बिचौलिए
बिचौलिए
बिचौलियों की जिंदगी सुना था बहुत खराब होती है।
परंतु जब तक बिचौलिए बेनकाब ना हो जाए।
तब तक उनका जीवन भी अमीरी में ही गुजरता है।
कहते तो यह भी है मालिक तो महान है। परंतु चमचों से परेशान है।
चमचे भी ऐसे चमचे लगते है। वह चमचे जन्मजात चमचे हूं। पुराने चमचों को देखकर ऐसा लगता है। जैसे चांदी के चमचे हो। कुछ चमचे घिसे हुए चमचे होते है।
कुछ चमचे अभी चमचागिरी में नए-नए मैदान में उतरे हैं।
खैर चमचे तो चमचे होते हैं। जिस बर्तन में भी कुछ भी होगा उसे वह खाली कर ही देंगे।
शायद बुजुर्गों ने इसीलिए यह कहा है।
मालिक तो महान है परंतु चमचों से परेशान है।
बाबू ने कहा कौन से चमचे की बात चल रही है।
विजय ने कहा चमचे तो चमचे होते हैं। कुछ छोटे होते हैं, कुछ बड़े होते हैं। कुछ लंबे होते हैं, कुछ छोटे होते हैं। कुछ मोटे होते हैं, कुछ पतले होते हैं। चमचे तो चमचे होते हैं।
बाबू तुम भी फिरकी लेते हो चमचों में तुम्हारा नाम भी कम नहीं है।
बाबू ने कहा नहीं ऐसी बात नहीं है।
तभी सुरेंद्र ने बोला बाबू चमचागिरी का सबसे बड़ा उदाहरण तो तुम ही हो।
राकेश ने ने बाबू की फिरकी लेते हुए कहा बाबू मीठे-मीठे शब्दों की जादू गिरी से तुम बड़े-बड़े सूरमाओं को ढेर कर देते हो।
यह जादूगरी है आपके चमचागिरी की।
विजय ने कहा वास्तव में जिस भी बुजुर्ग ने यह कहावत बनाई है।
मालिक तो महान है परंतु चमचों से परेशान है। एकदम सही बनाई है।
कई बार कार्यालय में इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो जाती है। एक से दूसरे ऑफिस दूसरे से तीसरे ऑफिस तीसरे से चौथे ऑफिस वह बातें किस कदर अग्नि बनकर उठाती है। वायु बनकर हर कार्यालय में पहुंचती हैं। वर्षा बन कर एक दूसरे के कानों को छूती है। फिर कहीं जाकर वे अफसाना बनती है।
वह बात हर किसी को पता होती है। सिर्फ मलिक के कानों तक नहीं पहुंच पाती। क्योंकि चमचे उस बात को मलिक के कानों तक पहुंचने ही नहीं देते।
कुछ ऐसी ही कहानी लेकर मैं आपके सामने प्रस्तुत हो रहा हूं।
एक कंपनी का मालिक भरत जो गरीब व्यक्तियों का मसीहा कहा जा सकता है।
वह गरीब व्यक्तियों को रोजगार देने के लिए कार्यालय के एक विश्वासी कर्मचारी संतोष से ढाई सौ रिक्शा बंटवाता है।
संतोष भी उन रिक्शा को गरीबों में बांट देता है। परंतु संतोष के मन में लालच भर जाता है।
संतोष अपने लालच के चलते ढाई सौ रिक्शा वालों से प्रतिदिन ₹400 किराया वसूलता है।
जिसका लालच दिन प्रतिदिन बढ़ता चला जाता है। वह उन 250 रिक्शा चालको पर किराया न मिलने पर उन्हें जलील करता है। उन्हें नीचा दिखाता है। यहां तक वह उम्र का भी लिहाज नहीं करता। वह बुजुर्ग रिक्शा चालक को भी थप्पड़ मारने से गुरेज नहीं करता।
उसके लालच की इम्तिहान तब हो गई। जब उसकी गर्लफ्रेंड ने एक रिक्शा चालक को यह कहते हुए पिटवाया कि इस रिक्शा चालक ने मुझसे किराए के पैसे मांगे थे।
संतोष ने उसे खूब मारा लेकिन कहते हैं वक्त सबका बदलता है। एक दिन सुबह मादीपुर के पास मालिक किसी काम से गया था। वह अपना बैग रिक्शे में रख देता है। अपनी गाड़ी स्टार्ट कर के वहा से चल देता है।
जब वह ऑफिस पहुंचता है। तो उसे याद आता है। वह मादीपुर के पास एक रिक्शा में अपना बैग भूल गया।
भरत मैनेजर संतोष को बुलाता है। वह उससे पूछता है मेरा बैग वहां छूट गया है। रिक्शा पर। शहर में तो हमारे ही रिक्शा चलते हैं।
क्या वह बैग वापस मिल सकता है।
संतोष कहता है जी सर कल सुबह तक वह बैग मिल जाएगा।
भरत ने कहां उस बैग के अंदर 20 लाख रुपया है। 20 लाख रुपया कम नहीं होता ध्यान रहे। 20 लाख रुपया खोना नहीं चाहिए ।
अभी मलिक भरत और संतोष की बातचीत चल रही थी। तभी एक रिक्शा चालक दरवाजा खटखटाता है।
जैसे ही वह रिक्शा चालक उस बैग को वहा बैठे मलिक को देता है। मलिक बड़ी घबराहट में वह बैग रिक्शा चालक से छीन लेता है। जल्दी से वह नोट गिनता है। वह पाता है बैग में पूरा 20 लाख रुपया है।
भरत रिक्शा चालक से पूछता है क्या वह जानता है। इस बैग में क्या है। रिक्शा चालक बड़ी ईमानदारी के साथ कहता है। बैग में बहुत सारा रुपया है। मालिक उसकी इमानदारी पर बहुत ही प्रसन्न हो जाता है।
कहते हैं मलिक महान है इस महानता का उदाहरण तब पता चलता है।
कहते हैं मालिक महान है इस मानता का उदाहरण तब पता चलता है।
जब मलिक रिक्शा चालक को उसकी ईमानदारी पर प्रशंसा के शब्द बोलता हैं।
जब मलिक प्रशंसा के शब्द रिक्शा चालक को बोल रहा था। तभी रिक्शा चालक की नजर साथ में खड़े हुए व्यक्ति पर पड़ती है।
रिक्शा चालक की उस पर नजर पड़ते ही वह कहता है साहब आज मैं तुम्हें रिक्शा का किराया जमा नहीं कर पाऊंगा।
क्योंकि सारा दिन इन साहब का पता ढूंढते ढूंढते निकल गया।
भरत ने कहा संतोष मै यह क्या सुन रहा हूं।
क्या तुमने इन रिक्शा चालकों को रिक्शा नहीं दिया।
संतोष ने कहा मैंने इन्हे रिक्शा दिया है। भरत ने कहा फिर तुम इनसे किराया क्यों वसूलते हो।
संतोष ने कहा मैं इनसे कोई किराया नहीं लेता। ये रिक्शा चालक झूठ बोल रहा है।
तब उस रिक्शा चालक ने कहा यदि मैं झूठ बोल रहा हूं। तो मैं अपने उन सभी रिक्शा चालक भाइयों को बुलाकर लाता हूं। जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
यह सुनते ही संतोष कि सिट्टी पिट्टी गुम हो गई।
संतोष यह सुनते ही घबरा गया उसका चेहरा शर्म से काला पड़ गया।
रिक्शा चालक ने कहा साहब संतोष को किसी भी हालत में छोड़ना मत।
यह बहुत ही बदमाश आदमी है। इसने हम सबको बहुत सताया है। इसने हम सबको बहुत पिटा मारा है।
हमारे हक के पैसों में से हमारे मेहनत से कमाए गए पैसों को भी इसमें हड़प कर लिया है।
इसलिए संतोष को किसी भी सूरत में आप बिना सजा दिए छोड़ना मत।
भरत संतोष को बहुत बुरा भला कहता है।
भरत संतोष को कहता है तुम सबसे विश्वासी आदमी हो। उसके पश्चात भी तुमने मुझे इतना बड़ा धोखा दिया।
मैंने तुमसे ढाई सौ रिक्शा बंटवाए अपनी संतुष्टि शकुन के लिए।
परंतु तुमने मेरे पुण्य को भी पाप में बदल दिया।
इन गरीब लोगों की बददुआएं तुम्हें लगे ना लगे मुझे अवश्य लगेगी।
क्योंकि तुमने उनके हक के पैसों में से जो वसूली करके अपने घर अपनी इज्जत अपने रुतबे को बनाए रखने का घिनौना काम किया है।
वह कम से कम संतुष्टि तो किसी प्रकार से नहीं दे सकता।
संतोष मैं तुम्हें इस नौकरी से निकलते हुए यही कहना चाहता हूं।
जहां भी तुम काम करो कम से कम दूसरों के हक का पैसा कभी मत मारना।
अब तुम मेरे ऑफिस से जा सकते हो।
जाते-जाते वह रिक्शा चालक को कहता है। इस आदमी को ₹1 भी देने की आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि वह रिक्शा मैंने मुफ्त में बटवाए हैं।
उसके बदले में मुझे किसी से ₹1 नहीं चाहिए।
मैंने वह रिक्शा इसलिए बंटवाए हैं। जिसके पास रोजगार नहीं है। वह अपना रोजगार कर सके। जो किसी कारणवश पैसा नहीं कमा पा रहा है। वह इस रिक्शा व्यवसाय के माध्यम से पैसा कमा कर अपने घर परिवार को चला सके।
मैं आए दिन हजारों व्यक्तियों को मुफ्त में भोजन करवाता हूं।
मैं न जाने अलग-अलग जगह पर अलग-अलग वस्तुएं मुफ्त में बटवाता हूं।
किसी बुजुर्ग ने सही कहा है मालिक तो महान है चमचों से परेशान है।
दोस्तों मलिक और आम कर्मचारियों के बीच में जितने भी बिचोलिय आते हैं।
उन्हें आज की तारीख में चमचे ही कहा जाता है।
चलते-चलते यही कहूंगा आज के डिजिटल युग में आज के आधुनिक युग में किसी से सावधान रहे ना रहे परंतु चमचों से सावधान अवश्य रहना।
किसी से बनकर चले ना चले परंतु चमचों से बना कर अवश्य चलना।
इतिश्री
