छल-कपट
छल-कपट
हमलोगों अर्थात पंचकेदार ट्रेकिंग दल के छः सदस्यों को बद्रीनाथ पहुंचते दोपहर हो गई। गाड़ी से उतरने के बाद होटल या धर्मशाला की खोज करनी थी सो सुनील इस कार्य के लिए रवाना हो गया। बाकी पांच अपने रुकसैक लिए वहीं खड़े इन्तजार करने लगे। तभी एक हेलीकॉप्टर उड़ते हुए बांयी ओर ऊंची चोटियों की तरफ जाते हुए नजर आया। हममें से हीं किसी ने कहा कोई भी आई पी उतरेगा। एक बार को सर उठाकर गड़गड़ाहट गुंजाते हैलिपैड की तरफ देखा पर उससे कहीं अधिक हमारे कानों में अलकनंदा की जल प्रवाह की अट्टहास सुनाई दे रही थी और उपर स्वच्छ आसमान अपने नीले रंग में मुस्कुरा कर हमें कह रहा था सोच क्या रहे हो, आगे बढ़ो-आगे। बदरीनाथ समुद्र पृष्ठ तल से लगभग चौदह हजार फीट ऊंचाई पर स्थित होने के कारण ठंढी आवोहवा का क्षेत्र है दोपहर की धूप सुहानी लग रही थी पर चिपचिपा गर्मी का अहसास भर रही थी उपर से भूख भी लगी थी सो पेट में चूहे-बिल्ली के खेल चल रही थी। हम जहां खड़े थे उसके बाएं तरफ होटलों की भरमार एवं भीड़-भाड़ से भरी कोलाहलपूर्ण बाजार तथा दाहिने ओर नीलकंठ पर्वत शिखर नीलाम्बर को सर पर धारण किए हल्की मुस्कान बिखेरते दिखाई रहा था। इसके साथ हीं साथ घनी जन बस्ती में प्रवेश करने के लिए पतली-पतली गलियां वह भी चढ़ाई की ओर जो आगे बढ़ो तो सांसें हीं हिचकी लेने लगती हैं। फिर भी मजा आ रहा था क्योंकि जब आसमान में को सर पर उठाए पर्वतों की चोटियां रह रह कर कुहासा के चादर से ढंक जाया करती है एवं कभी-कभी शृंखलाबद्ध पर्वतों के दो-तीन शिखरें बादलों की ओट में छुप जाएं और उसी के साथ खड़े अन्य शिखरों पर चमचमाती हुई सूर्य की स्वर्णिम किरणें हमारी आंखों को बंद करने से मना कर रही हो तो कहने को कुछ बचता हीं नहीं है। खैर सुनील ने मोबाइल पर हमलोगों को बांयी ओर रवाना होने को कहा ताकि हम होमस्टे तक पहुंच जाए और हमलोगों ने किया भी वही। लगभग तीन सौ मीटर की चढ़ाई को पार किया एवं हमें रुक जाना पड़ा क्योंकि सामने एक मोड़ थी और हमारे तीन सदस्य जो आगे जा रहे थे दिखाई नहीं पड़े सो होमस्टे किधर है और किधर से जाएंगे निर्णय कर पाना कठिन था। अतः मैं और मेरा छः फुटिया साथी अगली सूचना का इन्तजार करने लगे। वहां से बदरीनाथ मंदिर की दूरी पांच सौ मीटर होगी तथा अलकनंदा हमारे दांयी ओर थी परन्तु उसका प्रवाह शक्ति देख आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सका। उसकी जलधारा जैसे सामने आई हर बाधा को तोड़-फोड़कर रख देगी एवं उसका नीली-दूधिया रंग की फेनील जलराशि आपको बरबस हीं अपनी ओर आकर्षित करती है। जबकि मंदिर का भव्य रूप भक्तों एवं दर्शनार्थियों की गिजगिज करती भीड़ स्पष्ट रूप से कह रही है कि मैं भारतवर्ष का अन्यतम तीर्थ स्थल हूं। भीड़ देख कर यह स्थल दूर से बिल्कुल चींटियों की तरह दिखता है जो चलते हीं रहते हैं कभी भी थमता नहीं है क्योंकि सबका उद्देश्य एक हीं होता है। यहां मैंने मनुष्यों की तुलना चींटियों ऐसे प्राणी से नहीं की है बल्कि उस ध्यान-ज्ञान एवं ध्येय के बारे में कहा है जो बद्रीविशाल का दर्शन और भक्ति भाव से जुड़ा है। इतना सबकुछ मैं अनुभव कर हीं रहा था कि मेरे साथी ने कहा सामने जो ब्रीज दिख रहा है उसे पार कर दाहिने तरफ अर्थात बाजार की ओर जाना पड़ेगा। अब हम दोनों पुनः तीन सौ मीटर नीचे उतर कर ब्रीज की तरफ बढ़ गए। सबसे पहले हम तप्तकुण्ड के बगल से निकले जहां लोगों को कुण्ड से जल लेकर नहाते हुए देखा यहां भी लोगों का ऐसा व्यवहार देखा कि शायद कुण्ड का गरम जल समाप्त हो जाएगा और उससे पूर्व हीं गरम जल को लूट लिया जाए। लोग ईश्वर के पास आकर भी अपने स्वार्थीपन को त्याग नहीं सकते हैं फिर ऐसे भक्ति भावना का क्या मोल रहेगा! इसके बाद ब्रिज पार करने लगे तथा ब्रिज के निचे बहती अलकनंदा के रूप को देखकर सिहर उठा इतना भयंकर, क्रोधित एवं उन्मत्त! ब्रिज को पार करना भी एक बड़ी चुनौती थी कारण भीड़ अस्त-व्यस्त केवल अपने में हीं समाहित है,दूसरे को धक्का लगे,गिर पड़े कोई फर्क नहीं पड़ता है उपर से सच्ची भक्ति भाव कितना है पता नहीं चलता है पर भक्ति की दिखावा ज्यादा थी। अभी हम दोनों ब्रिज के दक्षिणी छोर पर पहुंचने से थोड़ी हीं दूरी पर थे अचानक हमारी पीठ की ओर से एक शोर व आपाधापी का अहसास हुआ। हम दोनों पिछे मुडकर देखा तो पाया कि एक महानुभाव को कई सिक्योरिटीज घेरे में लिए चला आ रहा है। लोगों को कहते हुए सुना कि अभी-अभी जो हैलिकॉप्टर आई थी इसी को लेकर आया,वाह! क्या बात है लाखों भक्त घंटों लाइन में खड़े रहकर भी दर्शन नहीं कर पाते हैं कपाट बंद हो जाता है जबकि बड़े लोग तथा विख्यात व्यक्तियों को लाइन देने की आवश्यकता नहीं है। सचमुच में सामने आ रहा व्यक्ति नाम किया सिने अभिनेता है। महानुभाव गर्व के साथ ब्रिज को पार कर बाजार की राह बढ़ गया जहां शायद उसे ले जाने के लिए गाड़ी खड़ी होगी। इसके बाद हमलोग बाजार में हीं ब्रह्मानन्द आश्रम पहुंचे और रूम में जाकर पहले हमलोग फ्रेश होकर दोपहर की भोजन की व्यवस्था की तथा आगे हमें क्या करना है इसके उपर आलोचना किया जिसमें तय किया गया कि रात नौ बजे तक बदरीविशाल के दर्शन करेंगे। अतः तब तक जो लोग आराम करेंगे या इधर-उधर घुमेंगे तो वे स्वतंत्र हैं। जबकि हम चार सदस्य मैं, सुनील,रजत और सुभाष ने तय किया कि विष्णु चरण की ट्रेकिंग पर निकलेंगे जो मुश्किल से आने-जाने में चार घंटे लगेंगे। और हमने वही किया। अपराह्न् चार बजे हम चार सदस्य विष्णु चरण ट्रेकिंग के लिए रवाना हो गए। ट्रेकिंग का ट्रेल खड़ी चढ़ाई की थी जिस पर चलना आसान नहीं था पर सीढ़ियों की भांति और छोटे-छोटे बोल्डरों को पास-पास रख कर स्थानीय लोगों ने तैयार किया था। हमलोगों की सांसें फूल रही थी पर हम भी थमने वालों में से नहीं हैं। धीरे-धीरे जन बस्ती समाप्त हो गई और घाटीनुमा क्षेत्र में प्रवेश किया लेकिन वही खड़ी चढ़ाई। एक-एक कदम रखना मुश्किल लग रहा था जैसे हमारे पैर शायद किसी चुम्बक से चिपका हो। अतः एक कदम को बढ़ाने में परेशानी हो रही थी। जंघाओं की पेशियां अकड़ जा रही थी। खैर आगे बढ़ना जारी रहा। हमारे दोनों तरफ उंची प्राचीर की तरह नीलकंठ के सहयोगी पर्वतों की श्रृंखलाएं सिना ताने सर ऊंचा किए हमें देख रहा था जैसे हम उनके समक्ष क्षुद्र कण हों। फिर भी उसने अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के भण्डार से हमारा स्वागत की तैयारी कर रखा था। सो सारे कष्टों को दूर भगा आगे बढ़ते रहे। पुरे ट्रेल के दोनों तरफ कुछ पूजा स्थल देखने को मिला एवं वहां धूप-दीप अभी भी जल रही थी, भक्ति भावना से भरे लोग आना-जाना कर रहे हैं। एक-डेढ़ घंटे चल चुके हैं और एक स्थान पर कुछ लोगों की भीड़ देखने को मिली। निकट जाने पर पता चला यह स्थान गुप्त गंगा के नाम से विख्यात है। एक गुफा जिसके अंदर भक्तों को घुटने के बल रेंगकर प्रवेश करना पड़ता है। एक साथ दो-तीन जन हीं अंदर जा सकते हैं। हम भी उसी तरह अन्दर प्रवेश किए तो एक अंधेरे में डूबे गड्ढे के अन्दर कल-कल करती हुई आवाज के साथ जलधारा दिखाई दे रही थी। औरों के विश्वास को सम्मान देते हुए गुप्त गंगा को नमन किया तथा बाहर निकल आए। वहां पुरोहित भी संन्यासी की तरह गेरुआ वस्त्र धारण कर गुप्त गंगा से सटे एक झोंपड़ी में रहता है। सुनील ने पुरोहित को दक्षिणा स्वरूप कुछ रुपए देना चाहा तो उसने साफ मना कर दिया और कहा कि हम तो मैया के सेवक हैं हम इनसे क्या नाता रखना है यदि देना हीं चाहते हो तो सामने रखे दान बॉक्स में रख दो ताकि इनसे यहां के रास्तों को भक्ति भावना रखने वाले लोगों को आराम मिले। सुनील दान बॉक्स में रुपए रख दिए। उस पुरोहित ने हमलोगों से पुछा कि आपलोग को देख कर नहीं लगता है कि मैया के दर्शन के लिए आए हो। इस पर सुनील ने कहा-हमलोग पंचकेदार ट्रेकिंग पर निकले हैं। यहां पता चला कि बद्रीविशाल से कुछ उंचाई पर विष्णु चरण स्थित है सो हमलोग इधर चले आएं हैं तथा इसी बहाने गंगा मैया के दर्शन हो गए। यह सुनकर पुरोहित बड़ा खुश हुआ और हमें बताया कि बस घंटे भर चलते चले जाओ भगवान के चरणों का दर्शन हो जाएगी।फिर वहां से अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ गए। निश्चित स्थान पर पहुंचने के बाद देखा कि एक छोटा सा चट्टान पर मानव पैरों के तलवे ऐसी आकृति। जिसे देख आश्चर्यचकित हो गया क्योंकि ऐसी रचना तो कोई मानव नहीं बनाएगा वह भी ऐसे निर्जन व बिहड़ क्षेत्र में थोड़ा हजम नहीं हुआ अतः इसे प्रकृति का खेल हीं कहा जा सकता है। इसके बाद हमलोग वापसी की राह पर चल पड़े। लगभग बदरीविशाल मंदिर के निकट पहुंचे तभी सुनील के मोबाइल पर नविन और लखन ने कहा कि वो दोनों तप्त कुंड की ओर जा रहे हैं एवं हम चारों को वहीं इकट्ठा होना होगा ताकि एक साथ भगवान बद्रीनाथ के दर्शन करेंगे। हम चारों को थोड़ी निराशा एवं खुशी का मिश्रित अहसास हुआ। निराशा का कारण था लगभग छः किलोमीटर की चढ़ाई करने के पश्चात् विश्राम की आवश्यकता थी जो मिलने से रही खुशी इस बात की ठंड के समय तप्त कुंड के जल से स्नान करना कितना आनन्ददायक होगा! मन्दिर प्रांगण में पहुंचने के भक्तों की भीड़ देख हक्का-बक्का हो गया क्योंकि अत्यधिक भक्ति में मानव ज्यादा आत्मकेंद्रित हो जाता है। लोगों को नहाते समय दूसरे के उपर उसके शरीर पर गिरे जल की छिंटे पड़ रहें हैं या किसी अन्य के कपड़े भींग गए कोई फर्क नहीं पड़ता है। कोई धक्के खाकर गिर पड़ा तो गिरने दो हमें उससे क्या और भीड़ भाड़ में ऐसा होता रहता है कोई नई बात नहीं है, इस तरह की भावना से ग्रस्त हो गए हैं। अवाक तो मैं इसलिए था कि लोग कहते हैं भगवान के सामने सबकी भावना एक सी हो जाती है तथा हर किसी में भक्त को भगवान नजर आता है। अब यदि सबकुछ में भगवान है तो भगवान गिर पड़े हैं और भक्त को कोई कष्ट का अनुभव नहीं हुआ फिर यह कैसी भक्ति है! औरों की भांति हमने उस तप्त कुंड के जल से स्नान किया और नवीन एवं लखन को ढुंढते हुए मंदिर के मुख्य कपाट की ओर बढ़ गए। कपाट की सीढ़ियां तक पहुंचुंगा उसके पूर्व हीं एक पूजा की डाली बेचने वाले की दुकान में अपनी जूतों को जमा रख दिया क्योंकि जूता पहने तो मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगे। अब हमलोगों ने नवीन एवं लखन से सम्पर्क करने का प्रयास किया पर असफल रहे। उधर भीड़ ऐसी देखने को मिली समझ हीं नहीं पा रहा था मंदिर में प्रवेश करने वाले लोगों की लाइन किधर है, अनगिनत लाइन दिख रही है और धक्का-मुक्की जम कर हो रही थी। हमारी ऐसी स्थिति हो गई कि इस ठंड में भी हम पसीने-पसीने हो गए पर हम जहां थे वहां से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाया। कैसे लाइन में शामिल होऊं कोई उपाय नहीं मिला तथा उपर से भीड़ का दबाव के कारण ठीक से सांस नहीं ले पा रहे थे। एक प्रश्न मेरे मन में उथल-पुथल मचा रही थी कि क्या यहां मंदिर या प्रशासन की ओर से भीड़ को नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं है और यदि है तो नियंत्रण करने वाले कहां है? इन्हीं प्रश्नों के बारे में सोचता हुआ मुख्य कपाट से और भी अधिक दूर जा पहुंचा एवं इस कार्य को पूरा करने वाले अन्य नहीं बल्कि स्वार्थी, पागलपन का शिकार हुए भक्तों की भीड़ थी। दूरी पर पहुंच कर देखा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार की पुलिस तैनात है पर वे भी लाचार हैं। पुलिस वाले लाठी ऊंची कर एक तरफ पागलों की लाइन ठीक करते तो थोड़ी हीं दूरी पर स्थिति अस्त-व्यस्त हो जाती। अब अस्त-व्यस्त स्थान को नियंत्रित करने के लिए पुलिस भागी तो पागल हंसने लगे,हुटिंग करने लगे । स्वाभाविक है पुलिस कर्मियों को क्रोध आएगा हीं पर सीनियर पुलिस कर्मी ने उन्हें रोक दिया। अब मुझे समझ आया कि जिन लोगों को भगवान बदरीविशाल के दर्शन हेतु सुविधाएं उपलब्ध कराने पुलिस वाले आए थे वही भक्तजनों की पागल भीड़ खुद व्यवस्था को अव्यवस्थित कर रहा है तो नियंत्रण करने वाले क्या करेंगे। आखिर हम लोगों को लम्बे बैरीकेडिंग में लाइन को बढ़ते हुए पाया जिससे मन को शांति मिली कि चलो इस लाइन की पुंछ बन जाता हूं बदरीनाथ के दर्शन हो जाएंगे परन्तु पुंछ का अंतिम छोर को खोजते-खोजते लगभग दो किलोमीटर ट्रेकिंग करनी पड़ी। इस तरह से पुंछ के साथ जुड़ तो गया पर हमारे आगे-पीछे जो जहां खड़ा है वो वहीं खड़ा रहा पर उसके आगे खड़े दर्शनार्थी के आगे ढेर सारे लोग घुस जा रहे हैं और पिछे खड़े दर्शनार्थियों के प्रतिवादी शोर उठती पर कुछ पल की किचकिच सुनाई देती फिर सब कुछ सामान्य अर्थात हम लोग जहां के तहां स्थिर रहे। उपर हमारे सर के उपर खुला झिलमिलाते तारों से खचाखच आसमान ओस की फुहारों से हमारा बैण्ड बजा रहा था। अचानक हमारे सामने खड़े लोगों के कदमों में गतिशीलता आ गई और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। अब तक की परेशानी से मैं हीं नहीं सभी लोग शारीरिक एवं मानसिक रूप से थक चुके थे फिर भी एक आस के मोह में फंसे शायद विशाल बदरी के दर्शन हो जाए आगे बढ़ते जा रहे हैं। रात के दस बजने को थे और ठंड भी बढ़ती जा रही है। अब हम सभी लगभग एक किलोमीटर की निकटता प्राप्त कर ली। अचानक हमसे पचास दर्शनार्थियों के आगे शोर उठा,लोग पुलिस को गालियां दे रहे थे। सुभाष उस शोर वाले स्थान पर गया तथा वास्तविकता का पता लगाकर आया और कहा-पुलिस ने कुछ लड़कों को लाइन में घुसा दिया एवं खड़े लोगों को धमकियां दी, ज्यादा बोलोगे तो अन्दर कर दूंगा। खड़े-खड़े अधिकतर लोग उब चुके थे। इस कारण निराशा ने भी सबके उपर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया एवं इसी कारण कभी पुलिस वालों से तो कभी आ रहे भक्त जनों से पुछ रहे थे कि मंदिर के कपाट बंद नहीं न हो जाएंगे। उत्तर मिला लाइन में जितने लोग हैं उनको दर्शन करने दिया जाएगा जबकि सामने घोषणा कर दी गई है कि अब लोग लाइन में खड़े न हो। मैं तो अब एक पल भी खड़ा नहीं रहना चाहता था परन्तु साथियों के कहने पर मुझे उनके साथ रहना पड़ा। जबकि मंदिर या पूजा-अर्चना में मेरी कोई रूचि न थी फिर भी साथ देने के खातिर मुझे भी भगवान के दर्शन के लिए पागलों की भीड़ में शामिल होना पड़ा। अब तक हमने डेढ़ किलोमीटर की निकटता पाई। कहने का मतलब यह है कि कपाट से बस पांच सौ मीटर दूर। लेकिन विश्व का सातवां आश्चर्य तो हमारे सामने आ हीं गया। लाइन की गतिशीलता अचानक थम सी गई। मोबाइल की घड़ी में देखा ग्यारह बजने को हैं। तभी हमारे सामने की भीड़ हल्की होने लगी कारण सामने खड़ी पुलिस ने कहा कपाट बंद हो चुका है सो आप लोग आज वापस लौट जाओ। यह सब सुनकर लोग थके-हारे क्रोधित हो मंदिर व्यवस्था एवं सरकारी प्रशासन को कोसना शुरू कर दिया। पर इस कोसना को कौन सुननेवाला है यानी कि भैंस के आगे बिन बजाए,भैंस खड़ी पगुराए। अतः हम लोगों ने भी अफसोस करते हुए वापिस लौटने लगे जबकि आज का दिन को एकदम खराब गया। सुबह से चार चक्के पर सवार बैठे-बैठे कमर और घुटनों की जय-जयकार हो गई थी उपर से बदरीनाथ ने भी हमें शारीरिक एवं मानसिक यंत्रणा देने के बाद अपने कपाट भी बंद कर दिया। मेरे साथियों ने मुझे नास्तिक कह चिढ़ाने का प्रयास किया पर मैं शांत रहा। खैर हमारी स्थिति उस व्यक्ति की भांति-माया में दोनों गए अर्थात माया मिली न राम। वापस ब्रह्मानन्द आश्रम लौट आए पर भोजन नसीब नहीं हुआ। हम सबके पास ड्राइ फूड्स थे उसी को ऊदरस्थ करना पड़ा एवं पानी पीकर सोने की तैयारी कर ली लेकिन उससे पहले अगले दिन भगवान बदरीविशाल के दर्शन करने के लिए आलोचना की गई जैसे भी हो मंदिर में प्रवेश करना हीं होगा भले हीं साम-दाम-दंड-भेद की नीति का सहारा क्यों न लेनी पड़े। मैंने स्पष्ट कर दिया कि मुझे उस पागलपन का शिकार नहीं होना है जिनको जाना है जा सकते हो। मेरा देखा-देखी रजत ने भी मंदिर दर्शन जाने से ना कर दिया। अंत में हम दोनों को छोड़कर बाकी चार जन मंदिर दर्शन को तैयार थे। इन सबके बीच नवीन की एक बात मैंने सुना कि हम भी वही करेंगे यदि किसी अच्छे कार्य को करने के लिए झूठ का सहारा लेना अनुचित नहीं माना जाता है। अतः अगली सुबह क्या होगा यह मैं अच्छी तरह अनुमान लगा चुका था। इसके बाद रूम की लाईट बुझा दी गई। अगली सुबह आंख खुली तो पाया कि मंदिर दर्शन पर जाने की तैयारी चल रही है। चारों जन रूकसैक ठीक किया तत्पश्चात स्नानादि से निवृत्त होकर मंदिर की ओर प्रस्थान कर गए हालांकि मंदिर रवाना से पूर्व एक बार फिर हम दोनों से साथ चल कर भगवान बदरीविशाल के दर्शन का आग्रह किया पर हम दोनों अपने निश्चय पर अडिग रहे। उन लोगों को अपनी शुभकामनाएं दी। इस समय सुबह के छः बज चुके थे और हम दोनों सो गए। जब आंखें खोली तब तक सवा आठ हो गया। प्रातः कृत्य से निवृत होकर चाय-कॉफी के लिए बाजार की ओर आया। आकाश नीले रंग की चुनरी पहने मनमोहक अंदाज में रुई से सफेद बादलों के झुंड तैर रहे थे और इनके उपर सुनहली सौर किरण एक आकर्षक जगत का सृजन कर अलौकिक तेज से हमारा साक्षात कराया। काफी ठंडक लग रही थी सो काफ़ी पीने की इच्छा जागी। एक साफ-सुथरे रेस्तरां में घुस गए और काफ़ी का आर्डर दे दिया। गरम-गरम काफ़ी बड़ी अच्छी लगी। उसके बाद बाजार घूमने लगे। बिच राह में हीं मोबाइल ने हमें रोक दिया क्योंकि मंदिर दर्शन जाने वाले वापस लौट रहे हैं तथा जल्दी से स्वल्पाहार कर के माना गांव के लिए रवाना होना होगा। रजत ने मुस्कुराते हुए कहा-सर लगता है आज भी सफल नहीं हुए हैं वो लोग इसलिए वापस लौट रहे हैं परन्तु मैंने उसकी बात काटते हुए कहा-नहीं रजत आज उस दल का नेतृत्व नवीन कर रहा और वह तो बोला हीं है कि मंदिर के दर्शन जरूर करेंगे भले हीं इसके लिए उल्टा-पुल्टा हीं क्यों न करना पड़े। नहीं-नहीं सर उनको वापस आने दिजिए पता चल जाएगा। मैंने उसकी बात नहीं काटी और प्रत्युत्तर में कहा ठीक है आने दो। पन्द्रह से बीस मिनट में हमलोग रूम में इकट्ठे हो गए। उन चारों के हाथों में पूजा की डाली थी और उन्होंने हमें प्रसाद दिया। लेकिन मैं अवाक था आखिर ये लोग सचमुच में भगवान के दर्शन करने गए थे या नहीं पर सुनील को कहते हुए सुना मानना पड़ेगा नवीन भाई आज तुम्हारे कारण हीं दर्शन सम्भव हुआ। तभी सुभाष बोल पड़ा-क्या खेल खेलें हैं सर,सामने खड़े लोग कुछ बोल भी नहीं सके और आराम से कपाट के अन्दर हम-सब प्रवेश कर गए जबकि गत रात्रि सात बजे से साढ़े ग्यारह बज गए फिर भी हम लोग मन मसोस कर वापस लौट आए। रजत को चिढ़ाने के लिए सुनील ने कहा ये लड़का श्रापित है,कल हम लोगों के साथ था इसलिए दर्शन नहीं कर पाए आज देखो नहीं गया तो हमलोग भगवान का दर्शन एवं पूजा दोनों हीं सम्पन्न हो गई। संग हीं संग रजत ने तुनककर कहा तब तो सर (मुझे)भी श्रापित हैं। इस पर सुभाष ने विषय को हल्का करने का प्रयास किया-अरे भाई सर की बात छोड़ दो,वे तो पहले से हीं नास्तिक हैं। इसके बाद यह चर्चा थम गई। अगली योजना थी माना गांव एवं वसुधारा जलप्रपात की ट्रेकिंग सो सभी इसी में व्यस्त हो गए। लेकिन मेरे मन में रह-रहकर उत्सुकता करवटें ले रही थी कि इन लोगों ने अव्यवस्थित दर्शन पद्धति पर कैसे असम्भव को सम्भव कर दिखाया। इस विषय की जानकारी जब मुझे मिली तो अवाक होना स्वाभाविक था। जब ये चारो मंदिर दर्शन के लिए पहुंचे तो गत रात्रि की तरह दर्शनार्थियों की लम्बी लाइन खड़ी थी। सबसे पहले ये लोग खड़ी लाइन के अंतिम छोर तक टहलते हुए गए एवं वापसी कर एक स्थान पर रुक गए जहां दाहिने एक सार्वजनिक बाथरूम थी जिसकी दूरी प्रधान कपाट तक मुश्किल से दो-तीन सौ मीटर रही होगी। कुछ पल तक तो वहीं खड़े रहे। दर्शन के लिए खड़े लोगों को इतना ध्यान कहां रहता है कि कौन आया-कौन चला गया। इसी भावना को सामने रखकर ये चारो पहले तो बाथरूम में घुसे तत्पश्चात बाहर निकल कर पास हीं चाय की दुकान थी चाय पी। चाय पीने तक बाथरूम के निकट खड़े लोगों की भीड़ तो कपाट की ओर बढ़ गई। तब तक इन लोगों की चाय पीनी खत्म और वहीं पर खड़े हो गए जबकि लाइन में खड़े लोग भेड़ बनकर केवल सामने वाले का अनुसरण कर रहे थे और उसी के ओट में ये चारो लाइन में शामिल हो गए तथा किसी भी प्रकार की शोर-शराबा नहीं हुआ और ना हीं किसी ने कहा कि ये लोग लाइन में नहीं थे, इन्हें बीच में घुसने मत दो। चारो ने एक दूसरे को देखा एवं आराम से आगे बढ़ते रहे। धीरे-धीरे कपाट के अन्दर प्रवेश किया और खड़े पुरोहित ने साधारण तरीके से पूजा-अर्चना कराया। इसके बाद वह इन चारों की तरफ आरती की थाल बढ़ा दी तब नवीन ने थाली में लक्ष्मी रख दिया संग हीं संग पुरोहित ने मंत्रोच्चारण की ध्वनि तेज कर दी एवं मन से सबको सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया। लखन तो एकदम से आध्यात्म में डूब हीं गया जबकि नवीन, सुनील, सुभाष एकदम शांत व प्रसन्नचित्त चेहरे के साथ मंदिर से बाहर निकल आया। मंदिर परिसर से बाहर निकलने के बाद सुनील ने योजना की सफलता के बारे में बताया कि ठीक हीं कहा गया है आधुनिक युग में भगवान भी गलत हथकंडे अपनाने वाले पर हीं अपनी दया दृष्टि रखते हैं। ****************************
