गंगा
गंगा
किशन छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव का किसान था। उसकी लगभग 2 एकड़ जमीन थी। जिससे उसके घर का गुजारा हो जाता था। किशन अपने दीदी-,काका, अम्मा-बाबू से सुनता था कि मरने के बाद अस्थि को गंगा में विसर्जित करना चाहिए उससे आदमी जीवन-मरन के चक्र से मुक्त हो जाता है।
किशन के मन में ये बात घर कर गई। दीदी के मृत्यु के समय किशन 14-15 साल का था वह पहली बार बाबू के साथ बनारस गया। विधि-विधान से बाबू ने दीदी की अस्थि गंगा में प्रवाहित कर दी और किशन के साथ गंगाजल लेकर गांव आ गया। किशन असमंजस में था गंगा नदी में ऐसा क्या विशेष है। कि उसमें अस्थि विसर्जित करने से आत्मा मुक्त हो जाती है। उसमें डुबकी लगाने से पाप धुल जाते है। बाबू ने उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वेद एवं पुराण का हवाला देते हुये बताया कि गंगा सिर्फ नदी ही नही बल्कि देव नदी है। इसलिये उसमें अस्थि प्रवाह से आदमी जन्मजन्मांतर के बधंन से मुक्त हो जाता है।
किशन पिता की बातो से समझ गया कि गंगा नदी की महिमा अन्य नदियों से अलग है। वह गंगा नदी को माॅं गंगा कहने लगा। किशन के काका- अम्मा बाबू सब साथ छोड़कर चले गये। सबकी अस्थि गंगा में प्रवाहित हुई। हर बार किशन गंगा का नया कलेेवर देखता और बढ़ते व्यवसायीकरण से उसका मन क्षुब्ध हो जाता था। मन ही मन सोचता गंगा मैया को पैसा कमाने का साधन बनाया जा रहा है। लोग अस्थि के साथ झिल्ली, प्लास्टिक और प्रदुषण की बहुत सी चीजों को प्रवाहित कर गंगा माॅं को प्रदुषित कर रहे है। किशन कम पढ़ा-लिखा था पर वह प्रकृति को सरंक्षित रखने के लिये कटिबद्व था। उसे बाबू की बात याद थी हम प्रकृति की रक्षा करेगें तो वह हमारा पोषण करेगी हम इसे हानि पहुचायेंगे तो वह आपदा के रूप में ऐसा बदला लेगी कि हम सब नष्ट हो जायेगें।
किशन के बच्चे बड़े हो गये थे किशन उन्हें बाबू-काका की बातें बताता। बेटा इंजीनियरिंग कर अच्छी कंपनी में नौकरी कर रहा था और बिटिया स्कूल में व्याख्याता थी। किशन के बच्चे भी प्राकृतिक साधनों का सदुपयोग करते उन्हें अपने पिता की सोच पर गर्व होता था कि कम पढ़े लिखे होने पर भी वह प्रकृति के प्रति कितने सजग है। किशन साल दो साल में परिवार के साथ गंगा माँ के दर्शन के लिए जाता था। किशन को यह महसुस हुआ कि मृत व्यक्ति के मुक्ति के नाम पर अस्थियों के विर्सजन से गंगा माँ प्रदुषित होती जा रही है। किशन ने मन में एक संकल्प लिया तथा पत्नी और बच्चों से कहा अगर मुझे कुछ हो तो मेरी अस्थि गंगा में विसर्जित न करना बल्कि अस्थि में छायादार वृक्ष के बीज डालकरए किसी अच्छी जगह में लगा कर उसमें गंगाजल डाल देना जब पौधा अंकुरित होगा तब मैं समझुंगा कि गंगा माॅं ने मुझे मुक्त कर दिया। पत्नी ने भी किशन की इच्छा में हामी भरी और बच्चों से अपना भी क्रियाकर्म ऐसे ही करने को कहा।
बच्चे बहुत खुश थे कि उनके माता-पिता कितने समझदार है। उनकी सोच कितनी अच्छी है। ऐसी सोच सबकी हो तो गंगा का प्रदुषण स्वमेव समाप्त हो जायेगा और देवनदी, जीवनदायनी गंगा प्रदुषण से मुक्त हो जायेगी। कुछ वर्षो के बाद किशन की मृत्यु हो गई बेटे ने किशन की अस्थि के साथ पीपल का पौधा लगाया उसमें गंगाजल डालकर उसकी अंतिम इच्छा पूरी की। उसके बाद गंगा माँ के पास जाकर पिता के संकल्प को दोहरायाए उसकी आँखों का खारा पानी, गंगा के मीठे पानी में मिल गया, जैसे गंगा माँ कह रही हो कि मैने तुम्हारे पिता को मुक्त किया और उसने इस रूढ़िवादी सोच से अलग काम कर मेरे पानी को अमृत बनाकरए मुझे मुक्त कर दिया।
बेटे को किषन को आवाज सुनाई दे रही थी।
'जय माँ गंगा, जीवनदायनी माँ, हम आपकी रक्षा करेगें, आप हमें तारना जय माँ गंगा।'
छत्तीसगढ़ में दीदी, दादी को एवं काका, दादा को बोला जाता है।
