जेम्सबोंड

जेम्सबोंड

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अरे शंभू आजकल कैसा हो गया है रे ? ना तू बात करे ठीक से ना ही तू खाना खावे ना तो तू दोस्तों के साथ जावे है कहीं पे ! पहले तो तू घर में नहीं टिके था अरे बाबू अब के हो गया है तने ? थारी तबियत तो ठीक है चल डाक्टर के पास मैं लेके चलूं तने अपनो वो सरमो एक ही दिन में ठीक कर देगो उसकी दवा बड़ी अच्छी रेवे ! चल उठ उठ महारा लाडेसर के बात है उठ-उठ कहते-कहते अम्मा प्यार से सिर पर हाथ फेरती है और चलने के लिए जोर देती है शंभू एकदम चिला पड़ता है - अम्मा मने कहीं भी नहीं जाना परेशान तो मती कर मेरो लारो छोड़ !

अरे छोरा तने तमीज भी बेच खाई के जो ऐसी बात करे मैं तो थारे भले के खातर कह री थी तने सरम कोनी आवे थारे बाप की मां हूं ! थारो बाप तो ऐसे कदी ना चिलायो म्हारे सामने मैं कुछ भी कैती डांटती गुस्सो करती बेचारो नीची गर्दन करके बैठो रेवे थो और तू राक्षस की जियां दहाड़ रयो है कांह ते ये सब सीख के आयो है ? पहले तो ऐसो नई थो थारे पढ़ने-लिखने को के फायदो ?

शंभू को अपनी गलती का अहसास हुआ तो अपनी अम्मा से माफी मांगने लगा - अम्मा मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई मुझे माफ़ कर दो मैंने तेरी नकल भी उतारी सौरी अम्मा कहते-कहते अपनी दादी से लिपट गया !

अरे-अरे छोरा मने पटकेगो के ? जब तू म्हारी नकल करे तब तो म्हारो लाडेसर लागे !

अम्मा बड़ी जोर की भूख लगी है कुछ अच्छा-अच्छा खिला ना अपने हाथ से खिलाओ ना अम्मा जैसे बचपन में खिलाया करे थी पता नहीं क्या हुआ कि फफक पड़ा ! दादी ने अपने लाडले पोते को बिलखते देखा तो पसीज गई और अपनी बाहों में भर लिया। प्यार से चुप कराने लगी सहलाने लगी इस प्यार भरे स्पर्श से रोना थमने के बजाय और भी हिचकियां बंध गई। इस तरह रोते देख दादी को आश्चर्य होने लगा ऐसा क्या हो गया जो इस तरह रो-रो के हलकान हो रहा है बचपन के बाद आज पहली बार ऐसे रोते हुए देखा ये क्या चिंता तो होनी ही थी। उसके माता-पिता तो बचपन में ही गुजर गए थे पिता को टीबी थी पहले टीबी मतलब एक घातक रोग ! जब वह आठ महीने का था तभी उसके पिता चल बसे यही बीमारी मां को भी लग गई थी साढ़े तीन साल का हुआ तो मां भी रामप्यारी हो गई ! यूं तो चाचा-चाची थे पर उनके अपने बच्चे थे तो इसके साथ न्याय कैसे कर पाते ! दादी ने बड़े लाड और नाजों से पाला अपनी अम्मा के तो जिगर का टुकड़ा था भला कैसे किसी के भरोसे छोड़ देती हां चाचा जान छिड़कता था मगर चाची का आये दिन झगड़ा अम्मा को यह सब सहन नहीं था उनके लाडेसर को मजाल है जो कोई कुछ कह दे ! इसलिए आज चिंता तो होनी ही थी !

जब - तब बहु के झगड़ों से तंग आकर आखिरकार अम्मा ने फैसला किया भाई रे मैं और शंभू तो अब अलग रवेंगे अपना सब काम खुद ही कर लवेंगे ये रोज को झगड़ो बरदास कोनी मने म्हारे छोरा पे भी कितो खराब असर पड़े तू थारे संभाल थारी लुगाई ने ! खबरदार जो म्हारे छोरा ने कुछ कई तो ऐसो नई समझे के बेचारे छोरा के मां-बाप है नई तो मां बनके पाले - पोसे सो तो नई ऊपर से रोज -रोज का नाटक करे ! बूढ़ी हो गई तो के हुओ इती कमजोर कोनी अपने शंभू को तो पाल ही लूंगी वो भी एकदम आच्छी तरह से ! म्हारे जगत की निसानी है खूब पढ़ा-लिखा के बड़ो आदमी बनाऊंगी और तब से घर के दूसरे हिस्से में दादी-पोते रहने लगे। पोते के प्यार में दिवानी दादी खूब ख्याल रखती उसकी पसंद की हर चीज बनाती। स्कूल के एडमिशन के लिए सब भाग-दौड़ चाचा ललित ने की बाकी सब पढ़ाई खाना-पीना उसकी हर तरह से देखभाल करना हारी-बीमारी इत्यादि सबकुछ अम्मा के जिम्मे था।

इतना प्यार करती कि उसे जरा भी उदास देखती तो परेशान हो जाती हालांकि सब समझती थी बच्चा है मैं कितना भी प्यार करूं फिर भी मां-बाप की कमी तो खलती है भले ही मां-बाप की सूरत भी याद न हो ! इसलिए भरसक कोशिश करती शंभू के लिए कि किसी प्रकार की उसे कोई तकलीफ न हो ! इस तरह शंभू अपनी दादी के प्यारभरे लालन-पालन में बड़ा हुआ अम्मा ही उसे अपनी मां लगती अपनी हर तकलीफ और परेशानी अपनी दादी से बेझिझक बताता। कुछ भी अच्छा-बुरा जो भी होता अपनी अम्मा से शेयर करता। अम्मा तो अपने बच्चे के लिए एक पैर पर खड़ी रहती अब तो वे भूल ही चुकी थी कि दादी हैं याद था तो महज इतना ही कि उन्ही का कोख-जाया है अगर उनका कोई किरदार है तो वो है मां का किरदार जो वे बख़ूबी निभा रही थी ! ऐसे ही इस मां के प्यार में पला-बढ़ा ! गांव में पढ़ाई की व्यवस्था बारहवीं तक ही थी आगे वो जयपुर जाकर पढ़ना चाहता था पर अम्मा का मन नहीं था इतनी दूर भेजना लेकिन शंभू ने आगे पढ़ने की जिद की अम्मा को माननी पड़ी अपने लाडेसर की बात लेकिन एक शर्त पर मैं भी साथ जाऊंगी कमरा ले लवेंगे हम मां-बेटा वहीं रह लवेंगे ! वहां का एडमिशन एवं अन्य सारी व्यवस्था ललित ने कर ली थी। अम्मा-बेटा दोनों बड़े प्यार से रहने लगे। शँभू सुबह जाता शाम को आता। एक दिन अम्मा की तबीयत काफी खराब हो गई पंद्रह दिन अस्पताल में रहना पड़ा शंभू ने अम्मा को अस्पताल में भर्ती करने के बाद चाचा को बताया और आने को कहा लेकिन वो भी आज आता हूं कल आता हूं इस तरह एक हफ्ता निकाल दिया बराबर एक हफ्ते बाद आया। अम्मा ठीक होकर घर आ गई। ललित वापस चलने के लिए अम्मा से कह रहा था - देख अम्मा अब तुम्हें वहां गांव में रहना चाहिए बीमार-सीमार पड़े कितनी परेशानी होवे थारे अठे होने से और मने भी तो काम छोड़ कर आना किता मुश्किल होवे ! शंभू ने भी कहा - हां अम्मा मैं रह लूंगा बड़ा हो गया हूं मेरी चिंता मत करो मैं हर शनिवार को आ जाया करूंगा ! एक महीने बाद तो छुट्टियां पड़ने वाली है जब छुट्टियां खत्म हो जायेगी और मैं वापस आऊंगा तब आप भी आ जाना तब तक आपका आराम हो जायेगा।

पर छोरा

अरे अम्मा मेरी चिंता मत करो मैं सब ठीक से कर लूंगा शाम को रोज आपसे बात करूंगा फिर एक महीने की ही तो बात है वहां सब लोग हैं ना  आपका ख्याल रखने के लिए यहां तो मुझे कॉलेजपं जाना पड़ता है आप अकेले रह जाते हो तो आपकी फिक्र रहेगी ना ! हां-ना करते आखिरकार अम्मा मान गई ! शंभू हर शनिवार को आता था और सोमवार की सुबह चला जाता था उसका भी तो अपनी अम्मा के बिना मन नहीं लगता ! छुट्टियां खत्म होने के बाद अम्मा को भी साथ ले गया।

एक दिन अम्मा ने पूछा - अब तेरी डाक्टरी किते साल में पूरी हो जावेगी ? पास करके अपने गांव में रहना वहां और कोई ना है बस वो सरमो ई है वो भी तो छोटी - मोटी बीमारी को ई इलाज कर सके ये ई सरदी खांसी ताप वगैरह बस तू तो अपने गांव में ई डाक्टरी करियो !

 हां अम्मा मैंने भी यही सोचा है अभी तो डेढ़ साल बाकी है बाद में अपने ही गांव में एक छोटा अस्पताल बना लेंगे ! अपना बाड़ा है वहां ठीक रहेगा।

 छोरा वहां तो जगा बांधनी पड़ेंगी।

 पहले कच्चा बांधकाम कर लेंगे बाद में धीरे-धीरे हो जायेगा सरकार से कर्ज ले लेंगे अस्पताल आपके नाम से खोलूंगा !

महारा लाडेसर !

डाक्टरी पास करके शंभू अपने गांव वापस आया अपनी दादी के पास उनकी तो खुशी का पारावार न था अपने डाक्टर पोते के साथ जो थीं उन्हें देखकर तो ऐसा लग रहा था जैसे वे खुद ही डाॅक्टर बन गई हैं ! वाकई अम्मा की खुशी तो देखते ही बनती थी ! गांव वालों ने खूब भव्य स्वागत किया घरवालों को तो मजबूरी में साथ देना पड़ा चाचा के अलावा एक चाचा हीं तो था जो सच में बहुत खुश था। 

 वैसे गांव में सरकारी अस्पताल था लेकिन वहां डाक्टर तो कभी -कभार ही मिलता था फिर भी उसे लगा यहीं से शुरूआत करनी चाहिए अपना अस्पताल बांधकाम करने के बाद शुरू करेंगे। उसने अप्लीकेशन तो दे दी काम भी उसी दिन से करने लगा। अपने मन से ज्वाइन किया था इसलिए वहां के कलेक्टर ने अस्पताल का सारा कारभार शंभू को सौंप दिया ! बाकी के जो दो डाक्टर थे उन्हें रेग्यूलर होने के लिए वार्निंग दी गई कभी दिखते ही नहीं थे हां रजिस्टर में रेग्यूलर थे बेचारा कंपाउंडर उसका एक यही काम था - आज तो डाक्टर साहब आये नहीं कल आयेंगे कल आना। शंभू के आने के बाद साल भर में अस्पताल के रंग ही बदल गये मरीजों का इलाज और देखभाल वगैरह सब अच्छी तरह से होने लगा। कलेक्टर उसकी इन कोशिशों और काम से बहुत ही खुश था वाकई शंभू ने एक साल में ही अस्पताल की काया ही बदल दी लेकिन अब उन पहले वाले डाॅक्टर्स को रेग्यूलर आना पड़ता इसलिए उनके लिए तो शंभू मुसीबत ही था। इस बारे में शंभू ने पर्सनल रूप से बात की - सर आपसे एक रिक्वेस्ट है आप इन दोनों डाक्टर्स का कहीं और जगह तबादला करवा दीजिए ये लोग गांव में खुश नहीं है मैं जानता हूं ये लोग डाक्टर अच्छे हैं बस ये अपने शहर में रहना चाहते हैं मेरे साथ पढ़ने वाले मेरे मित्र आस-पास के गांवों के हैं अगर उन्हें यहां अपोइंट किया जाय तो वे यहां अच्छी तरह से कार्य करेंगे मैंने उनसे बात की थी वे तैयार हैं सर एक और बात है मेरे माता-पिता मेरे बचपन में ही गुजर गए थे जन्म से मेरी अम्मा ने पाला।

 अम्मा ने मतलब मां ने ? 

 दादी ने माता-पिता के रूप में अम्मा को ही देखा है जाना है माना है इतना प्यार से पाला है कि शायद मां भी ऐसे न पालती ! मैं अपनी अम्मा के नाम से गांव में अस्पताल खोलना चाहता हूं इसलिए ये अस्पताल अच्छे हाथों में सौंपना चाहता हूं ! 

 शंभू तुम्हारी भावना की कद्र करता हूं लेकिन तुमसे अच्छे कोई और हाथ हो ही नहीं सकते ! तुम्हारी अम्मा को नमन तुम तो इसी अस्पताल को अपनी अम्मा का अस्पताल समझकर काम करो बाकी सब मुझपर छोड़ दो !

 लेकिन सर मैंने अपनी अम्मा के लिए खुद से वादा किया है !

 मैं जयपुर जाकर कमिशनर सर से बात करूंगा तुम्हारी अम्मा का नाम इसी अस्पताल को दिया जाय और इसी का विस्तार किया जाय ताकि यह अस्पताल सही ढंग से चलता रहे !! इसमें भी गांव का ही भला होगा तुम जिसको भी यहां लाना चाहते हो ला सकते हो और जिन सामानों की जरूरत है लिस्ट बना दो  पहली बार तो किसी गांव का कोई अस्पताल सुचारू रूप से चल रहा है आय एम प्राउड ऑफ यू ! इतना सब होने के बावजूद जिन डाॅकटर्स का तबादला करवाया गया था उनका शहर में न होकर और भी दूर - दराज के गांवों में अलग-अलग हो गया तब से दोनों खुनस खाये हुए थे किसी भी तरह से शंभू से बदला लेना चाहते थे बस मौके की तलाश में थे आज वो मौका भी आ गया ! पास के देवरिया गांव में मेडिकल केंप लगा इसका प्रमुख डाॅक्टर था शंभू जब इन दोनों को पता चला तो इन्होंने भी अपने आने का जुगाड़ लगाया केंप दस दिन का था बस अच्छी तरह से चल रहा था कि आठवें दिन ऑपरेशन के दौरान एक पेशेंट की जान चली गई ऑपरेशन कर रहे थे वे दोनों डाक्टर जगताप और मोहन ताज्जुब की बात तो यह है कि पांव के टखने का ऑपरेशन और मौत ! नामुमकिन मगर यह हुआ  इसका दोषी शंभू को माना। लाख सफाइयां पेश करने के बाद भी नतीजा ‘ ढाक के तीन पात ‘ ! इन्क्वायरी बिठाई गई पूरी जांच-पड़ताल के बाद शंभू को ही दोषी पाया गया जगताप और मोहन को ऑपरेशन की मंजूरी देना ही उसका बहुत बड़ा अपराध सिद्ध हुआ क्योंकि उसने ऑपरेशनज की परमीशन लिखित दी जब कि ऐसा नहीं था इन दोनों ने सर्जन न होते हुए भी ऑपरेशन की परमीशन कैसे हासिल की ! इस पर तो वो खुद भी हैरत में था उसने कलेक्टर और कमिशनर को अप्लीकेशन दी लेकिन पहले वाले कलेक्टर का तबादला हो चुका था ये कुछ भी सुनना नहीं चाहता था उसका कहना था किसने भी किया मगर मौत तो तुम्हारे ही अंडर में हुई है यह मामला तो बहुत आगे जायेगा अब !

अभी तक घर में उसने किसी को भी नहीं बताया यहां तक कि अम्मा को भी नहीं ! लेकिन उसे उदास देखकर अम्मा को कैसा भी तो लग रहा था उसे रोज इस तरह उदास देखती कलेजा मुंह को आता आज तो हद हो गई यूं औंधा पड़ा था अम्मा लाड करते हुए उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगी कुछ देर यूं ही उसे सहलाती रही बाद में बोली - के हुओ म्हारे लाडेसर को ? कुछ नहीं बोला फफकते हुए अम्मा की गोद में मुंह छुपा लिया और फफकता रहा साथ ही अम्मा की आंखें भी गंगा - जमना हो रही थी ! इसी तरह काफी देर तक अम्मा की गोद में सिर रखे पड़ा रोता रहा अम्मा भी उसे वैसे प्यार करती रही आंसू भी बहाती रही ! जब कुछ संयत हुआ तो उठा अम्मा के आंसू पोंछे उन्हें प्यार किया और खुद ही चाय बनाकर लाया साथ में भुजिया भी जो अम्मा को बहुत पसंद था वे चाय के साथ जरूर लेती एकाध चम्मच। लेकिन उसे तो चाय के साथ मीठा पसंद था वो भी खुरमानी अम्मा ने अपने पीछे रखा डब्बा सामने रख दिया देखकर शंभू के मुंह से एकाएक वाह निकला ये कहां से आये ?

 आज सुबह ही भंवरू से मंगाये थे मने म्हारे लाडेसर की खातर और बड़े लाड से उसकी तरफ देखा अम्मा की आंखें डबडबा रही थी। उसने अम्मा की आंखों को पोंछ कर उनके हाथों को चूम लिया अम्मा के होंठों पर मुस्कान आ गई फिर कुछ देर चुप रहने के बाद बोली - ले अब बता ऐसो के हुओ है ?

अरे मेरी मां कुछ खास नहीं !

चल खास नहीं तो अनखास ही बता दे अब तू मने परेशान तो कर मती।

अम्मा कुछ भी नहीं बस ऐसे ही

ठीक है म्हारे सिर पर हाथ रख कर कसम खा - कुछ नहीं है ! तने म्हारी कसम है जो तू म्हारे से झूठ बोला म्हारो मरो मुंह देखेगो ! तू अपनी अम्मा से छुपावे ?

क्यों कसम दे दी अम्मा मैंने छुपाया इसलिए कि तुमको तकलीफ होगी सहन नहीं कर पाओगी लेकिन अब सबकुछ बता दूंगा पर अबतक जो छुपाया उसके लिए तू मने माफ करे तो बताऊं।

म्हारा लाडेसर तने माफ नहीं करेगी तो मैं रवेगी कैसे ! बोल छोरा म्हारी तो जान सूख रही है। अम्मा के हाथों को अपने हाथों में लेकर जो हुआ सब बता दिया। अम्मा सोच में पड़ गई कुछ देर यूं ही सोचती रही और फिर बोली - तने फिर से जांच की अर्जी दी उसको के हुओ ?

अगले महीने की दस तारीख को कमेटी बैठैगी आज से ग्यारह दिन बाद जयपुर में।

ठीक है मैं भी साथ में जाऊंगी।

पर अम्मा

घरवाले जा सके है ना ?

जा सकते हैं पर तुम्हें परेशानी होगी पता नहीं क्या फैसला हो अम्मा अभी भी मैंने पूरी बात नहीं बताई जो करने वाला था लेकिन अब नहीं करुंगा सुनने के बाद नाराज़ मत होना तुम्हारी कसम के कारण बता रहा हूं कबसे मेरा मन खाये जा रहा है इस झूठे आरोप के कारण मेरा लाइसेंस रद्द कर दिया जायेगा और सज़ा भी मिलेगी मैं ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा और फिर अपनी अम्मा को कैसे अपना मुंह दिखाऊंगा ! ये भी चिंता थी मेरे बाद मेरी अम्मा कैसे रहेगी मुझे माफ़ कर दो अब हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा ! लेकिन तुम कहां बेकार ही परेशान होओगी !

 बस बोल दिया तो बोल दिया मैं जाऊं हूं कोर्ट बस अब बहस नाय समझो छोरा ? पर तूने ऐसो करने को सोच लियो म्हारो लाडेसर इतो कमजोर कदी ना हो सके !

आखिर वो दस तारीख भी आई दादी-पोता दोनों गये अभी कमिटी वाले आये नहीं थे  पैंतालीस मिनट बाकी थे मगर वे दोनों डाॅक्टर आये हुए बाहर वेटिंग एरिया में बैठे थे। गेट पर ही अम्मा ने कहा - अब तू मने नहीं पिचाणे मैं तने नहीं पिचाणूं म्हारे से बात मती ना करे समझ गयो ? 

हां समझ गया मगर ये सब क्या है ?

कुछ नहीं बस तू चुप रे अनजाण बणके रे ! ओ बता - दोनों वो डाक्टर आये हैं तो तू आगे जा उनसे बात कर फिर उनसे दूर जाकर बैठ जा अंदर जाने के बखत मने मती बुलाना मैं आप ई आ जाऊंगी। तू यो समझ ले मैं तेरे साथ में हूं ई नहीं।

अच्छा पर तेरी चिंता हो रही है क्यों कर रही है ऐसा ? 

शंभू तू म्हारी तो चिंता मती कर और चुपचाप आगे जा।

अब शंभू हैरान था फिर भी चुप रहने में ही भलाई थी अम्मा की दबंगई तो जानता ही था ! आगे जाकर डाक्टर जगताप और मोहन से दुआ सलाम की फिर चार रो छोड़ कर बैठ गया और अम्मा उन दोनों के पास बैठ गई। पहले थोड़ी देर चुप रही फिर यूं ही बड़बड़ाने लगी - अब दिखाऊंगी उस राक्षस को जे डाक्टरी नहीं आवे तो क्यूं करे मेरी बेटी को मार दिया जल्लाद ने कहते हुए सुबकने लगीं। इस तरह रोते हुए देख दोनों डाक्टर उनकी तरफ आकर्षित हुए जगताप ने पूछा - कब क्या हुआ था आपकी बेटी को ?

 अभी पंद्रह दिन पहले की तो बात है  बच्चा होणे वाला था पहला बच्चा था दोनों को मार दिया राक्षस ने ! मने पतो चलो है इसने पहले ही किसी को मारा है आज उसी को केस है ना ? मैं भी अपनी फरियाद करूंगी राक्षस को फांसी दिलाऊंगी  देखो उधर कैसो चुपचाप बैठो है राक्षस ! आप कौन आपको भी कुछ है क्या ?

आप एकदम सही कह रही हैं माताजी इससे तो हमारी भी दुश्मनी है हमें अस्पताल से निकलवा दिया हम छः साल से यहीं काम करते थे हमे परेशान भी बहुत करता था।

परेशान ?

हमें सिखाने चला था कल का आया छोकरा !

इसको सज़ा हो जावेगी ना ?

सज़ा तो पक्की  

वो कैसे ? जरा खुलकर बताओ मने तसल्ली हो जावेगी।

माताजी आप तो बिल्कुल भी चिंता मत करो ये डाक्टर तो बचेगा नहीं हमने भी ऐसा फंसाया है कि अब तो हमारे शिकंजे से बच ही नहीं सकता ! आपके लिए भी हम गवाही दे देंगे चिंता मत करो हम हैं ना

 लेकिन आप म्हारे खातर क्यूं करेंगे ?

 हमें भी तो इससे बदला लेना है आपका ही दोषी नहीं हमारा भी है इसने तो हमारे नाक में दम कर रखा था इतना परेशान कर दिया हमारा कंपाउंडर सब जानता है वो अपना काम भी बड़ी मुस्तैदी से करता था वो इतना होशियार था कि हमारे बिना भी सब मैनेज कर लेता था हम तो कभी-कभार ही आते थे !

क्यूं रोज क्यूं नहीं ?

माताजी हम सीनियर डाक्टर रोज-रोज कैसे आ सकते थे ! हमें बाहर के भी तो बहुत काम रहते थे लेकिन इस डाक्टर ने आते ही इतना कड़क अनुशासन रखा कि अस्पताल के सारे कर्मचारी परेशान हो गए !

जे तो बहुत खराब बात।

और नहीं तो क्या सब कहते - हमको इस जल्लाद से बचाओ बस हम भी मौके की तलाश में थे पूरा अस्पताल हमारे साथ था !

अच्छा फिर के हुओं ?

एक पेशेंट भर्ती किया गया वो बहुत ही सीरियल था लेकिन इसके इलाज से पहले दिन से उसमें सुधार आने लगा हमने सोचा अगर ये ठीक हो गया तो हमें फिर मौका नहीं मिलेगा ! वैसे है इसके हाथ में जादू ! खैर जो हो हमें बदला तो लेना ही था हमने उसे हवा का इंजेक्शन दे दिया !

 हवा के इंजेक्शन से क्या मतलब ?

 सिरिंज में हवा भर के नस में देने से मौत भी हो जाती है !

 तो तुमने हमारी बेटी को मार दिया ?

 नहीं माताजी वो पेशेंट तो चालीस साल का मर्द था ! हमारे सामने कोई डिलीवरी नहीं हुई आप तो पंद्रह दिन पहले का बता रहे हैं हम तो उसे इंजेक्शन देने के बाद डर के मारे निकल गये थे !

डर किस बात का ? 

एक और पेशेंट के पांव का ओपरेशन करते समय भी हमसे भूल हो गई उसको हाई डायबिटीज थी और ब्लड प्रेशर भी ! हमने बिना टेस्ट किए गुलुकोज रातभर चढाये रखा पता नहीं कैसे उसका शुगर और बीपी इतना बढ़ गया कि उसका हार्टफेल हो गया और रामजी को प्यारा हो गया ! डाॅक्टर शंभू ने हमें दोषी मानकर दोनों को निकाल दिया तो क्या हुआ मगर जिम्मेदार तो वही हुआ अरे कल का आया हुआ और डीन ! 

डीन के होवे ?

आपको समझ में नहीं आयेगा समझिये आपकी बेटी का कातिल तो गया !

तो तो कौन-सी बड़ी बात है ? के होवेगो इससे ?

आप तो माताजी बेफिक्र रहो अभी हमने बहुत कुछ उसके खिलाफ बना रखा है अब आप बाक़ी का कमिटी के सामने सुन ही लेंगे वैसे आपसे एक बात कहूं - ये डाॅक्टर कमबख्त अपने काम में है बड़ा माहिर साले ने हमसे पंगा नहीं लिया होता तो खुद भी चैन से रहता और हम भी !

भाई म्हारी सुनवाई भी हो जावेगी ना ?

हो जायेगी - हो जायेगी ! अब सब लोग आ गए हैं बुलावा भी आ जायेगा !

आप म्हारा शिकायत कागज तो लिख दो।

अभी तक आपने शिकायत नहीं की ?

अब करूंगी ना आप लिख दो।

अब तो आप ऐसे ही बताना लिखने का तो टाइम नहीं है। सब लोग आ गए हैं। इस डाक्टर को आज छठी का दूध याद न दिलाया तो हमारा भी नाम नहीं।

इंक्वायरी कमिटी के सब मेंबर्स आ गये थे  जो बाहर बैठे थे उनके लिए बुलावा आ गया। सब लोगों ने अपना स्थान ग्रहण किया। सारी फोर्मेलिटीज पूरी होने के बाद डाक्टर कपूर ने पहले आरोपी पक्ष को अपनी बात कहने को कहा तो जो लिखित में लाये थे उसकी काॅपी कमिटी के पास भी थी ही वो ही पढ़ कर सुना दी। उसके बाद शंभू को माइक पर बुलाते हुए कहा - डाक्टर शंभूनाथ तोमर आप पर जो आरोप है उसकी ‌ सफाई में आप अपनी बात रखिए। उसने भी अपनी याचिका पढ़कर सुना दी एक पहले से ही कमिटी के पास थी ही। इस तरह दोनों पक्षों की बातें सुनने के बाद शंभू को दोषी पाया गया। फैसला देने वाले ही थे कि अम्मा खड़ी हुई और बोली - आप लोग फैसला देणे से पहले म्हारी बात भी सुणो।

आपका परिचय माताजी  

बेटा म्हारो परिचय तो आपने दे दियो ! 

मैंने कब परिचय दिया ?

अभी तो आपने मने माताजी कई है ना मैं तो आप सबकी माताजी हूं कि नाय ?

जी माताजी आप कहिए।

लीजिए साब आप इसको सुनिए और अपना मोबाइल ऑन करके कमिटी की टेबल पर रख दिया। डाक्टर जगताप की आवाज सुनाई देने लगी बीच-बीच में डाक्टर मोहन का हां ऐसा है वगैरह चल रहा था साथ ही अम्मा के सवाल भी थे ! हाॅल में इतनी शांति हो गई थी कि सूई गिरने की आवाज भी सुनाई दे। 

सब सुनने के बाद कमिटी ने ने डाक्टर जगताप और मोहन दोनों को दोषी पाया जानबूझ कर किसी की जान लेने का घिनौना अपराध किया इसलिए दोनों पर मुकदमा चला उनको अपने अपराध के लिए आजीवन कारावास मिला साथ ही और भी कुछ लोगों को दोषी पाया उन्हें भी सज़ा मिली इसमें एक कंपाउंडर एक नर्स और दो वार्ड बाय ही शामिल थे। कुछ लोगों को लिखित वार्निंग दी गई। डाॅक्टर शंभूनाथ को दोषमुक्त पाया इसलिए उन पर लगे सारे चार्जेज हटा दिये गये। 

शंभू तो अपनी अम्मा की कारीगरी चतुराई और बहादुरी भरी चालाकी का कायल हो गया। घर पहुंचते ही अम्मा को बाहों में भर कर चारों तरफ घुमाते हुए - अरे अम्मा तुम तो जेम्सबोंड निकली ! मैं तो हाथ धो बैठा था - जेल तो होती ही लाइसेंस भी रद्द बेइज्जती होती सो अलग ! मैं तो बर्दाश्त ही नहीं कर पाता था और फिर तो मौत को गले लगाने के सिवा कोई चारा ही नहीं था। इसलिए मुझे रोना आ रहा था कि मेरी अम्मा का क्या होगा ? कैसे रहेगी मेरे बिना ? पर अम्मा मैं साची कवेथा अब भी तो यही कहूं - तू साची की जेम्सबोंड है !

जे मरो जेम्सबोंड के हो वे ?

तुम्हारी तरह होवे तू तो म्हारी जेम्सबोंड है अम्मा और बार - बार जेम्सबोंड - जेम्सबोंड कहते-कहते अम्मा को बाहों में समेटे चक्कर लगाए जा रहा था ! और अम्मा शंभू की बाहों में झूलती हुई झूठ-मूठ का गुस्सा कर रही थी - अरे अरे अरेरेरेरे छोराआआ..............मगर........


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