महुए के पेड़ ने मुझसे कुछ बातें
महुए के पेड़ ने मुझसे कुछ बातें
कुछ दिन बीते मैं इलाहाबाद से कानपुर जा रहा था । जून का महीना था औऱ चिलचिलाती धूप । भयंकर गर्मी औऱ आग बरसाती हुई लू का साम्राज्य था। कुछ देर बाद रास्ते में एक महुए का बाग दिखाई पड़ा । हरे-भरे विशालकाय वृक्ष औऱ गंभीर छाया । मुझे लगा कि रुक जाऊं औऱ कुछ देर बैठूं इन वृक्षों के पास । तभी मुझे ऐसा लगा कि महुए के एक वृक्ष ने मुझे आवाज दी हो कि आओ औऱ कुछ देर बैठ लो , घनी छाया है , कोई परेशानी नहीं होंगी । आदमी ने निमंत्रण दिया होता तो एक बार सोचता भी । लेकिन वृक्ष ने निमंत्रण दिया था , निस्वार्थ निमंत्रण । मैं रुक गया औऱ महुए की जड़ के पास बैठ गया । विशाल वृक्ष , बाग औऱ घनी छाया , कुछ देर के लिए तो मैं भूल ही गया कि गर्मी का मौसम है । अचानक महुए के वृक्ष से आवाज आयी । "तुम्हें पता है कि तुम क्यों मेरे पास बैठे हो ?" वृक्ष ने स्वयं उत्तर दिया- "क्योंकि मेरे पास छाया है , मेरे पास अपनी जड़ें हैँ । तुम्हारे पास न अपनी जड़ें हैँ औऱ न छाया है।" मैं कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया । फिर सोचा कि ये कितनी सही बात कह रहा है ।
वृक्ष चिलचिलाती धूप में खड़े हैँ फिर भी हरे रहते हैँ क्योंकि उनके पास अपनी जड़ें हैँ जो जमीन में गहराई तक हैँ । हम ज्यादा देर तक धूप में नहीं खड़े हो सकते क्योंकि हमारी अपनी जड़ें नहीं हैँ । जिनकी अपनी जड़ें नहीं होतीं उन्हें ही छाया के लिए दूसरोँ का सहारा लेना पड़ता है । जिनकी जड़ें जमीन में होतीं हैँ , उनकी शाखाएं , पत्ते , डालियाँ सब हरे होते हैँ । जिनकी अपनी जड़ें नहीं होतीं वे ही दूसरे का शोषण करके जीवित रहते हैँ । कुछ बेलें ऐसी होतीं हैँ जिनकी जड़ें नहीँ होतीं । उन्हें जिस वृक्ष पर डाल दो , उसी को चूस लेतीं हैँ । इंसानों में भी यही नियम लागू होता है । जिनकी अपनी जड़ें होतीं हैँ वो अपना ख़ुद कमाकर खाते हैँ । जिनकी जड़ें नहीं होतीं हैँ , वे दूसरोँ का खून पीते हैँ । जरहीनों ने जरदारों का बहुत नुकसान किया है ।
महुए के वृक्ष से फिर सरसराहट भरी आवाज आयी । महुए ने कहा कि तुम्हारी ख़ुद की जड़ें तो हैँ नहीं इसलिए मेरी एक प्रार्थना सुन लो । मेरे कहने पर इतना कर सको तो ज़रूर करना कि मेरे जैसे किसी जड़ वाले की जड़ें मत काटना ।मैंने आहिस्ता से सहमति देकर अपना सिर हिलाया ।
महुए ने अपनी बात जारी रखी औऱ कहा - "तुम्हें पता है , इस बाग में सैकड़ों वृक्ष हैँ लेकिन हममें कभी झगड़ा-फसाद नहीं होता है । एक बात हम वृक्ष भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैँ कि जीवित रहने के लिए जिस जमीन से मुझे जल मिल रहा है , उसी जमीन से सभी वृक्षों कॊ जल मिल रहा है । जमीन के ऊपर हम भले अलग दिखाई पड़ रहे हों , लेकिन जमीन के भीतर हम सब एक हैँ क्योंकि एक ही धरती हम सभी का पालन-पोषण कर रही है । सभी वृक्षों के तनों , शाखाओं व पत्तों में एक ही धरती का जीवन-जल दौड़ रहा है । तुम मनुष्यों कॊ शायद इतनी भी समझ नहीँ है , इसीलिए तुम लोग उपद्रव करते रहते हो ।"मेरे पास सुनकर चुप रहने के अलावा औऱ विकल्प भी क्या था । जवाब देता भी तो क्या देता ? मैं महुए की बात से पूरी तरह सहमत था । एक वृक्ष के सामने मैं निशब्द बैठा था । उसके वृक्ष होने के सामने मेरा मनुष्य होना व्यर्थ था । मेरे लिए किसी भी तरह वह किसी सद्गुरु से कम नहीं था । मैं बड़ी श्रृद्धा से सिर झुकाकर वहाँ से विदा हुआ ।
आज का दिन मेरे लिए बहुत कीमती था । जो ज्ञान बड़े - बड़े ज्ञानियों के पास नहीं मिलता , उसे एक वृक्ष ने सहज ही दे दिया । कितने पते की बात महुए के वृक्ष ने कही थी -" जिनके पास अपनी जड़ें होतीं हैँ वे सीधे प्रकृति से , सीधे जमीन से जीवन लेते हैँ । जिनके पास अपनी जड़ें नहीं होतीं हैँ वे दूसरोँ पर लद जाते हैँ औऱ दूसरोँ का शोषण करते हैँ , खून पीते हैँ ।" "जमीन के ऊपर हम भले ही अलग हों लेकिन जमीन के भीतर हम सब एक हैँ ।"
मेरे हृदय में उस अजनबी औऱ प्रज्ञावान वृक्ष के प्रति अटूट आदर था औऱ परम पिता परमात्मा के प्रति अपार श्रृद्धा , जिसने मुझे वृक्षों की बात समझने की अंतर्दृष्टि प्रदान की ।
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