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Rubita Arora

Inspirational


3.6  

Rubita Arora

Inspirational


जब ससुराल बन जाए मायका

जब ससुराल बन जाए मायका

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आज रीमा सुबह जल्दी उठकर झट से घर के कामों को निपटाने लगी।रात को ही उसके पति ने कहा था कि दफ्तर जाते हुये रास्ते मे उसे उसके मायके छोड़ देगे।अपनी सास से जब मायके जाने की अनुमति माँगी तो वे बोली हमारे दोपहर के खाने का क्या? रीमा का दिल तो किया कह दे रोज तो वह बनाकर खिलाती ही है आज एक दिन खुद बना लेना लेकिन फिर भी उसने विनम्रता से कहा मैं सबकुछ बना कर रख जाऊँगी।आपको कोई परेशानी नही होगी तो वे मान गई। 


मायके जाने की खुशी मे काम करने की स्पीड भी बढ गई थी।सब काम समय से पहले खत्म कर लिए।सबको नाश्ता वगैरह करवा कर वे लोग निकल ही रहे थे कि तभी माँजी की आवाज आई, बहु एक कप चाय तो पिलाती जा। रीमा फटाफट चाय बनाने लगी।पति बाहर हार्न पर हार्न बजाए जा रहे थे।चाय देकर भाग के गाड़ी तक पहुँची तो पति ने डाँटते हुए बोला, कितना समय लगता है तुम औरतों को तैयार होने मे,जल्दी करो तुम्हें मायके छोड़ कर मुझे समय पर दफ्तर पहुँचना है। रीमा की साँस फूली हुई थी सो कुछ न बोल सकी।


पति उसे मायके छोडने आए तो रीमा की माँ ने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन दफ्तर के लिए लेट हो रहा हुँ,कहकर निकल गए।घर के अन्दर गई तो देखा माँ घर के कामों मे लगी हुई थी।अपनी भाभी आरती के बारे मे पूछा तो माँ ने बताया अभी सो रही है।फिर माँ ने चाय बनाई और सबने मिल कर पी साथ मे ढेरों बातें भी की।तब तक आरती भी उठकर उनकी बातों मे शामिल हो गई थी। इसके बाद मां और आरती ने मिलकर सबके लिए नाश्ता बनाया। रीमा ने माँ की मदद करने की कोशिश की तो माँ ने कहा अपने घर मे ढेरों काम करती है एक दिन माँ के घर तो आराम करले।नाश्ता करके आरती ने शिकायत भरे लहजे मे कहा दीदी आपने पहले क्यों नही बताया आप आज आ रही हो।आज तो मैंने अपनी सहेलियो के साथ शापिग का प्रोग्राम बनाया हुआ है औऱ लंच भी बाहर ही करना है।माँ ने उसे प्यार से कहा कोई बात नही। तुम्हे जाना है तो चली जा और फिर हम माँबेटी तो है ही ढेरों बातें करने के लिए। रीमा ने भी माँ की बात मे हामी भर दी आरती तैयार होकर चली गई। 


पीछे से माँ ने रीमा के साथ बातें करते करते पूरे घर को कामवाली की मदद से व्यवस्थित किया औऱ फिर दोपहर को रीमा की पसंद का खाना बनाया। तभी आरती का फोन आया बताने के लिए कि वह अपनी सहेलियो के साथ पिक्चर देखने जाना चाहती है तो माँ ने भी खुशी खुशी इजाजत दे दी। रीमा ये सब देखकर बहुत हैरान थी।एक तरफ वह खुद थी जिसे कई महीनों बाद आज मायके आने की बडी मुश्किल से अनुमति मिली थी तो दूसरी तरफ आरती जो बडे मजे से दोस्तों के साथ समय बिता रही थी।


माँ ने शायद उसके मन की उलझन को समझ लिया था फिर बोली मैंने कभी बहु आरती को महसूस ही नही होने दिया कि वह अपने ससुराल मे है। मेरे लिए तो जैसे तू है वैसे ही आरती है। बहु बेटी दोनों एक समान है। आरती भी यहाँ बहुत खुश रहती है। पूरे घर को अपना समझती है हर किसी को पूरा सम्मान देती है। माँ की बातें सुनकर रीमा सोच रही थी कि काश आरती की ही तरह हर लडकी को इतना हक मिल जाए कि वह ससुराल मे भी मायके की तरह रह सके तो शायद कोई भी लडकी मायके से विदा होते हुए मन भारी न करें। मायके मे जो लडकी अपनी ही मस्ती मे बिदास जिन्दगी जीती है, ससुराल मे आकर पूरी जिम्मेदारी निभाने के बाद भी उसे अपनापन नहीं मिल पाता। शायद इसी लिए छुट्टियां आते ही हर लडकी मायके जाने के लिए तडफ उठती है। शादी के इतने सालों बाद भी मायके का जिक्र होते ही मन मस्ती से भर उठता है वही ससुराल की बात पर बोझिल सा महसूस करने लगता है। क्यों न हम सब मिलकर मायके औऱ ससुराल के इस अन्तर को पूरी तरह से खत्म करने की एक पहल करें। अपनी बहुबेटियो को ससुराल मे रहते हुये भी वे सारे हक दे जो उन्हें मायके मे मिले थे। उन्हें अपनी जिन्दगी अपनी मर्जी से जीने की आजादी दे। जब मायके मे बेटी की किलकारियाँ गूंज सकती है तो फिर ससुराल मे बहु की क्यों नही। उम्मीद है जिस दिन ससुराल ही हर लडकी का मायका बन जायेगा उस दिन बहु भी सही मायने मे बेटी बन जायेगी।


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