जोरू का गुलाम
जोरू का गुलाम
"अमाँ यार विश्वास, तुम तो ईद का चाँद हो गए हो। शादी क्या हुई तुम तो यारों को भूल ही गए। आज भी अगर इस बर्थडे पार्टी में ना बुलाता तो शायद तेरे दर्शन ही ना होते। अरे भाभी ने कौन सी छड़ी घुमाई के हमारा यार अब हमारा न रहा!" वंश विश्वास की टांग खींचते हुए बोला।
"अच्छा! आज बहुत दिन बाद मिले हो तो सेलिब्रेशन तो बनता है। भाभी को आंटी के साथ भेज देना और फिर हम चारों पहले की तरह"
"अरे नहीं यार वो शगुन को पीना-पिलाना पसंद नहीं" विश्वास ने थूक सा निगलते हुए कहा।
"देखा धीरज, कैसा जोरू का गुलाम हो गया है ये। अरे इन बीवियों का क्या?, ये तो बोलती ही रहती हैं। ज्यादा सर पे नहीं चढ़ाना चाहिए इन्हे। मेरी ये बात गांठ बांध ले। समझा, खुश रहेगा"
"तू भी मेरी बात गांठ बांध ले, शराब का गुलाम बनने की बजाय घर-परिवार का गुलाम बन जा। तू भी सुखी रहेगा और घर परिवार भी" कह कर विश्वास शगुन की तरफ निकल गया।
वंश, धीरज और वेद मुँह बाए विश्वास को देखते रह गए और विश्वास किसी बात पर शगुन के साथ मुस्कुरा रहा था।
