घर नहीं जाना
घर नहीं जाना
बचपन का हर पल यादगार होता है। कभी न भूलने वाले पल होते हैं और शायद आने वाली यादें होती हैं।
हर चीज का पहला दिन बहुत खूबसूरत और यादगार होता है ।और वह पल भी अगर स्कूल का हो तो क्या कहने। धुँधली धुँधली सी याद है पर मम्मी कहती है कि मैंने बहुत परेशान किया था स्कूल जाने के पहले दिन । मैं बहुत रो रही थी एकदम नहीं जाना चाह रही थी।
ऐसा लग रहा था जैसे मुझे कोई जबरदस्ती किडनैप करके कहीं ले जा रहा हो। दो घंटे के स्कूल में मैं बीसों बार रोईं होंगी। मम्मी को वहाँ से जाने नहीं दिया गया। उन्हें बाहर बैठा दिया गया था ।लेकिन मैंने मस्ती भी खूब की। जब मैं बहुत रोई तब मुझे मैम ने बहुत सारे खेलने के सामान दिए और भी लड़के लड़कियाँ थी।
सब से मिलकर मुझे बहुत मजा आया। बहुत टाॅफियाँ मिली खानेके लिए।पहले दिन तो ऐसे भी पढ़ाई होती नहीं है। धीरे-धीरे मुझे मजा आने लगा और श छुट्टी के समय मैं स्कूल से घर नहीं आना चाह रही थी।
तब मैं स्कूल में रहने के लिए रोने लगी ।"मुझे घर नहीं जाना, मुझे घर नहीं जाना।"तब सभी लोगों ने अपना सिर पकड़ लिया कि अब क्या किया जाए ?जब मैं घर आई तो मम्मी ने बहुत मुझे डाँटा। सभी हँसने लगे कि सुबह स्कूल जाने के लिए रो रही थी और अब यह घर नहीं आने के लिए रो रही थी। पता नहीं आगे क्या होगा ? आज भी जब यह बात मम्मी बताती है तो हम सभी बहुत हँस पड़ते हैं। मुझे खुद पर शर्म आ जाती है कि मैंने कैसे अपना पहला ही दिन बिगाड़ दिया और क्या किया था ?"
