हाथी के दाँत खाने के अलग और दिखाने के अलग शादी-24
हाथी के दाँत खाने के अलग और दिखाने के अलग शादी-24
नीता के मम्मी पापा ने नीता के हर सपने को पूरा करने की कोशिश की थी। उन्होंने नीता को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाई। मेडिकल एंट्रेंस के लिए कोचिंग करवाई। नीता ने भी जी जान लगाकर पढ़ाई की और वह अपने नाम के आगे श्रीमती से पूर्व आखिर डॉ. लगाने में कामयाब हो ही गयी।
डॉ. बनने के बाद भी नीता के मम्मी पापा ने कभी भी उसकी कमाई को हाथ नहीं लगाया। उन्होंने उसे अपने कमाए पैसों को फिक्स्ड डिपाजिट करके रखने के लिए कहा। चाहे उन्होंने अपनी बेटी को पढ़ाया लिखाया और उसकी छोटी चचेरी बहिनों की शादी उससे पहले हो जाने पर भी, उसके मम्मी पापा ने परिवार और समाज का डटकर सामना किया। लेकिन बेटी की कमाई का उपयोग न करने की अपनी परम्परावादी सोच को वो छोड़ नहीं पाए थे।
लेकिन नीता ने अपने मम्मी पापा को एक कार तो फिर भी गिफ्ट कर ही दी। मम्मी पापा ने जब उस गिफ्ट को देखा तो उनकी आँख में से ख़ुशी के आंसू रुक ही नहीं पाए थे।
नीता अपने प्रोफेशनल लाइफ में अच्छे से सेट थी तो अब उसके मम्मी पापा ने शादी को लेकर उसकी राय जाननी चाही। नीता ने कहा, " मम्मी पापा इस मामले में आप ही मेरी मदद करो। बस एक बात का ध्यान रखियेगा दहेज़ की मांग और शादी हमारे स्टेटस के अनुसार हो, ऐसा कहने वालों को दूर से ही नमस्कार कर देना। "
"बेटा, ऐसे तो अच्छा लड़का मिलना ही मुश्किल हो जाएगा।" नीता की मम्मी ने अपन चिंता जाहिर करते हुए कहा ।
"नहीं मम्मी, यही तो सोच बदलने की ज़रुरत है । समय लगेगा, लेकिन मिलेगा जरूर, नहीं मिला तो मैं अविवाहित रह लूँगी; लेकिन लालची लोगों से हम रिश्ता नहीं जोड़ेंगे ।"नीता ने मम्मी के गले में बाँहें डालते हुए कहा ।
नीता के मम्मी पापा ने नीता के लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी। डॉ.विवेक पर जाकर उनकी खोज समाप्त हुई। नीता ने भी विवेक से ४-५ बार मिलने के बाद इस रिश्ते पर स्वीकृति की मुहर लगा दी। विवेक के मम्मी पापा ने भी दहेज़ की कोई मांग नहीं की। उन्होंने नीता के मम्मी पापा के शादी से जुड़े हर प्रस्ताव पर सहर्ष अपनी स्वीकृति दे दी थी ।
नीता भी खुश थी। नीता ने शादी के खर्चे के लिए अपने फिक्स्ड डिपाजिट तुड़वाने की बात अपने पापा मम्मी से की। लेकिन मम्मी पापा ने नीता को मना कर दिया। उसके पापा ने कहा, " अभी तो मेरे पास तेरी शादी में खर्च करने के लिए पैसा है। जब नहीं होंगे, तब तुझसे नहीं लूँगा तो किससे लूँगा। अभी तो अपने फिक्स्ड डिपाजिट अपने ससुराल ही ले जाना। टीके में वही रख देंगे। दुनिया दिखाने को भी हो जाएगा। वैसे भी तेरे ससुराल वालों को तो कुछ भी नहीं चाहिए। इससे उनका भी मान बढ़ जाएगा। "
नीता और विवेक की शादी सकुशल संपन्न हो गयी। नीता विदा होकर अपने ससुराल आ गयी। शादी के बाद की रस्मों को निभाने के बाद नीता थोड़ा आराम करने चली गयी। शाम की चाय के वक़्त सब देवर, ननद, भाभियाँ इकट्ठे थे। हंसी मज़ाक चल रहा था। नीता भी सबके साथ बैठी हुई थी। विवेक भी आ गया, नीता ने देखा विवेक की आँखें एकदम लाल हो रही थी। नीता ने पूछ लिया, "ठीक से सो नहीं पाए क्या ?आँखें लाल हो रही है। " विवेक ने बिना कुछ कहे हाँ में सर हिला दिया। सबके बीच इससे ज्यादा कोई बात हो भी नहीं सकती थी।
रात्रि में जब एकांत मिला, तब नीता को विवेक की आँखें लाल होने का कारण पता चला।
विवेक ने बताया कि, "मम्मी पापा मेरी शादी ऐसे घर में करवाना चाहते थे, जहाँ से उन्हें बहुत दहेज़ मिले। लेकिन तुमसे मिलते ही मैंने तय कर लिया था कि शादी के लिए तुमसे बेहतर लड़की मुझे मिल नहीं सकती। मैंने मम्मी पापा को भी बता दिया। उन्होंने मेरी ज़िद के आगे मजबूर होकर शादी के लिए हाँ कर दिया। फिर कभी दहेज़ की कोई बात भी नहीं की। मैं सोच रहा था कि उनकी सोच बदल गयी है। लेकिन ऐसा नहीं था। तुम्हारे पापा ने जो टीके में फिक्स्ड डिपाजिट दिया है, उसको लेकर जीजाजी ने हंगामा कर दिया था। उन्होंने उस पर तुम्हारा नाम देखकर पापा को बोला कि ये तो आपका सरासर अपमान है पापा।अब तक खामोश रहे पापा का भी सारा गुबार निकल गया। पापा का कहना था कि मेरे कारण पापा का सारे समाज और बिरादरी में नाम ख़राब हो गया। दहेज़ में फूटी कौड़ी न मिलने के कारण लोग बातें बना रहे हैं। और भी न जाने क्या क्या कहा ? पापा और सबकी बातों ने मुझे रुला दिया था। सोचा था कि तुम्हें कुछ नहीं बताऊंगा। लेकिन तुम्हें अपने घरवालों के असली चेहरे से रूबरू करवाना मुझे जरूरी लगा। क्यूंकि अब से तुम और मैं अलग थोड़े न हैं। "
नीता एक तरफ विवेक जैसा जीवन साथी पाकर अपने आपको खुशनसीब समझ रही थी। वहीं दूसरी तरफ वह सोच रही थी कि लोगों को कहने और करने में कितना फर्क होता है? आदर्श और नैतिकता की केवल बातें करना अच्छा लगता है, निभाना नहीं।
