जेवर
जेवर
"महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी..." उस खूबसूरत शाम की याद तरोताज़ा हो आई जब मम्मी मधुर स्वर में गाए जा रही थीं। बुआ जी ने जरूर नाक भौं सिकोड़ी थी। उनके बताये कई रिश्ते पापा पहले ही नापसंद कर चुके थे। इसी बात पर खार खाए बैठी थीं। किसी में कोई कमी थी तो किसी में कोई और?
पापा अपनी इकलौती बेटी की शादी बहुत सोच समझ कर करना चाहते थे। इस रिश्ते की बात पर पहली बार दादी ने हामी भरी थी। उनकी बात पिता जी नहीं टालते थे। बस चट मँगनी पट ब्याह संपन्न हो गया। साक्षात राम-सिया की जोड़ी थी हमारी। मम्मी-पापा ने हमें जी भर कर सजाया। विदा हो ससुराल आते ही मैंने सारे जेवर उतार कर सासु माँ के हवाले कर दिये और सासु माँ ने जेठानी जी के साथ भेजकर लाॅकर में रखवा दिया था। वहीं आखिरी बार देखा था उन प्यारे गहनों को। मेरी माँ अपने माता-पिता की अकेली संतान थीं और मैं उनकी इकलौती बेटी, ऐसे में सारे खानदानी जेवर मुझे ही मिले। तीज-त्यौहार पर माँ के गले की शोभा बढ़ाने वाले उन हारों को भला कैसे भुला सकती थी।
आज उन्हें समीरा के गले में देखा तो जैसे तन-बदन में आग लग गई। इसके पास ये कैसे आये? मन में सोचने लगी। माँ ने विदा करते हुए कहा था कि, "छोटी बहु हो, परिवार से हटकर कुछ ना करना। वहाँ के रहन-सहन को अपनाकर हमारा मान-सम्मान बढाना।"
उनके सीखों को मन में संजोये, हर छोटी-बड़ी बात में मैं सौ बार सोचा करती। मेरी किसी बात से किसी का दिल ना दुखे। क्या करती? मायके में यही संस्कार मिले थे। पर यहाँ किसी तरह की बन्दिश नहीं थी। सभी मस्त व मर्जी के मालिक थे। उपर से पति की नौकरी विदेश में थी। इन्हीं कारणों से ससुराल में रहना ही नहीं हो पाया। हर साल छुट्टियों में घर आती। मायके- ससुराल घूमने में ही पूरा वक़्त निकल जाता।
परेशानी तो तब शुरू हुई जब हार्ट-अटैक से सासु माँ का अचानक निधन हुआ। उनकी इतनी उम्र भी ना थी। परिवार के लिए बड़ी संकट की घड़ी थी। सारे मेहमानों की विदाई के बाद ससुर जी ने मीटिंग बुलाई और कहा कि, "माँ के रहते जैसे मिल कर रहते थे वैसे ही रहना ताकि जगहँसाई ना हो।" उनकी बातें बिल्कुल सही थीं। हमने भी हामी भर दी। अब गहनों के बँटवारे की बारी थी। एक से डिजाइन के दो सेट गहने सामने थे जोकि ससुर जी ने एक साथ दोनों बहुओं के लिए बनवाए थे। उनके अलावा वह थे जो तीज -त्यौहारों पर हमें नेग स्वरूप मिले थे। पर मेरे मायके के गहनों का कोई अता-पता ना था।
"मेरे मायके के गहने कहाँ है भाभी?" "कैसे गहने ? जो भी थे सामने पड़े हैं।" उन्होंने टका सा जवाब दिया। "पर माँ ने आपको ही लाॅकर में रखने के लिए दिये थे।" "अब बीच में कई बार लाॅकर से जेवर निकाले गए। शादी वाले घर में इतने आने-जाने वालों की भीड़ होती है। चोरी हो गए होंगे।" "ऐसे कैसे चोरी हो गए भाभी? "देखो छोटी! तुम तो आराम से विदेश में रहती हो। मैं अकेली घर-परिवार, रिश्ते-नाते क्या-क्या सँभालूँ।"
दोनों बहुओं की तनातनी देख ससुर जी ने मुझसे कहा कि "तुम्हें किस बात की कमी है बेटी? जब चाहो अच्छे से अच्छा खरीद सकती हो।" "पर पापा वह गहने नानी ने माँ को और माँ ने मुझे दिये थे। मुझे वही चाहिए।" अगले दिन की वापसी थी। उन्ही तनावों में वहाँ से निकली तो वापस ससुराल जाने का का भी दिल ही नहीं किया। सुना था कि जेठानी की भतीजी शादी के बाद दुबई रहने आ गई।
आज आमना-सामना भी हो गया। तो जेठानी ने मायके में अपनी धाक जमाने के लिए मेरे गहनों का इस्तेमाल किया था। देर से ही सही पर सच्चाई सामने थी। सब कुछ पति को बताया पर कोई फायदा नहीं हुआ। उन्हें इन जनानी बातों से कोई दरकार ना था। मैंने भी सीधी बात करने के ठानी।
"गहने मिल गये भाभी! मेरी माँ के गहनों को देख कर बहुत अच्छा लगा।" "अच्छा! कहाँ मिले? मैंने तो पहले ही कहा था कि तुम खुद रखकर भूल गयी होगी।" "भूल तो आप गईं भाभी अपनी भतीजी को पहनाकर।" "भतीजी ........!" गश खाकर गिर पड़ीं।
"क्या हुआ भाभी?" उस ओर से कोई आवाज़ नहीं आई। एक सन्नाटा सा पसरा था। होश आने पर जेठानी जी के आँखों के सामने सब घूम गया। दो वर्ष पहले अपनी माता जी के स्वर्गवास पर मायके गई थीं तो ढूंढने पर भी गहनों की वह पोटली ना मिली जो उनके संदूक में छुपा कर रख आई थीं। अपनी भाभी से उन गहनों के बारे में पूछ -पूछ कर थक गई थीं। उन्हें वही जवाब मिला जो कुछ मुझसे कहा था कि, "कौन से गहने-कैसे गहने? मुझे कुछ भी नहीं पता।"
पासा पलट गया था। इस दफे चोर के घर चोरी हुई थी। अब उनकी भतीजी के गले में पड़े हार ने दूध का दूध, पानी का पानी कर दिया था।
