छोटी बहू चालिसा
छोटी बहू चालिसा
"ये क्या स्कूल से आते ही टीवी के सामने? देखो लव कुश को हर चीज में अव्वल हैं। पढ़ाई हो या खेलकूद, सुबह उठकर मंदिर जाना, बड़ों के पैर छूना। तुम्हारी मां ने तो तुम्हें संस्कार ही नहीं दिये? जब देखो टिवी या मोबाइल !"
सुनंदा जी आज ही लौटी थी अपने छोटे बेटे के यहां से और आते ही शुरू हो गया उनका छोटी बहू चालिसा। और यह पहली बार नहीं था, हर बार का था। जब भी वे अपने छोटे बेटे के यहां से लौटती उनका रवैया कुछ ऐसा ही होता। रहती वह अपने बड़े बेटे के साथ और गुण हमेशा छोटे बेटे के गाती रहती।
रिया उनका स्वभाव जानती थी इसलिए उसने बच्चों को इशारा किया और बच्चे टिवी बंद कर अपने कमरे में चले गए। इतने में डोरबेल बजी।
"बहू दरवाजा तो खोल जरा, सविता आई है।"
रिया मन ही मन सोच रही थी। वैसे ही मांजी लौटी तबसे मुंह फुलाए बैठी हैं और अब आंटी आ गई आग में घी डालने।
"प्रणाम आंटी जी कैसी हैं आप?" दरवाजा खोल रिया ने कहा ।
"बस बेटा ठीक हूं, कविता से सुना कि सुनंदा आ गई तो मिलने चली आई।"
"हां हां आंटी आईये ना'
"कैसी हो सुनंदा? क्या बात है इस बार बहुत दिन रह आई अपने छोटे बेटे के यहां। मोटी भी हो गई हो लगता है छोटी बहू ने खुब सेवा की।"
"हां हां बहू तो आने भी नहीं देना चाहती थी और बच्चे तो दादी दादी करते थकते ही नहीं थे। दिनेश भी गले लगकर रो रहा था, मां थोड़े दिन और रुक जाओ छोटी बहू कि भी आंखें भर आई" पर तू तो जानती है ना इन्हें जो यहां अकेला छोड़ गई थी।"
रिया पलटकर जवाब देना नहीं चाहती थी इसिलिये वह चुप थी। पूरे परिवार के होते हुए भी पापाजी अकेले !
"और कैसी रही दिनेश के साले की शादी? सुना है बहुत माल ताल ले आई है बहू, तेरी समधन के तो भाग खुल गये।"
"बहुत धूमधाम से हुई शादी और समधन ने तो मान मनुहार में बिल्कुल कसर ना छोड़ी। दिनेश का साला दुल्हा होते हुए भी दिन में चार बार बुलाने आ जाता था वैसे तो दिनेश के मकान के पास ही है छोटी बहु का मायका पर बेटे की मां हूं बिना बुलाए क्यो जाना? मनुहार तो करानी ही चाहिए ना।
सही कहा तूने...
वैसे मेरे दिनेश के सांस ससुर है भी व्यवहारिक लोग अच्छे से समझते हैं समाधियों कि खातिरदारी कैसे करते हैं।
ठीक है सुनंदा अब आराम कर सफर से लौटी है थकान भी तो होगी ।
हां हां वैसे तो छोटी बहु बार बार हवाई जहाज के टिकट करवाने की छिद्र कर रही थी । पर मैंने ही मना कर दिया।
ठीक है सुनंदा अब चलती हूं ।कल मिलते हैं।
सविता के जाते ही रमेश जी बाहर आये उन्होंने देखा बहू की आंखों में आंसू थे पर उफ़ तक नहीं की उस बेचारी ने ।आज उन्होंने तय कर लिया था कि सुनंदा की अक्ल ठिकाने लानी ही होगी यह क्या हर बार।बहू कुछ बोलती नहीं इसका मतलब यह थोड़े ही कि उसे बात बेबात ताने देती रहे। क्या बात है सुनंदा आई तब से बहुत खुश हो छोटी बहु चालिसा गाते जा रही हो लगता है बहुत ने खूब सेवा की।
हां हां क्यों नहीं जो सच है वहीं तो बता रही हूं। उसमें गलत क्या है आप भी तो अपनी बड़ी बहू की बढ़ाई करते नहीं थकते।
वह तो मुझे करने की जरूरत ही नहीं, लोगों को भी दिखता है। पर तुम क्यों भूल जाती हो जिन समधियों की तारिफ के पुल तुम बांध रही हो ना लगता है भूल गई वे दिन जब उन्होंने हम पर दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप लगाया था। और जिस छोटी बहू और बेटे के नाम की माला जप रही हो ना जायदाद के लालच में आकर हमें घर से निकाल दिया था। यह तो सुरेश था जिसे हमने बिना कुछ दिये घर से निकाल दिया था फिर भी मां बाप की सेवा को अपना फर्ज समझ हमे यहां ले आया।
सुनंदा दूर से डुंगर सदा ही सुहावने लगते हैं। छोटा बेटा समझ तुमने माफ कर दिया अच्छी बात है, पर कम से कम जो बुढ़ापे का सहारा है उन्हें तो मत धिक्कारो। रिया की सेवा का गुणगान ना भी करो उसे कोई फर्क पड़ता क्योंकि हमें वह अपने माता पिता समान मानती है और हमारी सेवा वह अपना धर्म। पर उसके संस्कारों पर तो उंगली मत उठाओ यह उसके संस्कार ही हैं जो इतने ताने सुनने के बाद भी चुप है।
सुनंदा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अपनी बहू को गले से लगा लिया। रिया को भी आज उसकी सेवा का फल मिल गया पापाजी के दिल में अपने लिए इतना सम्मान देख उसकी आंखें भर आईं।
