दीये- बाँटने का सुख
दीये- बाँटने का सुख
दीये- लघु कहानी - डॉ शैलजा भट्टड-9164325435 "माँ, सिर्फ दस दिन बचे हैं, मिट्टी के दीये नहीं आए अभी तक, उन्हें सजाना भी तो है।" शीतल ने पूछा। माँ ने बताया- "इस बार पूरा बाजार छान लिया, कहीं भी मिट्टी के कच्चे दीये नहीं मिले।" "ऐसे कैसे?" "सिर्फ़ सजावटी दीये हैं या फिर मोम के दीये। इस बार इन्हे ही लाना होगा।" अपनी बात को जारी रखते हुए सीमा ने बताया लेकिन शीतल ने कहा- "नहीं मुझे मिट्टी के दीये ही चाहिए और मैं खुद उन्हें सजाना चाहती हूँ।" इतना कहकर, शीतल बाहर चली आई और अपने आस-पड़ोस के मित्रों से इस बारे में बातचीत की, सभी का यही जवाब था। अतः सभी बच्चों ने बाजार जाकर पता किया और वाकई वहाँ कोई भी कच्चे दीये का ठेला या दुकान दिखाई न दी। तब बच्चे आसपास से दीये बनाने वालों का पता लेकर उनके घर पहुँच गए। उन्होनें बताया- "हमने इस साल से दीए बनाना बंद कर दिया है, क्योंकि सबकी दिवाली में चार चाँद लगाने में हमारे दीये असफल रहे। हमारे दीये साधारण होते हैं जो कोई भी पसंद नहीं करता।" एक कोने में पड़े पिछले साल के नब्बे प्रतिशत बिन बीके दीये उन्होंने दिखाए और कहा- "दिन-रात की मेहनत भी पिछली दिवाली उनके घर में दीये नहीं जलवा पाई, इसलिए अब उन्होंने दीये बनाना छोड़ दिया है।" शीतल और बाकी बच्चों ने उनसे वादा किया- "इस दिवाली आपके सारे दीये बिक जाएँगे, वह भी ज्यादा कीमत में। यह सब हम आपके साथ मिलकर करेंगेI" सभी ने दीयों को सजाकर आकर्षित बनाया और उन्हें फिर-से दुकान लगाने के लिए कहा। अगले दिन वे उनकी खुशियों का हिस्सा बनने गए तो, सब नए कपड़ों में सजे, कोई दीए लगा रहा था, तो कोई रसोईघर में मिठाई बनाने में व्यस्त दिखा। हमें देखते ही उत्साहित हो हमारे पास आकर कहने लगे- "हम आप ही लोगों का इंतजार कर रहे थे।" शीतल ने उन्हें घर पर बनी मिठाइयाँ सौंपकर कहा- "हम सब आप सभी के साथ अपनी खुशियाँ बाँटने आए हैं। गोवर्धन पूजा के दिन हमारी सोसायटी ने अन्नकूट रखा है; आप सभी को प्रसाद लेने आना-ही-आना है।" शीतल के निमंत्रण में आग्रह था। "हम सब जरूर आएँगे। आप सबने हमारी सपनों की दुनिया को धरातल दिया है। हमारी खुशियों में चार चाँद लगाए हैंI आप लोगों का कहना कैसे टाल सकते हैं। "ये हुई न बात। चलिए इसी बात पर सब मिलकर मुँह मीठा करते हैं।" =========
