जीने की राह
जीने की राह
मन में ढेरों सपने संजोये सुम्मी ने राघव के घर में पहला क़दम रखा था। सुम्मी के माता पिता बचपन में ही गुज़र चुके थे। उसके भाई भाभी ने ही उसे पाल पोस कर बड़ा किया था , हालाँकि वह अपनी भाभी को फूटी आँख न सुहाती थी । आर्थिक तंगियों के बावजूद किसी तरह ट्यूशन आदि कर के सुम्मी ने स्नातक तक पढ़ाई की थी।देखने में बेहद आकर्षक सुम्मी को पूरा विश्वास था कि परियों के देश से आकर कोई राजकुमार उसे ब्याह ले जायेगा और उसे रानी बना कर रखेगा।
राघव की बनारस में छोटी सी रेडीमेड कपड़ों की दुकान थी । सुम्मी विवाह के पश्चात राघव के साथ शहर आ गई और बड़े अरमानों से अपने घरौंदे को सजाने सँवारने में व्यस्त हो गई । शुरू के कुछ दिन तो पंख लगा कर उड़ गये , परन्तु धीरे धीरे सुम्मी की सपनों की दुनिया उजड़ने सी लगी। राघव को शराब की लत थी और वह नशे की हालत में सुम्मी को मारता पीटता था । राघव को सुम्मी का किसी से भी बात करना पसन्द नहीं था। वह किसी के साथ भी अगर सुम्मी को हँसते बोलते देख लेता तो आसमान सिर पर उठा लेता। यहाँ तक कि जब वह दुकान पर भी जाता तो सुम्मी को घर में बंद कर बाहर से ताला लगा जाता। सुम्मी अपमान का कड़वा घूँट पीकर रह जाती परन्तु धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा , यह सोच उसके मन में नई आस जगाती ।
फिर एक दिन सुम्मी की ज़िन्दगी में तूफ़ान आ गया। राघव रोज़ की तरह ही नशे में धुत्त होकर जब लौटा तो उसने खिड़की पर सुम्मी को पड़ोस में रहने वाली एक महिला से बात करते देख लिया। घर में घुसते ही राघव का ग़ुस्सा सुम्मी पर कहर बन कर टूटा। आज न जाने कहाँ से सुम्मी में भी थोड़ी हिम्मत आ गई और वह चिल्ला पड़ी “ अब अगर तुमने मुझे हाथ लगाया तो मैं पुलिस स्टेशन जाकर तुम्हारी शिकायत दर्ज कराऊँगी “ यह सुनते ही राघव का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया “ ठीक है , तो फिर जा अब पुलिस स्टेशन में ही रह “ कहते हुए उसने सुम्मी को खींच कर घर से बाहर कर दिया और भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। सुम्मी ने इस अप्रत्याशित स्थिति की तो कल्पना ही नहीं की थी। वह गिड़गिड़ा कर बोली “ तुम जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूँगी....दरवाज़ा खोल दो...मैं इतनी रात में कहाँ जाऊँगी “ वह रोती रही , गिड़गिड़ाती रही पर राघव तो जैसे पत्थर का हो गया , उसके ऊपर कोई असर न हुआ “ जा , अब पुलिस स्टेशन में मर.... मेरे घर में तेरे लिये कोई जगह नहीं “ कह कर उसने घर की बत्तियाँ बुझा दीं , शायद सोने चला गया। पति पत्नी का आपसी मामला समझ ,पड़ोसी भी सुम्मी की मदद के लिये आगे नहीं आये।
अपमान , क्रोध , क्षोभ और असह्य पीड़ा की भावनाओं में उलझी सुम्मी वहाँ से चल पड़ी । उसे कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था । उसे अपना जीवन व्यर्थ लग रहा था। इस दुनिया में किसी को उसकी ज़रूरत नहीं...भाई भाभी और राघव सभी उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं , यह सोच उसके दिमाग पर हावी होती जा रही थी।
वह गंगा माँ की गोद में समा जायेगी , अपने प्राण त्याग देगी यह सोच कर सुम्मी गंगा किनारे आ पहुँची । जब वह घाट पर पहुँची तब तक रात बीतने को थी और एक नई सुबह होने को थी। सुम्मी वहीं घाट पर बैठ गई और प्रकृति की सुन्दरता में डूब सी गई। आकाश की लालिमा....पक्षियों का कलरव....मंद मंद चलती शीतल पवन...गंगा की मचलती लहरें और भोर की रश्मियाों को अपने भीतर समेटे , उगता हुआ सूरज।यह सब कुछ सुम्मी में एक नई ऊर्जा का संचार कर रहे थे। वह सोचने लगी , जैसे हर काली रात के घने अंधेरों को भोर का उजाला नष्ट कर देता है वैसे ही दु:ख के काले अंधेरे भी दूर हो जायेंगे। यह बुरा समय भी बीत जायेगा, वह दु:ख और कष्टों से घबरा कर अपने प्राणों की आहुति क्यों दे ? वह इतनी कमज़ोर तो नहीं कि अपनी परेशानियों से हार मान ले...वह लड़ेगी...अपने लिये भोर के उजालों की तलाश स्वयं करेगी।
वह इन्हीं सोच विचारों में गुम थी , तभी उसका ध्यान पास से आ रही रोने की आवाज़ से टूटा। उसने देखा , एक प्रौढ़ दंपति वहीं घाट पर बैठे थे , और वह महिला ज़ोर ज़ोर से रो रही थी। उनके पति उन्हें ढाँढस बँधा रहे थे। सुम्मी न जाने क्यों उठ कर महिला के पास गई और उन्हें सांत्वना देने लगी। उसकी प्रश्नवाचक निगाहों का जवाब देते हुए प्रौढ़ पुरुष बोले “ हम अभी अपनी बेटी का दाह संस्कार कर के आ रहे हैं “ सुम्मी को अपना दु:ख उन प्रौढ़ दंपति के दु:ख के सामने बहुत तुच्छ लगा।
थोड़े ही समय में सुम्मी और वे प्रौढ़ दंपति एक दूसरे के दुखों से वाक़िफ़ हो चुके थे। प्रौढ़ पुरुष का नाम देवीदयाल था , वे जौनपुर के किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे और उनकी पत्नी कमला देवी वहीं एक विद्यालय में अध्यापिका थीं । उन दोनों की एक ही पुत्री प्रीति थी , जिसका उन्होंने अभी दाह संस्कार किया था। प्रीति को अचानक मस्तिष्क ज्वर हुआ , उसे बनारस के बड़े अस्पताल में भर्ती किया , परन्तु प्रीति ने तीन दिनों बाद दम तोड़ दिया। इकलौती संतान की असमय मृत्यु से देवीदयाल जी और कमला जी बिलकुल टूट चुके थे।
सुम्मी और इन प्रौढ़ दंपति के बीच एक दु:ख और दर्द का रिश्ता बन चला था। कमला जी अपने आँसू थमने के बाद सुम्मी से बोलीं “ अब क्या करोगी बेटी ? कहाँ जाओगी ? “ कुछ सोचा नहीं आँटी , बी.ए. तक पढ़ाई की है...शायद कुछ ट्यूशन्स मिल जाएँ...कहाँ जाऊँगी यह तो पता नहीं पर वापस घर नहीं जाऊँगी इतना पता है “ सुम्मी ने उत्तर दिया। न जाने कहाँ से उसके शब्दों में दृढ़ता आ गई थी। “ बुरा न मानो बेटी , तो तुम हमारे साथ जौनपुर चल सकती हो....हमारे साथ रह सकती हो “ कमला जी ने प्रस्ताव रखा । “ परन्तु मैं आपके साथ कैसे चल सकती हूँ ? आप मुझे जानती ही कितना हैं ? फिर हमारे बीच कोई रिश्ता भी तो नहीं “ सुम्मी ने हिचकिचाते हुए कहा।दीनदयाल जी बोले “हमारे बीच दर्द का रिश्ता है बेटी “।“ परन्तु मैं आप पर बोझ नहीं बनना चाहती....अपने पाँव पर खड़ी होना चाहती हूँ “ सुम्मी के स्वर में अभी भी हिचकिचाहट थी । “ तुम चिन्ता मत करो बेटी....अपने पैरों पर खड़े होने में हम दोनों तुम्हारी सहायता करेंगे “ कमला जी बड़े प्यार से बोलीं ।
अब सुम्मी जौनपुर आ गई थी और दीनदयाल जी और कमला जी के घर के बाहरी हिस्से में बने एक कमरे में रहने लगी थी। उसने दीनदयाल जी और कमला जी से वादा लिया था कि जब वह अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी तो उस कमरे का किराया उन दोनों को देने लगेगी । दीनदयाल जी और कमला जी ने सुम्मी की बात मान ली थी। उनके घर के पास एक ब्यूटी पार्लर था , सुम्मी वहाँ काम सीखने जाने लगी । ख़ाली समय में आस पास के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।जिससे उसे थोड़ी बहुत आय हो जाती।
ऐसे ही समय बीतने लगा था। सुम्मी ने अपनी मेहनत और लगन से पार्लर में अच्छी पहचान बना ली थी।पार्लर में आने वाली सभी महिलायें सुम्मी के काम से बहुत प्रसन्न होती थीं ।उन्हीं महिलाओं में से कुछ धनाढ़्य महिलाओं ने सुम्मी की सहायता की और उसका अपना पार्लर खुलवा दिया।सुम्मी ने उस पार्लर का नाम रखा “प्रीति पार्लर” सुम्मी की अथक मेहनत और व्यवहारकुशलता से प्रीति पार्लर अच्छा चल निकला।उसके पार्लर अब कई लड़कियाँ काम करती थीं ।
दीनदयाल जी और कमला जी, सुम्मी की सफलता से बहुत प्रसन्न थे , सुम्मी उनका एक बेटी की तरह पूरा ख़्याल रखती थी। इस तरह सुम्मी को उसके माता-पिता तथा दीनदयाल जी और कमला जी को उनकी बेटी वापस मिल गये थे।
समय तेज़ी से बीत रहा था। सुम्मी के काम की तारीफ़ अब जौनपुर से बाहर भी होने लगी थी।ऐसे ही किसी विवाह में जब वह दुल्हन के मेकअप के लिये गई तो उसकी मुलाक़ात लखनऊ की श्रीमती अंजलि से हुई। अंजलि लखनऊ के किसी बड़े अधिकारी की पत्नी थीं । वे सुम्मी से बोलीं “ तुम्हारा काम इतना अच्छा है तुम क्यों छोटे से शहर में रह रही हो ? तुम अपना पार्लर लखनऊ में खोलो....मैं और मेरी सभी सखियाँ तुम्हारे ही पार्लर में आया करेंगे “ “ परन्तु लखनऊ जैसे बड़े शहर में तो हज़ारों पार्लर होंगे....वहाँ मेरा पार्लर कैसे चल पायेगा ? सुम्मी के स्वर में हिचकिचाहट साफ़ झलक रही थी ।” अच्छे काम करने वालों की हर जगह क़द्र होती है....तुम शुरूआत तो करो “ अंजलि मुस्कुरा कर बोलीं।
घर लौट कर सुम्मी ने दीनदयाल जी और कमला जी को इस बारे में बताया। दोनों यह सुन कर बहुत प्रसन्न हुए । दीनदयाल जी ने सुम्मी से कहा “ ज़रूर जाओ , लखनऊ जाकर हमारा नाम रोशन करो....बैंक से क़र्ज़ लेकर अच्छा सा पार्लर शुरू करो...बैंक क़र्ज़ देकर हमारे सपनों को पूरा करने में मदद करता है “ सुम्मी ने वैसा ही किया ।”प्रीति पार्लर “ की एक शाखा लखनऊ में भी खोली।
जैसी कि आशा थी ,” प्रीति पार्लर “ लखनऊ में भी अच्छा चल निकला।धीरे धीरे समय के साथ “प्रीति पार्लर” की कई शाखायें लखनऊ और अन्य शहरों में खुल गईं।सुम्मी की मेहनत , लगन और अदम्य हौसले से उसका व्यवसाय दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति करने लगा ।
आज सुम्मी का नाम बड़ी महिला उद्यमियों में गिना जाता है।लखनऊ में उसका अपना आलीशान बंगला है , जिसमें वह दीनदयाल जी और कमला जी के साथ रहती है। वे दोनों अब अपनी अपनी नौकरियों से रिटायर हो चुके हैं और सुम्मी का व्यवसाय संभालने में हाथ बँटा रहे हैं। सुम्मी अपने पार्लर में ग़रीब , शोषित , पीड़ित या बेसहारा लड़कियों को काम सिखाती है , जिससे वे भी उसकी तरह ही अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। हाँ , राघव ने कई बार सुम्मी से मिलने की कोशिश की , परन्तु सुम्मी के पास समय नहीं है। वह अतीत की काली परछाइयों से निकल कर अपने हौसले के दम पर जीवन पथ पर बहुत आगे निकल चुकी थी ।
