हिन्दी दिवस
हिन्दी दिवस
हिन्दी वर्णमाला में अब कितने अक्षर रह गए हैं, मुझे पता नहीं ! ऋ और लृ का श्राद्ध हो चुका है, मात्राओं में से अर्धचंद्र और चंद्रबिन्दु की मृत्यु हो चुकी है, पूर्ण विराम के पाँव कब्र में लटके हैं और कई शब्द काल के गाल में समा चुके हैं।
हमलोग बचपन में वर्णमाला सीखने के बाद ककहरा सीखने में जिस तन्मयता से जुट जाते थे वह उसके सीखने की लयात्मकता में निहित थी।
कब्बिर काने क
कैंचुन का
हरषें कि
दीरघें की
तारे कु
बरजन कू
एकलें के
दोलैं कै
कलमत को
दुधकन्ना कौ
मस्ते कं
दू बिन्दा दू पासी कः
उपरोक्त तरीके से जिन मित्रों ने ककहरा सीखा हो उन्हें गर्वोन्नत होने की आवश्यकता नहीं है, यह मात्र इसका प्रमाण है कि वे बुड्ढे ( बूढ़े नहीं) हो गए हैं !
मुझे इस बात का गर्व है कि मेरी मातृभाषा मैथिली है फिर भी मैंने हिन्दी माध्यम से अंग्रेजी एम ए किया और विगत दस-बीस वर्षों से अंग्रेजी माध्यम से संस्कृत पढ़ रहा हूँ क्योंकि हिन्दी में उन्हें समझना अत्यंत कठिन है।
आज के बच्चे अंग्रेजी माध्यम से हिन्दी पढ़ने की कोशिश तो करते हैं परंतु अंग्रेजी समझते नहीं और हिन्दी पढ़ते नहीं l
