कौन हलावे लीमड़ी ने कौन झुलावे
कौन हलावे लीमड़ी ने कौन झुलावे
[भाई से लिपटकर जैसे बहन के दुखों का सैलाब पिघलकर बहने लगा। छोटे भाई की कर्त्तव्यपरायणता उम्र की बावीसवीं पायदान चढ़कर एक अधिकार का रुप लेकर विस्तृत होकर फैल गई और बड़ी बहन की सारी बेबसी उसमें समा सी गई।]
बस के चलते ही खिड़की से एक ठण्डी हवा का झोंका आया और अमित जैसे विचारों की तन्द्रा से बाहर आ गया। उसके पास ही बैठी नीरु का चेहरा भावविहीन था। वह जब से बस में चढ़ी तब से लगातार खिड़की से बाहर ही देखे जा रही थी। हवा के हल्के झोंको के साथ पीछे छूट रहे शहर के बाहर स्थित महादेव मन्दिर के पास वाली सड़क से बस के गुजरते ही अचानक ही जैसे वह दो साल पीछे चली गई।
ब्याहकर आने के बाद शहर में प्रवेश करने से पहले मोड़ वाली सड़क के किनारे स्थित इसी महादेव मन्दिर में जाकर दुल्हन के रूप में उसने अपने दुल्हे राजा नरेश के संग पहली बार शीश नमाया था। फिर तो श्रावण मास के सोमवार से लेकर लगभग हर तीज त्यौहार इस मन्दिर में आये बिना पूर्ण नहीं होता था। शादी के पहले वाले साल की कुछ शाम के फुर्सत के क्षण इसी मन्दिर के खुले प्रांगण में नरेश के संग सुखद जीवन की कल्पना कर बतियाते हुए बीते थे।
तभी मोड़ से गुजरते ही बस ड्राइवर ने अचानक से जोर से ब्रेक मारा। वह अपनी सीट से फिसलकर कुछ आगे सरक गई। अमित ने हाथ का सहारा देकर उसे सम्हाल लिया। अमित के चेहरे पर एक उदासी के संग संतुष्टि भी छाई हुई थी। लेकिन नीरु का चेहरा अभी भी भावविहीन ही था। अमित उसे देखकर मुस्कुरा दिया। अमित की हथेली धीमे से दबाते हुए वह भी फीकी सी हंसी हंस दी। घुमावदार मोड़ से आगे निकलकर बस अब हाइवे पर आकर सरपट तेज गति से दौड़ने लगी। वह फिर से खिड़की से बाहर झांकने लगी। अमित ने पीछे सीट पर अपना सिर टिका लिया और आंखें बंद कर ली।
‘देख, तू तेरी दीदी के यहां किसी त्यौहार पर पहली बार जा रहा है। थोड़ी तहजीब से रहना। और हां उसके संग अब ज्यादा मजाक मश्करी मत करना।’ नीरु की शादी के बाद पहली बार पड़ने वाली रक्षाबंधन पर उसे घर आने न्यौता देने के साथ वीर पसली की रस्म पूरी करने के लिए अमित को नीरु के ससुराल भेजने से पहले मां ने उसे हिदायत देते हुए कहा।
‘क्यों मजाक मस्करी नहीं कर सकता मैं अपनी दीदी के संग। सुसराल ही तो गई है कोई जेल में थोड़े ही जाकर बैठी है।’ किशोरवस्था को पार कर युवानी की ओर डग भर रहे अमित ने मां की बात पर अपनी असहमति दर्शायी।
‘चुपकर। कुछ भी अनापशनाप बोल जाता है। अरें छोरी की नई नई शादी हुई है। कौन जाने उसकी सास का स्वभाव कैसा है। फिर तेरे जीजू को उसके संग अब तेरी पहले जैसी मस्करी करना पसंद आये न आये।’ उसकी बात सुनकर मां ने उसे डांटा।
‘ठीक है। अब आपका यह भाषण बंद हो गया हो तो जाऊं? एक बज रहा है। डेढ़ बजे की बस है।’ अमित ने पास रखा थैला उठाते हुए जाने की अनुमति मांगते हुए पूछा।
‘हां और सुन। कल सुबह नहाने के बाद कुछ भी खाने से पहले वीर पसली की रस्म पूरी कर देना। पहले वह तुझे तिलक लगायेगी फिर अपना पल्लू तेरे सामने फैलायेगी। तू साथ ले जा रहे गेंहू की पोटली में से पांच बार मुट्ठी में लेकर सारे गेंहू उसके पल्लू में डाल देना और जो ५०० रुपये तुझे दिए है न वह आखरी में उसके हाथ में रख देना।’
‘ओफ्हो मां। कल से दस बार यह बात बता चुकी हो आप। मैं कोई बच्चा न रहा अब जो भूल जाऊं। जा रहा हूं अब।’ मां की कही बात सुनकर खीजते हुए उसने कहा और उनके पैर छूकर थैला उठाकर घर से बाहर निकल गया।
‘अमित, जरा पानी की बोतल देना।’ सहसा नीरु का स्वर सुनकर अमित वापस वर्तमान में आ गया। अपनी जगह से खड़े होकर उसने हाथ लम्बाकर ऊपर रखे थैले में से पानी की बोतल निकालकर नीरु के हाथ में थमा दी। नीरु ने पानी के दो घूंट गले से नीचे उतारकर बोतल वापस अमित को सौंप दी। अमित ने बोतल को अपने दो पैरों के बीच में दबा लिया पर वापस आंख बंदकर सिर पीछे सीट पर टिका लिया।
‘दीदी, मां ने कहा था कि कुछ खाये बिना पहले वीर पसली की रस्म पूरी करनी है।’ दूसरे दिन सुबह नीरु के नाश्ते की प्लेट जब अमित के सामने धरी तो उसने मां की दी गई समझाईश याद आ गई।
‘इस घर में इन सारी रस्मों को कोई नहीं मानता। मैंने मां से कहा भी था पर फिर भी उन्होंने तुझे नाहक ही यहां भेजा। तू नाश्ता कर ले पहले।’ नीरु ने जल्दबाजी में बात को निपटाते हुए कहा।
‘तो क्या हुआ ? पहली राखी पर भाई को बहन को सासरे से लिवाने तो आना ही होता है न।’ अमित ने नीरु के घुंघट से ढके चेहरे पर आते जाते भावों को जैसे पढ़ने की कोशिश की।
‘बड़ा समझदार हो गया है रे तू!’ नीरु ने जबरदस्ती से उसके हाथों में नाश्ते की प्लेट पकड़ा दी और वहां से चली गई। अमित ने गौर किया उसकी प्लेट में मां के बनाये हुए लड्डू और उसके द्वारा लाया गया चिवड़ा ही रखा गया था। सहसा उसके जेहन में एक बात तैर गई। मां तो कभी भी मामा की लायी हुई मिठाई उन्हीं की प्लेट में उन्हें खाने को न देती थी। पापा को तरह तरह की हिदायते देकर मामा के लिए किसन हलवाई की दुकान से ताजी ताजी ईमरती मंगवाती थी। अपनी प्लेट में रखी खाने की चीजों को देखते हुए अपनी ही बातों में उलझता हुआ अमित चुपचाप नाश्ता करने लगा।
‘नीरु, तुम्हें कल मेरा व्हाईट शर्ट और ब्ल्यू पेंट इस्त्री कर आज के लिए तैयार रखने को कहा था न। तुमने अभी तक न किए। आज ऑफिस में जरुरी मींटिग है और मुझे वही जोड़ी पहननी है।’ तभी अन्दर के कमरे से जीजाजी का तेज स्वर अमित के कानों में पड़ा।
‘भूल गई। लाओ अभी किए देती हूं।’ उसे नीरु का सहमा सा स्वर सुनाई दिया।
‘अब क्या खाक करोगी। देर हो रही है मुझे। मायके से भाई ही तो आया है कोई फरिश्ता थोड़े ही है जो उसके आने की खुशी में घर के रोज के काम करना भूल गई।’
एक तीखा सा स्वर कानों में पड़ते ही अमित के कान जैसे सुन्न पड़ गए और मुंह का स्वाद कसैला हो गया।
‘टिकिटटिकिट.. तभी कंडक्टर की आवाज कानों में पड़ते ही अमित ने आंखें खोली और कुक्षी की दो टिकट लेकर सौ सौ की तीन नोट कंडक्टर के आगे बढ़ा दी। पचास रूपये उसे वापस कर कंडक्टर आगे बढ़ गया। अमित ने वह नोट अपने शर्ट की जेब में टिकिट के संग सरका दी और वापस अपना सिर पीछे सीट पर टिका लिया।
‘दीदी, आप कल मेरे साथ चल रही हो न। जीजाजी भी साथ आयेंगे न?’ शाम को अमित ने एकांत पाकर नीरु से पूछा।
‘इनकी छुट्टियां नहीं है। वैसे भी राखी तो अगले हफ्ते है न! मैं इनके साथ उसी दिन आ जाऊंगी। मां से कह देना मेरी नाहक चिन्ता न करें।’ अमित आगे कुछ कह या पूछ पाता इससे पहले ही नीरु काम होने का बहाना कर उसके पास से उठकर रसोई में चली गई। अमित को महसूस हुआ जैसे एक मोम की गुड़िया कांच की बोतल में बंद हो गई।
जिस गति से बस अपने गंतव्य स्थल की ओर बढ़ रही थी उससे भी तेज गति से अमित के मन में उथल पुथल होते हुए उसके दिमाग में पिछली एक एक घटना किसी टीवी सीरियल की भांति बार बार दस्तक देने लगी। टीवी और फिल्मों में नायिका के संग होते अत्याचार उसे काल्पनिक दुनिया की अतिश्योक्ति पूर्ण विचारों की उपज ही प्रतीत होते थे लेकिन उसका यह भ्रम दीवाली के बाद भाईदूज आने पर टूट ही गया।
दोपहर को खाना खाने वक्त घर के सदस्यों के चेहरे पर मुस्कान छाई होने के बावजूद अमित एक अजीब सा तनाव महसूस कर रहा था। नीरु उसे कुछ डरी सी और उसका व्यवहार उसे असहज सा लग रहा था। खाना का लेने के बाद वह उठकर रसोई से अभी बाहर के कमरे में गया ही था कि रसोई में किसी चीज के टकराने और बर्तन गिरने की आवाज सुनकर वह वापस रसोई में गया। नीरु अपने गाल को सहलाते हुए कांप रही थी। उसके सामने खड़ा नरेश उसे घूर रहा था। नीरु की सास पास ही बैठी जूठन साफ कर रही थी। नीरु के चेहरे पर उभरती हुई दर्दभरी लकीरें और गीली हो चुकी आंखें देखकर अमित को सारा माजरा समझते देर न लगी। उसके लिए यह बिल्कुल ही अकल्पनीय क्षण था।
‘जीजाजी, आपने मेरी दीदी पर हाथ उठाया ?’ नरेश की तरफ देखकर अमित की आंखें लाल हो गई।
‘इसी लायक है यह। शुक्र मना लात नहीं पड़ी।’ नरेश ने नीरु को एक और चांटा मारने के लिए अपना हाथ उठाया ही था कि अमित ने हिम्मतकर उसका हाथ पकड़ लिया।
‘अमित !’ नीरु चीख उठी। ‘यह कौन सा तरीका है अपने से बड़ो से व्यवहार करने का। चल माफी मांग तेरे जीजाजी से।’
‘कैसे रह रही हो दीदी आप यहां। चलों अभी मेरे साथ अपने घर।’ अमित ने जैसे नीरु की बात सुनी ही नहीं। अपनी आंखों में उभर आये आंसुओं को पोंछते हुए उसने नीरु का हाथ पकड़ लिया।
‘नहीं। मैं कहीं नहीं जाऊंगी। तू माफी मांग पहले इनसे।’ नीरु ने उसकी पकड़ से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा।
‘माफी तो मैं कभी नहीं मागूंगा और आपको भी यहां से ले जाकर रहूंगा।’ अमित की आंखें नरेश को देखते हुए लाल हो गई।
‘तेरी बहन पर अब तुझसे ज्यादा मेरा हक है, समझा। मैं खिलाता हूं इसे तू नहीं। यह यहां से मेरी मर्जी के बिना कहीं नहीं जाएगी।’ नरेश गुस्से से गुस्से से तिलमिला उठा।
‘आपकी मार और गालिया खाने के लिए नहीं हुई है उनकी आपसे शादी।’ अमित का स्वर गुस्से से तेज हो रहा था।
‘अमित ! मेरे भाई। मुझे सुखी देखना चाहता है तो यहां से अभी ही चला जा।मेरी जमी जमाई गृहस्थी बर्बाद न कर।’ कहते हुए नीरु अमित के सामने दोनों हाथ जोड़कर बेबस होकर खड़ी हो गई। अमित ने उसकी आंखों में देखा। बेबस हुई आंखों में उसे एक याचना नजर आ रही थी।
अपने मन को कड़ा कर उसने नीरु की सास की तरफ देखकर दोनों हाथ जोड़े और वहां से जाने को पीछे मुड़ा।
‘कोई संस्कार ही ना दिए है छोरे को मां बाप ने। लड़की वाले होकर झुकना तो पड़ता ही है।’ तभी उसके कानों में नीरु की सास का स्वर पड़ा। अमित वापस मुड़कर जवाब देने जा ही रहा था कि नीरु ने उसे आंखों के इशारों से रोक दिया। हारकर अमित वापस अपने घर आ गया।
’कौन हलावे लीमडी, ने कौन झुलावे पीपडी।
भाई नी बेनी लाडकी, ने भयलो झुलावे डालखी, बेनडी झूलेरे, भयलो झुलावे डालखी।’
तभी पीछे की सीट पर बैठे किसी सहयात्री के मोबाइल में बज रहे गाने के शब्द उसके कानों में पड़ते ही भाई बहन के स्नेह की सुनहरी स्मृति का अहसास पाकर उसकी आंखों की कोर गीली हो गई। डबडबाई हुई आंखों से उसने नीरू की तरफ नजर डाली। वह अब भी अपने ही विचारों में खोई हुई सी खिड़की से बाहर झांक रही थी।
‘मैं ससुराल जाऊंगी तो तू रोएगा?’ पंद्रह बरस की नीरु ने अपने से तीन साल छोटे अमित से खेल खेल में पूछा।
‘नहीं। मैं तो तुम्हारें साथ ससुराल आऊंगा दीदी।’ अमित नीरु से लिपट गया।
‘अच्छा ! वहां आकर तू क्या करेगा भला ?’
मैं, ठुड्डी पर हाथ रखकर कुछ सोचते हुए वह आगे बोला –‘मैं तुम्हें ससुराल से वापस अपने घर ले आऊंगा।’
बचपन में खेल खेल में नासमझी में कही बातें एक दिन हकीकत बनकर सामने आ जाएगी यह तो उसने सपने में भी न सोचा था।
घर पर भाईदूज के दिन नीरु की ससुराल वाली घटना सुनाते ही पूरे घर में एक हड़कंप सा मच गया। अभी तक इस घर की बेटी चेहरे पर झूठी मुस्कान लाकर अपने कुशल मंगल होने की झूठी बात कहकर मायके के संस्कारों की लाज रख रही थी। इस मसले पर घर और नजदीक के रिश्तेदारों के बीचबचाव के चलते अगले दस महीने हवा की तरह उड़ गए। इस बार राखी पर ननद के घर आने पर खुद के न आ पाने की मजबूरी बताकर नीरु ने मां को तो फोनकर समझा लिया लेकिन अमित के मन ने उसके झूठ को पकड़ लिया।
आज सुबह चुपचाप जब वह उसके घर की दहलीज पर पहुंचा तो नीरु बैग थामे बाहर बैठी हुई थी और घर का दरवाजा अन्दर से बंद था। अमित को अचानक आया देख नीरु सकपका गई। अमित ने उसकी आंखें पढ़ने की कोशिश की। कृश हो चुके चेहरे के अंदर धंस चुकी आंखें भाई को अपनी दहलीज पर पाकर आप ही गीली होने लगी।
‘और कितना झूठ बोलोगी और किसके लिए? कब तक अपने आपको छलती रहोगी दीदी।?’ कहते हुए अमित का गला रुंध गया।
‘अमित। मेरे भाई।’ कहते हुए नीरु अपने आपको रोक न सकी। भाई से लिपटकर जैसे दुखों का सैलाब पिघलकर बहने लगा। छोटे भाई की कर्त्तव्यपरायणता उम्र की बावीसवी पायदान चढ़कर जैसे एक अधिकार का रुप लेकर विस्तृत होकर फैल गई और बहन की सारी बेबसी उसमें समा सी गई।
‘आपके पड़ौस वाले शर्मा अंकल से फोन पर बात हुई थी। वही बता रहे थे कि पिछले दो दिनों से बहुत झगड़ा और मारपीट हो रही हो रही है। मुझसे रहा न गया दीदी। आप मर जाती पर अपना मुंह न खोलती। अगर फोन कर पता न लगाया होता तो शायद आपको आज खो ही चुका होता। चलो दीदी, अपने घर।’ अमित ने नीरु का हाथ पकड़ा और वापसी को अपने कदम बढ़ा लिये। नीरु ने एक पल पीछे मुड़कर बंद दरवाजे देखा और आंखों में उभर आये आंसुओं को अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछकर अमित के साथ चल दी।
