हम तो छोटे बेटे के साथ रहते है
हम तो छोटे बेटे के साथ रहते है
मनीष बेटा बहू से कहना एक कमरा खाली कर थोड़ी साफ सफाई करवा ले। दो दिन बाद दीदी आनेवाली है। और हाँ रीटा मीना भी दस दिन बच्चों के छुट्टियां है तो आ रही है। तू तो जानता है हमारा मकान तो छोटा है तो सबको दिक्कत होगी। मैं और तेरी माँ भी दस दिन के लिए उधर ही आ रहे है। वैसे भी छोटी बहू मायके जा रही है तो हम अकेले क्या करेंगे।
ये भी कोई कहने की बात है पापा, घर आपका है। जब चाहे आओ, दस दिन क्यों मैं तो चाहता हूँ आप हमेशा के लिये हमारे साथ रहो।
बहू से बता देना...
मनीष ने घर आते ही प्रिया को सारी बात बताई
लेकिन मनीष आप तो कह रहे थे ... "तुझे मायके जाकर बहुत दिन हो गये है। दस दिन छुट्टियां है तो तू चली जाना। दो साल हो गये, एक ही शहर में होते हुये भी मैं चार दिन भी चैन से नहीं रह पाती माँ के घर। मेरा भी तो मन करता है ना।"
तो क्या करुं, मना कर दूँ पापा को कि हम अलग रहते है। अब आप हमारी जिम्मेदारी नहीं हो। आप अपना देख लो..अरे उनका मकान छोटा है और सपना भी मायके जा रही है तो।
ये अच्छा है मनीष, हर छुट्टियों मे देवरानी जी पिहर चली जाये। जब मैं पापाजी से पूछती हूँ तो कह देते है तुम्हारा मायका तो यही है बहू जब मन चाहे जा सकती हो। जैसे की मेरा तो एक पैर मायके में तो दूसरा ससुराल में। हर बार उनके पास एक ही बहाना होता है दीदी आ रही है मकान छोटा है। बेटियाँ आ रही है मकान छोटा है। बात यह नहीं है कि मैं उनके आने से ना खुश हूँ। पर यहाँ आने के बाद भी गुण तो वे हमेशा सपना के ही गाते है। चाहे फिर मम्मी जी पापाजी हो या रीटा मीना...
देखो प्रिया अब खुशी खुशी करो या दुखी हो कर करना तो तुम्हें ही है।
दो दिन बाद...
सब आ गये भुआजी, रीटा, मीना, उनके बच्चे ,मम्मी जी, पापाजी और देवरजी भी। अब तो प्रिया को एक पल की भी फुर्सत नहीं थी। सब कमरे मे बैठ बातें करते हँसी मजाक करते पर प्रिया का दिन तो सबकी फरमाइश पूरी करने मे ही चला जाता।
कभी बच्चे कहते मामीजी जूस बनाओ, तो कभी पास्ता नूडल्स, बच्चे तो बच्चे बड़ों की भी फरमाइश पूरी नहीं होती। कभी चाय पकोड़े की फरमाइश, तो कभी कुछ मीठा खाने कि, और कभी चटपटा। प्रिया को कुकिंग का बहुत शौक था। तो वह कभी मना भी नहीं करती थी। हँसते हँसते दिन भर सबकी फरमाइशे पूरी करती।
एक दिन की बात है। सब हाल में बैठकर बातें कर रहे थे। भुआजी आई हुई थी और रविवार का दिन था तो पूरे दिन लोगो का आना जाना लगा रहता था।बातों बातों में बेटा बहू की बात छिड़ी सब अपने अपने बेटा बहू कि तारीफ कर रहे थे। तो..रमेश जी तपाक से बोले हम तो अपने छोटे बेटे बहू के साथ रहते है सेवा तो वे करते है। यहाँ तो ठीक है हम कुछ दिनों के लिए मेहमान है।
भुआजी को ये बात कुछ हज़म नही हुई। वे वहाँ आई तब से देख रही थी कि प्रिया अकेली सारा काम कर किस तरह सबको खुश करने में लगी रहती है। उसके चेहरे पर कभी शिकायत के भाव तक नहीं होते। उन्होंने कहा..
"रमेश रहते तुम भले अपनी छोटे बेटे बहू के साथ हो। पर मेहमानों की आवभगत, व्यवहार संभालना ये तो सब बड़ी बहू ही करती है। आज दस साल हो गये मनीष की शादी को, आठ साल से तुम्हारे साथ था, और दो साल से जुदा है। पर हर बार जब मैं आती हूँ, रीटा, मीना आती है, सेवा तो बड़ी बहू ही करती है। चार साल तो छोटी बहू को आये भी हो गये पर लगता है ननदों और भुआजी का नाम सुनते ही मायके भाग जाती है।
ऐसी बात नहीं है दीदी आप तो जानती हो ना दीदी हमारा मकान छोटा पड़ता है।
अरे! रमेश मकान नही इंसान का दिल बड़ा होना चाहिए और बड़ी बहू को अच्छी होने के लिए किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। उसका दिल कितना साफ है ये तो उसके चेहरे पर झलकता है। तुम चाहे अपने छोटे बेटे बहू के साथ रहो सेवा तो बड़ी बहू ही करेगी ये मेरा तजुर्बा कहता है। आज भुआजी के मुख से अपने लिये तारिफें सुन प्रिया को अपने सेवा का मेवा मिल गया।
तो दोस्तों क्या कहते है आप... क्या चाहिए पराये घर से आई उस बेटी को दो मीठे बोल प्यार के और कुछ नहीं। अगर आप अपना स्नेह लूटा दो तो वह तो आप पर अपना सबकुछ लुटाने को तैयार हो जाती है।
