चाय के दीवाने
चाय के दीवाने
चाय के दीवाने,
कहानी का शीर्षक: "चाय के दीवाने, एक-दूजे के दीवाने"
मुंबई की वही पुरानी शाम, वही बारिश, वही प्लेटफॉर्म की चाय की टपरी। लेकिन उस दिन कुछ अलग था।
आदित्य, हमेशा की तरह अपने ऑफिस की थकान लिए टपरी पर पहुँचा। रमेश ने उसे उसकी पसंदीदा अदरक-इलायची वाली चाय थमाई।
वो पहला घूंट ही लेने वाला था कि एक तेज़ हवाओं के झोंके के साथ बारिश तेज हो गई।
उसी वक़्त, एक लड़की भागती हुई आई। हाथ में एक फाइल, काँधे पर बैग, और चेहरा... बारिश से भीगा हुआ, लेकिन मुस्कुराता हुआ।
"एक चाय मिलेगी?" – उसने हल्की थकावट भरी आवाज़ में कहा।
रमेश मुस्कराया, "पहली बार आई हो, तो इस प्याली की कीमत एक मुस्कान है।"
लड़की हँसी।
आदित्य ने उस हँसी को सुना नहीं, महसूस किया। जैसे कोई मीठा संगीत हो जो कानों में नहीं, दिल में बजता है।
वो लड़की आदित्य के ठीक बगल में खड़ी थी। अचानक, एक गड़गड़ाहट हुई और लड़की हल्के से काँपी।
आदित्य ने बिना कुछ कहे अपनी छतरी उसके ऊपर कर दी।
"थैंक यू..."
"नो वॉर्रीज़..."
"आप रोज़ आते हैं क्या यहाँ?"
"हाँ, और अब शायद तुम भी आओगी।"
दोनों मुस्कुराए। चाय का पहला घूंट दोनों ने एक साथ लिया। और वहीं से शुरू हुई एक चुपचाप कहानी।
बारिश हर दिन नहीं होती, लेकिन उस शाम के बाद हर दिन दोनों वहीं मिलने लगे। कभी कम बोलते, कभी ज़्यादा। लेकिन चाय के प्याले के बीच, दिल की दूरी हर दिन कम होती गई।
रमेश अक्सर चुटकी लेता –
"अब ये चाय की टपरी नहीं, इश्क़ की गली बनती जा रही है!"
और एक दिन, जब बारिश फिर से वैसे ही बरस रही थी, लड़की ने कहा –
"पता है, मैं कभी चाय नहीं पीती थी। पर तुम्हारे साथ चाय पीना... ऐसा लगता है जैसे ज़िंदगी को किसी ने मीठा बना दिया हो।"
आदित्य ने मुस्कुरा कर जवाब दिया –
"और मुझे चाय से मोहब्बत थी। अब चाय की वजह से मोहब्बत हो गई है।"
और यूँ, ‘चाय के दीवाने’ एक-दूजे के दीवाने बन गए।
हर प्याली में अब एक कहानी थी, और हर कहानी में वो दो दिल थे – जो बारिश, चाय और मुस्कान के बहाने एक हो गए।

