Shakuntla Agarwal

Inspirational


4.6  

Shakuntla Agarwal

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"गुनहगार कौन"

"गुनहगार कौन"

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हर माता - पिता का सपना होता है कि मेरा बेटा कलैक्टर बन जाये ।हरियाणा में तो कहावत भी है कि - "के बेटा ! कलैक्टर लाग रा सै ?" माता - पिता बच्चों का करियर बनानें के लिये, हर संभव कोशिश करते हैं ।चाहे रूपये - पैसों से हो या शारीरिक मेहनत से ।उनकी एक ही तमन्ना रहती है कि बच्चा पढ़ - लिख कर काबिल बन जाये, तो हमारा जीवन सफल ।उसमें उनका निजी स्वार्थ नहीं होता है ।उन्हें अपने बच्चों से कुछ नहीं चाहिये ।आजकल ज्यादातर माता - पिता स्वाभिमानी हैं और अपने लायक उनके पास जमा - पूँजी भी है ।उन्हें सिर्फ इज़्ज़त और प्यार की जरूरत होती है ।वह चाहते हैं कि हम अपने बच्चों को भरपूर प्यार दें और उनसे भी यही उम्मीद करते हैं ।आजकल के माता - पिता सुलझी हुई प्रवृति के हैं ।उन्होंने बच्चों को उड़ने के लिये न केवल पर दिये हैं बल्कि स्वेच्छा से जीने का अधिकार भी दिया है ।यानी माता - पिता का बच्चों के जीवन में हस्तक्षेप न के बराबर है ।

परन्तु फिर भी न जाने क्यों कई बार कुछ किस्से ऐसे नज़र में आ जाते हैं, जिससे लगता है, जिन बच्चों को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया, वो आज माता - पिता पर हावी होना चाहते हैं ।उन्हीं की इच्छा से माता - पिता जिये, जैसे माता - पिता का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं हैं ।

सुनिता का बेटा बड़ी कंपनी में सी ए था ।उसे अपने बेटे पर बड़ा गर्व था ।हर बात के साथ कहती कि मेरा सुनील तो बहुत ही सीधा और होनहार है ।सी ए है सी ए ।पहले अटेम्प्ट में ही सी ए बन गया था ।इतना इंटेलीजेंट है, और मज़ाल है मेरे से पूछे बगैर कोई काम करें ।फोन तो हर - रोज़ ही करता है,और जब भी फुर्सत मिलती है घर भागता है ।वहाँ तो उसका मन ही नहीं लगता पर नौकरी तो करनी ही है ।धरती इधर से उधर हो सकती है, परन्तु मेरा बेटा सुनील नहीं बदल सकता ।

ऐसे ही समय पँख लगाकर उड़ता चला गया ।सुनील होनहार तो था ही, परिवार भी प्रतिष्ठित था और रिश्तें भी कुलीन परिवारों से आने लगें ।घर में शहनाईयाँ बजी और सुनील और रिचा विवाह बंधन में बंध गये ।सुनील के माता - पिता दोनों ही अध्यापक थे, तो उन्होंने अपनी अहमियत से भी ज्यादा खर्चा करते हुए, हनीमून पर रिचा और सुनील को स्विट्ज़रलैंड भेजा ।दोनों ख़ुशी - ख़ुशी वहाँ से वापस आये और घर के सभी सदस्यों के लिये महँगे तोहफ़े भी लाये ।घर में खुशियों की बहार आ गयी ।लगता था स्वर्ग अगर है तो यहीं है ।सुनील के पिता रिटायर हो चुके थे ।सुनील की मम्मी के दो साल अभी रिटायरमेंट के बाकी थे ।सुनील उनका इकलौता बेटा था |  


तो उन्होंने सोचा क्यों न दो साल पहले रिटायरमेंट लेकर सुनील और रिचा के साथ रहा जाये ।वो दोनों नौकरी पर जायेंगे तो हम दोनों घर संभाल लेंगे ।बहू - बेटे की मदद भी हो जायेगी और हमें भी बेटे - बहू का प्यार मिल जायेगा ।तो सुनील के माता - पिता उनके पास रहने चले गये ।पंद्रह - बीस दिन तक तो सब - कुछ ठीक था, परन्तु धीरे - धीरे घर का माहौल बदलने लगा ।सुनील के माता - पिता को लगने लगा कि जैसे वो बिन - बुलाये मेहमान की तरह हैं ।रिचा बात - बात पर खीझनें लगी ।धीरे - धीरे सुनील भी उसका साथ देने लगा ।शुरू - शुरू में तो सुनील की मम्मी ने बेटी समझकर उसे समझाना चाहा, परन्तु ये क्या ! 


रिचा - "मैं कोई नासमझ बच्चीं नहीं हूँ, जो आप मुझें बच्चों की तरह समझाते रहते हो ।आखिरकार मैं भी पढ़ी - लिखी हूँ, सी - ए हूँ ।अगर अपनी सेवा का इतना ही शौक था, तो कोई अनपढ़ - गवार लाते, जो आपकी सेवा ही करती रहती।"पहले तो सुनील के माता - पिता ने सोचा नासमझ बच्चीं हैं, अगर मेरी बेटी ऐसा व्यवहार करेगी तो क्या हम उसे माफ़ नहीं करेंगे ? परन्तु बात बढ़ती ही चली गयी ।रिचा की मम्मी का भी रिचा के घर में दखल बढ़ता ही जा रहा था ।जैसे सुनील के माता - पिता का घर न होकर, रिचा की मम्मी का ज्यादा हक़ हो ।

सब - कुछ एक सीमा तक ही शोभा देता है, नहीं तो वह हलक में हड्डी बनकर अटक जाता है ।अब सुनील के माता - पिता का स्वाभिमान डोलने लगा ।उन्हें लगने लगा कि जिस सुनील को सी - ए बनानें के लिये, उन्होंने दिन - रात एक कर दिया था, वह अब बदल चुका था या यूँ कहें कि वह प्रैक्टिकल हो गया था ।हमारें लिये उसके घर और उसके दिल में कोई जगह नहीं ।उन्होंने अपना सामान समेटा और वापस अपने घर आ गये ।जहाँ उनका अपना अधिकार था, बिना किसी रोक - टोक के ।वह किसी पर बोझ नहीं थे ।

ये तो उन माता - पिता की स्थिति है, जो कमाते हैं ।जो माता - पिता अपने बच्चों पर ही आश्रित हैं, उनका भविष्य क्या होगा, तनिक विचार करें ।एक सीमा तक तो समझौता सभी कर लेते हैं, परन्तु जब स्वाभिमान को चोट लगती है, तो वह असहनीय हो जाता है ।माता - पिता की सेवा करना परमोधर्म है ।अपने चाम की जूती भी पहना दोगे, तो उनके अहसानों को उतार नहीं पाओगे ।बच्चों को यह समझना होगा कि जो आज इनके साथ हो रहा है, वो कल उनके साथ भी होगा ।

मैं भी एक बेटी की माँ हूँ ।हर लड़की को यह समझना चाहिये कि जब मैं अपने माता - पिता को भरपूर इज़्ज़त और प्यार दे सकती हूँ, तो लड़के के माता - पिता यानी सास - ससुर को क्यों नहीं ? 


"शकुन" नदी जब अपने गंतव्य पर बहने लगती है, तो उसके दो छोर हो जाते हैं और उसे उस मर्यादा में रहकर ही बहना पड़ता है, वर्ना बाढ़ आने का खतरा बना रहता है ।शादी के बाद लड़की के भी दो छोर होते हैं - मायका और ससुराल ।दोनों में सामजस्य बनाकर ही जीवन की नैया पार लगती है और समाज और परिवार में तभी पलक - पावड़े बिछाये जाते हैं |


                 


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