गंगा की व्यथा
गंगा की व्यथा
दो सहेली थी नदीमती और नदीवती। दोनो ही बड़ी दुखी थी। जब भी मिलती अपना सुख दुख बाँटती।
नदीमती बोली- सुन बहन लोग पहले तो पाप करते है फिर मेरे में डुबकी लगाकर धोते है। बता तू ही ये भी कोई बात है। फिर अपने कपड़े भी मुझमें ही निचोड़ते हैं।
नदीवती- हाँ बहन यही मेरा भी हाल है। शहरो के गंदे नाले हमारे में ही मिला देते है
नदीमति जब मैं किसी खेत खलिहान के पास से गुजरती हूँ तो बड़ी खुशी होती है। मेरे जल से खेती होती है फसल ऊपजती है। जिससे प्राणियों का भरण पोषण होता है।
उनको तृप्ती होती है, उनकी तृप्ती मेरी संतुष्टी है।
नदीवती हाँ बहन जब मेरे किनारो पर पेड़ो के डाल पर पक्षी चहचहाते हैं तो मन खुश हो जाता है।
नदीमति मैने सुना है ये जो मनुष्य है न वो प्रदूषन बहुत फैलाते है। इसकी वजह से जल संकट आने वाला है। मतलब ये संकट हमपर आएगा।
नदीवति अब क्या करें बहन। जो हमारे नसीब में होगा भुगतना तो पड़ेगा ही।
अच्छा मैं चलती हूँ। आज बड़ा नहान है गंगा जी का। मुझे अपने स्थान पर चलना चाहिए।
