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Kumar Vikrant

Comedy

4  

Kumar Vikrant

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दलभ दूध : बच्चे

दलभ दूध : बच्चे

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लल्ला जी यदि एक दिन कोई उपन्यास या मैगज़ीन न पढ़े तो उन्हें बेचैनी होने लगती थी और आज उन्हें किसी उपन्यास या मैगज़ीन का दर्शन हुए एक हफ्ता हो चुका था और उन्हें अभी अपने ननिहाल में पूरे १० दिन और रहना है। 

"काश मैं कुछ मैगज़ीन और उपन्यास अपने झोले में ही डालता आता तो इस बोरियत का सामना तो न करना पड़ता। "यही सोच कर लल्ला जी अपने ननिहाल की छत पर बैठे अपना सिर धून रहे थे। 

"न जाने कैसे लोग है इस गांव के? न कोई पढता दीखता है और न कोई खेलता ही दिखता है, जिसे देखो मोबाइल में सिर घुसाए बैठा है। "

लल्ला जी सोच में डूबे हुए थे लेकिन तभी छत पर बैठे-बैठे उनकी निगाह अपने छोटे मामा छुट्ट्न के घर पर जा पड़ी। उनकी छोटी मामी निशा देवी के हाथ में एक मैगज़ीन थी जिसका नाम धर्म युग था; जिसके पन्ने वो धीरे-धीरे पलट रही थी। अरे वाह, घर में छोरा शहर में ढिंढोरा। अपने मामा के घर में धर्म युग जैसी शानदार पत्रिका है और हम पूरे गांव को कोस रहे है। लल्ला जी लपक कर छत से नीचे उतरे और छुट्ट्न मामा के घर जा पहुँचे। निशा मामी जहाँ बैठकर धर्मयुग के पन्ने पलट रही थी आंगन में पड़ी उस कुर्सी पर मामा जी का चार वर्षीय पुत्र छुन्नू विराजमान था। 

"ओ छुन्नू के बच्चे चल उठ कर खड़ा हो जा और मम्मी से धर्मयुग लेकर आ।" लल्ला जी ने हुक्म दिया। बच्चा उछल कर कुर्सी से उतरा और लल्ला जी की तरफ देखा। 

"अबे छुन्नू के बच्चे, जा अपनी मम्मी से धर्मयुग लेकर आ। ऐसे क्या देख रहा है? तेरी समझ में नहीं आ रहा है क्या।" लल्ला जी ने छोटे बच्चे की तरफ गौर से देखते हुए कहा।

बच्चा कुछ नहीं बोला और फिर सिर को हिलाकर अंदर घर में भाग गया। दौड़ते-दौड़ते वो चिल्ला रहा था- मम्मी लल्ला भैया आया, लल्ला भैया आया। 

अब लल्ला जी के सामने इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था। वो वहीं आंगन में रखी कुर्सी पर विराजमान हो गए और अपने मोबाईल में उलझ गए। 

पाँच मिनट गुजरे, दस मिनट गुजरे, पंद्रह मिनट गुजरे लेकिन न तो मामी घर से बाहर निकली और न छुन्नू। लल्ला जी उठकर चलने ही वाले थे कि मामी की आवाज आई, "अरे लल्ला भैया दूध गर्म कर रही थी इसलिए थोड़ी देर हो गई, लो पीओ गर्म दूध।"

कहते हुए मामी ने गर्म दूध से भरा एक गिलास लल्ला जी को थमा दिया। 

"दूध?" मामी जी दूध वो भी इस वक्त?" लल्ला जी सकपका कर बोले। 

"क्यों तुमने गर्म दूध लाने के लिए नहीं कहा था?" मामी ने आश्चर्य के साथ पुछा। 

"मामी जी मैं दूध क्यों मंगाने लगा?" लल्ला जी बोले, "वैसे आप यह गर्म दूध किसके कहने पर लाइ हो?"

"जिसे तुमने कह कर भेजा था।" मामी बोली, "तुमने छुन्नू को गर्म दूध लाने को नहीं कहा था?"

"नहीं मामी जी।" लल्ला जी बोले, "ऐसे ही आपको क्यों परेशान करूंगा मैं।"

निशा मामी आश्चर्य से लल्ला जी कि तरफ देखते रही और फिर कर्कश आवाज में चिल्ला कर बोली, "छुन्नू के बच्चे इधर बाहर आ।"

बच्चा दौड़ता हुआ घर से बाहर आया। 

"क्यों रे छुन्नू के बच्चे, लल्ला भैया ने क्या मंगाया था?" मामी ने छुन्नू से पुछा। 

"दलभ दूध।" छुन्नू ने जवाब दिया। 

"अब बोलो लल्ला भैया।" मामी लल्ला जी की तरफ देख कर बोली, "देखा छुन्नू क्या कह रहा है।"

"मामी जी मैंने तो इससे धर्मयुग लाने को कहा था।" लल्ला जी बोले, "अरे वही पत्रिका जो आप थोड़ी देर पहले पढ़ रही थी।"

मामी कुछ कुछ समझ गई थी लेकिन फिर भी हंस कर छुन्नू से बोली, "छुन्नू के बच्चे लल्ला भैया ने धर्मयुग लाने को कहा था?"

"हाँ दलभ दूध।" छुन्नू ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। 

"अच्छा तो वो पत्रिका धर्मयुग चाहिए थे तुम्हे, जो छून्नु की तुतली जुबान में दलभ दूध हुई और मेरी समझ में गर्म दूध आया।" मामी हँसते हुए बोली, "ठहरो अभी लाइ धर्म युग।"

थोड़ी देर बाद लल्ला जी गर्म दूध पीते हुए धर्म युग पढ़ने का आनंद ले रहे थे। 


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