Bussy Bee~एक अधूरे प्यार की कहानी
Bussy Bee~एक अधूरे प्यार की कहानी
Bussy Bee
(एक अधूरे प्यार की कहानी)
शहर की हलचल भरी सड़कों के बीच एक पुराना कैफ़े था — Bussy Bee। रोज़ की भागदौड़ में भी उसका एक कोना शांत रहता था — जैसे वक़्त वहाँ ठहर गया हो। उसी कोने की एक टेबल पर हर शनिवार एक लड़का आता था, किताबों में खोया हुआ, और एक खाली कुर्सी के सामने बैठा रहता। उसका नाम था विहाग।
कैफ़े के पुराने कर्मचारी अक्सर नए लोगों से कहते,
"देखो वो जो लड़का है ना, वो उस खाली कुर्सी का इंतज़ार करता है... जहाँ कभी वैदेही बैठा करती थी।"
वैदेही — एक नाम, एक कविता।
कॉलेज के दिनों में उनकी मुलाक़ात हुई थी। वैदेही कविताएँ बुनती थी और विहाग कहानियाँ। जब दोनों ने मिलकर पहली बार एक कविता-कहानी प्रतियोगिता में भाग लिया, तो शब्दों के उस संगम में उनका दिल भी जुड़ गया।
प्यार धीरे-धीरे उन दोनों की कलमों से निकलकर उनकी मुस्कानों तक पहुँच गया था। पर शायद ज़िंदगी को उनके प्रेम की सादगी रास नहीं आई।
एक शाम वैदेही ने रोती आँखों से बताया —
"पापा का ट्रांसफ़र हो गया है... हमें विदेश जाना होगा, हमेशा के लिए।"
विहाग ने उसका हाथ थामा और पहली बार कहा,
"आई लव यू।"
वैदेही कुछ देर चुप रही, फिर बोली —
"काश हम थोड़ा और वक़्त साथ बिता पाते..."
और फिर, वो चली गई… और Bussy Bee का वो कोना हमेशा के लिए ख़ाली हो गया।
वर्षों बीत गए। कैफ़े बदला, मेन्यू बदला, शहर की रफ़्तार बदली — लेकिन विहाग का कोना नहीं बदला। हर शनिवार वो आता, उसी कुर्सी के सामने बैठता, किताब खोलता, और एक अधूरे पन्ने पर ठहर जाता।
एक बार किसी ने उससे पूछा,
"क्या तुम पागल हो?"
विहाग मुस्कराया और कहा —
"नहीं… मैं वफ़ा हूँ… अधूरे प्यार की आख़िरी उम्मीद।"
कहानी कभी ख़त्म नहीं हुई — क्योंकि कुछ प्यार कभी ख़त्म नहीं होते...
वो बस Bussy Bee के कोने में अधूरे रह जाते है.

