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Anand Mishra

Action

5  

Anand Mishra

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धुंध में चौथा यात्री

धुंध में चौथा यात्री

5 mins
3

कालका–शिमला रेलमार्ग
अक्टूबर 2008

पहाड़ों पर धुंध उतर चुकी थी।

कालका से शिमला जाने वाली अंतिम ट्रेन धीरे-धीरे चढ़ाई चढ़ रही थी। रात के नौ बजे थे। खिड़कियों के बाहर केवल अंधेरा और धुंध दिखाई दे रही थी।

प्रथम श्रेणी के एक छोटे डिब्बे में चार यात्री सफर कर रहे थे।

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आर.के. मेहरा

प्रसिद्ध उद्योगपति विक्रम सहगल

खोजी पत्रकार नंदिता घोष

और इतिहास के प्रोफेसर समरदीप सेन

चारों एक-दूसरे को बीस वर्षों से जानते थे।

लेकिन अब उनके बीच मित्रता नहीं, केवल एक साझा अतीत बचा था।

रात 9:12 बजे ट्रेन बड़ोग सुरंग में प्रवेश कर गई।

कुछ मिनट बाद सुरंग समाप्त हुई।

तभी एक चीख सुनाई दी।

रेलवे कर्मचारी दौड़े।

डिब्बे का दरवाज़ा भीतर से बंद था।

जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो उद्योगपति विक्रम सहगल फर्श पर मृत पड़े थे।

उनके सीने में एक धातु का पत्र-खोलक धँसा हुआ था।

पूरा देश इस समाचार से हिल गया।

मामला पुलिस अधीक्षक अदिति राणा को सौंपा गया।

अदिति ने सबसे पहले तीनों जीवित यात्रियों से पूछताछ की।

न्यायमूर्ति मेहरा ने कहा,

"सुरंग में अंधेरा था। मैं अख़बार पढ़ रहा था।"

नंदिता बोली,

"मैं मोबाइल पर नोट्स देख रही थी।"

समरदीप ने शांत स्वर में कहा,

"मैं खिड़की के बाहर देख रहा था।"

सभी के बयान सामान्य लग रहे थे।

लेकिन अदिति को एक बात परेशान कर रही थी।

तीनों ने विक्रम के साथ लंबी बातचीत का दावा किया था।

फिर भी किसी ने यह नहीं बताया कि बातचीत वास्तव में किस विषय पर हुई थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई।

और पूरी जाँच बदल गई।

विक्रम की मृत्यु सुरंग के भीतर नहीं हुई थी।

वह कम से कम पैंतालीस मिनट पहले मर चुके थे।

अदिति ने रिपोर्ट तीन बार पढ़ी।

फिर धीरे से कहा,

"तो ट्रेन में हत्या नहीं हुई।"

अब प्रश्न था—

यदि विक्रम पहले ही मर चुके थे, तो ट्रेन में उनके साथ सफर कौन कर रहा था?

सीसीटीवी फुटेज मँगवाए गए।

स्टेशन पर एक व्यक्ति विक्रम सहगल जैसा दिखाई दे रहा था।

वही कोट।

वही टोपी।

वही चश्मा।

लेकिन चेहरा कभी साफ नहीं दिखा।

फुटेज को कई बार देखने के बाद अदिति ने एक विचित्र बात नोट की।

विक्रम सहगल बाएँ हाथ से काम करते थे।

वीडियो में व्यक्ति दाएँ हाथ से सूटकेस उठा रहा था।

अब मामला रोचक हो चुका था।

इसी दौरान अदिति को बीस वर्ष पुरानी एक विश्वविद्यालय परियोजना के दस्तावेज़ मिले।

चारों उस परियोजना का हिस्सा थे।

परियोजना हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्रों में अवैध भूमि अधिग्रहण की जाँच कर रही थी।

अचानक परियोजना बंद हो गई थी।

कुछ दस्तावेज़ गायब हो गए थे।

और उसके बाद चारों अलग हो गए।

अदिति ने दस्तावेज़ पढ़े।

उनमें दर्ज था कि अनेक गाँवों की जमीन फर्जी कंपनियों के माध्यम से खरीदी गई थी।

इन कंपनियों का अंतिम लाभार्थी कौन था?

विक्रम सहगल।

लेकिन इससे भी बड़ा रहस्य अभी सामने आना बाकी था।

अदिति ने समरदीप सेन की पृष्ठभूमि जाँची।

उन्हें पता चला कि उन प्रभावित गाँवों में से एक गाँव समरदीप का अपना था।

उनके पिता वहाँ स्कूल शिक्षक थे।

उन्होंने भूमि अधिग्रहण का विरोध किया था।

परिणामस्वरूप उनकी नौकरी चली गई।

घर बिक गया।

परिवार बिखर गया।

कुछ वर्षों बाद उनकी मृत्यु हो गई।

समरदीप ने कभी सार्वजनिक रूप से शिकायत नहीं की।

लेकिन घाव भीतर जीवित था।

फिर अदिति को एक और प्रमाण मिला।

कालका स्टेशन के पास स्थित एक पुराने गेस्ट हाउस के रजिस्टर में विक्रम सहगल के हस्ताक्षर थे।

उसी दिन के।

कमरे की तलाशी ली गई।

वहाँ से खून के सूक्ष्म निशान मिले।

फोरेंसिक रिपोर्ट स्पष्ट थी।

वास्तविक हत्या गेस्ट हाउस में हुई थी।

अब सब कुछ जुड़ने लगा।

अंतिम बैठक में अदिति ने सभी को बुलाया।

न्यायमूर्ति मेहरा।

नंदिता।

समरदीप।

और जाँच दल।

अदिति ने कहना शुरू किया।

"विक्रम सहगल ट्रेन में जीवित नहीं थे।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"उनकी हत्या ट्रेन रवाना होने से पहले गेस्ट हाउस में हो चुकी थी।"

समरदीप का चेहरा निर्विकार था।

अदिति ने आगे कहा,

"हत्यारे ने विक्रम का कोट पहना।"

"उनका चश्मा पहना।"

"उनकी टोपी पहनी।"

"और स्टेशन पर लोगों को यह विश्वास दिलाया कि विक्रम अभी जीवित हैं।"

नंदिता धीरे-धीरे समझने लगी।

"इसलिए किसी ने चेहरा साफ नहीं देखा..."

"हाँ," अदिति बोली।

फिर उन्होंने सीधे समरदीप की ओर देखा।

"और वह व्यक्ति आप थे।"

कमरे में मौन छा गया।

कई सेकंड तक समरदीप कुछ नहीं बोले।

फिर उन्होंने गहरी साँस ली।

"आपको यह कब समझ में आया?"

"जब मैंने जाना कि विक्रम बाएँ हाथ से काम करते थे।"

समरदीप मुस्कुराए।

"इतनी छोटी बात।"

"सच्चाई अक्सर छोटी बातों में छिपी होती है।"

कुछ क्षण बाद समरदीप ने सिर झुका दिया।

"हाँ। मैंने ही किया।"

नंदिता स्तब्ध रह गई।

"क्यों?"

समरदीप की आँखें पहली बार नम हुईं।

"क्योंकि मेरे पिता न्याय चाहते थे।"

उन्होंने धीरे-धीरे पूरी कहानी बताई।

वर्षों पहले विक्रम ने भूमि अधिग्रहण रिपोर्ट दबा दी थी।

उसके बाद उसी भूमि से उन्होंने करोड़ों रुपये कमाए।

हाल ही में उन्हें अपराधबोध होने लगा था।

उन्होंने पुराने साथियों को शिमला बुलाया था।

वे सार्वजनिक स्वीकारोक्ति करना चाहते थे।

लेकिन समरदीप के लिए बीस वर्ष बहुत देर हो चुकी थी।

"जब मेरे पिता जीवित थे, तब उन्हें सत्य नहीं मिला।"

"जब गाँव उजड़ रहे थे, तब सत्य नहीं मिला।"

"अब स्वीकारोक्ति से क्या बदलता?"

कमरे में किसी ने उत्तर नहीं दिया।

समरदीप ने आगे कहा,

"मैंने उसे गेस्ट हाउस में मार दिया।"

"फिर मैं उसके रूप में स्टेशन पहुँचा।"

"ट्रेन में शव पहले से था।"

"मैं केवल समय को छिपाना चाहता था।"

अदिति ने शांत स्वर में कहा,

"आपने केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं की।"

"आपने कानून पर भी विश्वास खो दिया।"

समरदीप ने उत्तर दिया,

"शायद।"

"लेकिन मैंने विश्वास बहुत पहले खो दिया था।"

कुछ सप्ताह बाद मुकदमा चला।

समरदीप दोषी सिद्ध हुए।

विक्रम सहगल की कंपनियों की जाँच शुरू हुई।

भूमि रिकॉर्ड फिर से खोले गए।

कुछ प्रभावित परिवारों को वर्षों बाद न्याय मिला।

लेकिन उस मामले में कोई विजेता नहीं था।

एक व्यक्ति मर चुका था।

दूसरे ने अपना जीवन खो दिया।

और अनेक परिवार दो दशकों तक पीड़ा झेलते रहे।

मुकदमे के बाद पत्रकारों ने अदिति से पूछा,

"इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात क्या थी?"

अदिति ने उत्तर दिया,

"यह हत्या की कहानी नहीं थी।"

"यह उस कीमत की कहानी थी जो समाज तब चुकाता है जब सत्य को बहुत देर तक दबाकर रखा जाता है।"

उस रात कालका–शिमला रेलमार्ग पर फिर धुंध उतरी।

ट्रेनें चलती रहीं।

यात्री आते-जाते रहे।

लेकिन अदिति को आज भी वह मामला याद था।

क्योंकि उसमें सबसे बड़ा छल पहचान का नहीं था।

सबसे बड़ा छल समय का था।

और कभी-कभी समय ही सबसे कुशल अपराधी साबित होता है।



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