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Haripal Singh Rawat (पथिक)

Abstract

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Haripal Singh Rawat (पथिक)

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एक और कहानी

एक और कहानी

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बर्ष २०१३ बरसात की वह शहर आज भी याद है मुझे।

तीन दिनों सैर-सपाटे के बाद हरे भरे और स्वच्छ शांत वातावरण को छोड़कर मैं रानीखेत से काठगोदाम की बस में तो बैठ गया था, लेकिन घुमक्कड़ मन पहाड़ छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। काठगोदाम से दिल्ली के लिये शाम को रेल की टिकट बुक थी।

मैं किसी तरह बोझिल मन को ढोता हुआ सुबह लगभग 9 बजे काठगोदाम पहुँचा। रातभर बरसने के बाद अब जाकर कहीं व्योम दरक से रोशनी हरे भरे पर्णों पर बिखरे मोतियों को और प्रकाशमयी कर रही थी। सामने बड़े से इन्द्र धनुष को देख घुमक्कड़ मन और भी जिद्दी हो गया। और मुझे वह खींचता हुअ‍ा, आखिर उस जगह पहुंच ही गया जहाँ से कुदरत का सुंदर नजारा देखने को बनता था। घंटों मैं प्रकृति की गोद में बैठा रहा आस-पास के सभी प्रसिद्ध स्थानों का भ्रमण करने के पश्चात में रेलवे स्टेशन जा पहुँचा। मन अभी दिल्ली लौटने को राजी नहीं था। तो मैंने रेल की टिकट रद्द करवायी और नैनीताल की ओर चल पड़ा। तकरीबन दिन के दो बजे होंगे जब मैं नैनीताल मुख्य बाजार से दो-एक किलोमीटर दूर बसे हनुमान जी के मंदिर हनुमान चट्टी पहुँचा।

मन बेहद हर्षित था। दर्शन पश्चात मैं गाता गुनगुनाता हरे भरे जंगल के रास्ते से वापस नैनीताल की ओर लौटने लगा। अचानक मुझे किसी के हँसने की आवाज सुनाई दी। मैं रुका अपने आस पास झाँककर देखा तो कोई नहीं दिखा। पुनः कदमों को गति दी ओर उसी प्रकार गाता गुनगुनाता आगे बढ़ने लगा।

ढ़लान से यही कोई दस बारह कदम नीचे ही उतरा था कि मैंने देखा एक लड़की जिसने गहरे लाल रंग का लहंगा पहना था। रास्ते से थोड़ा हटकर हरी घास पर बैठी थी। मेरे पैरों की आहट पाकर वह थोड़ा सा सहम सी गयी थी। मैंने उसकी ओर देखा और फिर अपने रास्ते पर बढ़ने लगा। तभी उसने जोर जोर से हँसना शुरु कर दिया।

मुझ से चुप नहीं रहा गया तो मैंने उससे उसके हँसने की वजह पूछ ही ली।

क्या आप मुझे देख कर हँस रहीं हैं?

उसने थोड़ा सा सिर को उठाया औेर पुनः हंसना शुरु कर दिया।

इतने में उसकी एक और सहेली जिसे वह पूजा कहकर बुला रही थी। जो पास वाले बांज के पेड़ ( ऑक ट्री) पर बैठी हुई थी उसने उत्तर दिया ....

आप इतनी जोर जोर से जो गा रहे हैं।

मैं थोड़ा हिचकिचाया और फिर जवाब दिया.

हाँ ! प्रकृति की इस सुन्दरता को देख भला किसका मन गाने को न करे?

उन दोनों ने हामी भरते हुए, एक साथ सिर हिलाया।

फिर पूजा बोल पड़ी.....

लेकिन यह गाना कभी सुना नहीं। कौन सी फिल्म का है?

मैं हंसते हुए बोला, दरअसल यह किसी फिल्म का गाना नहीं है, बस मन गाने का किया तो ऐसे ही एक दो शब्द जोड़ लिये।

क्या ? सच में??? पूजा ने पेड़ से उतरते हुये पूछा।

मैंने हाँ के स्थान पर केवल सिर हिलाया।

फिर उनसे कुछ बातें की और फिर धीरे-धीरे जान पहचान होने लगी।

पूजा ने रश्मि से मेरी पहचान करवायी।

एकदम चुलबुल स्वभाव की दो सखियाँ । लड़ती-झगड़ती, हँसी-ठिठोली करती। 

पूरा माहौल बस उनकी हँसी ठिठौली से गूंज रहा था, मैं खुश था कि सफर के लिये मुझे दो साथी मिल गये हैं। उनसे बात करने पर पता चला कि वह भी मेरी ही तरह दिल्ली से नैनीताल आये हैं। बस अंतर इतना था कि मैं नौकरी के साक्षात्कार के लिये काठगोदाम आया था और वह दोनों रश्मि की बुआ से मिलने। 

खैर हम मंदिर से होते हुये नैनी झील की तरफ चल दिये। मेरा बेहद मन था कि मैं नौका- बिहार करुँ। पूजा ने साथ नौका में बैठने की जिद की और वह दोनों मेरे साथ एक ही नौका में आकर बैठ गये। मैं थोड़ा मिलनसार प्रवृत्ति का इंसान हूँ। लोगों से बेहद जल्दी घुल मिल जाता हूँ। शायद इसी कारण उन दोनों से भी मेरी अच्छी निभने लगी।कुछ ही देर में वह दोनो सहेलियाँ मुझसे इतना घुल मिल गयी कि मुझे उनके गाँव में बसे उनके चाचा-चाची, दिल्ली वाले मौसा-मौसी, और सभी रिश्तेदारों की कुंडलियाँ तक कंठस्थ हो गयी थी।

शाम होने को थी और मुझे अब दिल्ली वापस लौटना था। उन दोनों से विदाई लेते हुये मैं कुछ कदम चला ही था कि पूजा ने भी उनकी टिकट बुक करने को कहा। मैं उन्हे साथ चलने को पहले कह सकता था, लेकिन उन्होने मुझे बताया था कि वह अगली सुबह की गाड़ी से लौटेंगे। खैर उन्होने अपना मन क्यूँ बदला ये तो वही जानें। मेरे पूछने पर रश्मि ने यही जवाब दिया कि अब रुक कर क्या फायदा।

मैंने ज्यादा पूछताछ करना ठीक नहीं समझा और टिकट लेने के लिये लाइन में लग गया। शायद वह आस पास घूमते घूमते ऊब गये थे।

ट्रेन के डिब्बे में मुझे व उन दोनों कोआमने सामने की सीट मिली साथ में एक कुमांऊनी परिवार भी हमारे साथ ही दिल्ली तक सफर कर रहा था। वह दोनो मेरे ठीक सामने बैठे थे तो उनसे आमने सामने बातें होने लगी। मुझे बेहद अच्छा लग रहा था कि उनको मुझ पर इतना विश्वास था कि दोनो ने मेरे साथ ही दिल्ली वापस लौटने की मन बनाया।

वह दोनों उस समय दिल्ली के हिन्दू कालेज में बी०काम प्रथमवर्ष की छात्रायें थी।

में उस समय वाणिज्य में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी कर चुका था।

तो उनसे अपने अनुभव साझा करने लगा। 

उन दोनों ने पूरी रात बातें करते-करते गुजार दी। रात के १-२ बजे तक तो मैं भी जगा रहा, लेकिन नींद से प्यारा दुनिया में कुछ नहीं।

दिल्ली आकर रेल रुकी तो आंख खुली। रेल से उतरे पर भौर में घर के लिये निकलना सुरक्षित न लगा। पूजा ने चाय पीने की जिद की और चाय की चुस्कियों के साथ फिर उन दोनों के कई किस्से चाय को मीठा करने लगे।

दुनिया के बंधनों से बेखबर सच्चे मन की धनी। किसी के भी मन को जीत ले। किसी का भी मन मोह ले । न किसी से ईर्ष्या न किसी तरह काम लोभ। बस अपने-आप में मग्न ।

मैं शान्ति प्रिय स्वभाव का हूँ थोड़ी सी भी कर्कशता कानों को चुभती है। लेकिन उनकी बातों को सुनते हुये मुझे जरा सी भी असुविधा का आभास नहीं हुआ।

सूरज की पहली सुर्ख किरण के साथ हम भी रेलवे स्टेशन से‌ घर के लिये निकल पडे़ । मुझे जनकपुरी जाना था तो मैं उन दोनो को उनके घर राजौरी गार्डन छोड़ने चला गया। सुबह रश्मि की माँ चाय-नास्ते के साथ हमारा ही इंतजार कर रही थी। उनसे मिला तो पता चला कि बिटिया का स्वभाव माँ से कितना मिलता है। 

मैंने उनसे विदा लिया और घर की ओर निकल पड़ा।

पुनः रोज की जदो-जहद में वयस्त हो गया।

रश्मि और पूजा दोनो मुझसे फेसबुक पर जुड़ गयी। मुझे हमेशा मैसेज किया करते। मुझे लगा कि शायद उनको पढ़ाई के लिये उचित मार्गदर्शन की जरुरत है। औेर भला एक शिक्षक के मन में आ भी क्या सकता है पढाई-लिखाई के सिवा।

रश्मि और पूजा अक्सर मुझे घर पर होने वाले समारोहों में बुलाने लगे।

पूजा के भाई की शादी में तीन चार दिन तक उनके घर में सबका हाथ बढ़ाया। रश्मि और पूजा दोनों के साथ बहुत बातें करने का मौका मिला, उन्हे जानने समझने का मौका मिला।

लेकिन रश्मि के मन में कब मेरे लिये एक अहम जगह बनने लगी मुझे पता ही नहीं चला। पता मुझे तब चला जब पूजा के भाई की बारात वापस लौटते समय रश्मि ने मुझे अपने मन की बात बताई, सच में कितनी हिम्मत रही होगी उसके भावों में.... बिना ड़रे कितने आत्मविश्वास के साथ उसने उन भावों को जबान दी।

लेकिन मैं पूजा और रश्मि दोनों को पहले दिन से ही छोटी बहनों के रुप में देखता आया था।

मेरे लिये रश्मि के वह बोल किसी घातक प्रहार से कम न थे। जो मुझे, मेरे भावों को आहत कर रहे थे। मेरी आँखों से भाव बहने लगे। 

पूजा तो समझ गयी पर रश्मि को समझाना बेहद मुश्किल था। में शाम को घर के लिये लौटने लगा। इस आस में कि समय के साथ सब ठीक हो जायेगा। उस दिन के बाद न तो रश्मि काम फोन आया न पूजा का।

मैंने उनका हाल जानने की कोशिश भी की .... पर उसके घरवालों ने भी मुझे उससे न मिलने का अनुरोध किया।

५ साल बीत गये और यादें धुंधली हो गयी। मैं जिन्दगी की जद्दोजहद में उलझा सब भूल गया था कि एक दिन रश्मि काम फोन आया। बात नहीं की पर वह वही थी।

मैं यह जानने को व्याकुल था कि वह कैसी है। इसी आस में उसके घर उससे मिलने को गया। और शायद सही समय पर वहाँ पहुँचा।

भला इससे सुखद अहसास क्या हो सकता था कि घर पर उसकी शादी की तैयारिया चल रही थी। सब मुझे देख कर चौंक तो गये थे लेकिन फिर आखिर रश्मि से मिलने का सौभाग्य मिल ही गया। उसकी आँखों में खुशी साफ जाहिर थी। और मेरे लिये भी वह पल बेहद सुखद था।

और अंत वर वधू को आर्शीवाद देकर में हर्षित मन से वापस अपनी दुनिया में लौट आया।


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