एक इंजीनियर की दास्तान
एक इंजीनियर की दास्तान
यह कहानी उस समय की जब मैथन बाँध को निर्मित हुए पूरे एक दशक हो चुके थे। यानी कि वह समय कोई 1968-69 ईस्वी का रहा होगा। हमारे देश को आज़ाद हुए तब लगभग दो दशक से ऊपर हो चुके थे। गौरतलब है, कि मैथन का यह बाँध संसद की 14 वी अनुसूची के तहत एक बहूद्देशीय नदी घाटी परियोजना के तहत आई थी, जो बिहार राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा सन् 1957 ई को लोकार्पण किया गया था।
मैथन का अर्थ है--माई का स्थान। यह क्षेत्र माँ कल्याणेश्वरी के स्थान के लिए विशेष प्रसिद्ध है।
रजत सेन इसी मैथन बाँध के सिविल विभाग में कार्यपालक अभियंता ( executive engineer) के रूप में पदस्थापित था। उसकी तैनाती बाँध के मरम्मत और रखरखाव विभाग में हुई थी। वह बहुत ही ईमानदार और मेहनती अफ़सर था। इस हेतु भी वह अपने बाँस को विशेष प्रिय था।
रजत का बाँस एलैन कूपर चालचलन से पक्का अंग्रेज था, जबकि असल में वह एक एंग्लो इंडियन था। उसकी माँ भारतीय मूल की थी। इस वजह से वह अंग्रेजों जितना गोरा नहीं था। अपने रंग की कमी को वह अंग्रेजों जैसे मिजाज़ और रंग- ढंग से पूरा कर देता था। इसलिए उससे एकबार मिल लेने के बाद किसी की यह मजाल न थी कि उसे अंग्रेज न कह सके। अंग्रेजीयत का रंग उसपर इतना ही गहरा चढ़ा हुआ था।
एक और बात में वह अंग्रेजों से बढ़कर था, और वह था उसका भारतीयों के प्रति गहरी नफरत। उसे भारतीय लोग सभी असभ्य और अशिक्षित ही मालूम पड़ते थे। केवल रजत इसका अपवाद था! दरअसल, रजत ने एकबार साहब को टरबाइन के ब्लेड्स के नीचे आने से बचाया था। उस दिन के बाद से साहब के खास आदमियों के बीच उसकी जगह बन गई थी।
रजत शिक्षित था, पढ़ा -लिखा भी था और विनम्र भी। उसका सुडौल छः फीट ऊँचा कद और सौम्य मुखावयव दूर से ही बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। शायद इसलिए भी साहब के साथ उसकी अच्छी निभ जाया करती थी। वह वहीं गोगना गाँव स्थित ऑफिसर्स बंगलो में अपनी खूबसूरत पत्नी श्वेता और चार वर्ष का बेटे शुभ्र के साथ रहता था। उसके माता- पिता का पहले ही देहांत हो चुका था। इसलिए अब उसके परिवार में इतने ही लोग थे।
कुछ महीने हुए काॅरपोरेशन में कुछ जी॰टी॰यों ( ग्रेजुएट ट्रेनी) की बहाली हुई है। उनमें से एक, जिसका नाम कनक है, को काम सीखाने और प्रशिक्षण देने हेतु रजत के सुपुर्द किया गया था। रजत का स्वभाव इतना मिलनसार था कि वह शीघ्र ही कनक से घुल- मिल गया। और उसने न केवल उसको अपनी छत्रछाया में ले लिया, बल्कि उसे अपना छोटा भाई की तरह मानने लग गया था।
कनक को पहली बार देखते ही रजत को बड़ा अद्भुत सा अहसास हुआ था। पता नहीं क्यों वह उसी समय उसके दिल में उतर गया था। उसे देखकर अचानक भातृ-स्नेह का एक सैलाब सा उसके मन में उमड़ पड़ा था। ऐसा क्यों हुआ यह उसकी समझ के परे था।
रजत अपनी माँ- बाप की इकलौती संतान होने के कारण बचपन से ही उसे कभी भाई या बहन का साथ न मिल पाया था। इसलिए कभी किसी के प्रति उसकी ऐसी फीलिंग्स जाग्रत न हुई थी। परंतु कनक का हर बार सामने आकर खड़े होते ही न जाने उसे क्या हो जाता था!! उसका मन उसे गले से लगाने को आतुर हो उठता था। वह अपने आपको उस पर प्यार लुटाने से रोक न पाता था।
कनक की इतनी चर्चा जब अपने पति के मुख से सुनी तो श्वेता ने भी उसे व्यक्तिगत रूप से जानने की इच्छा जाहिर की। उसने कनक को किसी दिन खाने पर घर ले आने का आग्रह किया। रजत को भी श्वेता का यह प्रस्ताव बेहद पसंद आया। उसने ऑफ़िस जाकर कनक से यह बात कही।
कनक पहले तो बहुत शरमाया। रजत सर आखिर उसका बाँस थे। चाहे उसपर बाँस की कितनी भी कृपा क्यों न हो,
"पर बाँस के घर पर खाना खाना? कुछ ज्यादा न हो जाएगा?"
उसने अपने मन में सोचा। फिर उसके अन्य सहकर्मियाँ उसके बारे में क्या सोचेंगे? कहीं वे यह सोच न ले कि बाँस को पटाने के ये सारे उसके हथकंडे हैं! न, वह नहीं जाएगा उनके घर।
इसलिए कनक कई बार रजत सर के आमंत्रणों को बड़ी विनम्रता से टालता गया। वह कुछ न कुछ बहाना दिखाकर कन्नी काट जाया करता था। लेकिन उस दिन जब रजत सर के बेटे का जन्मदिन था। रजत सर ने विभाग के कुछ और लोगों को भी पार्टी में बुलाया था। और साथ में उसे भी। उन्होंने बड़ी जोरदार ताकिद की थी कि आज तो उसे आना ही पड़ेगा।
कनक समझ रहा था कि आज उसका कोई भी बहाना नहीं चलेगा।
शाम को कनक तैयार होकर अपने बाँस के बेटे की जन्मदिन की पार्टी में पहुँचा। उसने सोचा था कि पार्टी में ढेर सारे लोग होंगे इसलिए अपना चेहरा दिखवाकर थोड़ी देर में वह वहाँ से खिसक लेगा। परंतु वहाँ जाकर बाँस के और उनकी पत्नी के आत्मीय व्यवहार से लगा कि जैसे उन लोगों के साथ उसका बरसों का नाता है। और जिसका जन्मदिन था, वह शुभ्र "अंकल अंकल" कहता हुआ उसके साथ ऐसा चिपक गया कि उसे छोड़ने को तैयार ही नहीं हो रहा था।
शाम की पार्टी के समाप्त होने के बाद जब लगभग सब लोग जा चुके थे तो शुभ्र और श्वेता भाभी दोनों उसे डिनर के लिए रुक जाने हेतु बार-बार आग्रह करने लगे।
पार्टी में भाभी की छोटी बहन प्रिया भी आई हुई थी। प्रिया कनक से तीन साल छोटी थी और इस समय काॅलेज के आखिरी वर्ष में थी। वह इतनी खूबसूरत थी कि कनक की नज़र उस पर बार-बार अटक जाती थी। वह पार्टी के दौरान भी कई बार सबकी नज़रें चुराकर प्रिया को देख रहा था। इसलिए जब डिनर का आमंत्रण मिला तो वह मान गया।
इस उम्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बड़ा प्रबल होता है। फिर उसकी सरकारी नौकरी लगते ही माँ बाबा को भी एकाएक एक सुंदर और सुशील बहू की तलाश होने लग गई थी। आए दिन उसे लड़कियों के तस्वीर दिखाए जाते थे। तो उन अनजान लड़कियों से शादी करने के बजाय अगर लड़की उसकी पसंद की हो तो क्या हर्ज है?
उस रात को सभी अतिथियों के चले जाने के बाद जब शुभ्र भी सो गया तो पति-पत्नी के बीच निम्न संवाद हुए---
"सुनो जी, आज की पार्टी तो बड़ी अच्छी रही।" श्वेता हँसते हुए अपने पति से बोली।
"सब मेरी बीवी की मेज़बानी का कमाल है। दफ्तर के लोग तुम्हारे द्वारा बनाए हुए खाने की बड़ी तारीफ कर रहे थे। एलैन साहब की मिसेज को तुम्हारी गृह- सज्जा बहुत पसंद आई!"
फिर श्वेता को अपने करीब खींचते हुए उसने कहा,
"मैं ऐसी सुन्दर और गुणवती बीवी पाकर, वाकई में खुशनसीब हूँ।"
" धत्, तुम भी न" कहकर श्वेता ने शरमाकर रजत के वक्ष में अपना मुँह छिपा लिया।
थोड़े देर बाद वह रजत से पुनः बोली,
"सुनो न, आज पार्टी में मैंने कुछ देखा! क्या तुमने भी देखा?"
"क्या देखा? बताओ तो पहले! " रजत बोला।
"पर उससे पहले बताओ कि तुम्हारा वह कनक कैसा लड़का है? दफ्तर में किसी लड़की के साथ उसका कोई चक्कर वक्कर तो नहीं है?"
"यह क्यों पूछ रही हो?" फिर जरा सर को खुजलाते हुए रजत बोला,
"मैंने कभी सुना तो नहीं ऐसा कुछ।"
"पर, तुम यह सब क्यों जानना चाहती हो, श्वेता?"
श्वेता अपनी आवाज़ को बिलकुल धीमी करके लगभग फुसफुसाते हुए बोली,
"आज पार्टी में और उसके बाद भी मैंने कनक और प्रिया को कई बार एक दूसरे को कनखियों से देखते हुए पाया। लगता है दोनो एक-दूजे को पसंद करने लगे हैं।"
"हाँ, सही कह रही हो। यह तो मैंने भी देखा। तुम्हें बताने ही वाला था।
और तुम्हें याद है प्रिया ने जब कनक से डिनर के लिए रुकने को कहा तो वह कैसे एकदम से मान गया? पर पहली बार जब तुमने यही बात कही थी तो वह कैसे ना नुकूर कर रहा था?"
"जरूर दोनों में कोई खिचड़ी पक रही है।" श्वेता बोली।
"तुम एकबार कनक से पूछ कर देखो न,जी? पापा भी पिछले हफ्ते प्रिया की शादी के लिए लड़का देखने की बात मुझसे कह रह थे। देखो न, यदि लड़के वाले मान जाए तो प्रिया भी हमारे साथ ही मैथन में रहेगी, फिर तो मज़ा आ जाएगा।"
"अरे रुको, कनक की पोस्टिंग नहीं आई है, अभी। "
"कब आएगी, पोस्टिंग?"
"अरे, उसे पहले पार्मानेन्ट तो हो जाने दो। अभी तो उसका प्रोवेशन चल रहा है।"
"लेकिन, जब तुम्हारी इतनी इच्छा है तो बात करता हूँ, उससे। परंतु तुम पहले एकबार प्रिया से पूछ कर देखना। अगर वह सम्मति दे तो मैं बात आगे चलाऊंगा।"
"अभी सो जाओ, कल जनरल शिफ्ट में जाना है। शुभ्र को भी तो स्कूल भेजना है, तुम्हें।" रजत ने अपनी पत्नी से कहा।
श्वेता का परिवार मैथन से नजदीक कुल्टी में रहता था। तीन बहनों में श्वेता बीच में थी। उसकी बड़ी बहन शिप्रा की शादी भी पास में ही हुई थी। उसका पति एक कोलियरी में मैनेजर था।
शिप्रा का ससुराल बराकर में था। इसलिए अगर प्रिया की शादी भी मैथन में हो जाए तो तीनों बहनें पास-पास हो जाएंगी और शादी के बाद भी उनका एक- दूसरे के घर आने-जाने में कोई असुविधा न होगी। साथ ही उनके माता - पिता की भी देखभाल भी हो जाएगी। इस तरह श्वेता प्रिया की शादी के सपने देखते देखती सो गई।
कुछ महीने बाद
आज कनक के घरवाले प्रिया को देखने के लिए आने वाले थे। इसलिए रजत के घर में सुबह से ही खूब तैयारियाँ होने लग गई थी। इस अवसर पर श्वेता के माता-पिता के साथ-साथ शिप्रा भी अपने पति और बच्चों के साथ उनके घर पधारी थीं। किचन से स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू से पड़ोसी भी जान गए थे कि आज इस घर में कोई विशेष आयोजन है।
श्वेता की माँ सुबह सुबह नहा-धोकर अपनी दोनों बड़ी बेटियों के साथ किचन में घुसी हुई थी। दोनो बहनों में आज अपने अपने पाक-कला के हुनर दिखाने की होड़ सी लगी हुई थी। माँ तो सिर्फ इतना चाहती थी कि अतिथियों के आने से पहले सबकुछ ठीकठाक तैयार हो जाए। इसलिए वह अपनी दोनों बेटियों को बीच- बीच में जल्दी- जल्दी हाथ चलाने को कह रही थी।
बाहर बैठक में प्रिया के पिताजी बड़ी देर से चहल- कदमी कर रहे थे। उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे समय ने पलटा खाया और उनकी नौकरी का पहला इंटरव्यू वाला दिन फिर से सामने उपस्थित हो गया। दो बेटियों की शादी वे भली भांति करवा चुके थे। अबकी छोटी प्रिया के भी हाथ पीले हो जाए तो उन्हें भी अपनी इस ज़िम्मादारी से निजात मिले।
लड़के वाले आए! उनके आगमन पर रजत और उनके ससुर गेट पर से ही उनका विधिवत आदरपूर्वक स्वागत कर उन्हें बैठक तक लिवा लाए। लड़के वालों की ओर से केवल कनक और उनके माता-पिता ही पधारे थे।
बैठक में कदम रखते ही कनक की मम्मी की नजर दीवार पर पड़ी एक तस्वीर पर पड़ी। उनके कदम वहीं चौखट पर ठिठक गए। उनको एकटक वह तस्वीर को ताकते देक रजत ने आगे बढ़कर उन्हें बताया कि यह उसकी बचपन की तस्वीर है जिसमें वह अपनी माँ के साथ एक पार्क में खेल रहा है।
" यह औरत, बहुत जानी- पहचानी सी लगती है!" कनक की माताजी तस्वीर की ओर अपनी ऊंगली दिखाकर बुदबुदाने लगी।
उनकी आँखें इस समय विस्मय से फैलकर बहुत चौड़ी हो गई थी। इसके बाद वे एकदम से पलटकर खड़ी हो गई और बिना कुछ किसी से कहे वापस गेट की ओर चल पड़ी। बदहवास अपनी अम्बासडर गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर उसके पीछे वाली सीट पर बैठ गई। उनका चेहरा कागज़ के समान सफेद पड़ गया था और पसीने से उनका बदन भीगने लगा।
"अरे, आरती!! क्या हुआ? कुछ बताओगी भी--" कहते हुए कनक के पिताजी और रजत पीछे- पीछे लगभग भागते हुए आए।
आरती जी ने कुछ कहने के लिए अपना मुँह खोला ही था कि सामने रजत को खड़ा देखकर वे चुप हो गई और विस्मित सी उसे ही देखने लगी। तभी कनक भी पास आकर खड़ा हो गया।
आरती जी की दृष्टि अब एकबार रजत और एकबार कनक पर आवागमन करने लगी।
"माँ, क्या हुआ आपको, ऐसे क्यों देख रही हैं आप, मुझे? "
कनक के मन में बेचैनी सी हो रही थी। उसे यह डर सता रहा था कि कहीं माँ प्रिया से रिश्ता न ठुकरा दे।
"घर चलो।" आरती जी पति की ओर देखकर बोली।
अरिन्दम बाबू को भी ऐसा ही लग रहा था कि अभी घर चले जाने में ही भलाई है। न जाने कौन सी बात है? आरती को वे बरसों से जानते हैं। आज से पहले उसे कभी इतना बेचैन होते हुए उन्होंने न देखा था।
रास्ते में कोई भी किसी से कुछ नहीं कहता। केवल आरती जी कई बार--"चीकू, चीकू" कहती हैं और लंबी श्वास छोड़ती है। घर पहुँचकर अरिंदम जी एकांत में आरती जी से पूछते हैं,
"अब तो बताओ कि बात क्या है? तुम वहाँ से ऐसे क्यों चली आई?"
"चीकू, वह चीकू ही है।" आरती जी उनके चेहरे पर आँखे गड़ाकर बोली।
"क्या मतलब? हमारा बेटा चीकू तो बरसों पहले खो गया था। जिस बार हम तीर्थ करने वाराणसी गए थे!"
"तुमने वह तस्वीर देखी? वह औरत?--- वही औरत है जो हमारे धर्मशाला में बगलवाले कमरे में ठहरी थी! मुझे पूरा यकीन है।"
"मैं न कहती थी कि उसी बाँझ ने मेरे चीकू को चुराया है। तुम में से किसी ने उस दिन मेरी बात न मानी थी !"
"क्या कह रही हो भागवान!! इसका मतलब कि रजत ही हमारा चीकू है?!!!"
"मुझे सौ प्रतिशत यकीन है! आखिर माँ हूँ मैं उसकी! जन्म दिया है, मैंने उसे।"
"मैं अभी पता करता हूँ।"
अरिंदम बाबू ने अपने बेटे कनक को आदेश दिया कि जाकर तुरंत रजत को घर बुला ले आए।
"कहना कि बहुत जरूरी मसला है। आने में तनिक भी विलंब न करे।"
कनक को सबकुछ एक बड़ा रहस्य के समान भान हो रहा था। परंतु पिताजी के चेहरे पर पड़ी गहरी शिकन को देखकर उसे कुछ भी पूछने की हिम्मत न हुई। वह दरवाज़ा खोलकर जैसे ही बाहर निकलने को हुआ तो आश्चर्य से देखा कि रजत सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर चला आ रहा है।
कनक के माता-पिता के यूँ अचानक लौट जाने से श्वेता के परिवारवाले बहुत ही चिंतित हो उठे थे। खासकर श्वेता के पिताजी को लग रहा था जैसे उन लोगों की ओर से कोई भयंकर ग़लती हो गई हो। तभी वे लोग बिना कुछ कहे ही इस तरह चले गए। उन्होंने रजत को समझा-बुझाकर विशेष आग्रह कर उनके पीछे भेज दिया। रजत सौ कि॰मी॰ से ऊपर की गति से अपनी बाइक भगाकर अभी अभी वहाँ पहुँचा था।
कनक रजत को अपने पिता के पास ले गया।
अरिंदम बाबू ने रजत को सारी बातें बताई। तब तक आरती जी भी वहीं आकर बैठ गई। उन्होंने रजत को उसके बचपन की तस्वीर दिखाई। उसके जन्म का प्रमाणपत्र भी दिखाया।
जिस अस्पताल में वह जन्मा था उस दिन एक विशेष दिन था। इसलिए उस समय माँ बेटे की एक साथ फोटो अस्पताल की ओर से लिया गया था। वह फोटो भी उसे दिखाया गया।
फिर रजत का ब्लड ग्रूप भी चीकू के ब्लड ग्रूप से मेल खा गया!!
जिस दिन चीकू खो गया था उसके गले में सोने की एक विशेष प्रकार चेन थी। एलबम देखकर रजत बोला कि ऐसी एक चेन उसके पास भी मौजूद है।
सारे सबूतों को देखकर सबको यकीन हो गया कि रजत ही कनक का खोया हुआ भाई चीकू है।
रजत को भी अब समझ आने लगा था कि कनक को देखकर हर बार उसके प्रति भातृ- स्नेह क्यों उमर उठता था।
आशीर्वाद वाले दिन में कनक ने चुपके से प्रिया के कान में कहा,
" थैन्क्यू।"
"मैंने क्या किया?"
"तुम्हारे कारण ही मुझे मेरे बड़े भाई मिल गए।"
"मेरे कारण कैसे?"
"अगर उस दिन तुम्हें देखने न आते तो।"
और कनक और प्रिया एक दूसरे को देखते हुए उन आँखों में खो गए!!
