साढ़े चौबीस किलोमीटर भाग – १
साढ़े चौबीस किलोमीटर भाग – १
साढ़े चौबीस किलोमीटर
आखिर मैं पुनः सिक्किम हिमालय की ट्रेकिंग पर रवाना हो हीं गया। ट्रेकिंग की तैयारियां डेढ़ महीने पूर्व आरम्भ हो चुकी थी जिसमें रेलवे में आसन संरक्षण करना,होम स्टे बूकिंग करना तथा गाइड और सिक्किम सरकार से अनुमति पत्र लेना शामिल था। लोग कहते हैं कि ट्रेकिंग बकवास है, पैदल चलकर कहीं जाना कौन सी बड़ी बात है! परन्तु समतल भूमि पर चलना एवं पहाड़ी वह भी उंचाई की ओर जहां प्राकृतिक परिस्थितियां ट्रेकरों के शारीरिक एवं मानसिक अवस्था के बिल्कुल विपरीत रहती हैं। अत्यधिक ठंड, उंचाई पर हवा का दबाव, सांस लेने में परेशानी तथा पीठ पर लोड लेकर उंचाई की ओर कदम बढ़ाना, समय का ख्याल रखना शामिल है। इनमें से किसी एक में थोड़ी सी उन्निस या बीस हुई कि जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। ऐसा कहकर किसी को भयभीत नहीं कर रहा हूं बल्कि जो लोग पहाड़ों-जंगलों के प्राकृतिक सौंदर्य का उपभोग करने हेतु सवारियों का सहारा लेकर होम स्टे बूकिंग कर टुरिस्ट बन भ्रमण की कहानियां सुनाते हैं तो स्वयं ट्रेकिंग करें एवं खुले आकाश के तले टैंट लगा सेल्फ कूकिंग करें ज्यादा आनन्द का उपभोग करेंगे और शायद आप भी स्वयं टुरिस्ट के स्थान पर ट्रेकर बनना अवश्य पसन्द करेंगे।
मैं तो ट्रेकिंग पर जाने का निर्णय बड़े खुशी मन से किया था क्योंकि एक शिक्षक के छात्रों की वार्षिक परीक्षा समाप्त हो जाती है तो शिक्षक एवं छात्र दोनों हीं कुछ समय के लिए पढ़ाई-लिखाई से अवकाश ले लेते हैं। परन्तु मेरा तो गणित हीं उल्टा पड़ गया। पूर्व वर्षों में लिखित परीक्षा पहले हो जाती थी एवं बाकी के बाद में इसलिए ट्रेकिंग के लिए रेलवे में आने-जाने की टिकट आरक्षण करवा लिया। हुआ यह कि मैं तो आनन्द से बैलुन की भांति फुला हुआ था पर परिक्षा की रूटीन ने बैलुन में छिद्र कर दिया जिससे खुशी रुपी हवा बाहर निकलना शुरू कर दिया। मन हीं मन मुझे स्कूल के शिक्षकों पर क्रोध आ रहा था,लग रहा था शायद स्कूल के शिक्षकों को मुझसे जलन है और वो लोग मेरा ट्रेकिंग अभियान को रद्द करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन मैं भी कम नहीं, मुझे असफल कराना असंभव है उनके लिए। तभी एक और बाधा मेरे सामने आ खड़ी हुई। श्रीमती जी के आंखों का मोतियाबिंद ऑपरेशन का तारिख तय हो गई और मेरे घर में मुझे घर का सारा कार्य करना पड़ा। ऐसी स्थिति में मन में उठा पटक चल रही थी कि क्या करूं क्या न करूं? कभी कभी निराशा भी मुझे चिढ़ाती थी बड़ा चला है ट्रेकिंग करने। चुपचाप घर पर बैठो रहो, सोते-जागते एक हीं चिन्ता खाती कि क्या मैं ट्रेकिंग पर जा पाऊंगा! फिर भी मुझमे आत्मविश्वास की कमी न थी।
देखते देखते ट्रेकिंग के लिए मैं घर से रवाना हुआ। मैं जिस दल में था सदस्यों की संख्या चार -मैं, श्रीमती जी, पुत्री पायेल एवं पर्वतारोही छात्र रजत।३० नवम्बर को घर से नैहाटी रेलवे जंक्शन से बण्डेल जंक्शन और रात १० बजकर ५०मिनट पर हावड़ा-आगरतला गरीब रथ के ए सी कोच में सवार हो गए। यहां हमारी संख्या तीन थी अर्थात पायेल सिलिगुड़ी से हमारे साथ जुड़ेगी। रेलवे बोगी के ए सी कोच में सवार हो गया और आरक्षित बर्थ पर लेट गया परन्तु नींद आंखों से कोसों दूर चली गई। सारी रात करवटे बदलता रहा, कभी उठ कर बैठ जाता एवं अन्य यात्रियों के खर्राटों को सुनता-खर्र-खुर्र-खों-खां और रह-रह कर हंसी आ रही थी पर अपनी हंसी रोकने का प्रयास करता क्योंकि कहीं मेरी हंसी किसी को उसके स्वप्न लोक से धड़धड़ लोक में पटखनी न दे दे। खैर नींद न आने का एक कारण था मेरी रेल यात्रा की शुरुआत जनरल डिब्बे से हुई जहां मनुष्य न होकर चतुष्पद प्राणी के समान व्यवहार में व्यस्त रहा एवं बोगी में सवार होने से लेकर बैठने का स्थान पाने के लिए अनगिनत पापड़ बेले थे। पापड़ भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि जिसको खाकर भोजन हजम हो या न हो पर सारा शरीर हाय हाय कर उठता था। इस अवस्था से परेशान होकर आरक्षित बोगी में यात्रा करना आरम्भ किया तो एक चिड़ा रेलखाना देखी और टी टी ई के साथ आर पी एफों के सहयोग से विभिन्न कमियां दिखा यात्रियों का गला काटते देखा और इस समय पुत्री पायेल के कारण ए सी कोच में यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है अर्थात मरते हुए नहर में रहने वाले को यदि स्वच्छ बहती नदी में धकेल दिया जाय तो क्या नदी में मन बैठेगा हीं नहीं। रात किसी तरह से कटी और हम लोग लगभग सुबह आठ बजे के करीब न्यू जलपाईगुड़ी जंक्शन पर उतर कर सिलिगुड़ी एस एन टी(सिक्किम नेशनल ट्रान्सपोर्ट) जाने के लिए स्टेशन से बाहर निकला तो देखा कि अटो-टोटो के चालक गण जैसे यात्रियों को लगेज सहित निगलने की होड़ में व्यस्त थे यानी कि यात्रियों की संख्या कम अटो-टोटो वालों की संख्या अधिक है। सभी चालक यात्रियों को पकड़ने हेतु शब्द रूपी शहद का सुगन्ध फैला कर मधुमक्खियों को चिपकाने का प्रयास करता हुआ पाया। एक पल को तो राज्य व देश के सरकार के उपर विक्षोभ उभर आया आखिर नागरिकों के लिए कर्म संस्थान की व्यवस्था क्यों नहीं हो पाई है!
एक टोटो वाले ने २५० रूपए में हमलोगों से बात पक्की कर ली तथा हम तीनों को एस एन टी पहुंचा दिया। नौ बजने में अभी भी बीस मिनट बाकी थे। मेरी बिटिया पायेल से फोन पर बातें हुई कि वह जिस बस से आ रही है वो अभी थोड़ी सी दूरी पर है। हमलोगों को सिलिगुड़ी से जोरथांग जाना है और इसके लिए बस एवं बोलेरो गाड़ी दोनों उपलब्ध है। सर्वप्रथम मैं बस के टिकट काउंटर पर जाकर पुछताछ किया कि यहां से बस किराया दो सौ रुपए तथा नौ बजे एस एन टी बस स्टेशन से और अगली बस दोपहर एक बजे छुटेगी। पायेल से फोन पर संपर्क कर उसे बस के बारे में बताया तो वह बोली दूसरी सवारी की व्यवस्था क्यों। फौरन हीं दस सीट वाली बोलेरो से जाने की व्यवस्था कर ली गई। परन्तु यहां भी एक लोचा मिला जो ऐसी गाड़ियां पुरे दस पैसेंजर्स को लेकर हीं रवाना होगी तथा यदि किसी को जल्दी है तो खाली सीटों के लिए पेमेंट करो तो गाड़ी चालक स्टेयरिंग पर हाथ रखेगा अन्यथा सीट भरने तक इन्तजार करो। यहां हमलोगों के सामने समस्या थी दोपहर एक बजे के बाद उत्तरे जाने के लिए कोई गाड़ी मिलना अनिश्चित है। अतः मरता क्या न करता आत्मसमर्पण करना पड़ा और दो पैसेंजर्स की सीट खाली थी किराये का पेमेंट करना पड़ा कारण सिलिगुड़ी से जोरथांग जाने में कम से कम तीन घंटे लगते हैं परन्तु कुछ दिन पहले ही इस अंचल में लैण्डस्लाइड हुई थी जिससे रास्ते की पुनर्निर्माण कार्य चल रही थी और इसमें समय कितना लगेगा कहना मुश्किल। इसलिए हमें चार पैसेंजर्स के स्थान पर छः पैसेंजर्स का किराया चुकाना पड़ा जो प्रति व्यक्ति ३५० रुपये हुई। इन परिस्थितियों में हम प्रातराश से वंचित हो गाड़ी में सवार हो गए। गाड़ी रवाना होने के पश्चात अत्यधिक जनसंख्या बहुल इलाके से गुजरते हुए धूलकणों को हम सबकी नासिकाओं से प्रेम हो गया। उंगलियों से नथुनों को कितने देर तक दबा कर रख सकता था फलत:सेवक ब्रीज तक नाक मुंह में धूलकणों को फेफड़ों के अन्दर एवं मुखगह्वर में प्रवेश करने दिया। रास्ते में चाय बागानों के बीच से गुजरती सड़क सैनिक छावनियों का अभिवादन करते हुए हिचकोले खा रही थी। गाड़ी के खिड़कियों से प्रकृति के हरी मखमली लिबास को देख हृदय के तारों में हलचल पैदा हो रही थी जैसे दिल कह रहा है यहां रुक जाऊं और आंखों से रसस्वादन करता रहूं। सिलिगुड़ी क्षेत्र से विदा ले समतली भूभाग से पर्वतीय क्षेत्र की ओर आगे बढ़े तो बांयी ओर हिमालय अपना सिना ताने चुनौती दे रहा था और दांयी तरफ तिस्ता अपनी तीव्र धाराप्रवाह के इठलाती बलखाती तरंगों से हमारा स्वागत कर रही थी एवं जलधारा की भयंकर गर्जना सुन हृदयाघात हो जाने का आभास हो रहा था। गाड़ी सड़क पर रप रप की आवाज निकालती मन में गुदगुदी पैदा कर रही थी। आहिस्ता आहिस्ता सेवक ब्रीज के निकट आ चुके थे और हमारी गाड़ी रुक गई। कुछ देर तक हम गाड़ी में बैठे रहे पर दस मिनट गुजर जाने के बाद भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ी तो बाहर झांक कर देखा तो पाया अनगिनत गाड़ियां कतार में खड़ी है तथा केवल विपरीत दिशा से गाड़ियां आ रही है पर खड़ी गाड़ियों में कोई हलचल नहीं। गाड़ी चालकों को चहलकदमी करते एवं मुंह से तम्बाकू का गन्ध निकालते देखा। इतना हीं नहीं कुछ फेरीवाले भी ऐ झालमुड़ी,ऐ लेबू,ऐ उबला चना,ऐ मिक्सचर का गीत गाते क्रेताओं को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। लगभग एक घंटा गुजरने के बाद गाड़ियों में हलचल हुई और सरकने लगी। प्रत्येक गाड़ी के यात्रीगण यहां की व्यवस्था को कोस रहे थे कि यात्रियों के समय का कोई मोल नहीं है, क्या विदेशों के ट्रांसपोर्टेशन को देखकर भी भारत में यात्री सुलभ व्यवस्था नहीं किया जा सकता है,अरे भाई छोड़ो भारत को ऐसी व्यवस्था बनाने में सौ वर्ष लग जाएंगे आदि। बांयी ओर से गाड़ियां सामने की ओर भाग रही थी वहीं उल्टी दिशा से आने वाली गाड़ियां कतारों में खड़ी हो रही थी। इन्हें देखकर मैं एक बार सोचा कि आओ भाई आप भी सेवक ब्रीज का मजा चखो। हमारी गाड़ी तो सर्र-सर्र-फर्र-फर्र-सड़ात्-सड़ात् करती हुई पहाड़ी सड़क पर हिचकोले खिला-खिला कर यात्रियों के कमर को शायद अलग-अलग करना चाह रही थी और लैण्डस्लाइड हटाकर खाली सड़क पर इतना उछल रही थी कि सबके कन्धे गाड़ी के अन्दर हीं धक्के खा-खा कर खुलकर अलग-अलग होने के निकट थी। सबके मुंह से अरे बाप रे-हे भगवान ओह माय गॉड,ओ भाई ड्राइवर भाई थोड़ा सम्हाल कर चलाओ हमारी जीवन लीला समाप्त करने का मन बना लिया है क्या! जबाब में ड्राइवर गाड़ी में लगा होम थिएटर का स्विच ऑन कर दिया और डी जे से ढक-ढक की ध्वनि सुनाई देने लगी तथा उस ढक-ढक धुन पर एक यात्री बैठे बैठे थिरकने लगा वहीं ड्राइवर के बगल में बैठी दो युवतियां डी जे से सुनाई देने वाली गीतों को अपने होठों पर सजा रही थी। उससे भी ज्यादा गीत और संगीत से तालमेल रखते हुए होंठों से उंगलियां लगाए सिटी बजा रहा था,यह सब देख मैं अपनी हंसी नहीं रोक पाया। मैंने ड्राइवर नेपाली युवक से हंसते हुए मैंने कहा ड्राइवर बेटे थोड़ा सावधानी भी रखो कहीं तुम्हारी डि जे में बजने वाली गीत कहीं हम यात्रियों की अंतिम गीत न हो जाए। उस युवक ने बड़ी सरलता के साथ सामने सड़क पर दृष्टि एवं स्टेयरिंग पर हाथ रखे कहा- अंकल चिंता मत करो आपको आपके गंतव्य पर पहुंचाने के बाद हीं मेरी स्वीट हार्ट को कुछ कुछ होगा। चलो अच्छा हुआ जो मुझे उस गाड़ी का नाम पता चला नहीं तो मैं तो अब तक उस बोलेरो गाड़ी को हमारी गाड़ी कह रहा था। स्वीट हार्ट कभी ४० डीग्री उंची ढलान का आरोहण करती तो कभी ६० डीग्री नीचे की ढलान पर उतरने लगती जबकि तीस्ता एवं अन्य पहाड़ी नदी कभी बांयी तो कभी दांयी आंख-मिचौली खेल रही थी। जबकि वहीं रास्ते में कुछ कुछ दूरियों पर लैंड स्लाइड के मलवे हटाने के कार्य में व्यस्त श्रमिक यानवाहनों की बाधाएं दूर करने में लगे थे। जब उनके निकट से गुजरते हुए उनकी सरल स्वभाव वाली आंखें मधुर मुस्कुराहट के साथ हमें निहारती एवं स्वीट हार्ट भी उन्हें टाटा-बाय-बाय करते हुए जोरथांग की ओर बढ़ती जा रही थी। स्वीट हार्ट के खिड़की से उपर आसमान को देखता तो लगता था जैसे आकाश कह रहा हो विचलित मत होना धैर्य रखो तुम्हारी यात्रा पक्का शुभ होगा। जैसे जैसे जोरथांग निकट आते जा रहा है हमलोगों को चिंता सताने लगी क्योंकि एक बजने को है और एक बजे की गाड़ी छुटने के बाद शायद हीं शाम होने से पूर्व उत्तरे जाने की सवारी मिले। मन में उथल-पुथल मच रही थी कि उत्तरे को घुम कर शायद उसकी पर्वतीय प्राकृतिक सौंदर्य को देखने का अवसर मिल पाएगा या नहीं? इधर भूख के मारे आंतें ऐंठ रही थी कारण एस एन टी पर ब्रेक फास्ट करने का समय नहीं मिल पाया था, यहां तक कि चाय की चुस्कियां भी नहीं ले पाया था। एक बात कहने में संकोच नहीं करूंगा कि भूख एक ऐसी दैहिक अनुभूति है जो जग जाने के पश्चात भोज्य पदार्थ के अलावा दूसरी न तो सोचने देती है और न हीं कोई दूसरा कार्य करने देती है।
खैर जोरथांग पहुंच तो गए पर पन्द्रह मिनट देर से और सबसे पहले आवश्यक थी उत्तरे जाने वाली गाड़ी का पता करना एवं गाड़ी तुरंत हीं छुटने वाली थी सो हमलोगों ने बाथरूम में जाकर हल्का होना और भोजन की तलाश करना त्याग दिया। झटपट गाड़ी जोरथांग से उत्तरे के लिए रवाना हो गई। रास्ता वही सेवक ब्रीज से जोरथांग तक के समान थी। यदि कुछ अन्तर थी तो वह थी रास्ते से निचे पता नहीं कितने मीटर की खाई होगी और उसी के ढलान पर निर्मित सुन्दर-सुन्दर मकाने जो चारों तरफ खुबसूरत फूलों के पौधों से सज्जित, इन्हें देखकर पलकें भी नहीं झपक रही थी। हिमालय ने अपनी अद्भुत आकर्षण में मनुष्य तो मनुष्य वृक्षों-चट्टानों, धूलकणों को भी हृदय में बसा लिया हो बिल्कुल उस ममतामई मां की भांति जो अपने संतानों के हर सुख को पूर्ण करने के लिए सचेष्ट रहती है। सड़क के किनारे खिले गेंदा फूलों की कतारें और उसके कदम से कदम मिलाए लंका जवा (हमारे पश्चिम बंगाल में भी पाई जाती है) सड़क से काली चादर हटा पर्वतीय सुन्दरी सड़क के लिए कमर कस ली हो। इसके अलावा गाड़ी की गति अधिक नहीं हो पा रही थी क्योंकि लैण्डस्लाइड ने सड़क की कमर तोड़ दी थी और सिक्किम सरकार उसकी मरहम पट्टी करवा रही थी। ऐसे में सिक्किम का गाड़ी चालक भला सड़क सुन्दरी को कैसे कष्ट पहुंचाएगा! आखिर हमें उत्तरे होमस्टे पहुंचते- पहुंचते एक दम पहाड़ी अंधेरे ने घेर लिया। औरों की तो मैं नहीं कह सकता पर मैं खीझ उठा था कि अगले दिन हीं अचाले नामक गांव की ओर हमारी ट्रेकिंग शुरू हो जाएगी और उत्तरे ग्राम की दृश्यावलोकन नहीं कर पाऊंगा। वैसे आज की हमारी यात्रा ने हमें भूखा हीं रखा वो तो गनीमत थी कि जोरथांग में गाड़ी चालक को बोल कर बिस्कुट और चाय ले लिया था। जब हम लोग उत्तरे ग्राम से अभी पन्द्रह-बीस कि.मी.दूरी रही होगी पायेल फोन पर होमस्टे वाले को बोली कि हमलोगों के लिए कुछ गरम स्नैक्स के साथ काफी/चाय तैयार करके रखेंगे क्योंकि सुबह से अबतक हमने कुछ नहीं खाया है। परन्तु होमस्टे वालों ने हमें गर्मागर्म चाय व बिस्कुट में हीं निबटा दिया तथा हम सभी को हमारे रूम में जाने का आग्रह किया तथा अनुरोध किया कि हमारा डिनर आठ बजे के पहले प्रस्तुत कर देंगे। हमारा रूम किचन से लगभग पचास मीटर की उंचाई पर स्थित थी। अपना रूकसैक कंधे की सहायता से पीठ पर उठाया एक दम काली घनी अंधेरे को चीरते हुए पगडण्डीनुमा रास्ते पर चलना शुरू कर दिया उपर नीचे कुछ भी नहीं दिख रहा था।सो हमलोगों ने अपनी मोबाइल टर्च आन कर आगे बढ़े जा रहे थे। भूख और थकावट तथा पीठ पर लदी बोझ के कारण कदम उपर की ओर नहीं उठ रही थी, सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। खैर किसी तरह जब रूम में पहुंचा तो रूम की व्यवस्था देख मन को शांति मिली। साफ-सुथरा एवं सजी सजाई,बेड पर ठंढ से आराम पहुंचाने वाली उन्नत किस्म की कम्बल एवं अटेच्ड बाथरूम में गीजर की भी व्यवस्था थी। लगभग आधा घंटा आराम करने के बाद आगामी सुबह ट्रेकिंग शुरू करने के लिए आवश्यक तैयारियों पर चर्चा की गई जिसमें हमारा गाइड दावा शेरपा भी शामिल था। उसने ट्रेक रूट,अगली नाइट स्टे और सेल्फ कूकिंग के बारे में बताया तो एक नई समस्या सामने आ खड़ी हुई रजत को राशन में चावल, सोयाबीन के नूडल्स तथा मैगी के पैकेट खरीदने कहा गया था पर उसने केवल मैगी के पैकेट्स हीं खरीदा शायद उसे नूडल्स ज्यादा स्वादिष्ट लगती हो। पर अब क्या किया जाए स्थानीय दुकानदार से चावल,अण्डे, खरीदने होंगे। दुकान पचास मीटर नीचे उतर कर सड़क के किनारे दुकान थी। ट्रेकिंग के लिए सिक्किम सरकार की अनुमति पत्र के लिए दावा शेरपा ने परामर्श दिया कि आप लोगों को वालनट एवं मपलर पेड़ों की जंगल के बिच से लेकर अचाले ले चलुंगा इसलिए अनुमति पत्र की चिंता मत करो। सारी आवश्यक बिन्दुओं पर चर्चा करने के बाद मैं पुत्री पायेल को साथ लेकर दुकान की ओर चल पड़ा किन्तु दुःख की बात वो दुकान नहीं मिली और हमें वापस लौटना पड़ा तथा पचास मीटर की जगह बीस मीटर की चढ़ाई पहुंच आगे की पगडंडी से भटक गए। दांए-बांए जिधर से भी आगे बढ़ते पर वापस उसी स्थान पर आ खड़े होते। पगडंडी मेलिंग बम्बू की झाड़ियों के बीच से गुजरती थी मोबाइल के टर्च के प्रकाश में झाड़ियां बड़ी भयावह लग रही थी और भालू से भी शायद भेंट होने का डर था हालांकि मुझे जंगली जानवरों से भय नहीं था फिर भी साथ में मेरी बेटी उसके लिए मेरे मन में जन्म ले ली। सच में बच्चों की सुरक्षा के लिए न चाहकर भी आशंकित हो जाना पड़ता है। अंत में पायेल ने झाड़ियों के बिच से हीं आगे बढ़ने का निर्णय लिया और आखिर हम रूम तक पहुंचने में सफल रहे। मुझे पाएल के निर्णय एवं साहस को देख कर खुशी हुई। रजत, दावा दोनों हीं किचन में होम थिएटर पर गाना सुन झूम रहे थे। इसके बाद रजत ने हमें फोन कर डिनर के लिए पहुंचने को कहा। किचन में जाकर देखा रजत, दावा तथा उसका बंधु माउथ स्पीकर लेकर फिल्मी गीतों के शमां मेंकबांध रखा है और उनका सहयोग वहीं की दो स्थानीय युवतियां भी नृत्य करते हुए कर रही हैं। उन्हें देख मैं अपने राज्य की युवतियों की तुलना कर रहा था और सोच रहा था कि मेरे राज्य की युवतियों का गीत संगीत की चर्चा में कृत्रिमता अधिक है जबकि ये दोनों युवतियों ने अपने राज्य की पारम्परिक वेशभूषा में जहां कृत्रिमता लेशमात्र भी नहीं था। डायनिंग टेबल पर जब भोज्य सामग्रियां जैसे चावल एवं कर्न मिश्रित गरम गरम भात,दाल, चिकन, स्थानीय शाक भाजी, टमाटर की चटनी देखकर दिन भर की भूख ने हमारे उदर में अग्नि की लपटें उठाने लगी और हम सभी उन पर टूट पड़े परन्तु भात के रूप में जो मिला था उसे चबाने में दांत दर्द करने लगा। भोजन परोसने वालों ने हमसे कहा कर्न और चावल मिश्रित भात उदरस्थ करने में आपको शायद परेशानी हो रही है पर हमने आपके लिए खास कर इसे मेनु में शामिल किया है ताकि उत्तरे की उंचाई से अचाले होते हुए जरीबुटी की चढ़ाई करते समय आप लोगों को थकने नहीं देगा। खैर कुछ गाल चबाने पश्चात स्वाद का अनुभव ने चिकन के टुकड़ों को अमृत ऐसा बना दिया। किचन में गीत के साथ नृत्य ने हमें ऐसा मोहा था कि क्या मुंह के अन्दर जा रहा है पता हीं नहीं चल रहा था। गीत की शमां की मस्ती में अचानक ध्वनि की मात्रा बढ़ गई और पायेल की मां दावा से आग्रह की ध्वनि को थोड़ा कम कर दो फौरन हीं ध्वनि कम हो गई और उन लोगों ने हमसे क्षमा याचना की और हमलोग अपनी तृप्ति के लिए आपको असुविधा में पड़ने नहीं देंगे। पुनः अपने राज्य में किसी भी उत्सव पर डी जे बन्द करने का अनुरोध करने पर स्थानीय क्लबों के सदस्यों के द्वारा बिना किसी भेद भाव के अनुरोध कर्ता को पिट दिया जाता है और प्रशासन एवं नेतृत्व वर्ग आपस में सलटा लेने का परामर्श देते हैं। शायद सिक्किम वासियों में जीओ और जीने दो का अनुशासनिक अभ्यास है। कोई यह नहीं कहता है कि हम तो बजाएंगे हीं और आपको सहन नहीं होता है तो आज के लिए कहीं और चले जाओ। काश सभी लोग ऐसी हीं विचारों का पालन करते। डिनर के पश्चात मैंने रात के समय अंधेरे साम्राज्य में सोलर पैनल द्वारा संचालित विद्युत प्रकाश से आलोकित गांव तारों की भांति जगमगा रहे थे जैसे तारे आसमान में न होकर जमीन पर उतर आया हो।
आगामी प्रातः किसी भी हालत में आठ बजते-बजते ट्रेकिंग शुरू हो जाना चाहिए। हम तीन जन रुकसैक पैकिंग कर चुके थे जबकि पायेल राशन खरीदने गई थी। रजत के कहने पर कि झटपट भोजन के लिए मैगी नूडल्स उपयुक्त है जो उसके पास काफी ज्यादा है। इसलिए चावल छोड़कर अण्डे एवं कुछ अन्य ड्राइ फ्रूट्स खरीद कर वह वापस आ गई और उसने भी अपनी सैक पैकिंग कर ली। तब तक किचन में हमलोगों के लिए ब्रेक फास्ट तैयार। प्रातः काल का नाश्ता करने के पश्चात पायेल होमस्टे का शुल्क भुगतान की एवं ट्रेकिंग शुरू करने से पहले क्लब ध्वज के साथ फोटो खींची गई। ट्रेकिंग शुरू करने से पहले मैंने पायेल का सैक उठाकर देखा तो पाया कि उसका सैक काफी भारी थी क्योंकि उसके सैक में थ्री मैन टैंट,राशन, तीन जन का व्यक्तिगत व्यवहार योग्य वस्तुएं थी। मुझे बहुत बुरा लगा मेरी पतली दुबली बेटी इस भारी सैक को कैसे ढोकर ले जाएगी। परन्तु दूसरा कोई उपाय नहीं था। मैंने कहा कुछ सामान मुझे दे दे तो अच्छा होगा पर वह मेरे से सहमत नहीं हुई। मन हीं मन झुंझला कर रह गया। इसके बाद दावा से ट्रेकिंग परमिट के बारे में पूछा तो उसने कहा दादाजी आप चिंता मत करो आप का गाइड मैं हूं न। किसी भी परेशानी में पड़ने नहीं दूंगा।
हमारी ट्रेकिंग शुरू हो गई अर्थात उंचाई की ओर बढ़ते जा रहे थे। अभी कुछेक मिनट हीं बीते की गर्मी महसूस होने लगी और दम भी फूल रहा था। एक-एक कदम उंचाई की ओर जैसे पन्द्रह-बीस किलो जैसे लग रहा था। पहाड़ी पगडंडी किधर से आगे बढ़ रही है अन्दाज लगाना मुश्किल था। दावा बीच रास्ते में हीं बताया था कि संभल कर चलना होगा क्योंकि घने वन के पेड़ों के पत्ते झड़ कर रास्ते का अता पता नहीं चलने देगा। हालांकि वही रास्ता दिखा रहा था और हमलोग उसका अनुसरण कर रहे थे। हमारे कदम जब पत्तों से ढंकी पगडंडी पर पड़ती और घस्स-घस्स-सर्र-सर्र की ध्वनि सुनाई देती जिससे शरीर में सिहरन पैदा कर देती। मन में सांपों, कीटों-पतंगों का डर भी लग रहा था पता नहीं किस ओर एवं कहां मुलाकात हो जाए। जैसे जैसे हम उंचाई की ओर बढ़ते जा रहे थे वैसे वैसे जंगल की सघनत बढ़ता जा रहा था और धूप का लेशमात्र भी नहीं था जैसे उस वनांचल को किसी अंधेरी साम्राज्य ने घेर रखा हो यहां तक कि उपर नीलाम्बर भी दृष्टिगोचर न के बराबर थी । सबसे आश्चर्य की बात थी कि पुरा वातावरण एक दम शांत और शब्दहीन सिर्फ और सिर्फ हमारे कदमों की आहट एवं हमारी सांसें सुनाई दे रही थी। वारंट,ओलडर,मपलर आदि पेड़ों के तने गर्व से सर ऊंचा किए आकाश को शीश पर धारण कर भगवान भोलेनाथ के द्वारा सुरसरी और चन्द्र को अपनी जटाओं में लपेटने की पौराणिक कथाओं को प्रमाणित कर रहा हो। लगभग एक हजार फीट की उंचाई चढ़ाई कर चुके थे और इच्छा कर रही थी थोड़ा आराम करना चाहिए। थकावट के मारे गला भी सूखने लगा था, पानी के बोतल से गले को भींगोया तत्पश्चात बिस्कुट खाकर द्वारा पानी को गले से लगाया। इससे हमारी थकावट कुछ कम हुई और शरीर एवं मन को ताजगी मिली जिसने हमारे आत्मविश्वास को और भी मजबूत कर दिया। आराम कर लेने के बाद पुनः उंचाई चढ़ना शुरू करने से पहले रजत ने सैक से चॉकलेट निकाल सबको चार-पांच की संख्या में दे दिया। ये चाकलेट प्यास ज्यादा न परेशान करे और उर्जा प्रदान कर आगे बढ़ने के लिए सही साबित होता है। अभी आधा घंटा हीं चले थे देखा गया कि पायेल को आगे बढ़ने में असुविधा हो रही है और पुछने पर बोली पेट में अशांति एवं उल्टियां होने के ऐसा लग रहा है। मैंने सोचा कहीं हाई एल्टिच्यूड सिकनेस तो नहीं पर कुछ हीं दूर आगे बढ़े थे कि वह रुक गई और पीठ से सैक उतार दी एवं उल्टी करने लगी अर्थात तीन जन का लगेज लेकर चलना असम्भव हो गया सो दावा उसका सैक अपनी पीठ पर ले लिया। वह तो पर्वतीय क्षेत्र का निवासी एवं पर्वतारोहियों- ट्रेकरों के लिए गाइड और पोर्टर का काम करता था इसलिए उसके लिए लगेज लेकर चढ़ने में परेशानी कम थी। वैसे ट्रेकिंग में यदि बाधाओं से लड़ने का अवसर न मिले तो ट्रेकिंग में मजा नहीं आता है। हम पांचों में सबसे आगे पायेल की मां थी और उसके बाद रजत एवं उसके बाद पायेल, दावा तथा सबसे पिछे मैं। उंचाई की ओर बढ़ते जा रहे थे पर चढ़ाई की गति शिथिल होती जा रही थी। समय के साथ-साथ अचाले चोटी के निकट पहुंच चुके। दोपहर के सवा एक बजने को था भूख काफी तेज लगी हुई थी पर भोजन पकाने के लिए वहां जल की उपलब्धता नहीं थी पांच मिनट के लिए वहां रुके, आराम से सैक उतार कर बैठ गए कमर- पैरों को फैला दिया ताकि परिश्रम से राहत मिले। बोतल से पानी पी कर गला भींगोया, चाकलेट मुंह में डाल जीभ से दांए बांए करने लगा सच कहता हूं उस समय वह चाकलेट अमृत के समान लग रहा था। पायेल का शरीर अस्वस्थ हीं था, कष्ट के चलते उसकी बोलती बंद हो चुकी थी ठीक से कदम नहीं उठ रहे थे केवल आगे की ओर जबर्दस्ती बढ़ रही थी। उसका कष्ट देख मुझे अपने असहाय अवस्था पर क्रोध भी आ रहा था मैं उसके लिए कुछ भी नहीं कर सकता था। बस उसका आत्मविश्वास दूर्बल न हो और कुछ देर तक की चढ़ाई के पश्चात हमलोग जरीबुटी पहुंच जाएंगे आज का ट्रेकिंग समाप्त तथा टैंट पिचिंग कर सेल्फ कूकिंग एवं नाइट स्टे। यदि भाग्य ने साथ दिया तो दावा के अनुसार कंचनजंघा,पाण्डिम,डेण्थाम,कुम्भकर्ण आदि चोटियों के ऐसे हिमालय के अलंकारों का दर्शन हो गया तो समझूंगा कि हमारा ट्रेकिंग सार्थक हुआ। इधर की उंचाई तो बड़ी विचित्र मिली लगभग ६०-८० डीग्री होगी जिससे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी लग रहा था जरीबुटी न जा यहीं पर टैंट पिचिंग कर लूं और नाइट स्टे कर अगले दिन जरी बुटी होते देवलीन धाप से ओखरे तक परन्तु समय एवं खर्च बहुत बड़ी समस्या बन जाएगी। अन्ततः हम सभी ३ बजे जरीबुटी पहुंच गए। यह स्थल घना कोहरा से ढंकी और हवा की गति कम से कम ३०-४० किमी प्रति घंटा रही होगी जिसका प्रमाण था ऊंचे पहाड़ों पर तरु शिशों का जिमनास्टिक दिखाना तथा हवा चलने की भयंकर ध्वनि आत्मा को झकझोर कर रख दी थी। वहां पहुंच कर दस मिनट तक आराम किया, सांसें स्वाभाविक हुई। अब सबसे पहले हमने टैंट पिचिंग करने का स्थान चयन किया और उस ठंड से राहत पाने के लिए चाय की व्यवस्था की गई। तभी दावा ने कुछ लकड़ियां इकट्ठी कर उसे जलाने का व्यवस्था, जलती आग के पास बैठ कर शरीर को थोड़ा आराम मिला हालांकि धुंआ ने हमारी आंखों से नदी की धारा बहा दी फिर भी ठंड से बचने हेतु हमने आंखों के जलन को स्वीकार कर लिया। बहती हुई हवा की गति की कोई निश्चित दिशा नहीं थी एक दम स्वाधीन मस्त अपनी इच्छानुसार किसी भी दिशा से अठखेलियां करती रही। बड़ी जल्दी टैंट पिचिंग किया गया, भोजन पकाने एवं पीने का पानी जहां हमने टैंट पिचिंग की थी वहां से थोड़ा नीचे उतरकर किसी पहाड़ी नदी का उत्स स्थल से लाया। बाकी दूसरे भाग में
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