Husan Ara

Comedy Drama


4.2  

Husan Ara

Comedy Drama


बुरे फंसे

बुरे फंसे

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यह घटना उस समय की है जब हमे जॉब करने के लिए अपने शहर से दूर दूसरे शहर में जाना पड़ा था। हम निकल पड़ी थीं अपने नए सफर पर। तब हमें यह मालूम न था कि हम स्वयं के लिए ही एक बैल बुलवा लेंगे कि आओ मारो हमे।

अब हम थे उस नए शहर में अकेले, न कोई जानने वाला, न ही कभी पहले इस शहर में आए थे।

फिर हमारे शहर की इज़्ज़त आदाब वाली बोली और यहां के लोगो की ज़बान की तल्खी का आपस मे सामंजस्य बैठाना ज़रा मुश्किल मालूम होता था।

मगर धीरे धीरे पता चला कि नही भाई,आप भले तो जग भला।

मगर हमारी यह धारणा कुछ ही दिन में मुह के बल जा गिरेगी नही सोचा था। हमारे साथ कुछ ऐसा घटित हुआ कि हमने अपने लिए स्वंय ही मुसीबत को न्योता दिया के जी हम यहां हैं आप किधर ढूंढ रही हैं।

सच मानिए तो आ बैल मुझे मार की कहावत शायद हमारे लिए ही कही गई थी।

तो हुआ यूं कि एक वर्ष तो हमारा बहुत अच्छे से गुज़रा, उस समय मे हमारी आयु 22 वर्ष रही होगी।देखने मे भी हम इतनी ग्रेसफुल तो थी ही के आसानी से अपनी धाक लोगों के मन मे बैठा सकें। लेखिका होने के कारण हमेशा से ही चीज़ों का सूक्ष्मता से निरीक्षण करना आ गया था।

अतः कम समय मे ही यह पता लगाने की क्षमता थी कि सामने वाले के विचार किस प्रकार के है।

धीरे धीरे समय बीतता गया हमे वह जगह छोड़नी पड़ी और ऐसी जगह घर मिला जहाँ एक ही बिल्डिंग में 8-10 परिवार रहा करते। हमे नए लोगो से मिलने और नए प्रयोग करने का शौक भी वहां खीच लाया।

वहां भी हर तरह के परिवार मिले कोई अत्यधिक मॉडर्न तो कोई संस्कारो से सराबोर। कोई थोड़ी सी तनख्वाह में इज़्ज़त की रोटियाँ तोड़ता तो कोई पैसे के नशे में उन्ही टुकड़ो की बेअदबी करने वाला। किसी का मिजाज़ हर किसी को देख कर मुस्कुरा देने का तो कोई रोज़ मिल कर भी नज़रअंदाज़ कर देने वाला।

इन सब शख्सियतों के बीच एक और शख्सियत भी वहां थी जिनकी चीखती चिल्लाती आवाज़ अक्सर हमारा ध्यान खींचा करती थी।

थी तो वह बहुत पैसे वाली मगर कुछ गली पीछे उनका एक घर तैयार हो रहा था,तो कुछ दिन रहने को वहां किराए पर आई थीं। हम ऊपर के माले पर थे तो खिड़की से उनका वह तैयार होता घर नज़र आ जाया करता था।

हमारा अब तक उनसे तार्रुफ़ तो नही हुआ था मगर हमें आस पास की महिलाओं ने चौकस कर दिया था कि अपनी स्कूटी आदि इनके दरवाज़े के सामने मत पार्क करना वगेरह -वगेरह।

हमें पता चला कि उनकी वहां किसी से बनती नही थी आज इससे दोस्ती उससे लड़ाई फिर कल वाला दुश्मन दोस्त और किसी अन्य से लड़ाई।

हमारे बावरे मन को न जाने क्या सूझा, उनके इस व्यवहार का कारण जानने की बात मन में ठन गई। ऐसा लगता था कि ऐसी क्या वजह है कि इनका मूड बिगड़ा रहता है, क्या कोई जानने की कोशिश नही करता ?क्या किसी ने प्यार से बात करने की कोशिश की कभी ? क्या ये हमेशा से ऐसी थी या हालात ने बदल डाला।

ऐसे ही कई सवाल मन मे लिए हमने उनसे मिलने की ठानी। लगा हर प्राणी प्यार का भूखा होता है। पहुंच गए उनसे मिलने बड़े प्यार से उन्होंने बैठाया,चाय पिलाई, हमारे बारे में पूछा। हमारा मन उनके लिए आदर से भर गया कि अनजान होते हुए भी कितनी अपनाइयत दिखलाई थी।

दरवाज़े पर छोड़ने आने पर सबको सुनाने वाले अंदाज़ में चिल्लाईं कि कौन बदतमीज मेरे घर के पास से बाइक निकाल कर ले गया ? मिट्टी मिट्टी हो गई है थोड़ी दूर से नही निकाल सकते आदि आदि। हम उस बात पर बिना ध्यान दिये ,उनकी ओर देखकर घर आने को बोल कर ऊपर आ गए।


अगले दिन से उन्होंने रोज़ आना शुरू कर दिया। पहले जो शोर शराबा नीचे होता था, हमारे घर पर होने लगा । लोगो की शिकायतों और परेशानियों को लेकर इतना बड़ा अफसाना उनके पास था यदि लेखिका होती तो पूरा उपन्यास बन जाता। अब विडंबना ये कि उसका पूरा भावार्थ हमारे पास पढ़ा जाने लगा।

ऊपर से हमारी आदत बहुत ही शान्तिप्रिय तो हमे दूसरो के बारे में कुछ कहना सुनना अत्यधिक कचोटता था। कई बार मन होता उन्हें टोक देने का मगर हम जीरो फिगर वो हीरो फिगर, हमारी आवाज़ बेदम उनकी एटम बम। रोकते तो कैसे।

हम ना तो दूसरों की पर्सनल ज़िन्दगी के बारे में जानने की कोशिश करते न किसी का किसी को जज करना पसंद था ।हमारे अधिकतर लेख भी इसी विषय पर होते थे कि जियो और सबको अपने हिसाब से जीने दो।

तो सोचिये हमारा मस्तिष्क तो टन टन करने लगा था। मगर दोष उन्हें भी कैसे दे, इस घंटी को हमने स्वयं अपने गले बांधा था।

खैर हमे हमारे प्रश्नों का उत्तर भी मिल चुका था कि वह ऐसी क्यों थी। वह कारण था किक।

किक ! जी हां वही किक जो सलमान खान को किक फ़िल्म में मिलती थी कुछ उल्टा सीधा करके। वोही किक इन मोहतरमा को सबको उल्टा सीधा बोल कर मिलती।

हमने कई बातों के सोलुशन सुझाए मगर जनाब स्तिथि बदल जाती तो बाते कैसे होती, मुद्दा क्या होता चिल्लाने का। अपनी आवाज़ का रॉब जमाना भी तो था।

अब हम हर समय खिड़की से उनका तैयार होता घर देखते कि कितने दिन बाद ये जाए। कभी मज़दूरों पर गुस्सा आता कभी उनके पति पर कि और कितने दिन का यह कार्यक्रम बाकी है!

उनकी हर बात से हमे यही प्रतीत होता कि वह समझती थी कि उनके साथ जो कुछ भी बुरा होता था सब का कारण हम पड़ोसी थे।कभी पाइप, कभी नालियां तो कभी बारिश की कीचड़ आदि सबका दोष वह सब पर मढ़ने से ज़रा न कतराती। हम उन्हें कभी पानी पिलाकर शांत करते तो कभी कॉफी चाय से उनके सिर का दर्द मिटाने की कोशिश करते।

कई बार हमसे आस पास की औरतें इस दोस्ती का कारण भी जानना चाहती, मगर ये तो हम ही जानते थे कि यह दोस्ती नही समझौता था जिसमे हमने उन्हें कुछ भी बोलने का अधिकार दे रखा था और हम बस उनके मूक श्रोता थे।

न उनके आगे बोलने की हिम्मत थी न उन्हें रोकने की। बस यही सोचते कि चलिए कुछ दिन और।

फिर एक दिन जॉब से लौटने पर हमें पता चला कि वह अपने बाथरूम में फिसल गई थी, सिर पर चोट आई, पति घर पर नही थे, सब पड़ोसियों ने ही उन्हें समय से अस्पताल पहुँचाया।

वापिस घर पहुंचते समय रात हो चुकी थी। एम्बुलेंस से ही उन्हें घर के दरवाजे तक छोड़ा गया।

हम भी उतर कर उनके घर पर पहुँच गए थे। वे हाथ जोड़कर सबका आभार व्यक्त कर रहीं थी। हम खुश थे कि चलो आखिर पड़ोसियों के महत्व आज वह समझी तो सही। हम कुछ बोले नही उन सबको देख रहे थे। कोई उनके लिए फल लाया था कोई पूजा के फूल, खाना आदि भी

आस पास की युवतियों ने बना दिया था।

अगले दिन संडे होने की वजह से हम सब काफी देर वहीं उनके पास बैठे रहे,उनके पति के लौट आने तक।

उन्होंने प्यार से हम सबको विदा किया।

अगले दिन हमारा सोने का इरादा तो बहुत देर तक था परंतु शोर शराबे से हमारी आँख खुल गई । सिर पर पट्टी बांधे वही मोहतरमा चिल्ला रहीं थी कि एम्बुलेंस को दरवाज़े तक लाने की क्या ज़रूरत थी देखो सारी की सारी मिट्टी दरवाज़े पर जमा हो गई है, अब ये घर मे आएगी घर से बिस्तर पर और पता नही क्या क्या।

पता था मुझे अब आती ही होंगी हमे यानी अपनी इकलौती सहेली को उन सब की शिकायतें परेशानियो वाली बातें बताने। हम आह भरकर देखने लगे खिड़की से बाहर उनका घर, जिसे तैयार होने में अभी भी कुछ समय बाकी था।


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