Ramashankar Roy

Inspirational


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गिद्ध और बहेलिया

गिद्ध और बहेलिया

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दो गाँव हैं रामपुर और इस्लामपुर। दोनो पड़ोसी भी है और यही वहाँ के लोगों का दुर्भाग्य भी है। क्योंकि आप सब कुछ बदल सकते है लेकिन पड़ोसी के साथ आपको एडजस्ट करना ही पड़ेगा। आजादी की लड़ाई में दोनों गाँव के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था।

आजादी के बाद दोनों गाँव के लोगों के सामाजिक भाग्य ने अलग अलग राह पकड़ लिया। इस्लामपुर धार्मिक कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसता चला गया और रामपुर में जातिवाद का जहरीला फसल लहराने लगा। दोनों गाँव को ग्राम प्रधान अपने अलिखित और अघोषित व्यक्तिगत संविधान से चलने लगे। इस्लामपुर में दूसरे मजहब के लोगों का रहना दूभर हो गया जिसके चलते लोग धीरे धीरे पलायन कर गए और रामपुर के लोग जातिवादी वर्चस्व की लड़ाई में पीसने लगे। कोई पंचायत प्रधान दुबारा चुनाव नहीं लड़ पाया क्योंकि उसको कार्यकाल पूरा होने से पहले ही ठिकाने लगा दिया जाता था। इस्लामपुर का प्रधान भी अपनी अहमियत को साबित करने के लिए दंगा फसाद करने का कोई भी मौका छोड़ता नहीं था। इसका फायदा राजनीति के ऊपरी पायदान पर बैठे गिद्ध अपने हिसाब से उठते रहते। कभी बलात्कार ,कभी अपहरण और कभी छेड़खानी की घटना सिलेक्टेड जात और पंथ में उन्माद फैलाने के लिए करते रहते थे।

एक बार रामपुर में भीषण आग लगी। धीरे धीरे उसने सम्पूर्ण गाँव को अपनी चपेट में ले लिया। सब लोग अपनी क्षमता के अनुसार साधन जुटाकर गाँव से भाग पडे। लेकिन उसी गांव में एक अंधा और एक लंगड़ा व्यक्ति भी रहते थे। वो दोनों भागने असमर्थ थे क्योंकि अंधे को दिख नहीं रहा था की किधर भागना और लँगड़े को दिख रहा था लेकिन भाग नहीं सकता था।

आग इतनी भीषण थी कि किसी को दूसरे की सुध लेने की सुध नहीं थी। संयोग से अंधा और लंगड़ा दोनों उस समय एक साथ बैठे थे।

तभी लंगड़े ने अंधे को कहा तुम मुझे अपने कंधे पर बिठा लो फिर मैं रास्ता बताऊँगा और तुम बढ़ते जाना। संभव है हम दोनों बच जाएं। दोनों ने ऐसा ही किया और दोनों बच गए।

समाज को इसी तरह युवा वर्ग की मजबूत और जोशीले पैर और बुजुर्गों के अनुभवी आँख का प्रयोग कर भीषण आग से बचाया जा सकता है।

दोनों की जिंदगी भीख माँगकर रामपुर में भी कटती थी और नई जगह पर भी कटने लगी लेकिन अब दोनों ने अपनी मर्जी से चलना सिख लिया था। अतः एक ही जगह बैठकर इंतजार की मजबूरी खत्म हो चुकी थी। दोनों आपसी सहयोग से मिलकर अब व्यवहारिक रूप से साबुत आदमी बन चुके थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक बहेलिया रंग बिरंगी चिड़िया बेच रहा है और उसके पास बहुत भीड़ लगी है। आज उसी के बगल में बैठकर भीख माँगने का कार्यक्रम शुरू किया। थोड़ी देर में एक आदमी आया। देखने से बाहरी लग रहा था। उसने बहेलिए से पंछी का कीमत पूछा। बहेलिया ने सबका कीमत बताया। एक पिंजड़े में कई पंछी रखे थे। उनकी प्रजाति के हिसाब से अलग अलग कीमत थी। बहेलिया ने एक कबूतर अकेला एक पिंजड़े में रखा था। उस आदमी ने पूछा कि उस कबूतर की क्या कीमत है? बहेलिया ने कहा कि वह बिकाऊ नहीं है। वह आदमी बोला कि मैं तुमको मुंह माँगी कीमत देने को तैयार हूँ। बहेलिया सोच में पड़ गया और थोड़ी देर बाद बोला उसकी कीमत आपको एक हजार रुपया लगेगा। अब चौंकने की बारी उस ग्राहक की थी। उसने पूछा इसकी क्या विशेषता है जिसके चलते तुम इतनी कीमत माँग रहे हो !

बहेलिया ने बताया कि यह मेरा पालतू है और मैं जब जाल बिछाता हूँ तो यह उस पर बैठकर आवाज निकालता है जिसके चलते दूसरे पंछी आकर जाल में फंस जाते हैं। उस आदमी ने एक हजार रुपया देकर उस कबूतर को खरीद लिया। बहेलिया ने भी भारी मन से उस कबूतर को दे दिया।

अगले रोज फिर वह आदमी आया तो बहेलिया ने पूछा कि साहब आपने उस कबूतर का क्या किया ? उस अनजान आदमी ने कहा कि मैंने ले जाकर उस कबूतर को घने जंगल में छोड़ दिया। बहेलिया की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गयीं। उसने पूछा आपने फिर उसे हजार रुपए में क्यों खरीदा ?

अनजान बाहरी आदमी ने कहा कि मुझे उन लोगों से सख्त नफरत है जो अपने लोगों के बीच में अपनों जैसा रहकर धोखा देते है। ऐसे धोखेबाज लोगों को सभ्य समाज में रहने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे कबूतरों को पहचानकर अलग करना जरूरी है नहीं तो निर्दोष पंछी बहेलिया के जल में फँसते चले जाएंगे। जानते हो एक जार में काली और लाल चींटी लगभग आधे-आधे रखी हुई थी और शांति से टहल रहीं थी। कोई भी एक दूसरे को नुकसान नहीं पहुँचा रहा था। तभी एक आदमी ने उस जार को हिला दिया और दोनों चींटियों ने एक दूसरे पर हमला शुरू कर दिया और तबतक लड़ते रहे जबतक एक दूसरे को समाप्त नहीं कर दिया। इसमें दोष किसका है ?

लंगड़े आदमी ने कहा सीधी सी बात है जार हिलाने वाले की गलती है।

बिल्कुल सही हमलोगों को अब ऐसे कबूतर और जार हिलाने वालों से सावधान रहना होगा ताकि सामाजिक गिद्ध और बहेलिया से सुरक्षित रह सकें।

शंकर केहरी


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