Uma Vaishnav

Others


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सच्ची आजादी

सच्ची आजादी

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हर साल की तरह इस साल भी 15 अगस्त के दिन गीता स्कूल में समय से पहले पहुँच गई थी। वैसे वो यूँ भी कभी स्कूल में देर से नहीं आती थी लेकिन आज थोड़ी ज्यादा ही जल्दी आगई थी। और क्यूँ ना आये आज का दिन उस का सब से खास दिन जो होता है, आज स्कूल में लड्डू जो मिलने वाले हैं।

गीता के लिए तो स्वतंत्रता दिवस का मतलब इतना ही था कि आज के दिन स्कूल रंगारंग कार्यक्रम होगे और फिर उस के फेवरेट मोती चूर के लड्डू खाने को मिलेगें। कार्यक्रम खतम होते ही गीता लड्डू लेकर अपनी एक सहेली नीमा के साथ घर की ओर रवाना हो गई। उसन के पीछे पीछे गीता का बड़ा भाई केशव भी चल रहा था। अचानक गीता को नीमा की किसी बात पर जोर से हँसी आ गई, और वो जोर से हँसने लगी। तभी गली के नुकड पर कुछ आवारे लड़के खड़े थे। गीता की हँसी पर अभद्र कॉमेंट करने लगे। जिसे सुन गीता के भाई को बहुत गुस्सा आया। लेकिन उसने उन लड़को को तो कुछ नहीं कहा उल्टा गीता को डांटा...

"केशव.... तुझे कितनी बार कहा है, रास्ते में चलते समय हंसा मत कर।.... देखा लड़के कैसे कैसे कॉमेंट मरते हैं"

गीता और उसकी सहेली केशव की बात सुन हैरान रह गई। और एक - दूसरे के सामने इस तरह देख रही थी। मानो एक _दूसरे से पूछ रही हो... क्या हम आजाद हैं?... क्या यही आजादी है?.... क्या इसी आजादी का जश्न हम हर साल मानते हैं। ऎसे कई सवाल अब गीता और उसकी सहेली नीमा के जहन में घुस गये थे। वो दोनों यही सोचते सोचते कब गीता के घर के करीब पहुंच गई पता ही नहीं चला। पूरे रास्ते में दोनों खामोश थी। उनको देख ऎसा लग रहा था जैसे किसी ने जोर से एक तमाचा उन के गाल पर मार दिया हो। क्यूँ ना लगे.. केशव की डाट एक तमाचे से कम तो नहीं थी। घर के करीब आते ही गीता ने धीरे से नीमा को.. बाय..!! कहा और सीधा अंदर आगई।

चम्पल बाहर निकल कर सीधा आंगन में आकर बैठ जाती है, और पीछे पीछे उसका भाई केशव भी आ जाता है, और आते ही माँ से कहता है........" इस गीता को समझा दो रास्ते में ज्यादा बातचीत ना करे... और हँसे तो बिल्कुल नहीं......अब वो बड़ी हो गई है, बच्ची नहीं रही है"

माँ... "पर हुआ क्या है?"

केशव... "अरे अभी तो कुछ नहीं हुआ है.... कुछ होने का इंतजार कर रही हो क्या??.. वो अवारा लड़के.. वो ही जो गली की नुकड पर बैठे रहते हैं... पता है कैसे कैसे कॉमेंट कर रहे थे।"

गीता..." हाँ तो इस में मेरी क्या गलती आपने.. उल्टा मुझे ही डाटा उन लड़को को क्यूँ नहीं कुछ कहा।"

केशव... "क्या कहता मैं... हाँ.. बोलो.. क्या कहता... अरे चलों अभी तो मैं था... लेकिन कभी अकेले... आते जाते तुम्हें घेर लिया तो क्या करोगी। इसलिए इन लोगों से कोई दुश्मनी मोल नहीं लेनी थी मुझे और वैसे भी लड़को का तो यही काम हैं, तू लड़की हैं.. तुझे संभल कर रहना होगा।"

गीता... "ये भी कोई बात हुई। मैं लड़की हूँ तो क्या अब मुझे खुल कर हँसने की भी आजादी नहीं।"

माँ..." हाँ नही,.. ठीक ही कह रहा है केशव... तू लड़की हैं तुझे संभल कर रहना चाहिए।"

गीता माँ की बात सुन बहुत उदास हो जाती है, और अभी उस के मन में यही सवाल गूंज रहा होता है कि क्या हम आजाद हैं? तभी गीता की नजर पिंजरे के तोते पर जाती है, गीता की भाभी सविता उस तोते को दाना पानी दे रही होती है, तभी गीता अपनी भाभी से जाकर पूछती है कि वो क्या कर रही है?

सविता (गीता की भाभी)... "कुछ नही....बस तोते को दाना पानी दे रही हूँ?"

गीता..." क्यूँ??"

सविता...." अरे ये कैसा सवाल है..... हम दाना पानी क्यूं देते हैं इनके जीने के लिए... और किस लिये।"

गीता..". भाभी लेकिन क्या ये जी रहे हैं?'

सविता... "हाँ, जी तो रहे हैं!"

गीता..." हाँ भाभी जी तो रहे हैं लेकिन घुट घुट कर।"

ये सब बात करते करते सविता के सर से पलूँ गिर जाता है, तभी गीता की माँ आती है और कहती हैं

माँ... "अरे बहू... देख कैसे खड़ी हैं... सर से पलू गिरा दिया?? अरे अभी.. कोई आजू - बाजू वाली देखेगी तो क्या कहेगी।"

गीता... "क्या कहेगी माँ??.. अरे क्या हुआ जो भाभी के सर से पलू गिर गया... आप भी ना.. उनको कितनी तकलीफ होती होगी ना!!'

माँ.. "अरे.. वो इस घर की बहु हैं.. उसे अपनी मर्यादा में रहना होगा।"

गीता... "कैसी मर्यादा... क्या मर्यादा.. सिर्फ औरतों के लिये ही बनाई गई है?"

गीता की बात का जवाब शायद अब माँ के पास नही था। वो खामोश थी।इतने में गीता की बड़ी बहन सीमा अंदर से आती है, और माँ से कहती हैं कि.......... मुझे अभी अपने सुसराल जाना होगा। मयंक (सीमा का पति) का फोन आया है, आज ही घर आने को बोला है।

माँ... "लेकिन अचानक क्यूँ आने को कहा है... कोई खास वजह..".

सीमा...." वजह तो कुछ नहीं...कुछ दिनों से हमारी काम वाली नही आ रही है,इसलिए मुझे वापसी जल्दी बुला लिया। अब जाना तो है ही आज नही तो दो दिन बाद भी जाना तो पड़ता ना।"

माँ..." हाँ बेटा.. ठीक कहा... हम औरतों की यही कहानी है?"

"गुलामी!! गुलामी!! गुलामी"तभी गीता तपाक से बोल पड़ती है।

गीता... "कहने को तो हम आजाद हैं, आज आजादी का जश्न भी मानते हैं.. पर क्या सच में हम आजाद हैं... क्या आज भी हमारे देश में औरतों को पुनः स्वतंत्रता मिल पाई हैं? ना खुल के हँसने की आजादी,... ना खुल के जीने की आजादी... ना खुल कर रहने की आजादी?.. पता नहीं इस गुलामी से हमारे देश की औरतें कब आजाद होगी।"

गीता की सारी बातें उस के बाबा सुन लेते हैं, और गीता के पास आकर उसका हाथ पकड़ कर गली के उस नुक्कड़ पर ले जाते हैं जहां वे आवारा लड़के बैठे होते हैं, वहां जाकर गीता से कहते हैं कि किसने तुझे गलत शब्द कहे उस को एक जोर से थप्पड़ लगा। गीता उन लड़कों को जोर से थप्पड़ मारती है, गीता के बाबा पुलिस को बुला उन लड़को को जेल भेज देते हैं, और फिर घर आ कर अपनी बहू से कहते हैं कि तुझे पलू लेने की जरूरत नहीं... तू भी आजाद है.. तू भी मेरी बेटी ही तो है मुझे दुनिया की कोई फिक्र नहीं... फिर अपनी बेटी सीमा के सुसराल फोन कर के कहते हैं कि सीमा कुछ दिनो बाद आएगी। अभी उसका मन नही है इतना कह कर फोन कट कर देते हैं... ,... आज से मेरे घर की कोई भी औरत गुलाम नही है, वो आजाद है।

गीता बाबा की बात सुन बहुत खुश हो जाती है, और तभी भाभी भी पिंजरे के तोते को आजाद कर देती है। गीता मन ही मन अपने आप को आजाद महसूस करती है...

गीता... "सच है, सही आजादी तो अब मिली है हमें.."



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