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दास्तान-ए- सीट

दास्तान-ए- सीट

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आजतक मैं बहुत गलतफहमी में थी। मुझे लगता था कि किस्मत मुझसे रूठी हुई है।
पैंतालीस डिग्री तापमान में आपको एक खिड़की वाली सीट वो भी सूरज के दुसरे और वाली मिली हो। 
आखिर आप उन बस में खड़े 30-40 लोगों से कहीं अधिक किस्मत के धनी हैं।
"आपकी यात्रा सुखद हो" लिखा टिकट, जब कंडक्टर उन खड़े हुए लोगों को दे रहा था। मैं मन ही मन 'लोल' का कमेंट मार रही थी।
जब आप राजस्थान रोडवेज़ बस की, प्राइम सीट में बैठे हों। मुझे और लोगों का नहीं पता, मेरा मन दोबारा अंदर देखने का नहीं होता। बाहर का ही नज़ारा भाता है।
वैसे जैसे मूसलाधार बारिश में कोई सूखा रह जाये, बिलकुल वैसे ही मुझे सीट तो मिली लेकिन बिना बेक रेस्ट की। सीट का पिछवाड़ा गायब है।
वैसे मै  इतनी बेवकूफ नहीं कि बस में सबसे पहले टिकट में सीट नंबर लेकर चढ़ने वालों में शामिल होकर भी इतना गलत चुनाव करती। 
बस एक 60-70 साल की आंटी ने आकर, मुझे साम-दाम दंड भेद लगाकर सीट से बेदख़ल कर दिया।
हुआ ये कि कंडक्टर हाथ से नंबर डाल रहा था, मुझे क्या पता था कि ये मकबूल फ़िदा हुसैन का डाई हार्ड फैन मेरे टिकट पर मॉडर्न आर्ट बना रहा है।
चश्मे वालों को कोई भी बेवकूफ बना सकता है, और ऊपर से 69 का चक्कर ही ख़राब है। 
आखिर गलत सीट से बेदखल हुई और सही सीट पर बैठ नहीं पाई। वहाँ एक 18-19 साल की लकड़ी....जी, गलत नहीं है उसकी दशा से, अपने कुपोषण के शिकार बच्चे को लेकर बैठी थी। उस लकड़ी...उफ़्फ़ लड़की के हाथ पर टैटू बना था... सुरेश की लुगाई...
उसको मैं उठा नहीं पायी।
मेरी मज़ाल जो मै सुरेश की प्राइवेट प्रॉपर्टी पर हाथ भी डालू।
खड़े रहने में मुझे कोई दिक्कत नहीं अगर सब परफ्यूम लगा आते।
वैसे तो कोई टच भी हो जाये महिलाओं के तो उन्हें कोफ़्त होती है लेकिन बस में अगर वो आपकी सीट के पास खड़ी है तो भगवान मालिक है। आपको उनके खाते-पीते होने का अहसास हो जायेगा।
और अगर आप पुरुष है तो वो महिलाएं आपको पूरे सफ़र में अहसास कराएगी की आप कितने निर्दयी हैं तथा आप उस सीट पर बैठने के कतई हक़दार नहीं है।
बस में तरह-तरह की सीट होती हैं।
कंडक्टर की..... जिस पर बेचारा कभी बैठ ही नहीं पाता
विधायक की.....हा हा हा
विकलांग की .... क्या उसको इतनी सुविधायें हैं जो बस की सवारी का सोचें।
महिलाओं की....वो तो बैठ ही जाती हैं। कैसे ना कैसे।

आखिरी सीट पर बैठना पड़ा। जो सीट बस में आखिरी बची हो और आस-पास लोग बैठने के बजाय खड़े हों। उस सीट में ज़रूर कोई लोचा होता है। 
या तो वहाँ पुराना यात्री अपने लीवर कमज़ोर होने के निशान छोड़ गया है, या जैसा मैंने पहले भी बताया, सीट का पिछवाड़ा गायब होगा।
मज़े की बात है लोग उलटी कर देंगे। ताजा-ताजा माहौल तो कोई बर्दाश्त नहीं कर पाता हैं, इसलिये वो सीट खाली जाती है। लेकिन 12 दिन बाद वो सूख जाये तो लोगों को गुरेज नहीं।
हालांकि सीट के नीचे और खिड़की पर निशान चुगली कर रहे हैं। पर लोग बैठ ही जाते हैं।
क्या परिवहन वालों को शर्म आने तक और लोगों को सिविक सेंस आने तक खड़े रहें।
खैर मेरी सीट पर वापस आते है।
मेरे पास एक परेशान मैडम बैठी हैं। टीचर हैं शक्ल पर लिखा है।
उनके पास एक आदमी मुह पर रुमाल बाँध कर आँखे बंद कर बैठा था। जब से मैं बस में चढ़ी थी। वो तब से ऐसे ही था।
पहले सीट दूर थी, अब, जब पास बैठने का सौभाग्य मिला तब समझ आया भाई साहब पौवा लगा के बैठे हैं।
टीचर जी ने शिकायत लगा दी कंडक्टर को।
हालांकि बदबू सबको आ रही थी। मैंने तो परफ्यूम लगा कर स्कार्फ़ लगा लिया था। और कानों में इअर फोन डाल लिया।
होशियार हूँ गाना नहीं चलाया। मुझे भी देखना था टीचर जी कहाँ तक संघर्ष करती हैं।
आप सोच रहे होंगे मैंने क्यों कुछ नहीं कहा।
अब क्या बताऊ, मैं पुरानी खिलाड़ी हूँ। लोगों को सुधार- सुधार कर थक गई हूँ। छुट्टी पर हूँ।
मुझे पता था क्या होगा। 
टीचर जी कंडक्टर को बुलाएंगी। बोलेंगी इसको उतारो या सीट बदलो।
सीट बदलो....हा हा हा
दूसरा ऑप्शन पियक्कड़ को जगाएंगे। वो बोलेगा नहीं पी है और पी है तो अपने पैसों से।
किसी को परेशान थोड़ी किया है। टिकट लेकर बैठा हूँ।
इस तरह पियक्कड़ अपने स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल कर जायेगा और टीचर मैडम अपना मुँह लेकर बैठ जाएँगी।

इस से अच्छा मुझसे परफ्यूम ही मांग लेती।
वही हुआ जो होना था।
चलो यहाँ तो मैडम बेचारी जो कर सकती थी वो तो किया।
एक बार की बात है मेरे पास बैठे महाशय ने मूंगफली खाना शुरू किया। मुझे सख्त चिढ़ है। मूंगफली खाने वालों से नहीं, उनको खाकर बस में कचरा फेंकने वालों से।
इसलिये मै अपने बैग में कुछ प्लास्टिक की पॉलीथीन रखने लगी थी।
मैंने उस भले मानुस से कहा 'भैया मूंगफली खा के कचरा इस पॉलीथीन में डाल लो।' भैया जीे चुपचाप पॉलीथीन में छिलके डालने लगे। मै परम प्रसन्न थी।
अचानक भाई साहब ने पॉलीथीन खिड़की से बाहर हाई वे पर फेंक दी। 
मै सुन्न हो गयी। मैंने सोचा था वो उस थैली को बैग में डालेगा। पहले ऑर्गेनिक कचरा था वो भी बस में। अब तो वो पॉलीथीन में हाई वे पर लहराएगा, अनंत काल तक।

ऐसा नहीं है, बस के सफ़र में मुझे इतने अजीब और रोचक अनुभव ही हों। कभी-कभी साथ बैठे लोगों से दोस्ती भी ही जाती है।
उनमे से कुछ ज़िंदगी के सफ़र को सच में सफ़र बना देते हैं, और कुछ के साथ ज़िंदगी का सफ़र सुहाना हो जाता है। जैसे मेरी दोस्त पारु...बस में मिली थी मुझे।
रिश्ते बनाए रखने के लिये निरंतरता ज़रुरी है।
एक फोन, चाहे 2-3 महीनों में एक बार ही हो, कर लेना चाहिए। दोस्ती बहुत गहरी हो गई इतनी गहरी की उसके घर जाकर मेरी ख़ुशी चार गुना हो गई। उसकी तीन बहनें और मम्मी, वो चारों भी मेरी दोस्त पारु से कम नहीं थीं।
इसलिए बस में कभी मिले कड़वे अनुभवों को दिल पर मत लगाइए। दोस्त ब
नाते रहिए। बुरे के डर से कुछ अच्छा नहीं छूटना चाहिए।

खैर मेरी खिड़की बंद नहीं हो रही। और मैंने मेरा फेवरेट सफ़ेद टॉप पहना है। बहुत टेंशन है।
आप सोच रहे होंगे की इन दोनों का क्या कन्नेक्शन है।
दरअसल अगर आप रोडवेज़ बसों के आदि हैं तो समझ गए होंगे, कि आपके आगे वाली सीट वाले आदमी को ना तो गुटखे का शौक होना चाहिए, ना ही उसे पेट की तकलीफ होनी चाहिए।
नहीं तो लोग सॉरी कह के निकल लेंगे और आप ड्राई क्लीनर के घुमते फिरेंगे।
खैर ये मेरी दास्तान-ए-सीट थी। ये तो बस एक दिन की कहानी है 
मै तो बसछाप हो चुकी हूँ।


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