साढ़े चौबीस घंटे (भाग-२)
साढ़े चौबीस घंटे (भाग-२)
पायेल और उसकी मां यह काम कर ली। यहां पहुंच कर पायल का शारीरिक अशांति दूर हो गई थी। दावा ने बताया कि हमलोगों को डिनर तैयार कर लेना चाहिए और पांच-साढ़े पांच तक टैंट के अन्दर घुस जाना पड़ेगा अर्थात लंच तो आज मिला नहीं इसलिए जल्दी से डिनर करो और लेट जाओ क्योंकि कुछ हीं देर बाद अंधेरा छाने लगेगा। उसकी बात बिल्कुल सही थी कारण आज की चढ़ाई ने हमारे शरीर को तोड़ कर रख दिया था सो डिनर का काम शुरू हो गया। अचानक आकाश का धुंध मिट गया और आकाश का जो रूप दिखा उससे दृष्टि दूर नहीं हट रही थी। अम्बर का नीलापन में एक अजीब सी सौम्यता थी हम समतल वासियों को कभी दिखता हीं नहीं है। यहां के गगन में एक और भी दृश्य दिखा जो बादलों के आपस में मिलने का दृश्य यानी कि ब्रह्मांड का वह कुंडलीनुमा संरचना जो छात्रों को पढ़ाते समय चित्र के रूप में दिखाया जाता है। जिसे देख मैं पुलकित हो उठा। इसकी तुलना यदि उस अप्रमाणित स्वर्ग से की जाय तो शायद उचित होगा और अंतरात्मा ने कहा सुबह से लेकर अब तक विषय परिस्थितियों से लड़ने में जो कष्ट हुआ वो सब शोध बोध हो गया क्योंकि यहां हमने जो देखा वह अत्यधिक परिमाण में रुपए खर्च करने पर भी देखने को नहीं मिलेगा। रजत इस स्वर्गिक दृश्य को देख जैसे मानसिक संतुलन खो दिया था जो कि शायद अधिक आनन्द लाभ करने पर होता है वह तो अपनी मातृभाषा को हीं भूल गया था और आव-बाव का शब्द निकाल रहा था। यह दृश्य लगभग आधा घंटा का हीं था पर अद्भुत, अपूर्व, आकर्षक था जिसके मोहपाश में सभी डूब गए थे।
डिनर के पश्चात बर्तन धो लिया गया और पायल और उसकी मां एक टैंट में जबकि रजत, दावा और मैं दूसरे टैंट में। टैंट में घुसने से पूर्व दावा ने नदी के उत्स की ओर प्राकृतिक बुलावे पर जाने से मना कर दिया क्योंकि सिक्किम के लोगों के लिए वो पवित्र स्थल है इसलिए एक अन्य स्थल की ओर जाने का परामर्श दे दिया। सचमुच में पौने छह बजने को होगा रात्रि का अंधेरा छा गया और आसमां सितारों से सजी दुल्हन की तरह दिख रही थी। प्रकृति की सुन्दरता का दर्शन करने के पश्चात इस अभावनीय संरचना को सृजन करने वाले को धन्यवाद दिया और टैंट के अन्दर घुस गया। हम तीनों न जाने कब तक विभिन्न विषयों पर चर्चा की फिर कब पलकें बंद हो गई पता नहीं चला। एक नींद में रात्रि गुजार नहीं सकता और तीन-चार बार नींद खुल जाती है, यहां भी वही हुआ मैं लघुशंका के लिए टैंट से बाहर निकाल आया तो एक ऐसा दृश्य मेरा इंतजार कर रहा था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। रात का मेघ मुक्त आसमान में एक बड़ा सा दूध का कटोरा और उससे बिखरती रौशनी से नहाई पेड़ों-झाड़ियां अपनी प्राकृतिक रंग के स्थान पर गंधकई रंग से सरोबार मूझे उनकी तरफ आकर्षित कर रही थी तो वहीं मेरे बांयी तरफ दूरी पर ऊंचे आकाश में एक शिशु के निकले दांतों की पंक्तियां दिखाई दिया जो कंचनजंघा की श्रेणी थी और कह रही थी आओ मेरे पास आओ-आओ-अभी इसी पल एवं मैं उसे देख कर अपने आप को भूलकर न जाने कितनी देर तक एकटक उसे देखता रहा यहां तक कि पलकें झपकाना भी भूल गया था। कहीं किसी अन्य लोक में तो नहीं आ गया हूं! कहीं कोई स्वप्न तो नहीं न देख रहा हूं। जब मेरी तंद्रा भंग हुई उस समय तक शशधर की उज्ज्वल चन्द्रांश मलिनता की चादर ओढ़ने लगी तारे भी पर्दे की आड़ में छुपते जा रहा था और हल्की-हल्की तुषारापात भी होने लगी। मैं त्वरित टैंट के अन्दर घुसा और दावा को जगाया और जो देखा था सब बताया तब उसने कहा दादाजी आपने कंचनजंघा शिखर का दर्शन किया है, सूर्योदय के समय ज्यादातर पर्वतारोही-ट्रेकर कंचनजंघा का मोहिनी रुप देख कर पागल हो जाते हैं परन्तु रात्रि में अपने जो देखा है वह विरले को हीं प्राप्त होता है।
आज ०३-१२-२५ की प्रातः काल हम सभी पांचों की नींद खुल गई थी पर टैंट से बाहर कोई भी नहीं निकले कारण हमारे टैंट के उपर बर्फ की चादर बिछी थी और शरीर को अकड़ा देनेवाली ठंड बाहर निकलने से मना कर रही थी। मैं बाहर निकलना चाहा तो दावा ने मुझे कहा अभी धूप निकल रहा है और सारा बर्फ मेल्ट हो जाएगा तब तक अन्दर हीं बैठे रहो पर मैं कहां मानने वाला बाहर निकल आया तथा चारों तरफ दृष्टि दौड़ाई और सूर्यहीन आकाश देख मन निराश एकबार को अवश्य हुआ लेकिन अगले हीं क्षण आनन्द एवं जीवन-मृत्य का खेल देखना पड़ा। आज की ट्रेकिंग चढ़ाई न होकर उतराई थी सो जितनी जल्द रवाना हो लें उतना हीं सुविधाएं अधिक मिलेगी। सबसे जल्दबाजी करने को कहा गया। पायल बाहर निकली तो घास पर जमी कांच सा पारदर्शी बर्फ दिखी मैंने उसे मना किया ऐसे बर्फ जिसे भरग्लास कहा जाता है और दुर्घटनाओं को आमंत्रण देते हैं इसलिए सावधानी से पैर रखना। अब तक पायल की मां,रजत, दावा भी बाहर निकल आए एवं खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहा क्योंकि भुवन भास्कर भी कुहासे को बाहर भगा कर अपनी रौशनी से सबको नई उर्जा प्रदान कर जरीबुटी अंचल की सुन्दरता में चार चांद लगा दिया और हमारे बांयी ओर से सामने ९० डिग्री कोण तक कंचनजंघा, कुंभकर्ण,पान्डीम,डेन्थाम आदि चोटियां भी सौर प्रकाश से सफेद बर्फ स्वर्ण सा जगमगाती हुई सामने उपस्थित हो गए। इन्हें देखकर सबका मन आनंद से अभिभूत हो गया था। दावा को छोड़ कर बाकी सभी इस अवर्णनीय प्राकृतिक सौंदर्य को अपने अपने मोबाइल में बन्दी बनाने में लगे थे। दावा ओभेन जला सबके लिए चाय की व्यवस्था करने का उपक्रम किया। गरमागरम चाय लेने के पश्चात मन हीं मन सभी प्रफुल्लित थे तथा टैंट समेटने की तैयारी से पहले शारीरिक आपातकालीन कार्य निबटारा आवश्यक हो चुका था। अचानक आकाश में वही ब्रह्माण्ड की कुण्डलीनुमा आकृति बनना पुनः दिखाई पड़ा। उपर की ओर देख पुनः एक बार काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति होने लगी और ऐसी स्थिति में पायल की मां सर चकराने लगा जिससे टैंट के पास हीं धूप में बैठने को कहा गया। मैं भी प्रकृति के बुलावे पर दूसरी दिशा की ओर निकल चुका था। दस मिनट भी नहीं हुए कि पायल की चित्कार-ओ बाबा मां सेन्सलेस हो गई है। बेचारा दावा स्वयं अपने हाथों से हमलोगों के लिए ब्रेकफास्ट तैयार करने जा रहा था पर वह सब कुछ छोड़कर पायल की मां को सम्हालने में व्यस्त हो गया और मैं भी तब तक चला आया पल भर में हीं सारी खुशियां छू-मंतर और सबके चेहरे पर चिंता उभर आई। खैर होश तो आया पर बोली मेरा शरीर दूर्बल लग रहा है,गला सूख रहा है। मैं समझ चुका था यह हाई एल्टिच्यूड सिकनेस है और जल्द हीं निचे उतरना होगा तभी सिकनेस पैशेन्ट को बचाया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं किया तो जीवन भी जा सकती है। जल्दी से टैंट समेटना,सैक को पीठ पर लोड फेरी करने लायक बनाना होगा। पायल की मां को चुपचाप धूप में बैठने के लिए कहा गया और टैंट समेटने में हम सभी व्यस्त हो गए, हमारे चेहरे से खुशियां गायब थी एक दुश्चिंता की छाया मंडरा रही थी अचानक पुनः दावा-आन्टीजी आन्टीजी, बोलते हुए दौड़ा सबने चौंक कर देखा दावा पायल की मां को उठाकर बैठाने का प्रयास कर रहा है पर पायल की मां लुढ़क जा रही थी। पायल पीठ सहला रही थी,रजत हथेलियों को रगड़ने लगा, मैं तलवे को रगड़ रहा था। चुंकी सांस थम गई सी लग रही थी और बार बार नाक के पास हाथ ले जा रहा था सांसें चलना तो शुरू हो जाए। अंत में दावा ने कई सेकेण्ड के लिए नाक को दबाए रखा और सफलता हाथ लगी और पायल की मां हड़बड़ी में उठ बैठी एवं बोली क्या हुआ मुझे? तुमलोग मुझे घेर कर क्यों खड़े हो? मैं पानी पिना चाहती हूं। पानी पीने के बाद वह खुद को स्वस्थ महसूस की। दावा ने कहा-आन्टी जी को मैं पीठ पर ले कर नीचे उतरता हूं आपलोग मुझको फालो करो पर मैंने कहा-नहीं दावा यदि वो खुद चलकर जाती है तो ज्यादा अच्छा होगा यदि बीच रास्ते में पुनः देखा गया कि अस्वस्थ हो ने वाली है तो फिर पीठ पर ले जीतना जल्द हो उतार दिया जाएगा और मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करो। उसने मोबाइल पर संपर्क करना चाहा पर हम सबका दुर्भाग्य किसी भी मोबाइल से संपर्क नहीं हो पाया। मैंने पायल की मां से कहा यदि तुम स्वयं चलकर जाती हो तो स्वस्थ रहोगी और हमलोगों को भी परेशानी नहीं होगी तो क्या तुम चाहती हो तुम्हें रोगी के रूप में पीठ पर लादकर ले जाया जाए। मेरा इतना कहने पर तुरंत बोली-नहीं, नहीं मैं खुद हीं चल कर जाउंगी मेरी चिंता मत करो। यह सब सुनकर पायल दो बिस्कुट और पानी ला कर दी एवं मां को खाने के लिए बोली। बिस्कुट खाने के पश्चात वह धीरे-धीरे इधर उधर टहलने लगी और बाकी सभी टैंट समेटा तथा सैक को ठीक ठाक कर ट्रेकिंग के लिए पौने नौ बजे रवाना। पायल की मां और रजत सामने तत्पश्चात पायल, दावा और सबसे अंत में मैं।
आज हमें किसी भी हालत में लसुनिया देवलिन, -वार्से -हिले होते हुए ओखरे भिलेज पहुंचना हीं होगा। हमलोग प्रथम गंतव्य लसुनिया की ओर बढ़ रहे थे जिसकी ऊंचाई जरीबुटी से लगभग डेढ़ हजार फीट कम है अवश्य परन्तु रास्ता एक दम निचे ढलान वाली होगी ऐसी बात नहीं है कभी एक दम बीस-पच्चीस फीट ऊंची सांस फुलती तो कभी एकदम निचे मानो हंसते मुस्कुराते उतर रहे हों लेकिन चढ़ाई पर गिरने का डर नहीं रहता है परंतु ज्यों ही निचे की तरफ तो दुर्घटनाओं की संभावना अधिक रहती है और वही घना वन ऊंचे ऊंचे गगनचुंबी वृक्षों के झुंड जिससे होकर सूर्य की किरणें भी धरातल को स्पर्श नहीं कर पाती है। धूप की अनुपस्थिति एवं हवा का दबाव दोनों मिलकर ठंढ को परमानेंट पोस्टिंग दे रखी थी। जब तक चल रहे हैं तो ठंड की अनुभूति गायब और रुक गये कि गालों को जैसे नुकिले छूरी चुभ रही है। पायल की मां और रजत दोनों हीं सामने सौ मीटर आगे चल रहे थे एवं हम तीन जन पिछे। अबतक दो घंटे चल चुके थे तथा थोड़ा-थोड़ा धूप दिखने लगा था जिसने हमारे चलने की गति बढ़ा दी एवं ट्रेकिंग रवाना होने से पूर्व जिस भय दुश्चिंता का सामना किया था उसे भूलकर नई उर्जा से परिपूर्ण हो गए और आधा घंटा में लसुनिया पहुंच गए जो चारो तरफ हरियाली से आच्छादित पहाड़ी चोटियों से घिरा एक मैदान था और सूर्य का प्रकाश अपनी स्वर्निम आभा से वातावरण को मनोरम दृश्य में परिवर्तित कर दिया था। हम सबने अपने पीठ को हल्का किया एवं आराम से बैठ गए। दावा ओभेन जलाया ताकि गरम गरम चाय हो जाए और पायल अपनी मां के साथ पानी लाने गई। सबने बिस्कुट खाया,चाय पीया और निश्चय किया गया कि लंच के रूप में मैगी नूडल्स मसाला तैयार कर उदर को दे दिया जाए ताकि इसके बाद नॉनस्टॉप हिले तक चलते रहें।
लंच समाप्त कर पुनः ट्रेकिंग शुरू जो देवलिंगाम सिक्किम वासियों का पवित्र स्थल है जहां किसी भी प्रकार के वर्जित वस्तुएं छोड़ना मना था। वास्तव में यह स्थल दो पहाड़ी नदियां रंगित एवं डेन्थाम का उत्स स्थल है और नदियां चुंकी मानव सभ्यता की संजीवनी होती है। इसलिए उस स्थान को दूषणों से बचाए रखना हीं इसका मूल उद्देश्य है। लसुनिया से देवलिंगाम जाने का रास्ता दलदली जहां कदमों को स्थिर रखना मुश्किल में पड़ना। अतः टपाटप कदमों को रखो और निकालो की पद्धति से करीब एक घंटा में पार कर लिया गया। यहां एक ऐसा पौधा भी देखा जिसके पत्तों को कच्चा हीं जलाने पर खुशबू आती है जो पुरे उस स्थान पर एक आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण कर देते हैं। पुनः आगे बढ़ना आरम्भ कर उंचाई की ओर चढ़ रहें थे जिसकी पगडंडी कंटीली झाड़ियों से हमें क्षत-विक्षत करने को तैयार जबकि हमलोग भी कम नहीं थे बचते-बचाते कंटीली झाड़ियों को पार करके हीं दम लिया और नानस्टप तब तक चलते रहे जब तक कि वार्से रडोडेन्ड्रन सैंकचुअरी नहीं आ गई हालांकि दोपहर के स्थान पर धीरे धीरे अंधेरा छाने लगा था और पायल का शरीर पुनः अस्वस्थ हो चुका था पर वह अपनी मानसिक शक्ति को प्रबल बनाए चलती रही पेट की अशांति को दांतों से दबाए रुकी नहीं। जब हम वार्से रडोडेन्ड्रन सैंकचुअरी पहुंचे तो वहां एकदम बदला बदला सा दिखा।गत सात-आठ महीने पूर्व जोरदार विरामहीन बर्षा ने हमें रडोडेन्ड्रन फूल की अपरुप सौंदर्य का दर्शन नहीं हो पाया था एवं वहां का झील भी सूखा था जबकि वही स्थान आज पुष्पहीन,निरस और विराने का चादर ओढ़े है एवं आश्चर्यचकित हुआ क्योंकि इस समय जब बारिश नहीं है तो यहां का झील जल से भरा हुआ है कैसे! कुछ पल के विश्राम के बाद हिले के लिए रवाना हुए जो साढ़े पांच किलोमीटर की दूरी तय करना था इधर पायद एक तरह से चलने में असमर्थ हो चुकी थी फिर भी किसी तरह स्वयं को खिंच रही थी जैसे उसके कदमों को किसी भारी बोझ ने दबा रखा हो। उसके कष्ट को देख कर उसकी मां एवं मेरी स्थिति भी बेकार हो चुकी थी। दावा उसके मनोबल को बढ़ाने का प्रयास कर रहा था। रास्ता भी जैसे समाप्त होने का नाम हीं नहीं ले रहा था और साढ़े पांच किलोमीटर जैसे पचास किलोमीटर की भांति प्रतित हो रही थी। दावा ने इस बार मोबाइल आन किया तो टावर संपर्क मिल गया फौरन हीं उसने ओखरे भिलेज से एक फाइव सीटर गाड़ी बूक कर हिले बुला लिया। अब तक एक दम घुप्प अंधेरा छा चुका था, आकाश में दिपावली मनाई जा रही थी। जंगली कीड़े-मकोड़े के गीत सुनाई दे रही थी और रास्ते के किनारे स्थित मकान सौर विद्युत के प्रकाश में हमें अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। आखिर हमलोग हिले भिलेज पहुंच गए जहां फाइव सीटर हमलोगों के लिए पलक-पावड़े बिछाए खड़ी थी। इस प्रकार हमारी दो दिन की ट्रेकिंग समाप्त हुई। पाठकों ऐसा मत सोचना कि दो दिन की ट्रेकिंग का वर्णन करने के लिए बकवास लिख रहा हूं परन्तु कोई उपाय नहीं है एक दृश्य को देखता हूं तो दूसरा को भूल नहीं पा रहा हूं।
