हमारे अपने
हमारे अपने
"मम्मा, ये इतना बड़ा परांठा क्यों बनाया है? महक ने शिकायती अंदाज़ में अपनी मम्मी रीमा से कहा।
रीमा ने मुस्कुराते हुए कहा "जब तूने कसम खा रखी है की स्कूल में एक ही परांठा लेकर जाना है, तो मैंने भी कसम खा ली इतना बड़ा परांठा बना कर देने की।"
महक ने कहा "ओह...हो मम्मा...आप भी ना, अच्छा आज दोपहर को कुछ अच्छा सा खाना बनाना। मुझे दाल-रोटी नहीं खानी।"
"अच्छा क्या होता है? पौष्टिक खाना ही सबसे अच्छा होता है ।इस उम्र में अपने शरीर में जो ताकत ले आएगी, वो तेरे ज़िन्दगी भर काम आयेगी।"शादी के बाद बच्चे पैदा करने में पता है, कितनी ताकत चाहिए। रीमा ने उसे थोड़ा डांट कर समझाते हुए कहा।
आज ये सब बातें सोच-सोच कर महक को बहुत रोना आ रहा था ।अपने बराबर में अपने नन्हे मुन्ने को लेटा हुआ देख, महक सोच रही थी...एक माँ का प्यार कितना निश्चल होता है ।महक सोच रही थी "मम्मी कितना सही कहती थी कि अब का खाया हुआ बाद में काम आयेगा।"
इतने में महक की सास उसके लिए खाना लेकर आ गयी और महक से बोली "ये खाना अभी मेरे सामने खा, मुझे पता है तू खाने को लेकर कितनी लापरवाह है। छुटकू को सुलाते- सुलाते खुद भी सो जाएगी और खाना एक तरफ रखा रह जायेगा।"महक ने कहा "मम्मी आप बैठ जाओ, मैं आप के सामने ही खाना खा लेती हूँ।"खाना खाते-खाते महक ने कहा "मम्मी शाम को कुछ चटपटा बनवा देना। रोज़-रोज़ मुझसे ये उबला हुआ सा खाना नहीं खाया जाता।" उसकी सास उसे घूरते हुए बोली "अभी कुछ दिन कम घी तेल और मसाले का खाना खायेगी तो आगे के लिए सेहत अच्छी रहेगी। हमारे समय में तो हमारी सास के पास इतनी फुर्सत ही नहीं होती थी की हमारे के नाज़-नखरे उठाये।" यह कह कर वह कमरे से बाहर चली गयी। महक को अपनी सास की यही बात बुरी लगती थी कि कुछ भी कर के हर काम का उसे सुना देती थी महक ने सोचा चलो "कुछ नहीं होता, आजकल सारा काम उन्हें संभालना पड़ रहा है तो थोड़ा बहुत गुस्सा तो आ ही जाता है, वैसे वो दिल की बुरी नहीं हैं।"
"महक सोच-सोच कर मुस्कुरा रही थी और दुखी भी हो रही थी की हमारे बड़े कितने अच्छे होते हैं, वो हमारी कितनी चिंता करते हैं...जब कभी ये लोग हमें छोड़ कर चले जायेंगे, हम कितने अकेले हो जायेंगे ।हमारे लिए हर वक़्त सोचने वाला...हर वक़्त चिंता करने वाला कोई नहीं होगा।"
इतने में महक का पति जय आ गया पर महक अपने ही ख़यालों में खोई हुई थी। जय ने उसे हिलाते हुए कहा "क्या हुआ...मेरी जान आज कहाँ खोई हुई हो और हमारा नन्हा मुन्ना कैसा है"? महक ने एकदम चौंकते हुए कहा "आप कब आये और आपका मुन्ना तो इतना शैतान हो गया है...अभी से अपनी मम्मी को तंग करने लगा है, बिल्कुल आप के ऊपर गया है।"जय ने ज़ोर से हँसते हुए कहा "अभी हमारे छोटू महाराज एक महीने के भी नहीं हुए और शैतान हो गए"
महक ने फिर जय से कहा "आप अगले महीने कि चार टिकटें चार धाम की यात्रा की करवा देना। "जय ने कहा "क्या हुआ अभी से चार धाम की यात्रा पर जाओगी। अभी तो हमारे मौज-मस्ती के दिन हैं....सोच रहा हूँ अगले साल मुन्ना के लिए उसकी बहन ले आऊं" और कह कर जय ज़ोर-ज़ोर से महक को छेड़ते हुए हँसने लगा। महक ने कहा "कुछ भी बोलते रहा करो और मैं अपने लिए नहीं टिकट्स करवाने कि कह रही हूँ...मैं तो दो टिकट अपने मम्मी-पापा के लिए और दो टिकट यहाँ पर मम्मी-पापा के लिए करवाने की कह रही हूँ "देखो मेरे मम्मी-पापा ने ज़िन्दगी भर मेरी परवरिश में मेरी पढ़ाई पर कितना रुपया खर्च किया...जब से मैंने होश संभाला तब से मैंने उन्हें मेरी बढ़िया से बढ़िया शादी करने के लिए चिंतित होते हुए देखा और शादी करने को ही वो अपना फ़र्ज़ पूरा होना नहीं मानते...अभी भी उनके दिमाग में यह सब घूमता रहता है कि मुन्ना के होने का क्या देना है, कोई भी त्यौहार आने से पहले उस पर जो सामान देना है...उसकी तैयारियों में जुट जाते हैं। मैं उन्हें कितना मना करती हूँ की आपने मुझे पढ़ा-लिखा दिया, अच्छे संस्कार दे दिए वही मेरी सबसे बड़ी दौलत है। यह पैसा आपके बुढ़ापे में काम आएगा, पर हमेशा की तरह यह कहूं की तू तो बच्चा बुद्धि है मेरा मुंह बंद कर देते हैं । मैं यह नहीं कह रही हूँ यह सब सिर्फ मेरे मम्मी पापा ने ही किया है। आपकी परवरिश में भी आपके मम्मी-पापा ने कोई कमी नहीं छोड़ी होगी। शादी लड़की की हो या लड़के की माता-पिता का बहुत ख़र्चा बैठ जाता है और अभी भी वो हमारे लिए कुछ न कुछ करने में ही लगे रहते हैं।" मैं सोच रही थी..."हमारी तरफ से यह उन लोगों के लिए हमारा बेटा होने का गिफ्ट होगा। उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी हम लोगों की चिंता करने में ही निकाल दी। अब हमें भी उनके लिए सोचना चाहिए। उन्हें भी उनके लिए जीने का मौका देना चाहिए।" जय ने कहा "मेरी बीवी तो बच्चा पैदा करते ही कुछ ज़्यादा ही समझदार हो गयी।" अपनी मलिका का हुक्म सर आँखों पर"...कह कर जय ने महक के माथे को चुम लिया ।
जय की मम्मी जय से चाय के लिए पूछने उन दोनों के कमरे की तरफ ही आ रही थी। उन दोनों की बातें सुन कर वो दरवाज़े से ही मुस्कुरा कर वापिस चली गयी और मन ही मन अपने बेटे-बहु को आशीष दे रही थी ।
