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LALIT MOHAN DASH

Inspirational

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LALIT MOHAN DASH

Inspirational

मैं और आम के वे वृक्ष

मैं और आम के वे वृक्ष

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मैं अपनी दिनचर्या को ध्यान से देखता हूँ तो उसमें कुछ खास बात नहीं पाता हूँ । सुबह उठना , व्यायाम करना , नहाना , ध्यान करना , नाश्ता करके कार्यालय चले जाना , फिर दोपहर का भोजन कर लेना , कुछ देर बाद पुनः कार्यालय में जाकर सरकारी कामकाज करना और शाम को घर आकर थोड़ा ध्यान भजन करना , रात्रि का भोजन करना , थोड़ा टहलना और फिर सो जाना । अगले दिन फिर वही सारी क्रियाएँ दोहराना । जीवन इसी तरह व्यतीत हुआ जा रहा है । इस दिनचर्या में जीवन का उद्देश्य क्या है , जीवन का मंतव्य क्या है , जीवन का गंतव्य क्या है , इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता है । ये दिनचर्या यूं तो सभी मनुष्यों की दिनचर्या है लेकिन सच पूछो तो ये पशुओं की दिनचर्या है । मनुष्य के जीवन का उद्देश्य घर से दफ्तर और दफ्तर से घर जाना कदापि नहीं हो सकता । 


जीवन का उदेश्य क्या है ? ये प्रश्न सदा ही मेरे हृदय में गूंजता रहा है । इस प्रश्न का उत्तर सदैव मेरी तलाश का केंद्र रहा है । 


मेरे गांव के बाहर निकलते ही आम के दो वृक्ष थे । अपने इन्हीं प्रश्नों के उत्तर की खोज में जब भी अवसर मिलता था , मैं उन पेड़ों के नीचे जाकर बैठा रहता था । मेरा आम के उन वृक्षों से एक संबंध बन गया था । जब भी वहां जाता था तो एक गहरे अपनेपन का अनुभव होता था । 


धीरे धीरे ये प्रश्न मेरे हृदय में गहराते गए । फिर एक दिन आम के वृक्ष से जैसे कुछ शब्द बहने लगे । जैसे कोई संदेश झरने लगा । मेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए एक दिन प्रकृति तैयार हो गयी । 


आम के वृक्ष ने कहा था : — " मेरे पास बैठो और मेरी ओर ध्यान से देखो । मेरी एक वर्ष की दिनचर्या पर विचार करो । शायद आपको अपने प्रश्नों का उत्तर मिल जाए । शायद आपकी जिज्ञासा शांत हो जाए । "


मैंने बड़ी गहराई से आम के वृक्ष को देखा । इस समय पूरा वृक्ष बौर से भरा हुआ था । देखते देखते एक बात अनायास मेरी समझ में आयी । जैसे माँ के गर्भ में बच्चा आ जाता है । ठीक यही स्थिति बौर वाले आम की होती है । मनुष्य के जीवन का प्रारंभ इसी भांति होता है़ । 


कुछ दिनों बाद बौर का स्थान छोटी छोटी अमिया ले लेती हैं । ये मनुष्य के बचपन की तरह हैं । ये अमिया ऐसी होती हैं जैसे मनुष्य का नवजात शिशु । इन अमियों का अभी कोई मूल्य नहीं है और न ही कोई उपयोग है । अभी न इनका अचार बनाया जा सकता है और न ही पाल रखकर इनको पकाया जा सकता है । अभी ये किसी काम की नहीं हैं । 


इसी तरह मनुष्य का बचपन है । अभी बच्चे का कोई उपयोग नहीं है । न उसे किसी काम पर लगाया जा सकता है और न ही वह किसी काम का है । यद्यपि अभी न अमिया किसी काम की है और न ही बच्चे की कोई उपयोगिता है फिर भी दोनों के पास एक भविष्य है इसलिए उन्हें बचाया जाता है । अमिया भविष्य का आम है और बच्चा तो असीमित संभावनाएं समेटे हुए है । इसलिए दोनों की रक्षा की जाती है क्योंकि दोनों के पास एक सुंदर भविष्य है । 


जैसे जैसे अमिया बड़ी होती है तो वह कच्चे आम का रूप ले लेती है । कच्चा आम खट्टा और कसैला होता है तथा बिल्कुल सख्त होता है । कच्चा आम खाया नहीं जा सकता है । अगर कोई खाए तो दांत खट्टे कर देता है । कच्चे आम का अचार बनाया जा सकता है । उसमें नमक , मिर्च , मसाला , तेल और अन्य भी बहुत चीजें मिलानी पड़ती हैं तब कहीं खाने योग्य होता है । 


इसी तरह बच्चा जब जवान होता है , तो वह भी अचार वाले आम की तरह हो जाता है । मनुष्य की जवानी कच्चे आम की तरह होती है - खट्टी , कसैली , सख्त । जवानी में इंसान किसी से कुछ भी कह देता है , किसी से भी भिड़ जाता है । मनुष्य की जवानी को किसी लायक बनाने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं । अच्छी शिक्षा , अच्छे संस्कार देने पड़ते हैं । अचार की तरह मनुष्य की जवानी को उपयोगी बनाने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है । 


फिर एक घड़ी ऐसी आती है , जब कच्चा आम पक जाता है । तब एक चमत्कार घटित होता है । खट्टा आम अवर्णनीय मिठास से भर जाता है । उसके खट्टेपन में एक दिव्य मिठास पैदा हो जाती है । सख़्ती गायब हो जाती है और उसका स्थान नरमी घेर लेती है । खट्टा , कसैला और सख्त आम पकने पर मीठा , सुगंधित और मुलायम हो जाता है । अगर आंधी , तूफ़ान कच्चे आम को जबरन तोड़कर जमीन पर गिरा न दें तो हर आम पक कर मीठा हो जाता है और अपने जीवन की पूर्णता को प्राप्त हो जाता है । 


लेकिन अगर कोई आम पकने पर भी खट्टा ही रहे तो उसका क्या मूल्य है । कच्चे आम का तो अचार भी बन सकता है लेकिन अगर पका हुआ आम खट्टा हो तो वह किसी काम का नहीं है । वह तो सीधे कचरे के ढेर में ही फेंका जाता है क्योंकि जो पकने पर भी मीठा न हुआ हो उसका पकना व्यर्थ जाता है़ । 


मनुष्य का बुढ़ापा भी पके हुए आम की तरह होना चाहिए । जवानी में कोई चाहे कितना ही कड़ुआ , खट्टा और कसैला रहा हो लेकिन बुढ़ापे में अगर उसमें ज्ञान की सुगंध उठने लगी हो, सख़्ती का स्थान उदारता ने ले लिया हो, कसैलेपन को मिठास से भर दिया गया हो तो उस मनुष्य का बुढ़ापा आदर योग्य है़ । उसका पकना अर्थात बूढ़ा होना सार्थक हो जाता है । 


लेकिन मनुष्य का बुढ़ापा बड़ा दुर्भाग्य पूर्ण है़ । यह आम की भांति पककर मिठास से भर नहीं पाता है । जितनी खटास और कड़ुआहट जवानी में होती है़ उससे कहीं ज्यादा बुढ़ापे में आ जाती है । बूढ़े मनुष्य की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण यही है कि वह बूढ़ा तो हो जाता है़ लेकिन पक नहीं पाता है और अनायास इसी कच्चेपन और खट्टेपन को लेकर ही इस जगत से विदा हो जाता है़ । करोड़ों में कोई एकाध मनुष्य पकता है़ अर्थात परिपक्व होता है जिसमें ज्ञान और सत्य के अनुभव की सुगंध उठने लगती है़ , अन्यथा ज्यादातर लोग तो बिना पके ही विदा हो जाते हैं । 


पके हुए आम की भांति मिठास और सुगंध से भरकर विदा होना ही मनुष्य की पूर्णता है़ । जीवन के उद्देश्य को मैंने इसी भांति समझा ।


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