Uma Vaishnav

Drama

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Uma Vaishnav

Drama

चित्रलेखा

चित्रलेखा

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चित्रलेखा विजयगढ़ की राजकुमारी थी। वह बहुत गुणी और संस्कारी थी। चित्रलेखा के पिता महाराजा प्रताप सिंह चित्रलेखा का विवाह अपने मित्र सुमेर सिंह के बेटे रघुवीर सिंह से कराना चाहते थे, उन्होंने तुरंत सूरजगढ़ संदेशा भिजवाया।

सूरजगढ़ के महाराज प्रताप सिंह अपने मित्र का ये संदेशा पाकर बहुत खुश होते हैं, वो अपने पुत्र रघुवीर सिंह को चित्रलेखा के बारे में बताते हैं, रघुवीर सिंह अपने पिता की बात को टाल नहीं पाते हैं और शादी के लिए तैयार हो जाते हैं

परन्तु रघुवीर सिंह शादी से पहले एक बार चित्रलेखा से मिलना चाहते थे। सुमेर सिंह और प्रताप सिंह दोनों को मिलाने के लिए तैयार हो जाते हैं

चित्रलेखा को घूड्सवारी का बहुत शौक था तो वह रघुवीर सिंह को घूड्सवारी के लिए बुलाती है । रघुवीर सिंह सफेद घोड़े पर सवार होकर आते हैं, चित्रलेखा भी सुनेहरी घोड़े पर सवार होकर आती है

राजकुमार को आते देख चित्रलेखा घोड़े से उतरती है राजकुमार भी अपने घोड़े से नीचे उतर जाते हैं कुछ देर दोनों खामोशी बैठते हैं फिर राजकुमार... चित्रलेखा से पूछते है.. क्या आप इस संबंध से खुश है। चित्रलेखा कहती है.... हमे अपने पिता जी के फैसले पर विश्वास है, वो जो भी फैसला करेगे, हमारे हित में ही करेगे। राजकुमार कहते हैं..... इसका मतलब आपको हमसे विवाह करना स्वीकार हैं

चित्रलेखा..... जी, यदि आप को कोई आपत्ति नहीं हो तो।

रघुवीर सिंह कोई जवाब देते उससे पहले ही.... वहा अचानक एक घायल कबूतर आकार गिरता है... चित्रलेखा तुरंत उस कबूतर को अपने साथ में उठा लेती है........ और कहती हैं.... यदि आपको अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गये हो तो.... हमे अब इजाजत दीजिए......हमे इस पक्षी को इलाज के लिए ले जाना है.

रघुवीर... इसका क्या उपचार करवाना . ये तो ऐसे ही ठीक हो जाएगा।

चित्रलेखा...... नहीं.. नहीं.... हमे लगता है.... ये तकलीफ में है इसलिए इसे वेदजी के पास ले जाना है.... हमारी नजर में सभी जीव एक समान है उनको भी इतना ही दर्द होता होगा जितना की हमे होता है।

रघुवीर...... चित्रलेखा की बातों से बहुत प्रभावित होते हैं, और विवाह के लिए तैयार हो जाते हैं

राजकीय शान-शौकत से दोनों का विवाह संपन्न होता है विवाह के कुछ महीनो बाद ही सुमेर सिंह का निधन हो जाता है रघुवीर सिह की माता का निधन उसके बचपन में ही हो जाता है और अब पिता के अचानक निधन से कारोबार का सारा भार रघुवीर सिंह पर आ जाता है, रघुवीर अपने आप को बहुत ही अकेला महसूस करते हैं..... ऎसे वक़्त में चित्रलेखा रघुवीर का साथ देती है, और शहर का सारा कारोबार संभालने में रघुवीर का संयोग करती हैं

चित्रलेखा के संयोग से रघुवीर को बहुत राहत मिलती है, और वह बहारी कारोबार संभालता है, इस के लिए उसे कई कई बार विदेश भी जाना पड़ता है, और वह निश्चिन्त हो कर शहर से बाहर जाता है क्योंकि शहर का सारा काम अब चित्रलेखा संभाल लेती थी।सभी चित्रलेखा के कार्यो से संतुष्ट थे।इस बीच चित्रलेखा को एक पुत्र होता है, जिसका नाम जय सिंह रखा जाता है अब चित्रलेखा का कार्य और भी बढ़ जाता है, कारोबार के साथ - साथ उस पर अपने पुत्र की जिम्मेदारी का भार भी आ जाता है, परन्तु यह दो जिम्मेदारी बखूबी निभाती है

○ रघुवीर भी अपने बाहरी कार्यो में सफ़लता हासिल करते जाते हैं इसी बीच रघुवीर की मुलाकात स्टेला से होती है वो ब्रिटिश की रहने वाली होती है पर उससे भारतीय संस्कृति से बहुत लगाव हो जाता है, भारतीय लोगों को भी बहुत पसंद करती हैं स्टेला अपने पिता की एक कंपनी का प्रस्ताव लेकर मुंबई आती है, रघुवीर उसकी कंपनी में पैसा लगाते हैं, तो काम के सिलसिले में दोनों की मुलाकातें होती रहती थी, स्टेला बहुत ही खूबसूरत थी , रघुवीर सिंह धीरे धीरे स्टेला की ओर आकर्षित होते जाते हैं और स्टेला भी रघुवीर की ओर आकर्षित हो जाती है एक दिन स्टेला रघुवीर के सामने शादी का प्रस्ताव रखतीं हैं, स्टेला को चित्रलेखा और अपने पुत्र जय के बारे में भी बताते हैं, स्टेला ये सब जान कर भी रघुवीर से शादी करना चाहती थी। और रघुवीर भी स्टेला से प्रेम कर बैठे थे इसलिए इंकार नहीं कर पाते ।

अब रघुवीर के सामने यही प्रश्न था कि वो अपने और स्टेला के बारे में, चित्रलेखा को कैसे बताए। आखिर एक दिन हिम्मत कर के उसने चित्रलेखा को स्टेला और अपने संबंधों के बारे में बता दिया।

चित्रलेखा पर जैसे गमो का पहाड़ ही पड़ गया हो। वो अंदर ही अंदर बहुत दुखी हुई , परंतु वो बहुत हिम्मतवली थी। उसने रघुवीर और स्टेला के रिश्ते को स्वीकार कर लिया था, चूँकि उस समय राज घरानों में दो या तीन शादियां करना आम बात थी।

फिर भी अधिकांश लोगों की सहानुभूति चित्रलेखा को ही मिली, वहां की जनता चित्रलेखा को अपनी प्रतिनिधि मानती थी और उनके सेवा और समर्पण भाव से बहुत खुश थी ।

लोगो का अपने प्रति प्रेम और विश्वास देख चित्रलेखा में अपने दुख को सहन करने की शक्ति जागृति हुई। और वह अपने दुख से उभर आई।

रघुवीर अपना अधिकांश समय स्टेला के साथ ही बताते, कभी कभी वो चित्रलेखा से मिले अपने पूश्तेनी महल भी आते थे रघुवीर को स्टेला से एक पुत्र भी हुआ। किन्तु सूरजगढ़ के लोग चित्रलेखा के पुत्र को ही अपना राज्यधिकारी मानते थे। और चित्रलेखा को अपनी महारानी

मानते थे। चित्रलेखा अपने प्रति लोगो का इतना प्यार देख बहुत ही खुश थी।

एक दिन रघुवीर और स्टेला कही यात्रा के लिए जा रहे थे कि विमान दुर्घटना में उन दोनों की मौत हो गईं। अब फिर से चित्रलेखा अकेली पड़ गई थी। इस बार तो रघुवीर का साथ भी नहीं था। और राजकुमार जय सिंह भी बहुत छोटे थे। इस बार उसकी हिम्मत जवाब दे गई थी। फिर भी जनता के प्यार और सम्मान ने चित्रलेखा की हिम्मत फिर से बंधाई। स्टेला और रघुवीर की मृत्यु के बाद स्टेला का पुत्र जो उस समय 5 वर्ष का ही था अकेला पड़ गया था। चित्रलेखा ने उसपर भी अपनी ममता का हाथ रखा। उसे भी अपने महल में ले आई। अपने पुत्र के साथ साथ उसने स्टेला के बेटे की भी परवारिश की।

बड़े ही संघर्ष के साथ चित्रलेखा ने अपने बाकी के वर्ष बिताए। जय सिंह और स्टेला के बेटे उदय सिंह दोनों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश पढ़ने भेजा। स्वयं जन कल्याण में लगे गई। उन्होंने लड़की को पढ़ाने और आगे बढ़ने के लिए कई संस्थाएं खोली। इतना ही नहीं जन - कल्याण के लिए उन्होंने अपने राज कोश से बहुत सारा धन भी दान दिया। सूरजगढ़ की जनता उनको राजमाता कह के बुलाती थी।

उदय सिंह अपनी पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद वापस भारत आने से मना कर देते हैं, वो ब्रिटिश स्टेला के घर रहने चले जाते हैं।

जय सिंह अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके थे अब वे अपनी माँ का सहारा बन गए थे। अब चित्रलेखा निश्चिंत हो गई थी क्योंकि जय ने सारा कार्य संभाल लिया था। उन्होने जय की शादी उस की पसंद की लड़की भानुप्रिया से करवा दिया।

जय सिंह ने अपने माँ के संघर्ष भरे जीवन के बारे में भानुप्रिया को बताया कि कितनी कठिनायो से उन्होने उनको पाला है और अब वक़्त आगया है कि हम भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरे।

जय सिंह जहां भी जाते अपनी माँ और पत्नी दोनों को साथ ले जाते थे जीवन के आख़री पल में उन्होने अपने पुत्र जय सिह को बुला कर कहा..... मै धन्य हो गई तुम्हारे जैसा बेटा पा कर.... तुम हजारो साल जियो..... कोई भी दुख तुम्हें छू ना पाए।..... बस इतना कह के वो हमेशा के लिए खामोश हो गई।


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