जिद्दी पड़ोसी
जिद्दी पड़ोसी
आज मिस्टर त्रिपाठी की बरसी है,उन्हें हमसे दूर गए आज एक साल हो गया,उनका पूरा नाम ज्वालादत्त त्रिपाठी था,जैसा उनका नाम था वैंसे ही वें थे भी,लेकिन वें ऊपर से जरूर गुस्सैल थे लेकिन उनका हृदय मोम की तरह था,किसी की परेशानी देखकर वे भी परेशान हो उठते थे,कहने को वो मेरे पड़ोसी थे लेकिन जाते जाते वें हम सबसे एक ऐसा रिश्ता कायम कर गए जो इन्सानियत की जीती जागती मिसाल बन गया,
मैं जब इस मोहल्ले में रहने आई तो पाया कि मिस्टर त्रिपाठी मेरे पड़ोसी है,इसलिए मैं उनसे जान पहचान करने के उद्देश्य से उनके घर गई और दरवाजे की घण्टी बजाई,उन्होंने दरवाजा खोला और मुझसे पूछा....
"कौन हो तुम"?
"जी!मैं आपकी नई पड़ोसन",मैनें कहा...
"तो मैं क्या करूँ",?वें बोलें...
"जी!फ्रिज का ठण्डा पानी चाहिए था",मैनें उनसे कहा..
"लेकिन मैं फ्रिज का पानी इस्तेमाल नहीं करता"
और उन्होंने ऐसा कहकर मेरे मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया,
उनका ऐसा जवाब सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया लेकिन मैं उस समय कुछ नहीं बोली और वहाँ से मायूस होकर चली आई,तब मेरे पति ने मुझसे पूछा...
"मुँह क्यों फूला है तुम्हारा"?
तब मैनें कहा....
"बूढ़ा खड़ूस समझता क्या है अपने आप को,मेरे बाप की उमर का था इसलिए लिहाज़ कर गई नहीं तो मैं भी सुना सकती थी",
"ओहो....इतना गुस्सा,बूढ़े इन्सान है किसी चींज को लेकर परेशान होगें और तुम पहुँच गई होगी तो सारी खुन्नस तुम्हारे ऊपर निकाल दी होगी",मेरे पति बोलें...
फिर उस दिन के बाद मैं उनके घर नहीं गई और एक दिन मैं बाहर अपनी बालकनी में खड़ी थी और उधर मिस्टर त्रिपाठी सड़क पर अपनी दोनों कारों को धोने का काम कर रहे थे,तभी पड़ोस में रहने वाले मिस्टर पटेल का बीस-बाइस साल का बेटा लकी आकर उनसे बोला...
"अंकल आपकी ये रेड वाली कार मुझे बहुत पसंद है क्या मैं इसमें एक बार टेस्ट ड्राइव ले सकता हूँ"?
इस बात पर मिस्टर त्रिपाठी बिफरकर पड़े और लकी से बोलें...
"खबरदार!जो तूने इस कार के बारें में सोचा भी",
"लेकिन क्यों",लकी ने पूछा...
"ये कार संयोगिता की है उसने अपनी कमाई से खरीदी थी,ये उसकी निशानी है,इसके बारें में कभी सोचना भी मत",मिस्टर त्रिपाठी बोले...
"तो फिर ये ब्लैक कार तो मैं चला सकता हूँ ना!",लकी ने पूछा...
"नहीं!ये मेरी कमाई की है,इसे मैं तुम्हें चलाने नहीं दे सकता,तूने कहीं ठोक दी तो",मिस्टर त्रिपाठी बोले...
त्रिपाठी जी की बात सुनकर मैनें अपने मन में पक्का कर लिया कि ये बहुत ही जिद्दी और खड़ूस इन्सान हैं और फिर एक रात कुछ ऐसा हुआ जिससे मैनें उनके बारें में अपनी राय बदल ली,उस रात मेरे पति बाथरुम में फिसल गए और उनके पैर की हड्डी टूट गई थी,मैं उस समय सात महीने की गर्भवती थी और मैं अपने पति की उन्हें फर्श से उठाने में मदद नहीं कर सकती थी और मेरी दो साल की बेटी भी थी जो उस समय सो रही थी,मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था और मैं भागी भागी मिस्टर त्रिपाठी के घर पहुँची उन्होंने दरवाजा खोला तो मैनें उनसे एक साँस में सब कह दिया,उन्होंने मेरी बात सुनकर फौरन गैरिज से अपनी कार निकाली और दरवाजे पर ताला लगाकर फौरन मेरे घर आकर मेरे पति को कार में डालकर हाँस्पिटल ले गए,रात भर वें हाँस्पिटल में ही उनके साथ रहें और मुझे घर पर मेरी बेटी के साथ रुकने को कहा....
दूसरे दिन घर आएं और फिर मुझे भी हाँस्पिटल ले गए ,दो दिन बाद मेरे पति को हाँस्पिटल से छुट्टी मिल गई लेकिन पैर में प्लास्टर अभी भी था और इन दिनों में मिस्टर त्रिपाठी ने मेरा और मेरे पति का पूरा पूरा ख्याल रखा,कुछ दिनों में मेरे पति ठीक हो गए लेकिन वें अब भी छड़ी का सहारा लेकर ही चल रहे थे,इसी बीच हमारी शादी की सालगिरह आई और ये बात मिस्टर त्रिपाठी को पता चल गई तो उन्होंने उस रात हमें रेस्टोरेंट डिनर के लिए भेजा और मेरी बच्ची को घर में रहकर खुद सम्भाला.....
फिर बाद में उनके व्यवहार से मुझे पता चला कि वें दिल के बुरे नहीं है और एक दिन बातों बातों में उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी जब से उन्हें छोड़कर गईं हैं तब से वें खुद को अकेला महसूस करते हैं,उनकी शादी को दो साल ही हुए थे ,उस समय उनकी पत्नी उम्मीद से थी और उनका एक्सीडेंट हो गया था,उनके जाने के बाद फिर त्रिपाठी जी ने किसी और को अपनी जिन्दगी में शामिल नहीं किया,लेकिन तब से वें चिड़ चिड़े हो गए और फिर लोगों से दूरी बनानी शुरू कर दी,
वें बीमार थे उन्हें ब्लड कैंसर था लेकिन उन्होंने हमें अपने आखिरी समय तक अपनी बीमारी की खबर भी नहीं लगने दी,हमारे साथ यूँ ही रहते रहे जैसे कि कोई बात ही नहीं है,मेरी बेटी उन्हें नानू कहने लगी थी और फिर मैनें अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया जो कि बेटा था,मिस्टर त्रिपाठी उस बच्चे को अपनी गोद में उठाकर रो पड़े थे और मुझसे रोते हुए बोलें....
"आज मुझे संयोगिता की बहुत याद आ रही है",
और इतना कहकर वें अपने आँसू पोछते हुए हाँस्पिटल से बाहर चले गए,मैं अब उनका बहुत ख्याल रखने लगी थी, उनमें मैं अपने पिता को देखती थी,दिन ऐसे ही गुजर रहे थें और एक दिन मैं उनके घर पर थी और तभी मिस्टर पटेल का बेटा लकी उनके पास रोते हुए आया और उनसे बोला....
"अंकल!पापा ने मुझे घर से निकाल दिया है",
"क्यों"? मिस्टर त्रिपाठी जी ने पूछा...
"वो इसलिए कि मैं किसी से प्यार करता हूँ",लकी बोला...
"कौन है वो लड़की"?,मिस्टर त्रिपाठी ने पूछा...
"इसी बात का रोना है कि वो लड़की नहीं लड़का है",लकी बोला....
"इसका मतलब तुम .....",इसके आगें मिस्टर त्रिपाठी ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया...
"हाँ! मैं....,लकी इतना ही बोल पाया था कि मिस्टर त्रिपाठी बोले... ,
"बस.... बस ... मैं समझ गया ,तू ऐसा कर मेरे घर के सरवेन्ट क्वार्टर में रह ले,वैसे भी वो खाली पड़ा है"
और फिर उस दिन के बाद लकी वहाँ रहने लगा,वो अपने काँलेज में लाइब्रेरियन का काम करता था इसलिए अपना खर्च निकाल लेता था....
अभी हमें मिस्टर त्रिपाठी का पड़ोसी बने एक साल ही हुआ था कि एक दिन जब मैं सुबह उनके घर गई तो उन्होंने दरवाजा नहीं खोला,मैनें लकी के मोबाइल पर फोन किया तब वो सर्वेन्ट क्वार्टर से बाहर आया और उसने घर के भीतर जाकर देखा तो चीख पड़ा और फिर उसने मेरे लिए दरवाजा खोला....
वहाँ का नजारा देखकर मैं परेशान हो गई क्योंकि मिस्टर त्रिपाठी अपने बिस्तर पर मृत पड़े थे और बिस्तर के पास खून की उल्टियाँ पड़ी थी,साथ में कुछ दस्तावेज भी पड़े थे,जो कि उनकी वसीयत थी,पुलिस आई और सभी चाँज पड़ताल करने के बाद उन्हें तसल्ली हो गई कि उनकी मृत्यु की वजह उनकी बिमारी थी, फिर हम सभी ने उनका दाह संस्कार किया,फिर उनकी वसीयत पढ़ी गई जिसमें लिखा था....
"मैं ज्वालादत्त त्रिपाठी,अपनी घर और जमीन का वारिस अपनी मुँहबोली बेटी शिवांशा गुप्ता को बनाता हूँ,मेरी ब्लैक कार का मालिक शिवांशा का पति अधिराज गुप्ता होगा और लकी को मेरी रेड वाली कार का मालिक बनाता हूँ और जब तक भी लकी चाहे मेरे घर के सर्वेन्ट क्वार्टर में रह सकता है, जीवनपर्यन्त भी,बैंक में जो भी कैश है वो मैं शिवांशा गुप्ता के बेटे और बेटी के नाम आधा आधा करता हूँ",
उनकी वसीयत सुनकर हम सभी का मन भर आया,वें ऊपर से जितने कठोर थे उनका मन उतना ही कोमल था,हालातों ने उन्हें ऐसा बना दिया था,हम सभी हमेशा समझते रहे कि वें बहुत जिद्दी और खड़ूस हैं लेकिन वें जिद्दी पड़ोसी नहीं,बहुत अच्छे पड़ोसी थे.....
समाप्त....
