Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Drama


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Drama


देवरानी और सरोज ..

देवरानी और सरोज ..

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सरोज को अपनी सोच में पति, जगन का समर्थन मिलने से वह आत्मविश्वास से भरी थी। अतः अगली सुबह, आदतन हल्की बात कहने वाली, देवरानी ने उसको पुनः नीचा दिखाने की दृष्टि से जब, पूछा कि - सच बता, जिठानी, बच्चे नहीं होने से बुरा तो लगता होगा, ना?

तब सरोज ने बिना चिढ़े, विनम्रता से उत्तर दिया- नहीं, कोई बुरा नहीं लगता, तुम्हारे तीन बच्चे, हमारे भी तो हैं, ना! 

दरअसल देवरानी की शादी को हुए चार साल में, तीन बच्चे हो चुके थे।

कोई अच्छी औरत होती तो उसे, सरोज का ऐसा कहा गया, सुनकर ख़ुशी होती, मगर देवरानी को ख़ुशी तो, सरोज को दुःखी करने में मिलती है।

उसने तुरंत पलट कर कहा- ना, ना जिठानी, अपने खुद पैदा करो। हमारे बच्चों पर नज़र न रखो।    

सरोज ने फिर शाँति से ही सफाई दी - नहीं, मेरे कहने का आशय ऐसा नहीं है। मैं यह कहना चाहती हूँ कि अगर मेरे बच्चे नहीं भी होते हैं तो भी, इस घर के लिए कुलदीपक तुम्हारे बच्चों के होने से ही, हम खुश रह लेंगे। 

इस पर देवरानी ने कहा- ऐसा है तो ठीक है, हमारे बच्चों में से गोद लेने का विचार न रखना, मैं अभी ही बता देती हूँ।

सरोज को इस निम्न सोच पर हैरत हुई मगर प्रकट में, देवरानी से उसने हँसते हुए कहा - कैसी बात करती हो, अभी मेरी उम्र 24 ही तो है। बच्चे पैदा करने की उम्र निकल थोड़े ही गई है। भाग्य में हुआ तो हमारा बच्चा भी हो जाएगा। 

देवरानी को सहज और अच्छे कहे गये शब्दों में भी, सरोज पर कटाक्ष करने का अच्छा अवसर दिखाई पड़ा, उसने तपाक से कह दिया - हाँ, हाँ ये ठीक है, मुंबई से लौटे हो, यहाँ काम वाम तो कुछ है नहीं। रोज रात को आठ बजे से ही, कमरे की साँकल लगा कर, लगी रहो जेठ जी के साथ। मैं सबको कह दूँगी, बच्चा पैदा करने की कसरत कर रहे हैं।  

सरोज को देवरानी का लहजा और शब्द बहुत अखरे थे। मगर उसने निश्चय सा कर रखा लगता था कि वह, देवरानी की नीचता पर भी, खुद नीच बनने से बचेगी।

हँसते हुए उसने ये ही कहा कि- अच्छा आइडिया दिया तुमने, इसमें मजा ही तो आएगा। 

देवरानी भी मालूम नहीं किस माटी की बनी थी। उसे कुढ़न इस बात से हो रही थी कि सरोज पर, उसके उकसाऊ बातों के तीर, बेअसर क्यों हो रहे हैं। सरोज को गुस्सा क्यों नहीं आ रही है ताकि घर में, उसे लड़ाई और तमाशा दिखाने का मौका मिले, थोड़ी चिढ़ती सी उसने कहा - हाँ जिठानी, तुम अभी भी, बच्चे के लिए मजा करो। हमारे तो तीन हैं, हम उनको खिलाने का काम करेंगे। 

स्पष्ट था कि हर बात में देवरानी, सरोज को निपूती होने का, अहसास कराते रहना चाह रही थी।

सरोज ने अब कुछ नहीं कहा, और बातों के बीच ही धो लिए कपड़ों को वह, रस्सी पर सूखने डालने लगी।  

फिर दिन भर क्वारंटीन वाली सतर्कता की दृष्टि से, अपने मुहँ पर लगाये गए मॉस्क के पीछे, अपने चेहरे के मर्माहत भाव छिपाते हुए, काम करती रही। यह बात अच्छी थी कि एकांत के अलावा, किसी और के सामने होने पर, देवरानी कोई घटिया बात नहीं करती थी।

जगन और सरोज 16 दिन में 1200 किमी की लंबी दूरी, कई मुसीबत में तय करते हुए, दो दिन ही हुए, गाँव पहुँचे थे।

अतः सरोज नहीं चाहती थी कि देवरानी की बात, जगन से कहे। अगर जगन सुनकर भड़क गया और लड़ाई-झगड़ा कर बैठा तो, यहाँ गाँव-घर में रहना दूभर हो जाएगा। अभी जल्दी ही मुंबई वापसी ही की, सरोज में हिम्मत नहीं थी। 

रात कमरे में यहाँ वहाँ की बात के बाद, पति-पत्नी रतिरत हुए, फिर गर्मी में पसीने से लथपथ जगन ने, करवट बदली और सो गया था।

मगर सरोज की आँखों में नींद नहीं थी। लेटे लेटे उसे, देवरानी की बातें याद आ रहीं थीं। वह सोचने लगी कि हम अभाव वाले परिवारों में, ज्यादा बच्चे कर लिए जाते हैं। बच्चों के मनोविज्ञान की समझने की फुरसत बिना, उनका लालन-पालन और शिक्षा ठीकठाक से नहीं हो पाती है। परिणाम यह होता है कि अनेक बच्चे, बड़े होकर देवरानी तरह की घटिया सोच, रखने वाले बनते हैं।

ऐसे में उसे लगा कि बच्चे न देकर भगवान, उसे अभिशाप नहीं वरन वरदान ही दे रहे हैं। इस तरह से सोचने पर उसके मन को शाँति मिली। एकबार फिर उसने, यही निश्चय किया कि खुद के बच्चे के फेर में ना पड़कर, वह एक बच्चा, अनाथालय से गोद ले लेगी। जिसे अपनी परवरिश से एक जिम्मेदार नागरिक बनाएगी। उसे सेना या पुलिस में, सेवा के लिए तैयार करेगी। ऐसे वह, अपने राष्ट्र एवं समाज दायित्व निभाएगी।

ऐसा तय करते हुए उसे नींद आ गई।

जगन बाद में प्यास लगने से, पानी पीने उठा था। पानी पी चुकने पर उसकी दृष्टि, सरोज के मुखड़े पर गई थी। उसके सोते हुए शाँत और खुश दिख रहे चेहरे पर, मुस्कान दिख रही थी।

अपनी पत्नी की सुंदरता पर वह रीझ रहा था। मगर उसने उसकी नींद में, कोई विघ्न नहीं डाली। वह बगल में लेट कर, सोचने लगा कि सरोज देख रही जो, चलता रहे वह सुंदर सपना .. 



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