दान भाव
दान भाव
एक साधु संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और आवाज लगाई- कुछ दे दो संत दरवाजे पर आया है।
एक छोटी बच्ची बाहर आई और बोली- बाबा हम बहुत गरीब हैं। हमारे पास देने को कुछ नहीं है ।
साधु संत बोले- बेटी, मना मत कर, कुछ नहीं है तो अपने आंगन की मिट्टी ही दे दे।
लड़की ने एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और भिक्षा पात्र में डाल दी ।
शिष्य ने पूछा- गुरु जी, मिट्टी भी कोई भिक्षा है,
आपने उसे मिट्टी देने को क्यों कहा ?
साधु संत बोले- , अगर वह आज मिट्टी भी ना देती तो फिर वह कभी कुछ नहीं दे पाती ।
आज मिट्टी दी तो क्या हुआ,
देने का संस्कार तो पड़ गया ।
आज मिट्टी दी है,
उसमें देने की भावना तो जागी ।
अगर कल समर्थवान होगी तो फल-फूल, अन्न-धन, वस्त्र भी देगी ।
बस भावना होनी चाहिए।
मेरा इस कहानी के माध्यम से सभी से निवेदन है कि
दान करते समय दान हमेशा अपने परिवार के छोटे बच्चों के हाथों से दिलवाये ।
यदि आज उनके हृदय में दान का बीज अंकुरित होगा, तभी वो अंकुरित बीज बड़ा हो कर समाज सेवा का वक्ष बनेगा व परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई का भाव जागृत व पैदा होगा ।
