काल्पनिक दुनिया
काल्पनिक दुनिया
काल्पनिक रोमांस
बड़ी अजीब सी बात है जिंदगी है सुधा की , एक तरफ़ तो उसका जीवन बेहद उदासीन है क्योंकि उसका दुनिया जहान में कोई नहीं है नितांत अकेली , साधारण सी शक्ल सूरत वाली मध्यम परिवार की अनाथ लड़की जिसका था कभी एक सुखी सम्पन्न और समृद्ध परिवार लेकिन एक सड़क दुर्घटना में सभी लोग चल बसे और बच कर रह गई अकेली सुधा । दूर के बहुत सारे रिश्तेदार आएं थे परिवार वालों के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए लेकिन कुछ ही दिनों में बारी बारी से सभी वापस लौट गए अपने अपने घर । सभी ने खूब आग्रह किया सुधा को अपने साथ ले जाने को लेकिन सुधा अड़ी रही । उसने स्पष्ट शब्दों में विनम्रता से सभी को जवाब दिया कि अभी कुछ दिनों तक यहीं इसी घर में रहेगी जब तक उसकी अंतरात्मा यह स्वीकार नहीं लेती है कि वो अनाथ हो गई है उसका इस दुनिया में अब कोई नहीं रहा और अब उसे बाहर वालों से संबंध बनाना होगा तब तक किसी के साथ कहीं नहीं जाएगी । सुधा का मानना था कि मां , पापा , भैया और दीदी के अलावा बाकी सभी रिश्तेदार बाहर वाले होते हैं । चुकी परिवार के सभी लोग विदा हो लिए इसलिए उसे बहुत सोच समझकर अपना कदम बाहर निकालना होगा ।
उम्र बहुत अधिक तो नहीं थी लेकिन वक्त और हालात ने उसे इतना समझदार तो बना ही दिया था कि घर वाले और बाहर वालों में अंतर समझ सकें । बाहर वालों के छोटे से छोटे अहसानों की अक्सर बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है ऐसा उसके पापा कहा करते थें । इसलिए वो अपना अधिकांश काम खुद ही करने लगी थी और धीरे धीरे पूरी तरह आत्मनिर्भर बन गई थी । पापा के दफ्तर वालों ने पेंशन की कार्रवाई पूरी करवा दी थी । हर महीने पहली तारीख को अकाउंट में पैसे आ जाते थे । घर अपना था , दो तीन फ्लैट किराए पर था सो वहां से भी पैसे आते थे उससे ही दैनिक जीवन की जरूरतें पूरी हो जाती थी । पेंशन के पैसे निकालने की नौबत नहीं आई । किराएदार भी बड़े सज्जन थें मां पापा के समय से रहते थे सो एक पारिवारिक संबंध स्थापित हो चुका था । आंटी अंकल भैया और दीदी सब मिलकर एक परिवार ही तो था । सभी लोग सुधा का बहुत ख्याल रखते थे । कॉलेज जाने आने के लिए गाड़ी मुहैया करा दी गई थी । कूल मिलाकर जिंदगी सही तरीके से चल रही थी । हां तीज़ त्यौहारों पर परिवार वालों की बहुत याद आती थी ....ऐसे में चुपचाप अकेली बैठकर अपने अतीत के दिनों को याद करके अपना मन हल्का कर लेती थी । इस तरह उसे बड़ा सुकून मिलने लगा था । उसी अतीत के आधार पर सपनों के ताने बाने बुनकर वो एक काल्पनिक दुनिया बसा ली थी जहां पहले तो वो अपने मां , पापा , भैया और दीदी के साथ बातें करके खुश होती थीं फिर धीरे धीरे उसका मन उम्र के हिसाब से रंगीन सपने देखने लगा और उसने अपनी कल्पनाओं में एक "राजकुमार" तलाश लिया और फिर उस राजकुमार की रानी बनने का अभिनय करने लगी ।
उसकी दिनचर्या बदल गई । सुबह उठकर धरती को प्रणाम करती फिर दोनों हाथों को जोड़कर अपना चेहरा ढक लेती और मूंदकर आंखें कल्पना करती अपने उसी राजकुमार का .... और उसका चेहरा खिल उठता । खुशी खुशी दो कप चाय बनाती और टी टेबल पर आमने सामने दोनों कप रख देती । पहले एक कप पी लेती फिर सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठती और तब दूसरी कप चाय पीती । खुद ही खुद से बातें करती । अपने दिन भर की प्लानिंग सुनाती । नाश्ता बनाती खुद खाकर चल पड़ती और डाइनिंग टेबल पर एक प्लेट सजाकर रख जाती । कॉलेज से सीधे घर आती और डाइनिंग टेबल पर आकर दिन भर के सारे किस्से सुनाती खाना खाती और फिर अपने कमरे में जाकर कोई गजल चला कर सो जाती । शाम को आंटी नियमित रूप से आवाज़ देती संध्या दीपक जलाने के लिए तब हड़बड़ा कर उठती । दीपक जलाती और दो मग कॉफी लेकर झूला पर आ जाती । रात को खाना का भी वही हिसाब दो थाली में खाना लगाती । रात को सोने से पहले जरा सा सज संवर लेती अपने बिस्तर पर दो अलग अलग तकिया लगाती और बीच में एक तकिया लगाकर पार्टिशन कर लेती । आंखें मूंद कर कल्पना करती अपने उस राजकुमार का और फिर उस काल्पनिक रोमांस की दुनिया में मगन होकर सो जाती ..... । सुबह जब उठती तो एक अद्भुत ऊर्जा और स्फूर्ति का अनुभव होता उसे । बड़ी अच्छी सुबह , दिन और फिर शाम सुहानी होती और रात बेहद आरामदायक ....।
उसकी आंतरिक संतृप्ति उसके चेहरे पर मुस्कान बनकर दमकने लगे । उसके जीवन में खुशहाली छा गई । नहीं था कोई फिर भी उसकी दुनिया आबाद हो गई ।
