चादर के अनुसार पैर पसारो
चादर के अनुसार पैर पसारो
जबसे छोटे बेटे का फोन आया है तभी से शारदा जी का बेटे-बहू के साथ बहस हो रही है।
"मुझे अभी भी लग रहा है कि वह झूठ बोल रहा है, बहाने कर रहा है। सब पैसा निकलवाने की चाल है।" बहू रोहिणी ने कहा।
"पिछली बार की हरकतें देख कर लग तो मुझे भी रहा है कि इस बार भी बहाने ही कर रहा है।" विवेक (बेटा) ने कहा।
"तू बड़ा भाई होकर भी ऐसी बातें करेगा मुझे यकीन नहीं था। अरे, क्या मैंने तुझे इसी दिन के लिए इतना पढ़ाया लिखाया, इस काबिल बनाया कि जरूरत पड़ने पर तुम अपने छोटे भाई की भी मदद ना करो। सही कहते हैं लोग पैसा आ जाने पर अपने ही अपने को नहीं पहचानते।"
"मां, आप सालों से बस एक ही बातें बोल रही हैं। आप और पापा ने तो हम दोनों को पढ़ाया। अगर उसने पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया इसमें मेरी क्या गलती? वो आज ही नहीं सालों से हम सबको बेवकूफ बना रहा है फिर भी आप समझने को तैयार नहीं। पहले भी पढ़ने के बहाने पैसे लेकर दोस्तों के साथ सिनेमा देखना, घूमने जाना, पार्टी करना बस यही सब करता रहा आज भी वही कर रहा है। मां, अब वह बच्चा नहीं रहा बल्कि एक बच्चे का पिता बन चुका है और फिर कब तक वह दूसरे पर निर्भर रहेगा कभी ना कभी तो उसे अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी।"
"अरे! तू कैसी बातें करता है वो कोई दूसरा नहीं तेरा अपना छोटा भाई है। ठीक है अगर तुम नहीं दे रहे तो मैं कहीं और से इंतजाम करती हूं।"
"आप इंतजाम मत करिए मैं देता हूं पैसे।" पैसे देने की बात सुन रोहिणी गुस्से में वहां से उठकर अपने कमरे में चली गई।
रोहिणी की शादी को 10 साल होने को आ गए। पति मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पोस्ट पर है। उसका देवर भी उसी शहर में कुछ किलोमीटर की दूरी पर रहता है। जब से उसकी शादी हुई है कभी देवर को घर खर्च या मां के इलाज में कोई मदद करते नहीं देखा उल्टा हर महीने कुछ ना कुछ पैसे बड़े भाई से मांग लेता यह कहकर कि मेरी कमाई ज्यादा नहीं है। शादी के कुछ महीनों बाद ही वह अलग रहने लगा। फिर भी जब-तब किसी ना किसी चीज के बहाने पैसे मांग ही लेता है। एक बार विवेक ने कह दिया, अपनी कमाई बढ़ाओ मैं हमेशा तुम्हारी मदद नहीं कर सकता, मेरा अपना भी परिवार है और मां का इलाज भी। तब से वह उधार कहकर पैसे लेता है लेकिन आज तक कभी वापस नहीं किया।
गुस्सा विवेक को भी आता लेकिन यह सोच कर रह जाता कि छोटा भाई है तो बड़े भाई होने के नाते मदद करनी चाहिए। पर वो इसका कुछ ज्यादा ही फायदा उठाने लगा। अभी कुछ महीने पहले पत्नी बीमार है, इलाज कराना है कहकर ₹25000 मांग लिया, भाई ने दे भी दिया बाद में बातों-बातों में देवरानी के मुंह से निकल गया कि इलाज में तो सिर्फ 10000 खर्च हुए बाकी पैसे शॉपिंग में खर्च किया।
आज फिर पैसे के लिए फोन किया था, बेटे के स्कूल की फीस देनी है। विवेक देने में आनाकानी करने लगा बस इसीलिए मां नाराज है। वैसे भी जो बच्चे दूर रहे मां को उसी पर ज्यादा प्यार आता है।
विवेक के कमरे में आते ही रोहिणी ने पूछा, "पैसे दे दिए?"
"हां, दे दिए मन तो नहीं कर रहा था लेकिन फीस भरनी है और फिर मैं मां को नाराज नहीं देख सकता। और वो है तो अपना छोटा भाई ही, फिर उधार लिया है। बोला है कुछ महीने में वापस कर दूंगा।"
"आज तक तो नहीं किया।"
"आज तक नहीं किया लेकिन हो सकता है अब कर दे।"
रोहिणी बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकल गई।
करीब 2 दिन बाद शारदा जी बाहर वाॅक करने निकली तो उनकी सहेली मिली, "अरे शारदा, उस दिन पार्टी में तुम नहीं गई थी क्या?"
"कौन सी पार्टी? तुम किस पार्टी की बात कर रही हो?"
"अरे अभी जो 2 दिन पहले तुम्हारे छोटे बेटे के घर पर था तुम्हारी छोटी बहू के जन्मदिन के उपलक्ष्य में। मेरा बेटा-बहू उनके पड़ोसी हैं तो वे दोनों भी गए थे पार्टी में। उसने ही बताया कि तुम लोग नहीं थे।" सुनकर शारदा जी चौंक गई लेकिन अब कैसे बोले कि उन्हें पता भी नहीं किसी पार्टी के बारे में। तुरंत बहाना बनाया, "अरे हां, याद आया तबीयत ठीक नहीं थी तो मैं नहीं जा सकी। और मुझे छोड़कर मेरे बेटे बहू भी नहीं गए।"
शारदा जी को अब समझ आया कि उसने पैसे फीस भरने के लिए नहीं बल्कि पार्टी करने के लिए लिया था। बेटे की हरकत पर उन्हें बहुत दुख हुआ लेकिन किसे कहें? बड़े बेटे-बहू को भी कहती हो शायद वे भी नाराज होते। इसलिए चुप रही। पर उनका उदास चेहरा देखकर विवेक बार-बार पूछने लगा, क्या हुआ मां, क्यों उदास हो? तब उनसे रहा नहीं गया और सारी बातें बता दी।
सुनकर विवेक को बहुत गुस्सा आया वो तुरंत फोन करने लगा तब रोहिणी ने मना कर दिया।
कुछ दिनों बाद देवर ने फिर फोन किया रोहिणी ने एक-दो बार रिसीव नहीं किया पर लगातार फोन किया तो उसने जैसे ही हेल्लो बोला, देवर हंस-हंसकर बोलने लगा। रोहिणी ने कहा, "तब देवर जी, पार्टी ठीक-ठाक रही ना, पैसे कम तो नहीं पड़े।"
"अरे नहीं भाभी, पैसे तो मैंने फीस भरने के लिए ही लिया था लेकिन प्रिया जिद करने लगी कि मुझे पार्टी करनी है तो छोटी सी पार्टी रखी थी बस अपने ही घर में। इसीलिए आप सबको नहीं बुला सका। सॉरी भाभी!"
"नहीं बुलाये कोई बात नहीं और ना ही सॉरी बोलने की जरूरत नहीं है। पार्टी करना और शौक पूरा करना बुरा नहीं है लेकिन हां किसी और के भरोसे नहीं अपने पैसे और अपने भरोसे। हां, एक बात और उधार वापस भी किया जाता है।"
सुनते ही देवर ने "हां.." बोल मां को फोन देने को कहा।
"क्यों बेटा और कितने झूठ बोलेगा? मैं हमेशा तुम्हारी मदद करने के लिए विवेक को डांटती रही पर आज समझ में आया मैं कितनी बड़ी गलती कर दी। अरे, किसी की अच्छाई का इतना फायदा मत उठाओ, पैर उतनी ही पसारो जितनी लंबी चादर हो।"
"मां, इस बार माफ़ करिए आगे से गलती नहीं होगी और हां जितना जल्दी होगा मैं पैसे वापस कर दूंगा।"
