ढलती उम्र सिसकते अल्फाज
ढलती उम्र सिसकते अल्फाज
बात कुछ नहीं थी।
गुमसुम पारू के ठहरे सिसकते उदास अहसास......
करती भी तो क्या कैसे दिल को समझाती शादी के बाद समझाया जाता है कि प्यार बुरी बला है।
बरबस ताने छींटाकशी से अनजान हवाओं में उड़ती घूमती कटी पतंग सी अल्हड़पन में चूर पारू अपने दिल को समझा नहीं पाई।
औरत के जीवन में खुशियाँ तो मानो महाजन के पास रखा सूद का धन .....
जैसे मन में कसक उठी ।दबा कर ख्वाहिशों का गला घोट देना ।मर्यादा कहलाती जाती है।
हमारे समाज की बेटियाँ अपनी अंतर्निहित सारी ख्वाहिश
दफन करना ही किस्मत बन जाता है।
एक ऐसी ही दास्तान है माया में लिपटी पारू की
उसके अंतःकरण में उमड़ते यौवन के बुलबुले जिन्होंने उसे उम्मीद और उम्र को बढ़ने नहीं दिया।
लड़कपन में उसके जीजा जी ने उसे पहला मानसिक आघात दिया।
बुआ जी ने आवाज लगाई जा कर टिफिन विजय बाबू को दे कर आना ।
पारू खुशी से चहकते कदमों से टिफिन लेकर कर गई।
लेकिन वहाँ उसका सामना हवस के पुजारी से हुआ जिसने बारह साल की नन्ही कली के जिस्म को रबड़ की गुड़िया समझ कर उसके वक्षस्थल को हैवानियत से दबाया। बेचारी बच्ची सहम गई। रोते रहते घर की भागी । किसी को कुछ नहीं कह पायी।
गहरे घाव को मन में नासूर की भांति रख ली।
दूसरी बार घरेलू मानसिक पीड़ा का शिकार हुई। जब उसके ताऊ जी ने अपने पन की आड़ में उसके जिस्म को खिलौना समझा।
अपने स्पर्श की तरंगों से उसके बदन की सिरहन का फायदा उठा कर उसके होंठों को चूसने की कोशिश करते हुए उसके वक्षस्थल से खेलने लगे।
समाज के डर से और गुस्सैल माँ के व्यवहार से एक बार फिर घरेलू हिंसा का शिकार हो गई।
समय बीतने के साथ यौवन भी उसकी खूबसूरती को कली से फूल बनाने लगा।
कभी बस मे किसी पुरुष का अनचाहा स्पर्श, कभी बरबस ही घृणा का कारण बन जाता है।
हमेशा से कीचड़ के छीटे नारी की आबरू को अपमानित करते है।
समाज में जननी, सृष्टिकाल से जहाँ एक तरफ नारी को पूजनीय माना जाता है। समाज के पवित्र माहौल को कुछ लोगों की वासना पौरुष पर कलंक लगा देती है।
हमारे प्राचीन काल के साहित्य गौरव सम्मान मर्यादित पुरुष कायम करने की मिसाल मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने की थी।
ना जाने क्या वासना में लिप्त लोगों ने कन्या का जन्म चिंता के विषय का कारण बना दिया।
पारू का सौंदर्य चरम सीमा पर था।
उसके संसर्ग मे जो आता कोमल मन से खिलवाड़ करने वासना का शिकार बना लेता।
पारू का जीवन काँटे के पथ के समान था।
माँ - बाप आर्थिक रूप से विकसित नहीं थे। मजबूरी में उसका विवाह कम पढ़े -लिखे व्यक्ति से दूर दराज करवा दिया गया। घर का माहौल जटिल गँवार , अशान्ति से भरा हुआ।
घर में ससुर द्वारा मंदिरा पान मांसाहारी भोजन खाना, अपने दोस्तों को लाकर मदिरा पान करवाना।
पारू बिना भोजन किये घंटों कम में व्यस्त रहती।
सास ससुर का व्यवहार पारू के प्रति क्रूरतापूर्ण था।
दुख की दिल में दफन करके अधूरी खुशियाँ ,उसके जीने की आस समाप्त करने लगी।
पति के बुरे बर्ताव ने की बार उसे खुदकुशी करने के विचार पर मजबूर कर दिया।
पारू के जीवन में चारों और अंधेरा लगने लगा।
आत्मा का गला घोट कर अपने शारीरिक अत्याचार सहने लगी। किसी ने अरमानों का गला घोट कर जिस्म से खेला किसी ने अपार प्यार दिखा कर जिस्म को नोचा।
कभी कभी तो ऐसा लगता नारी जो जन्मदात्री है । उसे जिस्मानी हैवानियत का शिकार बना कर समाज में पुरुष जाति का नाम पर हैवानियत की कालिमा का कंलक लगा देते है।
पारू की जीवन यात्रा के उतार चढ़ाव ने उसके जिस्म को पुरुषों के खिलवाड़ का समान बना दिया था।
धीरे धीर अधेड़ उम्र की दहलीज पर पहुँचते हुए उसकी खूबसूरती दिन ब दिन चाँद के समान खिलने लगी थी।
ढलती उम्र में क्या ये सच हो सकता है?
पारू की उदास आँखों को यकीन नहीं हुआ।
एक शख्स जिसने प्यार के मायने बदल दिये।
अब मन की उधेड़बुन ने भावनाओं के तूफान को बढ़ावा दिया।
दिल और दिमाग ने नींद ,सुख चैन सब छीन लिया।
क्या ढलती उम्र के पढ़ाई में जिस्म की हवस का समान या किसी के दिल में देवी समान मूर्ति
यह क्या होने लगा।
दिल की धड़कने उनके आगोश में तेज होने लगती।
हर छोटी बड़ी परेशानियों को दूर करने के लिए तैयार रहता।
लेकिन जिस्मानी रिश्तों का खेल दिल से जीने की चाहत मिटा देता था।
पारू ने एक ऐसा निर्णय लिया ।
जीवन में शांति की तलाश करने निकल पड़ी।
हाय रे किस्मत माया में लिपटी पारू कि ऐसी दवा कि उसे अपने आप से घृणा होने लगी।
उसकी आँखों का सूनापन कोई नहीं देखना चाहता था।
उसके जीवन के पथ को वासना लिप्त पुरुष मानो
जिस प्रकार चंदन की लकड़ी की विषधर लिपटना चाहते है ।
उसी प्रकार वासना में फंसा व्यक्ति औरत को भोग की वस्तु मान चंद पलो के लिए पारू को मन में मरहम रूपी शब्द सुना कर उसके अंगों का भोग ईरान लेता।
बेचारी अपनी आबरू को तार तार सहती।
ढलती उम्र की झुर्रियों ने उसे शांत चित रहने ही नहीं दिया।
सारी उम्र की एक तलाश ने उसे चैन की एक साँस लेने नहीं दी।
सुहागिन बना कर ,प्रेमिका मान कर, वासना में डूब कर क्या पाना होता है। इंसान वासना में डूब कर किसी आत्मा पर घाव देता है जो मरणासन्न अवस्था में चित पर घाव देते है जो नासूर बन कर श्मशान की राख बन कर भी गंगा में अस्थिविसर्जन होने पर भी ढलती उम्र की सिसकियाँ बन जाते है।
कुछ घाव समाज में शंका रूपी सवाल बन जाते है। जिनके जवाब निक्षुब्ध मौन का शंकु मुख में लगा लिया जाता है।
नारी नर सृष्टि के मूल, रचना का आधार है।
फिर हमारे समाज में नन्ही कलियाँ क्यों रौंदी जाती है।
आज भी हमारे समाज की सोच जरूरत के अनुसार बदल जाती है।
बड़े संस्कारों से पला है आदमी,
रुका नहीं हमेशा चला है आदमी,
गीता कुरान बाइबल पढ़ कर भी,
मानवता को क्यों खला है आदमी??
नारी की उत्पत्ति समाज को बीज से वृक्ष ,वृक्ष से फल ,फल से बीज पुनः जीवन चक्र का आवागमन का खेल होता है।
समय चक्र के इस पलो में मनुष्य अलग अलग रूपों में जन्म लेते रहते है।
परंतु पारू की ढलती उम्र में सिसकियाँ, आँसू, जिल्लत, ताने, मानसिक प्रहार से उसकी लाश को भी सुकून नहीं लेने दिया। चिता पर पड़ी लाश ने एक तांत्रिक की तंत्र शक्तियों के नाम पर वासना की तड़प का सरोकार ये क्या था। कैसा बीमार ,लाचार माहौल जहाँ औरत की लाश भी सुरक्षित नहीं।
हाय नियति ये क्या कर डाला, विकृत सोच हैवानियत की इच्छा ने आदमी की तामसिक, कार्मिक इच्छा ने सात्विक इच्छा को मार डाला।
क्या बीमार दिमाग, कमजोर मन ही कुंठित क्रिया कलाप का कार्य करवाते है।
हर नारी के दिल को जला देती है ।काम वासना की अनगिनत इच्छाएँ। दो दिल मिले, जिस्म का जिस्म से रूह का सुकून से मिलन हो तो विवाह रूपी बंधन समाज में सम्मान मान प्रतिष्ठा दिलवाता है।
वर्ना समाज में हजारों अबला अपनी सिसकता दिल तथा फटी इज्जत दूषित विचारो से लिपटे लोगों की वासना का शिकार बन कर
पारू की तरह जीवन से मरणासन्न तक वासना में लिप्त लोगों की कठपुतली बन कर जीवन के अंतिम पड़ाव मे भी सुकून नहीं पाती।
बेरहम दुनिया हर बार नारी को ही दोषी बतलाती।
काश ।
ऐसा होता कि नव पीढ़ी में संस्कारों की शुद्ध विचारो की सोच बीजे, सुनते ,समझते की कोशिश ने दफन कर दिया दिल में मानसिक आघात को, क्या होते है नारी के दिल में पनपते छाले जो घाव बन कर नासूर का रूप लेने लगते है।
मौन रह कर, दर्दनाक यादों का खौफ ढलती शाम को सिसकते लबों को सी कर सिसकते अल्फाज़ दफन हृदय में कर दिये। समाज में बदनामी का डर ही हिंसा को सहना तथा समाज की सोच को बीमार, गिरी हुई । तानो के प्रहारों से भरपूर कर देता है। पारू की जिंदगी कटी पतंग की भाँति
हिचकोले खाती हुई भोग की वस्तु की तरह इस्तेमाल की जा रही थी।
जब मन सोचने को आतुर हो कि हे ईश्वर क्या गुनाह हुआ जो औरत की संरचना को यूँ ही भोग का समान समझ रहे लोगों में तेरा खौफ मानव मन में नहीं रहा।
छह महीने की बच्ची को देवी समझने वाला समाज अब चंद लोगों की विकृत सोच से श्रापित हो चुका है।
कलयुग की कालिमा की कालिमा ने पौरूष व्यक्तित्व की छवि को हवस, कामना का पुजारी बना दिया।
पुरुष का पौरूषत्व मर्यादा में केन्द्रित होना चाहिए था।
संकुचित सोच जो शुद्ध के शिखर से वासना के दलदल मे गिर कर नन्ही कलियों के कोमल मन को रौंद देती है।
हादसे कुछ इस तरह घाव देते है। जिन्हें समय अपने आगोश में दफनाने की कोशिश करवाता है लेकिन दर्द में लिपटे करवाते अल्फाज सिसकते लव तक पहुंच कर शून्य हो जाते है।
विधाता ने जब नारी का साया बनाया उसे सहनशीलता, स्नेह, उदारता ,विशाल हृदय में क्षमा का अद्भुत खजाना सौंपा।
परंतु ऐसा समाज में सदियों से होता आया । चाहो जो भी
नारी पर तानो के प्रहार होते आये है।
बेचारी पारू जन्म की यात्रा के उतार चढ़ाव तय करती अपने मन पर हजारों सवाल को लिए परेशानियों के हादसों में हिचकोले खाती निक्षुब्ध शिला की भाँति मौन हो गई थी।
क्या नारी के जीवन का अंतिम छोर है बदनामी की कालिमा से बचने के लिए अपने आप को माना दिया जाए।
अनगिनत सवालो की लंबी कतार ने सूख चैन छीन लिया बेजान मूर्त की तरह आशा हीन व्यक्तित्व लिए साँसे पूरी करना ही क्यों नियति को मंजूर था।
समाज को स्वस्थ रखने मे नारी ही हर बार जिम्मेदार रहेगी।
पारू जैसी हजारो अबला शर्म से अपने आप को जिम्मेदार मान कर समाज के चंद दिमागी बीमार लोगों द्वारा दी गई पीड़ा को मौन रह कर भोग लेती है।
" दरो दीवार हमसे अँधेरों का पता पूछे।
गुनाह किया ही नहीं बेबसी झेले।
जन्म से मरण तक का कष्ट नारी झेले।
जज्बातों, हजारों के थपेड़े नारी सह ले।
बिन खता के सहे ,कुछ न बोले
घुटनों में सिर छुपाये सहने वाली सृष्टि को रचने वाली अपने शरीर रचना के कारण मानसिक, शारीरिक हिंसा का शिकार होती है। जिसका जन्म होना दुख की खबर का आना होता है। टूटे अनबुझे मन से लड़खड़ाते शब्दों में कहा जाता है।
फलाने ने बेटी जनी है। जहाँ देवी कह कर, कलियों को रौंदने का खौफ नहीं वही एक तरह पूजन में कन्याओं के सम्मान दूसरी ओर देखा जाता है उसे भोग रूपी सामान।
कमजोर बीमार दिमाग की गिरि सोच चंद पल की पुरुषों की मानसिक राहत, किसी के अंतःकरण को घोर विनाश की ओर धकेल डालता है।
कालिमा दुष्कर्म जब अस्तित्व को छलावे
ना युक्ति सूझे ,मिले न कोई उपाय
चिता रोग डसे मन को, वा का नहीं कोई सहाय
लबों को सी ले गर अश्रु रुकने नहीं पाये।।
कैसे चैन आए, कैसे मन को समझाये।।
कपड़े निचोड़ कर सुखाने का काम आपने कई वार देखा और सुना लेकिन मन से खुशियों को निचोड़ कर शरीर की ऊर्जा समाप्त करने वाले क्षण मे आत्मा को निराशा ही मिलती है।
हाय की किस्मत बुरे रूप में मिलने क्यों चली आती है।
समय की परिस्थिति चूक तथा हादसा मिले यूँ की मन से निकलने वाली आशा, संवेदनाओं का गला घोटने आए।
कभी कभी नाकामयाब कदमों को मिलते है ।
बेबसी के गुमनाम साये।
