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Komal Tandon

Comedy Drama Horror

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Komal Tandon

Comedy Drama Horror

भूतिया हवेली में नाजुक बालाएं / बलाएं

भूतिया हवेली में नाजुक बालाएं / बलाएं

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भुतिया हवेली में नाजुक बालाएं  बलाएं

एक पुरानी जर्जर मगर भव्य हवेली के सामने बोलेरो आकर खड़ी हुई जिसका नम्बर था PB-32-GG-7725। हवेली के बाहर पत्थर पर  हवेली का पता 7/725 घोरगांव उत्तर प्रदेश व पिन कोड 283266 दर्ज  था (काल्पनिक)। कार से उतरने वालों ने इस ओर ध्यान न देकर हवेली की ओर कदम बढ़ाये ये चार 20-22 वर्षीया युवतियाँ थीं जो बहुत ही मार्डन लग रहीं थीं। इस छोटे से कस्बे में हॉफ पैंट , मिडी, मिनी व स्वीवलेस टॉप के साथ शार्ट स्कर्ट पहने युवतियाँ प्रायः नजर नहीं आतीं। 

“वाऊ क्या बात है। बिल्कुल किसी हिन्दी फिल्म की भुतही हवेली के समान है जैसे ‘बंद दरवाजा’। ये बड़ा काला दरवाजा देखकर तो मुझे यही मूवी याद आ रही है।” झूमते हुए एक लड़की ने कहा जिसके कान में कॉर्डलेस इयर बड्स लगे थे शायद वह कोई गीत सुन रही थी। 

 “यहाँ भूत तो रहते होंगे न ? मेरी अगली भुतिया कहानी में मैं इस हवेली को ही डिस्क्राइब करने वाली हूँ। “ जींस के साथ स्लीवलेस और वी शेप्ड गले वाली टीशर्ट पहने एक लड़की ने कहा। उसकी जींस उसके एंकल तक आ रही थी। गाँव में कोई देखता तो यही कहता कि लड़की की जींस छोटी हो गई है। 

“हाँ कोमल यहाँ बहुत से भूत रहते हैं। कई लोगों ने यहाँ के विषय में अपने अजीब अनुभव बाँटे हैं। डैडी ने यह हवेली इसलिए खरीदी क्योंकि भुतिया कहानियों के कारण इसका रेट बहुत कम लगाया गया था। हमें यहाँ सिर्फ पिकनिक नहीं मनानी बल्कि इसका रिनोवेशन भी करना है। आज आराम और कल से काम । “ सुष्मिता ने कहा जो कि पर्पल भड़काऊ टॉप के साथ मिनि स्कर्ट में थी और चारों युवतियों में सबसे प्रभावशाली, आकर्षक और पैदाइशी अमीर दिख रही थी। 


सुष्मिता ने आर्किटेक्चर का कोर्स किया है और उसकी तीन सहेलियाँ सहायता करती हैं और इस सहायता के उन्हें अच्छे पैसे मिलते हैं। यूँ समझिये कि सुष्मिता की आर्किटेक्चर कम्पनी में वे तीनों जॉब करती हैं। सुष्मिता के पिता की “ओल्ड इज गोल्ड” नामक एक बहुत ही प्रसिद्ध आर्किटेक्ट एंड कन्स्ट्रक्शन कम्पनी है। वे पुराने घरों को खरीद कर नया बनाकर ऊँचे दामों में बेच देते हैं। इसी क्रम में यह हवेली खरीदी है।


“यार ऐसा मत बोल मुझे भूतों से डर लगता है।तूने कहा था कि ये सब अफवाहें हैं ?” डरते हुए एक पतली सी लड़की ने कहा जिसके शरीर पर हड्डियों के ऊपर माँस की एक महीन पर्त थी और हड़्डियों की चौड़ाई भी  बहुत कम थी जिससे वह और भी पतली लग रही थी।  उसका नाम स्नेहा था। उसने एंकल तक लंबी स्लीवलेस मिडी पहन रखी थी जो काले रंग की थी। पैर में काले हाई हील बूट थे। ऐसी वेशभूषा में वह और भी पतली लगा रही थी।

“ स्नेहा वो मजाक कर रही है। भूत वूत कुछ नहीं होता। ‘प्यार किये जा’ फिल्म में जैसे महमूद, ओम प्रकाश को डरावनी कहानी सुनाकर डरा रहे थे वैसे ही सुष्मिता तुझे डरा रही है। है न सुष्मिता।“ आँखें मटकाकर गालों पर डिम्पल वाली पहली लड़की ने कहा जिसने घुटनों तक टाइट स्कर्ट के साथ ढीला टॉप पहना था। इसका नाम प्रेमा है इसके कान में दो कॉर्डलेस इयरफोन घुसे थे वह झूम रही थी मतलब वह इस समय भी कोई गीत धीमी आवाज में सुन रही थी। इसे फिल्मों व गानों का शौक हद से ज्यादा है, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में रिलीज हुई शायद ही कोई मूवी हो जो इसने न देखी हो।

“हाँ यार मजाक कर रही हूँ। कम ऑन भूत बस कहानियों में होते हैं। जैसे कोमल की कहानियों में। “ सुष्मिता ने स्नेहा के कंधे पकड़कर कहा। 

फिर ये चारों हवेली के कम से कम पंद्रह फुट ऊंचे काले आबनूस की लकड़ी से बने सुंदर नक्काशीदार द्वार के सामने स्थित सीढ़िया चढ़ने लगीं। बेल बजाते ही एक पचास पच्पन के आदमी ने गेट खोला जो शरीर से स्वस्थ लग रहा था उसके मसल्स किसी को भी सलमान की याद दिलाते पर वह देखने में नौकर टाइप था न कि हीरो टाइप।

“साधू कुछ खाने पीने का इन्तजाम है या नहीं ?” सुष्मिता ने उसे देखते ही पूछा। वो चारों छः घंटे की यात्रा में फलों से ही गुजारा कर रहीं थीं क्योकि सुष्मिता शुद्ध शाकाहारी है और बाहर का खाना तो बिल्कुल भी नहीं खाती जब तक कि वह किसी फाइव स्टार होटल में न गई हो। उसकी सहेलियों ने मार्ग में ढाबा देखा तो खाना खाने की इच्छा जताई पर सुष्मिता ने सबको मना कर दिया, यह कहकर कि खाना गंदगी में बनाया गया होगा , इसे खाकर वो लोग बीमार पड़ सकते हैं। सुष्मिता फिटनेस और हाईजीन को लेकर पागलपन की हद तक पागल है । 

“हाँ मैंम आपके आने के पूर्व ही एक गांव की महिला को खाना बनाने के काम पर रख लिया है उसका नाम गौरी है। बहुत स्वाद खाना बनाती है। आप लोग प्लेट भी चाट जाएंगे। “ साधू सुष्मिता से घुला मिला था क्योंकि वो शहर में उसके घर की देखभाल करता था और स्पेशियली सुष्मिता के गाँव आने के कुछ दिन पूर्व वह यहाँ सारी व्यवस्था देखने आया है। उसने सुष्मिता बच्ची से बड़े होते देखा है वो जानता है कि उसे क्या पसंद है और क्या नापसंद है । 

“हा हा। कमऑन मैं कभी अपनी उंगलियाँ नहीं चाट सकती यक्क्क, पर हाँ मेरी फ्रैन्ड जरूर ऐसा करती हैं। “ सुष्मिता ने स्नेहा की ओर देखा। 

“उंगलियाँ चाटने में क्या बुरी बात है ?” स्नेहा ने कंधे उचकाये। 

“कुछ भी नहीं मेरी लाडो। बल्कि ये तो अच्छी बात है। “ प्रेमा ने कहा। 

“हाँ बिल्कुल क्या तुमने वह कहानी नहीं सुनी जिसमें दौपदी के घर भगवान कृष्ण ने भी बर्तन में लगा चावल का दाना चाट कर अपना और सभी साधुओं का पेट भर दिया था। अन्न का एक-एक दाना कीमती है। “ स्नेहा ने दार्शनिक बनते हुए कहा। बाकियों ने ऊपर नीचे सिर हिलाकर सहमति दिखाई फिर एक दूसरे को आँख मारकर खिलखिलाईं। 

“जय श्री कृष्ण।“ सबने एक साथ कहा और उसके सामने शीष नवाया। 

चाहे वे कितनी ही मार्डन क्यों न हों पर देवी देवताओं के जिक्र पर कोई संदेह या टिप्पणी नहीं करतीं। साधु को सुष्मिता ने कार की चाबी थमा दी। वो लोग अंदर गईं तो साधु बाहर कार से उनका सामान निकालने लगा।

किसी पुरानी हिन्दी फिल्म की भुतिया हवेली की तरह यह दो मंजिला एक छत वाली हवेली थी जिसमें दो कमरे, एक किचन, और एक बड़ा हॉलनुमा ड्राइंग रूम नीचे बने थे और तीन कमरे ऊपर बने थे। किचन भी इतना बड़ा था कि पूरी बारात का खाना वहाँ पकाया जा सकता था। हवेली में कई एन्टीक पीसेस थे। बहुत से फर्नीचर व सजावट के सामान थे जिनके विषय में सुष्मिता का मानना था कि वह उनका प्रयोग नई हवेली में करेगी। एक दीवार पर हवेली के पुराने मालिक राजा लक्ष्मी चरण की विशाल फोटो थी जो अपनी ऊपर की ओर उठी हुई मूँछो और गोल तोंद के साथ एक सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे थे और उनकी लाल पगड़ी देखते ही बनती थी। यह पोट्रेट किसी आर्टिस्ट द्वारा हाथ से पेंट किया गया था। इसके चारो ओर सुनहरा फ्रेम था। (1107)


कंजूस साहूकार

“साधू इनके विषय में कुछ पता चला ?” सुष्मिता ने दीवार पर टंगी पेंटिंग की ओर इशारा करके पूछा। 

“हाँ मैंम ये साहूकार लक्ष्मीचरण है ।  गाँव वालों का कहना है कि लक्ष्मीचरण बहुत कंजूस मक्खीचूस थे। धन खर्च करने में उनकी जान निकलती थी। उनके महल की देखभाल के लिए वे सस्ते से सस्ते नौकर रखा करते। फटे कपड़े व जूते तबतक रिपेयर करके पहनते जब तक पहन सकते। बाजार से सस्ती से सस्ती सब्जियां खरीदते और सस्ते से सस्ता सामान मंगाते। वो इस गाँव के साहूकार थे पर उन्हें राजा कहलाने का शौक था। अतः गाँव वाले उन्हें मक्खन मारने के लिए राजा साहब ही बुलाते थे। उनकी पत्नी ने दो बच्चों को जन्म दिया वो भी जुड़वाँ इस प्रकार उसने भी राजा जी के पैसे बचाये एक ही के खर्च पर दो बच्चे अस्पताल से लेकर आईँ  अजय और विजय। “

यह सुनकर चारों सहेलियाँ खिलखिला पड़ीं। साधू ने आगे कहानी बढ़ाई “कहते हैं राजाजी सरकारी अस्पताल में ही अपनी पत्नी का इलाज करवाने ले गये थे और कभी बीमार पड़ते तो सरकारी अस्पताल ही जाते थे। वो कहते थे कि प्राइवेट डॉक्टर्स तो पैसे वसूलने के लिए ऊट पटाँग बिमारियाँ बताते हैं। उनकी आदत से परेशान होकर बच्चे पढ़ने के लिए शहर चले गये, क्योंकि गाँव में तब आठवीं कक्षा तक ही स्कूल था, अतः ये एक अच्छा बहाना साबित हुआ। फिर बच्चों से मिलने के बहाने उनकी पत्नी भी शहर मे ही अधिक समय बिताया करतीं। धीरे-धीरे बच्चों की पढ़ाई के बहाने उनकी पत्नी शहर में ही रुक गईं, पर राजासाहब का मन शहर में न रमा वो कुछ दिन शहर में बिताते फिर गाँव लौट आते और उनके परिवार के लिए ये राहत की बात थी ।  जिस समय ये पोस्टर बनवाया गया था उस समय कैमरा का आविष्कार हो चुका था, पर राजा साहब को प्राचीन राजाओं की तरह अपना हैंडमेड पोट्रेट चाहिए था।  इसलिए उन्होंने एक आर्टिस्ट से पोट्रेट बनवाया। कहते है वह आर्टिस्ट उनपर पूरे पैसे न देने के इल्जाम लगाता रहा था। उसके अनुसार जितने कहे गये उतने पैसे नहीं दिये गये। वह गाँव भर में घूम-घूम कर राजा को कोसा करता। “

“बिल्कुल ‘दिल’ फिल्म के अनुपम खेर की तरह ………… राजा साहब भी बड़े मक्खी चूस टाइप रहे होंगे। मुझे तो वो सीन याद आ गया जिसमें अनुपम खेर चाय में गिरी मक्खी चूसकर फेंक देते हैं और चाय गटक जाते हैं।  खैर फिर क्या हुआ ?” प्रेमा ने पूछा। 

“अरे ये तो कुछ भी नहीं……  आगे सुनिए.... वह पोट्रेट बनाने वाला जादू टोना भी जानता था उसने अपने पोट्रेट की एक नकल बनाई जिसमें उसने राजा की जगह अपना चेहरा लगा दिया और इस प्रकार उसने राजा से अपनी आत्मा बदल ली और स्वयं महल में राजा बनकर रहने लगा। और राजा को जब होश आया तो वह उसकी झोपड़ी में था।  “

“ओह इनट्रेस्टिंग स्टोरी।“ स्नेहा ने अपनी प्वाइंटिंग फिंगर चाटने के बाद, मिडिल फिंगर चाटते  हुए कहा। अबतक रसोई में काम करने के लिए रखी गई महिला गौरी ने टेबल सजा दी थी और उन लोगों ने खाना भी शुरू कर दिया था। “फिर क्या हूआ ? राजा ने उसके पैसे दिये ?” स्नेहा ने अगली उँगली मुँह की ओर बढ़ाते हुए पूछा ।

“कौन सा राजा पैसे देगा ? बेचारा असली राजा तो खुद झोपड़ी में रह रहा था उसके पास पैसे बचे ही कहाँ जो देगा? “ कोमल ने सोचते हुए कहा।

“हुम्म अब तो राजा खुद फकीर था पैसे कहाँ से देगा? ठीक वैसे -जैसे ‘राजा और रंक’ मूवी में राजकुमार की जगह उसका हमशक्ल गरीब लड़का महल में आ जाता है और गरीब लड़के की झोपड़ी में राजकुमार पहुँच जाता है? आगे क्या हुआ ?” प्रेमा ने फिर पूछा।

“मैंम गाँव वालों का कहना है निराशा में पेंटर बने राजा ने आत्म हत्या कर ली क्योंकि उसके बाद वह गाँव में नहीं दिखा और कुछ दिनों बाद राजा बने पेंटर की भी हार्ट अटैक से मौत हो गई। गांव वालों का मानना है कि पेंटर को शरीर में जो राजा की आत्मा थी उसी ने राजा बनकर रह रहे पेंटर को इतना डरा दिया कि वह हार्ट अटैक से मर गया। राजा की आत्मा ने पेंटर से बदला ले लिया।  राजा के पत्नी और बेटे जो पहले ही राजा की कंजूसी से परेशान होकर शहर में रहने लगे थे, उसका अंतिम संस्कार करके वापस शहर चले गये। फिर वो लोग कभी नहीं लौटे और यहाँ का जमीन जायदाद बेचकर शहर में ही बस गये। रही यह हवेली जो बिक ही नहीं रही थी , आखिर हमारे बड़े साहब ने इसे भी खरीद लिया। तब से यहाँ भूतों की कथा है , कोई कहता है कि यहाँ राजा का भूत है तो कोई कहता है पेंटर का भूत है। “ 

रात घिर आई थी वे सभी अपने-अपने कमरे में सोने चले गये। प्रेमा , स्नेहा और कोमल  ने ऊपर के कमरों में कब्जा किया और सुष्मिता ने नीचे के कमरे में रुकना पसंद किया। साधू किचन के बगल वाले कमरे में था। किचन के साथ-साथ हर कमरे में इन्टरकॉम कनेक्शन था।

 स्नेहा रात में ब्रश करने अपने वॉशरूम में गई वॉशरूम में हल्की रोशनी का बल्ब था। स्नेहा बेसिन के ऊपर लगे आईने में देखते हुए ब्रश करने लगी। फिर वह कुल्ला करने नल पर झुकी पर ……. आईने में उसकी आकृति अभी भी ब्रश कर रही थी। वह ऊपर उठी और तौलिए से मुँह पोछा फिर आईने पर नजर डाली और अपनी बत्तीसी दिखाई, आइने पर उसके दाँत चमक रहे थे “परफेक्ट”। उसने मुँह बंद कर लिया पर आईने की स्नेहा अभी भी बत्तीसी काढ़े थी, यह देखकर स्नेहा चौंकी, उसने सिर झटका और फिर आइना देखा अब उसकी परछाईं नॉर्मल दिख रही थी। 0

“स्नेहा तू बस कल्पना कर रही है भूत वूत कुछ नहीं होता। “ उसने आईने में पुनः देखा उसका प्रतिबिंब सामान्य था। उसने चैन की साँस छोड़ी और वॉशरूम से बाहर जाने लगी। अभी दरवाजे की नॉब पकड़ी ही थी कि अचानक बेसिन के टैप से पानी टपकने की आवाज आई।

“ शायद नल ठीक से बंद नहीं किया होगा टीवी पर रोज ऐड दिखाते हैं,  पानी की एक-एक बूँद उपयोगी है, जल ही जीवन है। स्नेहा डर मत, नल बंद कर दे वरना हमारी आने वाली पीढ़ी जिन लोगों को जल की बर्बादी के लिए कोस रही होगी उसमें तू भी शामिल हो जाएगी। “

 स्नेहा ने धीरे से बढ़कर बेसिन का टैप बंद किया पर जैसे ही वह दोबारा दरवाजे तक पहुँची फिर नल टपकने की आवाज आई। स्नेहा ने फिर नल बंद किया और अचानक आईने पर उसकी नजर गई जहाँ उसका प्रतिबिंब उसे देखकर डरावने तरीके से मुस्कुरा  रहा था। वह चीखकर भागी, अभी दरवाजे तक पहुँची ही थी कि अचानक नल तेजी से पूरा खुल गया। स्नेहा चीखते हुए अपने बिस्तर की ओर भागी और कंबल ओढ़कर लेट गई। 

“भाड़ में जायें जल ही जीवन है का नारा लगाने वाले,  अरे अपने वंशजों की गालियाँ सुनने के लिए मैं कौन सा जीवित रहने वाली हूँ , हुँह। बहने दो नल।“ बड़बड़ाते हुए वो कंबल सिर से ओढ़कर छिप रही, जैसे कंबल उसे  भूत से  बचा लेगा। साथ ही वह हनुमान चालीसा का जाप भी करने लगी । तो भूत ने उनके आगमन के पहले दिन ही उन्हें अपनी मौजूदगी का अहसास करा दिया । पर यह भूत था किसका ? लक्ष्मीचरण का या पेंटर का ?  (1200)


मैडम भागमती देवी 

सुबह सुबह वो चारों बालाएं गाँव की सैर को गईं। गाँव का हर व्यक्ति उन्हें आँखें फाड़कर देख रहा था, क्योंकि जिन वस्त्रों का निर्माण आदिमानवों ने तन ढकने के लिए किया था, उन वस्त्रों का प्रयोग कर ये बालाएं अपने अंग प्रत्यंग का प्रदर्शन कर रहीं थी । हर कोई उनपर अपनी आँख सेंक रहा था और अपनी आँखों की रोशनी बढ़ा रहा था । गाँव के बूढ़े बाबा हों या छोटे बालक सभी बहुत उत्साहित लग रहे थे । बालाएँ भी किसी फिल्म स्टार्स की भांति कभी बच्चों तो कभी बुजुर्गों की ओर देखकर हाथ हिला रहीं थीं ।

“बाबा हम उस हवेली का रिनोवेशन कर रहे हैं जिसके लिए गाँव से कुछ मजदूरों की आवश्यकता है । क्या आप बता सकते हैं कि गाँव में कितने लोग मकान बनाने व नक्काशी आदि के कामों में एक्सपर्ट हैं ? हम उन्हें अच्छी पगार देंगे । “ सुष्मिता ने पीपल के नीचे बने कच्चे चबूतरे पर बैठे बुजुर्ग से पूछा जो देखने में उसे समझदार लग रहा था ।

मूँछों के ताव देकर पहले तो उसने भरपूर नजर सभी बालाओं पर डाली फिर बोला –“देखो मैडम जी ई गांव मां तो कौनो की माइया ने इत्तो दूध न पिलायो कि ऊ हवेली पर जावे की गलती कर सके । वहाँ तौ भूत रहत हैं । हमार मानौ तौ तुमहूँ जितनी जल्दी हो निकल लेवौ। ऊँहाँ तीन दिन से ज्यादा कोनो नाहि रुका आज तक। “

“अरे काका ये गाँव की नहीं शहर की पढ़ी लिखी छोरियाँ हैं ये भूत प्रेत नहीं मानतीं । है न मैडम ।“ एक जवान छोरे ने लार टपकाते हुए कहा ।

“बिल्कुल । भूत वूत कुछ नहीं होते । तो तुम हवेली पर काम करने आ सकते हो ।“ सुष्मिता ने उसी से पूछा ।

“मैडम हमका तो मजूरी का काम आवत नाहीं हम तो ठहरे खेतिहर मजदूर , पर हीरा और ऊकर बेटवा बहुत तेज मकान खड़ा कर देवे हैं । आप उनसे बात करि लेवो । “ अचानक उसकी भाषा ही बदल गई ।

वो लोग हीरा का पता पूछते हुए उसके घर पहुँचे तो पता चला वहाँ बहुत भीड़ लगी थी ।

“यहाँ क्या हो रहा है ?” स्नेहा ने पूछा ।

“अरे ऊ हीरा है न, ऊ आपन बिटिया का स्कूल नाहीं भेजत रहा, कहत है आठवीं पढ़ लीहिस बहुत है। अब खाना पकाना सीखे, आखिर ब्याह के बाद रोटियाँ ही तो सेंकनी हैं, कौन सा टीचर बनना है ? ईहै खातिर भागमती मैडम ऊसे बात करै आईँ रहीं पर साला पीछे के दरवज्जा से खिसक लिहिस। “ बाकी लोग उसकी बात पर हंसने लगे।

“भागमती मैडम कौन हैं ?”

“गांव के इंटर स्कूल की बड़ी वाली पिरिन्सिपल हैं। गांव में ई इंटर स्कूल और ऊ लरिकियन वाला स्नातक स्कूल दोनों इन्ही के प्रयासों के कारन बन सके हैं, वरना पहिले तो ईहाँ आठवीं तक ही स्कूल हुआ करत रहिन । “ एक अन्य पान चबाते हुए बुजु्र्ग ने पीक एक तरफ थूकते हुए कहा ।

बहुत से लोगों ने उस बूढ़े की हाँ में हाँ मिलाई ।

“ओह ये भागमती देवी को देखकर तो साउस इंडियन फिल्म “मैडम गीता रानी” की प्रिसंपल बनी जयोतिका की याद आ गई । जैसे ज्योतिका स्कूल के अनुशासन व बच्चों की पढ़ाई को लेकर कितनी सख्त थी वैसे ही भागमती मैडम भी बहुत सख्त जान पड़ती हैं ।“ प्रेमा ने कहा ।

तभी एक पाचास पच्पन वर्ष की महिला को निकलने के लिए जगह देने के लिए भीड़ दो भागों में बँट गई और एक अत्यंत प्रभावशाली महिला जिसने सूती सफेद छींटदार साड़ी बहुत ही सुगढ़ता से पहन रखी थी नजर आईँ । उन चारों पर नजर पड़ी तो वो उन्ही की ओर आईं ।

“आप लोग शहर से आईँ हैं न? और उसी हवेली में रुकी हैं जहाँ भूत की अफवाह है । “ भागमती मैडम ने उनसे पूछा ।

वो चारों मानो कुछ देर के लिए अचंभित सी उन्हें देखती रहीं फिर सुष्मिता ने कहा –“जी... मेरे पिता का कन्स्ट्रक्शन का कारोबार है, हम पुरानी हवेली व मकान को फिर से नया बनाकर बेचते हैं । इसी सिलसिले में वो हवेली खरीदी है ।“

“तब तो आप लोग काफी पढ़ी लिखी होंगी ?”

“जी…… पर……. आपसे ज्यादा नहीं ।“ सुष्मिता ने सकुचाकर कहा जो उनके व्यक्तित्व व उनके कारनामों से काफी प्रभावित हुई थी।

“कम से कम वो कहावत तो पढ़ी ही होगी “जैसा देश वैसा भेष” । देखिए आप बालिग हैं और अपनी पसंद के कपड़े पहन सकती हैं, पर ये वेशभूषा जो आपने धारण की है, शहर के लिए सही है , यह गाँव हैं । बात सिर्फ मानसिकता की नहीं है, यहाँ इतनी चिलचिलाती धूप में आप यदि ऐसे कपड़े पहन कर बाहर निकलेंगी तो आपकी त्वचा भी काली पड़ जाएगी । यहाँ ऐसे कपड़े पहनिये कि आपके शरीर की कम से कम त्वचा पर सीधी धूप पड़े । यह आपके सौंदर्य के लिहाज से भी अच्छा रहेगा और गाँव के परिवेश के अनुसार भी अच्छा रहेगा । आशा है आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगी। “

“अन्यथा व्हाट?” स्नेहा को अंतिम लाइन का मतलब समझ में नहीं आया । 

“मतलब आशा है आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगी और इसे किसी गलत अर्थ से नहीं देखेंगीं।” भागमती ने हाथ जोड़कर अपनी बात स्पष्ट की ।

“जी मैडम हम समझ गये । “ चारों ने ऐसे कहा जैसे स्कूल की छात्राएं हों । बदले में भागमती ने मोहक मुस्कान दी। उन्होंने ने भी भागमती को प्रणाम किया । 

फिर भागमती मैडम ने पलटकर वापस उस झोपड़ी के बाहर खड़ी महिला से कहा जो हीरा की पत्नी थी –“ रूपा अपनी बेटी को कल से स्कूल भेज देना । फीस की चिंता मत करना, मेरा है ही कौन कि उसके लिए पैसे जमा करूँगी ? अगर इसका पिता पैसे नहीं देता तो मैं फीस भर दूँगी, पर तेरी बेटी बहुत होशियार है, इसकी पढ़ाई मत रोकना । अगर हीरा फिर भी न माने तो मुझे बताना मैं पुलिस में शिकायत कर दूँगी । लड़की पढ़लिख गई तो सरकारी नौकरी लग सकती है, तेरे तो दिन फिर जाएंगे । अगर वो नौकरी न करके घर भी संभालेगी तो वो भी कुशलता से संभाल सकेगी , अपने बच्चों को पढ़ा सकेगी और उनकी नींव मजबूत कर सकेगी । पढ़ाई से उसका सर्वागींण विकास होगा । चाहे घर हो या बाहर वह अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीख जाएगी । यही तो इन मर्दों को खलता है कि औरत अपने अधिकार जान ले । “

“जी मैडम मैं समझ गई । कल से दिया जरूर स्कूल जावेगी । चाहे मुझे इसके बापू को जेल की हवा क्यों न खिलानी पड़े पर मैं अपनी बेटी की पढ़ाई न रुकने दूँगी । “ पल्लू कमर में खोंसते हुए उस महिला ने कहा मानों जंग के लिेए तैयार हो रही हो ।

उस महिला के पीछे दुबकी हुई एक किशोरी प्रकट हुई जिसके चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी । उससे भी विदा लेकर भागमती मैडम चली गईं ।

“भागमती मैडम ने तो मानों कसम खाई है कि गाँव की लड़कियों को पढ़ा लिखा के रहेंगी । मजाल है कि कोई अपनी बेटी को स्कूल भेजने से मना कर दे । हीरा ने जैसे ही सुना कि भागमती मैडम आ रहीं है, पीछे के दरवाजे से भाग खड़ा हुआ । बीबी और बेटी का तो मुँह बंद करा दिया पर मैडम से बहस लड़ाए तो जानें हिम्मत नहीं बच्चू में । “ भीड़ मे एक व्यक्ति ने कहा ।

“वाह भागमती मैडम तो बहुत ही नेक काम कर रहीं हैं । पर इन्होंने ये क्यों कहा कि इनका कोई नहीं है? “ सुष्मिता अभी भी उनके प्रभाव में थी ।

“इनका पति कई साल पहले इन्हें छोड़कर भाग गया था , इनके कोई संतान भी नहीं है । कहते हैं पति के जाने के बाद ये आत्महत्या करने के लिए नदी में कूद गईं थीं पर किसी ने इन्हें बचा लिया । तब से इन्होंने अपने नये जीवन की शुरुआत की और अपनी पढ़ाई पूरी की और गाँव की लड़कियों को शिक्षा दिलाना ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया । गाँव में स्कूल खोलने के लिए शहर के कलेक्टर के ऑफिस के रोज चक्कर लगाए । आखिर यहां लड़के और लड़कियों का इंटर कॉलेज और अब ये लड़कियों का डिग्री कॉलेज दोनों इन्हीं के प्रयासों का नतीजा है । गाँववाले इनकी बहुत इज्जत करते हैं और डरते भी हैं कि कहीं मैडम कलेक्टर साहब से हमारी शिकायत न कर दें। “ एक समझदार लग रहे युवा व्यक्ति ने कहा ।

“वाह .. ऐसी महिलाओं की देश को बहुत जरूरत है। सभी ऐसा सोचें तो कितना अच्छा हो । “ कोमल ने कहा तो सबने हाँ में हाँ मिलाई । 

“सही कहा, जहाँ शहरों में बड़े-बड़े फिल्म ऐक्टर हैं जो एक फिल्म के करोड़ों रुपये उठाते हैं, पर जरा सी निराशा से जाने क्यों जिन्दगी से हारकर आत्महत्या कर लेते हैं? वहीं गाँवों में लोग जिन्दगी की परेशानियों से निराश होने की जगह इस प्रकार नये जीवन की शुरुआत करते हैं और दूसरों के लिये प्रेरणा स्त्रोत बन जाते हैं।” प्रेमा ने कहा । 

इसके बाद उम्मीद है कि ये बलाएं जैसा देश वैसा भेष पर अमल करेंगी । 

“हाँ भाई हाँ करेंगे ।” 

(1300)


भूत भगाना सो सिंपल

रात तक वो लोग भागमती मैडम के बारे में ही बातें करते रहे हीरा से मुलाकात न हो सकी पर भागमती मैडम से मुलाकात ने उन्हें सबकुछ भुला दिया था। आखिर वो सभी थककर सोने गये। 

 कोमल ने ब्रश करने के बाद बिना आईने पर नजर डाले तौलिये से मुँह पोछा और वाशरूम से बाहर जाने लगी । अगर आईना देखती तो जानती की आईने में उसका प्रतिबिंब उसे देखकर कुटिलता से मुस्कुरा रहा था। जैसे ही बॉशरूम का दरवाजा खोलने के लिए नॉब घुमाया नल टपकने की आवाज आई ।

“जल ही जीवन है ।“ कहकर वो भी पलटी और नल के पास गई । उसने नल और बेसिन को ठीक से चेक किया वह एक प्लम्बर की बेटी है । वह अपने पिता के साथ प्लंबिंग का काम बचपन से सीख रही थी और प्लंबिंग की समस्या उसे बिल्कुल सहन नहीं होती थी । वो तो ह़ॉस्टल , हॉस्पिटल या होटल जहाँ भी ठहरी , अगर उसे वॉशरूम के नल में खराबी दिखी तो स्वयं अपने प्लम्बिंग टूल लेकर उसे ठीक करने जुट गई । वो तुरंत अपनी अटैची से टूल्स ले आई और बेसिन का नल को नीचे से बंद किया फिर टैप को फ्लास्क की सहायता से मोड़ मोड़ कर बाहर निकाला जिसमें बहुत मुश्किल हुई क्योंकि नल बहुत पुराना व जंग लगा होगा । इसकी भीतरी दीवारो पर जंग के कारण मानो कुछ फँस गया था जिससे नल को खोलने मे समय लगा पर आखिर उसने नल को फिर से टाइट कर दिया और तब सोने गई । उसे अहसास भी नहीं था नल के भीतर स्थित भूत की गरदन भी नल के मोड़ के साथ कई बार मुड़ गई थी । नल में जंग नहीं भूत फँसा था जो बार-बार नल को खोल रहा था ।

यह भूत अपनी इस ट्रिक से जाने कितने लोगों को हवेली से भगा चुका था । पर आज उसे अपनी गर्दन सेंकनी पड़ रही है । वह अपनी गर्दन को मोड़कर सीधा करता है, जो चार पाँच बार मुड़कर किसी छल्ले की तरह लग रही थी । और फिर उसने गर्म पानी की बोतल से गर्दन सेंकी । फिलहाल के लिए उसने बाकी दो लड़कियों को डराने का अपना प्लान पोस्टपोन कर दिया । अभी पिछली रात ही वह स्नेहा को डराकर कितना खुश हुआ था हँसते-हँसते उसके पेट में बल पड़ गये थे और अब गर्दन में बल पड़ गए हैं । किचन में टहलते हुए वह बड़बड़ाया ।

“ कम्बख्त लड़की बहुत ताकतवर थी । कोई इतनी बेदर्दी से नल को पाइप पर कसता है भला । इससे पहले इतने बद्तमीज लोग इस हवेली में कभी नहीं आये । हाय .... आज के लिए इतना ही काफी है बाकियों से कल निपटूँगा । तीन दिन में इन्हें हवेली के बाहर का रास्ता न दिखा दिया तो मैं भी भूत नहीं । पिछले बत्तीस सालों से मैंने किसी को यहाँ नहीं टिकने दिया अभी भी यहाँ सिर्फ मैं ही राज करूँगा। हाय ………………….“ भूत गर्दन सेंकते हुए बोला और गायब हो गया।

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“मुझे पता था तुम सब मुझ पर हँसोगी । पर मै सच कह रही हूँ मैनें भूत देखा है । “ आखिर स्नेहा ने अपनी सहेलियों को पहली रात  का अपना अनुभव बताया। पिछली रात तो भूत के डर से वो वॉशरूम में ब्रश करने ही नहीं गई। 

“और वह भूत दिखता कैसा था?” प्रेमा ने उसे छेड़ा ।

“बिल्कुल स्नेहा जैसा । हाँ भई भूत ऐसे ही होते हैं कंकाल से बने हुए । “ सुष्मिता ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर भूत बनने की ऐक्टिंग की ।

“शटअप... इसे जीरो फिगर कहते हैं । “ स्नेहा ।

“लेकिन यार तेरा तो माइनस में है । माइनस टेन फिगर ।“ कोमल भी डायनिंग टेबल से लगी एक कुर्सी पर बैठते हुए चर्चा में शामिल हो गयी ।

हा – हा – हा

“तुम सब मुझसे जलते हो कम से कम तुम लोगों की तरह मुझे जिम में घंटो कसरत तो नहीं करनी पड़ती । “ स्नेहा चिढ् गयी ।

“यार ..... स्नेहा सच कह रही है, कल मुझे भी भूत दिखा था । “ अचानक कोमल ने गंभीर स्वर में कहा ।

“सच कोमल क्या हुआ था इन्हें बता ?“ स्नेहा चहकी ।

“मैने ब्रश किया और जब वॉशरूम से बाहर जाने लगी तो मुझे भी नल टपकने की आवाज आई । और …..” कोमल ने बात अधूरी छोड़कर रहस्य बनाये रखा।

“और?” स्नेहा ने उत्सुकता दिखाई ।

“और मैंने देखा कि नल टपक रहा था , तो मैंने अपने टूल्स उठाये और उसे ठीक कर दिया । भूत तुझसे नाराज था क्योंकि तुझे नल ठीक करना नहीं आता । कोई बात नहीं मैं सिखा दूँगी । “ कोमल हँसने लगी ।

“हुँह मुझे नहीं सीखना । एक दिन तुम सब मेरी बात को मान जाओगे । “ स्नेहा ने नाश्ते की टेबल पर बैठते हुए कहा ।

“अरे यार ये पुरानी हवेली है, यहाँ नल खराब होना आम बात है, इसे इतना ईश्यू मत बना । हमें यहाँ और भी काम है भूतिया कहानियाँ सुनने और सुनाने के अलावा ।“ सुष्मिता ने उसे झाड़ा ।

फिर वो आस-पास के गाँव में गये और उपलब्ध संसाधनों की लिस्ट बनाई जो गांव में मिल सकते थे और जो शहर से मँगाने पड़ेगे ताकि हवेली की मरम्मत की जा सके । गाँव में मजदूर हवेली पर काम करने से कतरा रहे थे , अतः यह तय रहा कि मजदूर भी शहर से ही बुलाने होगें । अपने पिता को सुष्मिता ने गाँव का व हवेली का सारा हाल कह सुनाया और जरूरत के सामान का ईमेल भेज दिया ।

रात होते ही स्नेहा पर फिर भूत का डर चढ़ने लगा । गौरी उसके कमरे में पानी का ग्लास रखने आई तो –“गौरी तुम चाहो तो मेरे कमरे में सो सकती हो यहाँ मेरे साथ । “ स्नेहा ने उसे प्रेम से कहा । वह अपनी सहेलियों से यह कह नहीं पा रही थी कि उसे डर लग रहा था और वह उनके साथ सोना चाहती थी।

“न मेम साहब मैं यहाँ रात में नहीं रुकती । रात बारह बजे के बाद यहां का भूत जग जाता है । मैं तो काम निपटा कर चली जाती हूं अपने घर । वो तो मेरा बच्चा बीमार है दवा के लिेए पैसे चाहिए थे वरना …………………………गाँव के दूसरे लोगों की तरह मुझे भी अपनी जान प्यारी है । “

“अच्छा........... क्या वो भूत किसी की जान भी ले चुका है ?” स्नेहा ने थूक गटका।

“सिवाय उस राजा साहब के यहाँ कोई नहीं मरा , क्योंकि कोई रुका भी तो नहीं, लोग तीन-चार दिनों में ही भाग खड़े हुए।“ ताली मार कर हँसते हुए गौरी ने कहा। 

“तीन या चार  दिन? हमारे पास सिर्फ तीन-चार  दिन हैं जिनमें से दो रातें व दो दिन बीत चुके हैं। उसके बाद हमारा फैसला होगा। “ गौरी के जाने के बाद स्नेहा ने सोचा। फिर उसने किचन की घंटी बजाई जिसे सुनकर कुछ ही समय में साधू आया।  वो तो तीन दिन से ज्यादा समय से यहाँ रह रहा था। अवश्य ही वह कुछ जानता होगा। 

“साधू एक बात पूछूँ किसी से कहोगे तो नहीं ?”

“मैं जानता हूँ मैम आप उस भूत के विषय में पूछना चाहती है। है न ? सुबह आप बता रहीं थीं कि आपने उसे देखा है।”

“ हाँ …. तुम तो यहाँ कई दिनो से हो क्या तुम्हें ऐसा कुछ नहीं दिखा ?”

“मैम एक राज की बात बताता हूँ, कि मैं भी भूत प्रेत से बहुत डरता हूँ, यही कारण है कि जबतक आपलोग नहीं आये,  तबतक मैं गाँव की सराय मे रात बिताता था और अब मजबूरन बहादुरी दिखानी पड़ रही है। सुष्मिता बेबी को मैनें बचपन से पाला है, उनको बहादूर राजाओं की कहानियाँ सुनाता रहा हूँ, अब कैसे कबूल करूं कि मैं खुद एक नम्बर का डरपोक हूँ। पर कल रात तो मुझे कोई भूत नहीं दिखा। कहते हैं भूत अंधेरे में ताकतवर होते हैं , इसलिए रात में  मैं लाइट जलाकर सोया था और मैने आपके आने से पहले ही अपने कमरे व वॉशरूम में हाई लोजन बल्ब लगवा लिया था। “ साधू ने गर्व से कहा । 

“क्या, एक और हाईलोजन बल्ब है ? “ स्नेहा ने बल्ब की तरह चमक कर कहा। 

“हाँ है न, दो और हैं , मैं अभी आपके रूम व वॉशरूम में लगा देता हूँ। “ कहकर साधू चला गया। 

“हाँ यह अच्छा आइडिया है, भूत तो अंधेरे या कम रोशनी में ही आते हैं, सभी फिल्मो मे ऐसा ही होता है। फिर भूतो से निपटने के लिए लोग हाईलोजन आई मीन हाई पावर वाले बल्ब क्यों नहीं प्रयोग करते। सिम्पल ...........” स्नेहा ने सिर झटक कर कहा। 

"पर कई फिल्मों में भूत ने बल्ब फोड़ दिए और कैंडल्स बुझा दी थी । अगर ……." स्नेहा के मन से एक आवाज आई । 


"कम ऑन थिंक पॉजिटिव ।" स्नेहा ने मन को समझाया । 


कुछ देर में साधू ने आकर उसके कमरे में और वॉशरूम में बल्ब लगा दिया। 


स्नेहा चैन से सो गई। पर उसे रात भर लाइट जलाकर सोने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि आज भूत ने दो अन्य शिकारों को टारगेट करने की सोची थी। सुष्मिता और प्रेमा। 

सुष्मिता ने ब्रश करने के लिए नल खोला पर उसमें से पानी ही नहीं निकला - “लो किसी का नल टपक रहा है तो किसी का खुल ही नहीं रहा। “ उसने वाक्य पूरा किया कि अचानक से नल चल पड़ा। 

सुष्मिता ने ब्रश किया और फिर कुल्ला करने लगी। हवेली का भूत आईने में उसके प्रतिबिंब पर था जो अभी भी ब्रश कर रहा था पर सुष्मिता ने उस ओर देखा ही नहीं। सुष्मिता ने सिर उठाया और आईने के सामने अपने दाँतों वाली स्माइल चेक की “ये पर्फेक्ट है।“ सुष्मिता ने अपना मुँह बंद कर लिया था पर आईने पर उसके प्रतिबिंब ने अभी भी अपने दाँत निकाले हुए थे। सुष्मिता ने मानों ध्यान ही नहीं दिया उसने यह देखकर भी अनदेखा कर दिया और मुड़कर चली गई।

 जब वह दरवाजे की ओर गई तो आईने से निकलकर उसकी परछाईं ने झांका और कंधे उचकाये। परछाई एक पारदर्शी भूत में बदल गई जिसके पैर की जगह किसी जिन्न की तरह धुएं की एक लकीर थी। इस बार उसने नल वाली ट्रिक दोबारा नहीं आजमाई उसका पिछला एक्सपीरिएंस बहुत खराब रहा था। भूत सुष्मिता के जाने के बाद स्वयं से बड़बड़ाया “अजीब है आईने में मुझे देखकर भी नहीं देखा। स्टुपिड वुमन इससे तो गाँव की इल्लिटरेट वुमन अच्छी हैं। शहरी गँवार छोरी। हुंह .... अंधी कहीं की ।“  भूत ने मुँह बिचकाया। 

(1600)


थ्री डी आईना 

भूत ने सोचा आज वो किसी और को डरायेगा उसके पास कई ऑप्शन्श थे । इससे पहले इतने लोग एकसाथ इस हवेली मेें कभी नहीं रुके । भूत तैरता हुआ प्रेमा के आईने के पीछे वाली दीवार से पार होकर आईने पर बने उसके प्रतिबिंब पर चिपक गया। प्रेमा ने कान में इयर फोन ठूँस रखा था और तेज आवाज में गाना सुन रही थी, इतनी तेज कि गाने की आवाज बाहर तक सुनाई दे रही थी। यह कोई भड़काऊ इंग्लिश सॉंग था। प्रेमा ने आईने पर देखकर ब्रश किया और झुकी, कुल्ला करके ऊपर आई और आईने में अपना प्रतिबिंब देखा उसने भी अपनी सहेलियों की तरह आईने पर दाँत काढ़े। और गाने की धुन पर ठुमकते हुए बोली –“वाऊ क्या चमक है। एकदम परफेक्ट।“ उसने मुँह आगे करके पाऊट बनाया और आईने को फ्लाइंग किस दी। आईने में उसके प्रतिबिंब ने भी पाऊट बनाया , उसी की तरह गरदन आगे की , और आईने से थोड़ा बाहर आकर फ्लाईँग किस किया। 

“ओह वाऊ ये तो एक 3D आईना है। क्या बात है। ये तो बहुत ही कमाल की जगह है लोग फालतू में इतनी कमाल की जगह की बुराई करते हैं। “ प्रेमा ने जाते हुए एक बार फिर आईने की ओर देखकर फ्लाइंग किस किया तो प्रतिबिंब ने भी बाहर निकल कर उसे फ्लाइँग किस किया। “ओह हाऊ ब्यूटिफुल। “ प्रेमा ने फिर पाऊट बनाया आइने ने नकल की और इसबार उसने स्वयं को आईने पर चूम लिया। उसका प्रतिबंब चौंका और उसे आश्चर्य से देखने लगा।  आईने में अपने प्रतिबिंब को आश्चर्य से घूरता छोड़कर प्रेमा उसकी तरफ हाथ हिलाती हुई चली गई। आईने में उसका प्रतिबिंब जो आईने से आधा बाहर निकला उसकी ओर देखकर अभी भी हाथ हिला रहा था दरवाजा बंद होते ही चौंका। फिर तैरता हुआ आईने बाहर आया और एक पारदर्शी जिन्न समान भूत में बदल गया जो गाढ़े बैंगनी रंग का था। 

“हुँह लगता है ये ट्रिक इसपर भी नहीं चली मुझे कुछ और आजमाना चाहिए। हाँ क्यों न वो वाली ट्रिक आजमाये।” कुछ सोचकर वह कुटिलता से मुस्कुराया। और कुछ देर में वह प्रेमा के कमरे मे लगी सिद्धार्थ मेलहोत्रा की फोटो पर था। प्रेमा एक्टर सिद्धार्थ मेल्होत्रा की बहुत बड़ी फैन है। वह रात में सोने से पहले उसे गुडनाइट कहना नहीं भूलती। वह फोटो के सामने खड़ी होकर बात करने लगी।

“हाय सिद्धार्थ। अच्छा अब सोने का समय हो गया है तो मैं तुम्हें गुडनाईट बोलना चाहती हूंँ। गुड नाईट हनी मुँआ।” अचानक सिद्धार्थ मुस्कुराया और अपना सिर उसकी ओर घुमाया। “वाऊ ये… ये घर तो कमाल का है यहाँ तस्वीरों में लोग मूव करते हैं। जैसे हैरी पॉटर फिल्म में तस्वीरों के लोग बातें करते थे। ओह…. तो क्या मैं कोई पासवर्ड बोलूं तो तुम मेरे लिए ग्रिफिन्डॉर का रेस्ट रूम खोल दोगे। एक मिनट।” उसने पास ही रखा पेन उठाया और उसे तस्वीर पर तान दिया। “पम्पकिन पैस्ट्री “ बोलकर उसने पेन तस्वीर की ओर ताना। पेन की नोक भूत की आँख के एकदम पास थी वह चौंका और गायब हो गया। 

“हे भगवान ये कैसी बालाएं हैं , नहीं ये तो बलाएं हैं। मेरा ये इफेक्ट देखकर तो पिछला मकान मालिक बनियान और लुंगी में ही आधी रात को भाग खड़ा हुआ था। उसकी लुंगी बाहर गेट में फँस कर छूट गई तो वह उसे लेने के लिए भी पलट कर नहीं आया बनियान और चढ्ढी में ही भाग खड़ा हुआ और ये कमबख्त छोरियां। “ उसने निराशा से सिर हिलाया फिर अचानक चौंक कर किसी बल्ब की तरह चमक पड़ा। 

“आइडिया यहाँ एक पुरुष भी तो है , वो फट्टू..... जो डर के मारे कभी हवेली में रात के समय नहीं रुका पर अब कहाँ जाएगा ? अब तो उसे यहीं रुकना होगा इन बलाओं की सेवा के लिए। हाँ उसे ही डराता हूँ अगर इसी तरह ये लोग मुझे इग्नोर करते रहे तो मेरी डराने की क्षमता कम हो जाएगी। लोगों का डर ही तो मेरा भोजन है इसी से तो मुझे पोषण मिलता है। एक तो बहुत सालों बाद कोई इस हवेली में आया और मैं अभी भी भूखा का भूखा ही हूँ। अब उस साधू को ही डराता हूँ कुछ तो पेट में जाएगा फिर बाकियों को डराने के नये तरीके खोजूँगा। एक तो रात में ही मौका मिलता है दिन के शोर शराबें व बिजि श्केड्यूल में मैं खुद डरता हूँ बाहर निकलने से। इन्सान अँधेरे से डरते हैं और भूत उजाले से। “

साधू भी इस समय अपने वाशरूम में आईने के सामने ब्रश कर रहा था उसका कमरा ग्राउण्ड फ्लोर पर किचन के बगल में है। यहां हर कमरे में अटैच वाशरुम है। आईने के पीछे की दीवार को पार कर भूत ने उसके प्रतिबिंब का आकार ले लिया। ब्रश कर साधू नीचे झुका, यही समय है जब भूत अपना कमाल दिखाता है, पर जैसे ही साधू नीचे झुका आईने के सामने लगे हाई लोजन बल्ब की रोशनी सीधी आईने पर पड़ी और इतनी चमक से भूत की आँखे ही चौंधिया गईं। अभी तक साधू ने रोशनी रोक रखी थी उसके झुकते ही पूरी रोशनी आइने पर पड़ी। भूत तुरंत पलटकर आईने को छोड़कर बाहर ड्राइँग रूम में आकर अपने बिना उँगलियों वाले धुएं रुपी हाथ से अपनी दोनों आँखें मलने लगा। 

“हद है यार ........ भला वाशरूम में कौन हाई लोजन बल्ब लगाता है। ऐसे तेज रोशनी के बल्ब या तो क्रिकेट स्टेडियम में या फिर शादी समारोहों में प्रयोग होते हैं। हाय़ कम्बख्त मुझे अंधा करके छोडेंगे। कोई आँख में पेन घुसाये दे रहा है तो कोई फ्लैश लाइट मार रहा है ।“ भूत निराशा से सीढीं पर बैठ गया और फिर बीते दिन याद करने लगा।

“वो भी क्या दिन थे जब लोग मुझसे डरते थे पर आज ये लोग तो मुझे देखकर हँसते हैं। वो तो शुक्र है कि भूत समाज का वार्षिक समारोह आने में अभी काफी समय है। किस मुँह से मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ एक से बढ़कर एक डरावने भूत अपनी भुतिया कहानियाँ सुना सुना कर सुर्खियाँ बटोरते हैं? उस ड्रैकुला को ही लो, लोगों में आज भी उसकी दहशत है उसपर तो ब्रैम स्ट्रोकर ने कई उपन्यास लिख डाले और आज भी उसपर नई नई फिल्में बनती रहती हैं। वह तो वहाँ का सबसे प्रसिद्ध बंदा है। कितना अकड़ू भी है, हुँह। 

कुछ साल पहले आया टुम्बाड का हस्तर भी मुझसे ज्यादा प्रसिद्ध है, वो हस्तर वाली बुढिया दादी भी लोगों को मुझसे ज्यादा डरावनी लगती होगी। और तो और OCULUS मूवी ने तो उस कम्बख्त आईने को कितना फेमस कर दिया। कितनी डींगे मारता है कि उसके डर से तो लोग स्वयं आत्म हत्या कर लेते हैं। एक निर्जीव आईना भी मुझसे अधिक प्रतिभा रखता है। बु हू हू ...........लगता है मुझे ओवर टाईम करना चाहिए।

 दिन में ...... नहीं दिनभर तो मुझे अंधेरे गुम्बद में छुपकर रहना पड़ता है, जहाँ वो बुड्ढा जीना हराम किये रहता है। जिन्दा था तब भी हमेशा मुझे कोसता रहता है अब मर के भी मेरी छाती पर मूँग तल रहा है। यही समय है जब मैं उससे दूर अपनी मर्जी से समय बिता सकता हूँ और इन लोगों के कारण मेरी यह स्वतंत्रता भी छिन गई है। ” सोफे पर बैठा वो आँसू बहाने लगा एक चमकीला आँसू उसकी आँखों से टपका और फर्श पर गिरने के स्थान पर हवा में ही गायब हो गया। (1191)


भूत से डील

दिन भर वो हवेली के पुनर्निर्माण के लिए मजदूर ढूँढते रहे , गाँव से सजावट के उपयोगी सामान खरीदते रहे या सुष्मिता के पिताजी से जूम मीटिंग मे व्यस्त रहे ।

उस रात फिर स्नेहा आईने के सामने खड़ी ब्रश कर रही थी तभी उसका प्रतिबिंब दाँत दिखाकर हँसने लगा उसके मुंह पर झाग लगा था । वह उसे अनदेखा कर कुल्ला करने लगी । फिर चेहरा ऊपर किया तो प्रतिबिंब सामान्य था पर कुछ सेकेंड में प्रतिबिंब अचानक उसकी ओर बढ़ने लगा और आईने से बाहर निकलने लगा । 

“तुम्हारे पास कोई और ट्रिक नहीं है क्या ? एक वही घिसा पिटा आईने वाला ट्रिक । थिंक क्रिएटिव ।“ स्नेहा ने आइने से बाहर निकल आये अपने प्रतिबिंब को झाड़ा। 

“अरे क्या क्रियेटिव ? इसी ट्रिक से मैंने कितनों को यहाँ से भगाया है । फिर तुम सब क्यों नही डरते ? “ भूत ने परेशान होकर पूछा।

 “वैसे...... पहले दिन तो मैं डर गई थी पर फिर मैनें पाया कि तुम्हारी ट्रिक कितनी घिसी-पिटी है । तुम्हें अपने डराने की टेक्नीक पर और ध्यान देने की जरूरत है , देखो मैं तुम्हें दिखाती हूँ ।“ कहकर स्नेहा आईने की ओर पीठ करके मुड़ गई और जब पलटी तो उसकी पलकें ऊपर की ओर अजीब तरीके से मुड़ी हुईं थीं उसने पलकों को उल्टा कर दिया था पुतलियाँ लगभग गायब थीं और मुँह कुछ इस तरह टेढ़ा था जैसे लकवा मार गया हो । और तो और वो पलटी भी नहीं थी बस उसने अपनी गरदन पीछे की थी ।

“आ...आ... हे भगवान ये क्या तुम्हारी आँखों को क्या हुआ ? और तुम अपनी गरदन बिना मुड़े पीछे कर सकती हो । क्या तुम कोई चुडैल हो ?“ भूत ने अपना दाँया हाथ मुँह पर रखकर कहा ।

“नहीं मेरा शरीर जिम्नास्टिक प्रैक्टिस के कारण बहुत लचीला है देखो मैं तुम्हें और दिखाती हूँ। “ वह अपनी पलकों को ठीक करते हुए बोली । फिर वहाँ रखे एक कबर्ड में घुसने लगी जो खाली था । वह इतनी सी जगह में तुड़मुड़ कर फिट हो गई । भूत अपनी बिना उँगलियों वाले हाथ से ताली बजाए बिना नहीं रह सका।

“वाह तुम तो प्रतिभाशाली हो। पर तुम्हारे दोस्तों को तुम्हारी प्रतिभा की कद्र नहीं । ” भूत स्नेहा से प्रभावित लग रहा था।

“धन्यवाद । अब मैं समझ गई हूँ कि मैं डर रही हूँ , इसीलिए तुम मुझे डरा पा रहे हो जबकि मेरी सहेलियाँ निडर हैं इसलिए तुम उन्हें नहीं डरा पा रहे। मेरा डर तुम्हारी ताकत है ।“ स्नेहा फुसफुसाई ।

“सही कहा । लोगों का डर ही मेरी ताकत है । पर तुम सब सहेलियाँ तो मुझसे जरा भी नहीं डरतीं। मैं पहली रात तुम्हें डराकर कुछ ताकतवर महसूस कर रहा था पर अब तो मेरा कॉन्फिडेन्स लेवल और भी घट गया है। “

“ओह............आई एम सॉरी , मुझे तुमसे हमदर्दी है । असल में मैं तुम्हारे साथ एक डील करना चाहती हूँ। “ अंतिम लाईन स्नेहा ने कुछ फुसफुसा कर कही ।

“कैसी डील ?” हमशक्ल भूत भी आइने के भीतर से फुसफुसाया । 

“वो .... मेरी फ्रैंड्स हैं न..... वो मुझे बहुत चिढ़ाती हैं, क्योंकि मैं बहुत दुबली पतली हूँ और मुझे अँधेरे से डर लगता है । पर मुझे हॉरर फिल्में देखने का शौक भी है । तो मैं तुम्हें हॉरर फिल्में देखकर ट्रिक्स बताऊँगी जिनका तुम मेरी सहेलियों पर प्रयोग करना और मैं उनके सामने बहादुर बनकर तुम्हें भगाऊँगी । “

“ठीक है मुझे ये डील मंजूर है । कम से कम कुछ खाने को तो मिलेगा वरना ऐसे तो मैं भूखा मर जाऊंगा ।“ भूत ने कहा ।

“क्या बकवास है तुम पहले ही मरे हुए हो । और क्या खाना है तुम्हें? मुझे बताओ मैं अभी अपने दोस्त के लिए अपने हाथों से बनाकर लाती हूँ ।“

“धन्यवाद ... पर ..... डर, भय और आतंक यह मेरा भोजन है । दूसरों का डर मुझे ताकत देता है , पोषण देता है । और अगर कोई मुझसे नहीं डरेगा तो मैं आत्माओं की अँधेरी दुनिया में खो जाऊँगा । वहाँ मैं आजादी से कहीं भी नहीं जा सकूँगा बस दिनरात किसी कोने में बैठा आँसू बहाऊँगा । इन्सानों को मैं दिखाई नहीं दूँगा, न इस प्रकार के मजेदार कार्य कर सकूँगा । ये मृत्यु नहीं तो क्या है? सोचो .... अन्नत काल के लिए तुम्हें कढाये में तला जाए या किसी कोने में अनन्त काल तक रोने के लिए छोड़ दिया जाए। जो लोग आत्महत्या करते हैं, उनकी आत्मा तो अनन्त काल तक सूली पर लटकी रहती है। “

“ओह ये तो अन्याय है ।“

“हाँ वही तो । तुम्हें पता है हर साल भूतों का सालाना समारोह होता है, वहाँ सभी भूत अपने-अपने किस्से सुनाते हैं । ड्रैकुला तो कई सौ वर्षों से सबसे भयानक किस्से सुनाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच रहा है । एक शापित आईना भी कई लोगों के प्राण ले चुका है उसके हल्लूसिनेशन इफेक्ट के कारण कितने ही लोगों ने पागल होकर अपने ही परिवार का कत्ल कर स्वयं आत्महत्या कर ली । एक और छोटी बच्ची का भूत जाने कितने लोगों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर चुका है । पर मैं .... मेरे पास छोटे मोटे डरावने किस्से ही होते थे । जैसे कि मेरी आईने वाली ट्रिक से एक आदमी आधी रात में लुंगी बनियान में ही घर छोड़कर भाग गया था। एक औरत आईने पर अपनी क्रूर हँसी हँसती परछाईँ देखकर डर के मारे बेहोश हो गई थी। जब उसका पति उसकी चीख सुनकर वॉशरूम में आया तो उसने जमीन पर पड़ी अपनी पत्नी की हँसती हुई परछाईँ आइने में खड़ी देखी । यह देखकर वह भी बेहोश हो गया और अगले ही दिन वो दम्पत्ति दुम दबाकर भाग खड़े हुए । इस प्रकार कई परिवार यहाँ से दो या तीन दिन में ही भाग खड़े हुए पर आज तक किसी ने मेरे डर से आत्महत्या या हत्या नहीं की इसलिए भूत समाज मुझे हीन दृष्टि से देखता है । “

“किसी को आत्महत्या करने के लिए उकसाना भी उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि हत्या करना । जो लोग ये पाप कर रहे हैं वे कभी न कभी सजा जरूर पायेंगे । भूतों की कोई पुलिस नहीं होती क्या ? उन्हें कोई रोकता नहीं हत्या करने से ।”

“नहीं … हमारा फैसला तो ईश्वर द्वारा सुनाया जाता है अगर हम भूत समाज के नियम तोड़ेगे तो हम आत्माओं की दुनिया में भेजे जा सकते हैं । भूत आत्माओं की योनि में जाना बहुत गलत मानते हैं। और हम भूत किसी की हत्या भी नहीं करते, हम तो बस लोगों को उनके मन का चोर दिखाते हैं, भय दिखाते हैं और लोग स्वयं आत्महत्या कर लेते हैं । जैसे किसी ने अपनी पत्नी का कत्ल किया है, तो वह किसी भूत को अपनी पत्नी के रूप में देखकर सोचेगा कि उसकी पत्नी अपनी मौत का बदला लेने आई है और भ्रम में फँसकर वह स्वयं अपने आपको कष्ट देगा । यहाँ तक कि वह आत्महत्या भी कर सकता है । तुम जिस चीज से डरती हो वही तुम्हें और भी भयानक रूप में अपने सामने नजर आती है ।“

“ओह । मतलब भूत लोगों को उनके पापों के भयानक रूप दिखाते हैं । “

“हाँ ऐसा ही कुछ ।“

इस प्रकार दोनों ने बैठकर अपनी अगली ट्रिक पर चर्चा की जिसे दिखाकर वो अगले दिन यानी कि अगली रात किसी न किसी को डराने वाले थे । (1150)



बेइज्जती दर बेइज्जती

अगला दिन छुट्टी का था संडे को उनका हॉलीडे होता है। लड़कियों ने गाँव भर में घूम-घूम कर सेल्फियाँ खींचीं और नदी पर तैरने का प्लान बनाया । स्वीमिंग पूल पर तो वो लोग रोज तैरते थे पर नदी पर तैरने का आनन्द ही कुछ और था । स्वीमिंग पूल एक निर्जीव पानी का टैंक मात्र था और यहाँ उनके तैरने के लिए एक जीती जागती कल कल करती नदी थी । 


उन्होंने गांव के अनुसार कपड़े चुने और नदी के तट पर पहुंची तो देखा की वहां पहले ही कोई मौजूद था। 


"भागमति मैडम नमस्कार । आप यहां?" प्रेमा ने तट पर बैठी , लहरों को निहारती , उस खोई खोई सी अधेड़ महिला से पूछा । और बाकियों ने भी उन्हें प्रणाम किया । 



"हां आज विद्यालय बंद है, रविवार जो है। मैं हर अवकाश वाले दिन नदी तट पर बैठकर घंटो लहरों को देखती हूं । ये मेरा फेवरेट टाइम पास है। आप लोगो से दोबारा मिल कर खुशी हुई । " भागमती मैम ने आज भी सफेद कलफ की हुई धोती पहनी थी जिसपर लाइट कलर के महीन फूल प्रिंटेड थे । 




"हमें भी आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई। हमारी भी आज छुट्टी है इसलिए स्विमिंग के लिए आए हैं । गांव में कई दिनों से हम मजदूर ढूंढ रहे है पर कोई उस भूतिया हवेली पर काम करने को तैयार नहीं हुआ । " कोमल ने कंधे उचकाकर कहा । 



"गांव के लोग इन अंधविश्वासों में बहुत यकीन रखते हैं । इसमें उनका कोई दोष नहीं । इसका एक कारण शिक्षा का अभाव है । वो बस भोले भाले सामान्य लोग हैं । काश मैं इस विषय में आपकी कुछ सहायता कर पाती तो जरूर करती । " भगवती मैम ने आह भरकर कहा और जाने को हुईं। 



"तो मैं आपको लगता है की हवेली में कोई भूत नहीं है । जबकि सबका कहना है की भूत ने हवेली के राजा साहब को मार डाला था । " कोमल शायद अपनी कहानी के लिए मैटेरियल ढूंढ रही थी इसलिए वो गांव के किसी भी व्यक्ति से भूत के विषय में जानकारी लेना नहीं भूलती थी। 



"ये झूठ है।" भगमती मैडम पलट कर चीखीं। वो चारो उनके इस व्यवहार पर चौंक गईं। "मेरा मतलब उस हवेली में कोई भूत वूत नही है । और अगर है भी तो उसने किसी की जान नहीं ली । ये सरासर झूठ है । ऐसी अफवाओं को बढ़ावा मत दीजिए । क्षमा कीजिएगा । अब मैं चलती हूं । " भगमति मैम ने हाथ जोड़कर उनसे विदा ली। 



"वो ठीक कह रहीं हैं। एक तो पहले ही गांव वाले उस हवेली से डरते हैं ऊपर से तू अपनी कहानी के चक्कर में सबसे खोद खोद कर हवेली की मनगढ़ंत कहानियां फैलाने में लगी है । लगता है इसी वजह से भागमती मैम गुस्सा हो गई । अब से कोई भी गांव वालों से भूत के बारे में बात नहीं करेगा । " सुष्मिता ने पहले कोमल फिर बाकियों की ओर देख कर सख्ती से कहा तो सबने हां में सिर हिलाया। 



लड़कियों ने नदी पर तैरना खूब एन्ज्वाय किया । अब वे गाँव को पसंद करने लगी थीं।



उस रात स्नेहा भूत के साथ किसी को शिकार बनाने की योजना बना रही थी तभी उसे सामने से सुष्मिता आती दिखी। स्नेहा ने भूत को इशारा किया और खुद कमरे में छुपकर देखने लगी। भूत सुष्मिता के रूप में सुष्मिता के ही सामने प्रकट हुआ । सुष्मिता ने उसे देखा तो न चौंकी न डरी बल्कि ऐसे-ऐसे पोज दिये मानों आईने या कैमरे के सामने खड़ी हो । वह शायद उसे अपना प्रतिबिंब समझ रही थी । भूत भी जाने किस धुन में उसकी नकल किये जा रहा था, उसकी नजर दरवाजे से झांकती स्नेहा पर पड़ी तो वह अपना सिर पीट रही थी तभी भूत को अपना उद्देश्य याद आया । सुष्मिता का प्रतिरूप कुटिल रूप से मुस्कुराया और अचानक उसने कड़ की आवाज के साथ अपनी गरदन एक ओर लुढ़का दी, उसके मुँह से खून बह निकला और आँख उलट गयी । ऐसे जैसे गरदन टूट गई हो उसकी जीभ बाहर लटक आई । उसे लगा इस प्रकार सुष्मिता डरेगी, पर नहीं, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब सुष्मिता ने भी प्रतिबिंब की नकल की और अपनी गरदन एक ओर लुढ़का कर मुँह से कड़ की आवाज निकाली, अपनी जीभ टेढ़ी करके बाहर निकाली और आँखें भी टेढ़ी कीं उतनी टेढी जितनी वह कर सकती थी । फिर उसने धीरे से गरदन सीधी की और कुटिलता से हँसने लगी । उसे देखकर उसका प्रतिरूप भूत ही डर गया।

“ये क्या तरीका है ? तुम मेरी नकल क्यों कर रही हो? तुम मुझसे डरी क्यों नहीं? “ उसके प्रतिरूप ने प्रश्न किया । 

“ मैं तुमसे नहीं डरती क्योंकि............ मेरे पास माँ है ।“ कहकर सुष्मिता ने अपने नाइट सूट का कॉलर दोनो हाथों से विपरीत दिशा में खींचा । उसके गले में एक लॉकेट था जिसपर माँ दुर्गा का पेंडेन्ट लटका था । इसे देखकर भूत प्रतिरूप ने अपने हाथ जोड़कर प्रणाम किया । सुष्मिता ने व्यंगात्मक मुस्कान दी और अपने कमरे में चली गई । स्नेहा छुपकर खड़ी अपना सिर पीट रही थी । 

“तुमने देखा उस बदतमीज लड़की ने कितना बुरा बर्ताव किया मेरे साथ ।“

ठंडी साँस लेकर स्नेहा ने कहा -“कोई बात नहीं, असल में उसे चश्मा लगा है और वह कॉन्टैक्ट लेंसेज प्रयोग करती है, जो रात में उतार कर रख देती है। इस समय उसने कॉन्टैक्ट लेंसेज नहीं लगाये होंगे, इसीलिए उसे ठीक से दिख नहीं रहा होगा, जिससे उसने सोचा होगा कि वो या तो आइने के सामने खड़ी है या कोई सहेली उसे डराने की कोशिश कर रही है । और तो और उसे सुनाई भी कम देता है । हालांकि वो फैशन की मारी न चश्मा लगाती है न हियरिंग एड प्रयोग करती है । इतनी कमियों के बाद भी वो अपने आपको पता नहीं क्या समझती है ? घमंडी कहीं की । “

स्नेहा ने भूत को सांत्वना देते हुए कहा।

उन्होंने फिर ट्राई करना चाहा और अब वो दोनों प्रेमा के कमरे की ओर बढ़े । 

प्रेमा बेड पर बैठी सामने टेबल पर रखे कॉफी के कप को घूर रही थी। तभी स्नेहा वहाँ आ गई। 

“क्या? प्रेमा तू उस कप को क्यों घूर रही है ?”

“चुप मुझे कॉन्सन्ट्रेट करने दे।“ प्रेमा ने उसे चुप रहने का इशारा करते हुए कहा।

स्नेहा ने भूत को इशारा किया, यह अच्छा मौका था प्रेमा को डराने का। 

प्रेमा कप को घूर रही थी तभी भूत वहाँ आया, उसे प्रेमा को डराने का यह अच्छा अवसर दिखा । उसने टेबल पर रखे कप को उठा लिया । भूत तो नहीं दिखा पर कप हवा में तैर कर प्रेमा की ओर आने लगा । तभी स्नेहा चीखी । 

“हे भगवान वो देख कप हवा मे उड़ रहा है और…और  इसी ओर आ रहा है। हे भगवान मैने पहले ही कहा था कि इस हवेली में भूत हैं , पर डर मत मैं हूँ न तेरे साथ। “ स्नेहा ने प्रेमा से चिपकते हुए कहा। 

और तभी भूत ने स्पेशल इफेक्ट के तौर पर कप को जोर से जमीन पर पटक दिया जिससे तेज आवाज हुई। स्नेहा एक बार और चीखी।

“सत्यानास..... तूने मेरा कॉन्सन्ट्रेशन बिगाड़ दिया, देखा कप टूट गया मेरी कॉफी भी गिर गई । तुझे पता है कि मैं रात में सोने से पहले कॉफी पीती हूँ। “ प्रेमा स्नेहा पर बिगड़ी ।

“क्या मतलब कॉन्सन्ट्रेशन बिगाड़ दिया । क्या तू अंधी है तुझे हवा में तैरता कप नहीं दिखा ?”


“दिखा था........ उसे मैनें ही अपने विश्वास के बल, पर बिना हाथ लगाये अपनी ओर खींचा था। मैं ही उसे हवा में उड़ा रही थी। “

“क्या बकवास है ? ये कप तू हवा में उड़ा रही थी ।“ स्नेहा ने भूत की ओर देखा तो उसने कंधे उचकाये ।

“हाँ .... मैने एक मूवी में देखा कि विश्वास के बल पर्वत भी हिलाया जा सकता है । मैं विश्वास के बल पर इस कप को अपने पास बुला रही थी, बिना बिस्तर से उठे मैं उसे अपने पास ला रही थी, पर तूने सब बेकार कर दिया । “


स्नेहा ने ठोड़ी पर उँगली रखकर कुछ सोचते हुए कहा- “अच्छा ...... वो सलमान खान की मूवी ‘ट्यूबलाईट’ । उसमें सलमान के विश्वास से नहीं बल्कि भूकंप से पर्वत हिला था । “

“तो क्या ? हिला तो था । भूकंप उसी समय क्यों आया जब सलमान पर्वत हिलाना चाहता था ? कुछ समय आगे पीछे भी तो आ सकता था? क्योंकि सलमान का विश्वास इतना मजबूत था कि धरती ने स्वयं उसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । अगर आप कुछ ठान लें तो सारी कायनात आपकी इच्छा पूरी करने के लिए प्रयासरत् हो जाती है।“

 “वाह..... प्रेमा तूने तो कमाल कर दिया वाकई ये कप तो अपने आप तेरे पास आ रहा था । शाबाश । और सॉरी...... तेरा कॉन्सन्ट्रेशन तोड़ने के लिए।“ कहकर उसने प्रेमा को धौल दी । उधर भूत को आश्चर्य हुआ कि उसके कार्य का श्रेय स्नेहा प्रेमा को क्यों दे रही है ? 

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“मैं दिन रात कितनी मेहनत कर रहा हूँ इन्हें डराने के लिए पर लगता है इंसानों में इन्सानियत खतम हो गई है। हे ईश्वर मेरी सहायता करो ।“ हाथ जोड़कर ऊपर देखते हुए भूत ने कहा । 

“डोंट वरी डियर व्हेन आई एम हियर।“ स्नेहा ने सीढ़ियों पर उसके बगल में बैठते हुए कहा ।

“हाँ , वो तो है , इसीलिए तुम मेरे किये का श्रेय अपनी सहेली को दे रही थी । इस तरह तो मैं कमजोर होकर गायब हो जाऊँगा और आत्माओं की दुनिया में चला जाऊँगा । आत्माओँ को भूत कितनी हीन दृष्टि से देखते हैं, तुम तो जानती हो न । वो किसी को डरा नहीं सकतीं बस अपने कर्मों पर आँसू बहाती रहती हैं । न कोई उन्हें सुन सकता है न महसूस कर सकता है । मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहता । कैसी सहेलियाँ हैं तुम्हारी ? और तुमने उसे क्यों नहीं बताया कि ये मैनें किया ।“

“क्या जरूरत थी तुम्हें कप गिराने की...... वो भी तब जब मैं ओवर ऐक्टिंग करके उसे यह जता रही थी कि सामने भूत है । तुमने उसके सम्मोहन जादू को सच साबित कर दिया था । कप ठीक तभी गिरा जब मैंने उसे हिलाया । इसीलिये उसे लगा कि उसका जादू काम कर गया। अब मैं क्या उसे ये कहती कि देखो मुझे भूत दिख रहा है । तब तो वो बाकियों को यही बताती कि मैं फिर डरपोकों वाली बातें कर रही हूँ । मुझे उनकी नजर में बहादुर बनना है न कि कमजोर । हम कुछ और सोचते हैं। “ दोनों सीढियों पर अगल बगल बैठे सोचने लगे । (1172) 



प्लेट में खोपड़ीस्नेहा और भूत सीढियों पर बैठे अपनी आगे की योजना के विषय में सोच रहे थे । हमेशा की तरह पहला आईडिया स्नेहा के दिमाग में आया ।

स्नेहा बोली -“आइडिया .............. साधू आज केक बनवा रहा है गाँव में बेकरी तो है नहीं इसलिए गौरी ही केक बनाने में साधू की मदद कर रही है कोमल का बर्थडे है आज । रात को बारह बजे केक कटेगा । “

“तो क्या करूँ केक बनाने में साधू की मदद करूँ? अब यही बाकी रह गया है । ” भूत बिदक कर बोला । 

“अरे नहीं ... हा-हा... यू आर सो फनी ..... सुनों ….. डरावनी पिक्चर्स में न ... प्लेट पर कटा सिर दिखाते हैं, तो ये देखने बहुत डरावना लगता है । वो लोग इस ट्रिक से तो जरूर डरेंगे । जब साधू केक लेकर आएगा तो वह उसने ढक्कन से ढक रखा होगा । वो कोमल को एक सरप्राइज केक गिफ्ट करना चाहता है । तो अगर ............ढक्कन हटते ही .................. ?” आगे का आइडिया स्नेहा ने भूत के कान में फुसफुसाकर बताया । तो हम सुन नहीं सकते । हमें इन्तजार करना होगा । 

भूत की आँखों में चमक आ गई निश्चय ही उसने ऐसा खतरनाक स्टंट तो कभी नहीं किया था वह सालों से बोरिंग आईने वाली ट्रिक आजमाता रहा है । उसके भूत मित्र भी उसका मजाक बनाते थे । पर अब उसके पास बहुत ही इन्ट्रेस्टिंग कहानी होगी ।


 रात बारह बजे बर्थडे केक कटना था सभी लोग टेबल के चारों और खड़े थे केक एक गोल ढक्कन से ढककर साधू लेकर आया और टेबल पर रख दिया । सभी केक को देखने के लिए उत्साहित थे । साधू अच्छा केक बनाता है , ये तो सभी जानते थे पर इतना वास्तविक केक बना सकता है, ये उन्हें ढक्कन खोलने पर ही पता चला । ढक्कन उठाते ही भीतर से कोमल का कटा सिर निकला जिसके चारों ओर लाल खून बहा पड़ा था । सिर की पलकें बंद थीं उसका हेयरस्टाईल वैसा ही था जैसा कोमल ने इस समय बना रखा था । लग रहा था कि कोमल का वास्तविक कटा सिर प्लेट पर सजा है । 

“वाऊ साधू तुमने तो कमाल कर दिया । हूबहू मेरे जैसा केक बनाया है । ये तो एकदम रीयल लग रहा है। स्केरी मैन । “ कोमल ने आश्चर्य से केक देखते हुए कहा । तो बाकियों ने भी हाँ में हाँ मिलाई और केक की तारीफ की ।

 साधू ने यह देखा तो चौंक गया उसने तो एक गोल केक बनाया था जिस पर चॉकलेट चिप्स पड़े थे । और वनीला क्रीम से उसकी आइसिंग की गई थी । उसकी जगह कटा सिर देखकर साधू चौंका भी और डरा भी, पर सबको तारीफ करते देख ही-ही करके बोला –“हां मैंने ही ये केक बनाया है, ऐसा रीयल केक बनाना नया-नया सीखा था तो सोचा क्यों न आज ही बनाकर देखूँ । आपको पसंद आया तो मेरी मेहनत सफल हुई समझो।“

तभी केक ने आँख खोल दी –“वाऊ ये कैसे किया ?” तीनों एक साथ बोलीं । स्नेहा जानती थी कि ये भूत का काम है पर जबतक उसकी सहेलियाँ डरेंगी नहीं वो कैसे डरने की या बहादुर बनने की ऐक्टिंग करती इसलिये चुपचाप खड़ी नजारा देखती रही । उसे भूत पर तरस आ रहा था बेचारा । 

साधू फिर चौंका–“ वो – वो मैंने जो पलकें लगाईं थीं, वो गिर गईँ होंगी शायद, अब जल्दी केक काटिये वरना पता नहीं और क्या-क्या गिर जाएगा । “ साधू परेशान हो गया और तुरंत चाकू कोमल के हाथ में पकड़ाया । 

कोमल ने वह बड़ा चॉपिंग नाइफ लिया और अपने ही सिर के दो टुकड़े कर दिये । इसके बाद सबने आराम से केक का आनंद लिया । भूत पहली बार चाकू पड़ते ही केक छोड़कर भाग गया और केक का आकार सामान्य हो गया पर हाई म्यूजिक व मस्ती में किसी ने इसकी परवाह नहीं की । रात दो बजे तक धूमधमाका हुआ । फिर स्नेहा अपने कमरे में सोने चली गयी । कुछ ही देर बाद किसी ने दरवाजा खटखटाया । 

“कौन ?”

“मैम मैं साधू ।“

“ओह साधू आओ क्या बात है ?” लाईट ऑन करके दरवाजे का लॉक खोलते ही उसने पूछा । 

“मैडम अब आप लाइट बंद करके सोने लगीं ? क्या आपको भूत से डर नहीं लगता ?” साधू ने आश्चर्य से पूछा । 

“ओह हाँ..... अब मैं इस घर की आदी हो चुकी हूँ । तो अब डर नहीं लग रहा । “ दाँत दिखा कर स्नेहा ने कहा । 

“मैंम मैं कसम खाता हूँ, कि वो केक तो मैनें बिल्कुल सादा बनाया था पर वह कैसे कोमल मैम के सिर में बदल गया? मैं नहीं जानता ये कैसे हुआ ? जरूर ये उस भूत का काम है जो इस हवेली में रहता है । भूत रहता है यहाँ और वही यह सब कर रहा है । मैं उस समय कुछ कह नहीं पाया पर ………………. मैं बहुत डर गया था वह केक देखकर । ये कैसे हुआ ?“

“साधू........ परेशान मत हो देखो तुम थक गये हो तुमने इतनी मेहनत की है , इसीलिये तुम्हें ऐसा लग रहा है । तुमने केक बनाने में बड़ी मेहनत की थी, तुम्हारे दिमाग में कोमल का ही चेहरा घूम रहा था, इसलिए तुम्हें पता ही नहीं चला होगा कि कब तुमने केक पर उसका चेहरा उभार दिया । तुम अपनी कला में इतने खोये होगे कि तुम्हें पता ही नहीं चला कि एक सादा सा केक कैसे इतना यूनिक हो गया । महान कलाकारों के साथ ऐसा ही होता है । वो अपनी कला में खोकर दुनिया भूल जाते हैं। तुम एक महान केक बेकर हो । “ स्नेहा ने दार्शनिक बनते हुए कहा ।

“ओह ... अच्छा । हो सकता है आप ठीक कह रही हैं । मैं ही कुछ ज्यादा सोच रहा हूँ । हाँ शायद यही हुआ होगा । मैम आपसे बात करके हमेशा अच्छा लगता है , आप इतनी छोटी उम्र में कितनी समझदार हैं धन्यवाद । अच्छा गुड नाईट । “ गर्व से सीना फुलाकर साधू वहाँ से जाने को हुआ ।

“गुड नाइट । और आज लाइट बंद करके सोना । देखना तुम्हें अच्छी नींद आएगी । नींद पूरी न होने के कारण ही शायद तुम पेरशान हो और कल्पनाएं कर रहे हो । “

“हुम्म मैम आप ठीक कहती हैं तेज लाइट के कारण नींद ठीक से नहीं आती । अच्छा मैं चलता हूँ किसी को बताईयेगा मत कि मैं आपके पास आया था। ............ हे हे ..........”

“चिंता मत करो यहां की बात यहीं खत्म समझो । “

उसके जाते ही भूत वहां प्रकट हुआ । 

“यह क्या? तुमने मेरे किये धरे का सारा श्रेय फिर किसी और को दे दिया ।“

“तो क्या करूँ ? हाँ- हाँ तुम बताओ मैं क्या करूँ ? अपनी सहेलियों के बीच डरपोक फेमस हो जाऊँ जो कि मैं पहले से ही हूँ । एक तो तुमसे कोई भी ट्रिक ठीक से नहीं होती । क्या जरूरत थी केक को सिर बनाने की किसी और चीज को नहीं बना सकते थे । आजकल तो लोग ऐसे ऐसे केक बनाते हैं कि वो एकदम रीयल लगते हैं । सबने सोचा साधू ने भी वही किया है । “

“अच्छा केक को कोमल का सिर बनाने का आईडिया तुम्हारा ही था। और भला कोई रीयल जैसा केक भी बनाता है । मुझे भी दिखाओ । मैनें तो नहीं देखा आजतक ।“

स्नेहा ने यूट्यूब पर उसे इतने सच्चे लगने वाले केक के विडियोज दिखाए कि भूत ने अपनी उँगलियाँ तक चबा डालीं ।

 (1200)



सिर कटा 



अगले दिन शहर से बुलाए गए कुछ तीन-चार मजदूर बस पकड़कर गाँव आ गये थे। और अपने काम में लग गये । बेकार का सामान हवेली से हटवाया जाने लगा, गांव के कबाड़ी को बुलाया गया पर वो कंजूस सेठ की आत्मा से बैर नहीं लेना चाहते थे, फलतः सुष्मिता ने भारी मन से मजदूरों को ही सामान दे दिया । मजदूर मुफ्त में मिले कबाड़ को पाकर खुश हो गये पर साफ जाहिर था कि सुष्मिता को यह काम मजबूरी में करना पड़ा । वह एक बिजनेस मैन थी जिसे जबतक प्राफिट न दिखे किसी को मुफ्त में कुछ भी नहीं देती चाहे वह उसके लिये कबाड़ ही क्यों न हो । 

जैसे हमारे देश के नेता जो सर्दियों में कंबल बाँटते हैं वो पब्लिसिटी व गरीबों का वोट चाहते हैं न कि ईश्वर का आशीर्वाद । मजदूरों ने घर के बाहर मैदान में ही अपना तंबू गाड़ लिया था । यह देखकर भूत चिढ़ गया वह हवेली की चार दीवारी के बाहर नही जा सकता था इसलिए रात होने पर भी विवश था । अगर वो लोग हवेली के गेट के भीतर रुकते तो भूत उन्हे अच्छा सबक सिखाता । पर भूत की शिकार वो बालाएं थीं न कि मजदूर, मजदूरों को तो वैसे भी काम पूरा होते ही चले जाना था भूत को तो इन बलाओं से छुटकारा पाना था । 


“देखो साथियों , जैसा कि हम देख रहें हैं कि गाँव वाले किसी भी तरह हमारी सहायता करने को तैयार नहीं हैं । न वो इस हवेली मेें काम करने आना चाहते हैं न यहाँ का कोई सामान ही लेना चाहते हैं । फलतः हमने शहर से इन चार मजदूरों को बुला तो लिया है, पर ये हमें बहुत मंहगे पड़ने वाले हैं , क्योंकि इनके रहने के साथ-साथ खाने पीने का इंतजाम का खर्च भी कंपनी पर आ गया है । सोचा था गांव में मजदूर भी सस्ते पड़ेंगें और बढ़ई , लोहार आदि भी कम कीमत में मिल जाएंगे पर अब तो पूरी बाजी ही पलट गयी है । गाँव वालों ने हवेली के लिए कुछ भी बनाने से मना कर दिया है और तो और गाँव वालों ने कबाड़ तक खरीदने से मना कर दिया । फलतः कलको हमें फर्नीचर बनवाने व लोहार का काम कराने के लिए भी शहर के कामगारों की जरूरत पड़ेगी । अगर इधर पुरानी हवेली के पुर्निर्माण का खर्च बढ़ेगा तो उधर तैयार हवेली के दाम और भी बढ़ जाएंगे । तो ऐसे में जितना हो सके हमें कंजूसी से चलना होगा । और……… “ तभी सुष्मिता की नजर प्रेमा पर पड़ी जो मुस्कुराकर झूूम रही थी जिससे स्पष्ट था कि वो अभी भी गाना सुन रही थी और शायद उसने सुष्मिता की कही कोई बात नहीं सुनीं । 

“प्रेमा गाना सुनना बंद कर और मेरी बात ध्यान से सुन ।” सुष्मिता ने टेबल पर हाथ पटका और चिल्ला पड़ी उसकी आवाज इतनी बुलंद थी कि प्रेमा चौंक गई । वह झटके से उठी और सुष्मिता को सेल्युट मारा। 

सुष्मिता ने उँगली हिलाकर इयर फोन निकालने का इशारा किया तो प्रेमा ने वैसा ही किया ।

“मैंने अभी-अभी क्या कहा ?”

“यही कि शहर के मजदूर मंहगे पड़ रहे इसलिए खर्चें कम करने होंगे । “

सबने आश्चर्य से उसे देखा क्योंकि उसने गाना इतनी तेज आवाज में लगा रखा था कि टेबल पर पड़े ईयर पैड से भी आवाज स्पीकर के समान बाहर आ रही थी । फिर इतनी तेज आवाज में भी उसने यह कैसे सुन लिया ?

“ठीक है अब हम सब सोने चलेंगे कल बात करते हैं ।” झेंपते हुए सुष्मिता ने कहा और अपने कमरे की ओर चली गयी । 

“क्या बात है प्रेमा इतनी तेज आवाज में गाना सुनने के बाद भी तुझे सुष्मिता की बात कैसे सुनाई दी?” स्नेहा ने पूछा तो कोमल ने भी सिर हिलाया वह भी इसका उत्तर जानना चाहती थी । 

“हुँह इसमें कौन सी बड़ी बात है वो हमेशा पैसे कम खर्च करो और खर्चे घटाओ इसी बात पर मीटिंग बुलाती है । इस बार मजदूरों के कारण बढ़े खर्च पर बात कर रही होगी…. ऐसा मैनें तुक्का लगाया । “ बाकी दोनों ने उसे थम्प्स अप का इशारा किया । और अपने कमरे में सोने चली गयीं जाते समय स्नेहा ने कुछ बत्तियाँ बुझा दीं । जबकि प्रेमा ने वहीं पर टहलते हुए साधू को पुकारा -”साधू एक कॉफी बना दो ।”

“बस बन गयी प्रेमा मैडम, हमको पता है कि आप रात में सोने से पहले कॉफी जरूर पियेंगी, अभी लाते हैं बस खौल जाए अच्छी तरह । जरा कॉफी का रस उतर आये दूध में । ”

“अब इसे कौन समझाये ये कॉफी है चाय नहीं ।” प्रेमा सिर झिटककर फिर टहलने लगी । 

उधर भूत स्नेहा के सामने प्रकट हुआ । 

“आज का क्या प्लान है ?”

“आज मुझे एक और जबरदस्त आईडिया आया है । सिर कटा भूत । प्रेमा अभी नीचे ही टहल रही है वो काफी पिये बिना नहीं सोयेगी । जाकर सिर कटे के रूप में उसे डराओ । मैंने आते समय कुछ लाइट्स बंद कर दी हैं , अँधेरे में ये ट्रिक और भी डरावनी लगेगी । “

भूत को ये आइडिया भा गया वो तुरंत ही वहाँ से गायब हो गया । प्रेमा ड्राइंग रूम में टहल-टहल कर गाने की धुन पर झूम रही थी अगर सामने देखती तो शायद उसके रोंगटे ही खड़े हो जाते । एक सिर कटा शरीर जिसने सफेद कुर्ता पजामा पहन रखा था उसी की ओर बढ़ा चला आ रहा था । तभी साधू किचन से कॉफी का प्याला लिये किचन से बाहर आया और सामने ही सिर कटे भूत को देखकर चिल्लाया- भूत-भूत और उसने कॉफी का कप छोड़ दिया जो जमीन पर गिरकर टूट गया पर प्रेमा को गाने की धुन के आगे कुछ भी सुनाई नहीं दिया । इसी समय प्रेमा ने सामने देखा तो सिर कटे भूत के उस पार उसे साधू का सिर दिखाई दिया प्रेमा ने उन दोनों को पू्र्ण रूप में देखा, अतः उसे भूत का धड़ और साधू का सिर मिलाकर एक शरीर के रूप में दिखे । 

“ओफ्फो साधू कितनी देर लगाओगे । ठीक है, मैं अपने कमरे में जाती हूँ, कॉफी वहीं ले आना । “ प्रेमा ने सिर कटे भूत को पूरी तरह नेगलेक्ट करके पीछे से दिख रहे साधू को ऑर्डर दिया जो फटी-फटी आखों से उसी तरफ देख रहा था । फिर प्रेमा धड़धड़ाती हुई सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में चली गयी, अगर कुछ देर रुकती तो सिर कटे को हवा में घुलकर गायब होते और साधू को गिरकर बेहोश होते देख पाती । 

“धत्त तेरे कि हमेशा तुम्हारे साथ ही ऐसा क्यों होता है ? जब भी किसी को डराने जाते हो कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है कि सामने वाला डरता ही नहीं । “

“बू हू हू अब मैं क्या करूँ ऐसे तो मैं भूखों मर जाऊँगा । जब कोई मुझसे नहीं डरता तो वह एक तरह से मेरी एनर्जी को कम करता है । कुछ तो करो। कहो तो काल भैरवी का एक हजार एक पाठ जपूँ ? देवी भूतों पर बड़ी कृपा रखती हैं । “

“कमऑन ये सब दकियानूसी बातें हैं, कि देवी को प्रसाद चढ़ाने या जाप करने से कार्य सिद्ध हो जाते हैं । कार्य कर्म से सिद्ध होता है । फिकर नॉट मैं कुछ सोचूँगी । अभी मैं सोती हूँ और कोई डरावना सपना देखती हूँ, फिर कल तुम्हें नयी ट्रिक बताऊंगी ओके। गुड नाइट। “ स्नेहा ने भूत को फ्लाइँग किस फेंकी तो वो शरमा गया । (1190)



ऐक्टर या भूत

सुबह से हवेली में चहल पहल रहने लगी थी मजदूर अपना काम करते और हँसी मजाक करते । जिसकी आवाज भूत को बहुत परेशान करती । कहाँ तो लोग दिन में भी लोग हवेली में आने से डरते थे कहाँ ये बलाएं तीन दिनों से भी ज्यादा दिनों से यहां टिकी हुई हैं । उसकी गांव में जो इमेज बनी थी वो सब खराब हो गई है । आज तो भूत ने सुना कि हीरा नाम का मजदूर और उसका बेटा सुबह सुष्मिता से बात करने आये थे कि वे हवेली पर काम करने के लिए तैयार हैं बस अंधेरा होने से पहले चले जाएंगे । हीरा ने कहा कि उसे बेटी की पढ़ाई के लिए फीस भरनी थी वरना वो हवेली पर कभी काम न करता । हुँह….. भूत ने सुना तो मुंह बिचकाया । दिन में उसकी शक्तियां काम नहीं करतीं वो बस अपनी कोठरी में बैठा दूसरों की बातें सुन सकता है जिससे उसे उनके प्लान पता चल जाते हैं । वो गौरी नाम की महिला से ही खार खाया था कि वो हवेली पर काम करने चली आती है और यहाँ दो और गाँव वाले कल से काम पर आ रहे हैं । गाँव में उसकी इमेज का कबाड़ा हो गया था और ये सब इन कमबख्त बलाओं के कारण।

स्नेहा मैंम । साधू स्नेहा के कमरे में का दरवाजा खटखटाकर पुकारा । यह शाम का वक्त था और वो उसके लिए चाय का कप लेकर आया था।

“आ जाओ साधू दरवाजा खुला है ।”

चाय का कप रखकर वो स्नेहा के पास खड़ा हो गया जो सुष्मिता के दिये कामों की सूची पढ़ रही थी । “ सुबह उठकर मजदूरों को मॉनीटर करो कि वो कैसा काम कर रहे हैं ? फिर बाजार मे जो ऑर्डर कल दिया था उसको लेकर आओ । फिर मजदूरों को मॉनीटर करो हुंह । बकवास ।” उसने साधू को देखा-” क्या हुआ साधू कुछ कहना चाहते हो ?”

“मैडम आप ही हैं जिससे मन की बात बोल सकते हैं । दरअसल हमने कल रात में एक सिर कटा भूत देखा था वो भूत प्रेमा मैडम और हमारे बीच में खड़ा था । प्रेमा मैडम ने हमसे कॉफी मांगी तो जैसे ही वो लेकर ड्राइँग रूम में पहुंचे तो देखा सामने ही भूत खड़ा था हमारे हाथ से तो कप ही छूट गया ।” 

“अच्छा सच का भूत देखा तुमने तब तो प्रेमा ने भी देखा होगा । “

“हमको लगता है कि भूत बस हमें ही दिखाई देता है क्योंकि प्रेमा मैडम ने तो भूत को देखा ही नहीं वो तो भूत के पार हमें ही देखकर बात कर रहीं थीं । अगर भूत उन्हें दिखता तो वो जरूर डर जातीं । पर हम तो डर के मारे बेहोश ही हो गया था।” 

“ओहो तो ये बात है भूत बस तुम्हें ही दिखता है । अच्छा एक बात तो बताओ कल तुम लाइट बंद करके सोये थे “

“वो…………………………… मैडम आपने कहा तो था पर ………….. मैंने अपने कमरे की लाइट बंद रखी और वॉशरूम की खुली रखी ताकि रोशनी कमरे में आती रहे और जैसे ही भूत आता मैं तुरंत वॉशरूम में घुस जाता । “

“वही तो…….. लाइट जलाकर सोने के कारण लगातार तुम्हारी नींद नहीं पूरी हो रही है । इसी लिए तुम्हें चारों ओर भूत दिख रहे हैं । सुनो…… आज पूरी तरह लाइट बंद करके सोना ताकि हम पक्का कर सकें कि भूत वाकई तुम्हें दिखता है या नींद पूरी न होने का असर है । अगर भरपूर नींद लेने के बाद भी भूत दिखे तो समझो ये जगह वाकई भूतिया है वरना तुम्हें नींद पूरी न होने के कारण हालुसिनेशन आ रहे हैं……….. बस । “

साधू ने हाँ में सिर हिलाया तभी सुष्मिता ने उसे पुकारा तो वह झटपट वहाँ से चला गया ।

……………………………..

“ अरे हाँ एक बात तो भूल ही गई तुमने भी याद नहीं दिलाया । साधू केक वाली ट्रिक से डर गया है वो कह रहा था कि उसका सिंपल सा केक कैसे कोमल के सिर में बदल गया उसे नहीं पता चला ? वो कह रहा था कि जरूर ये भूत का काम है । और आज भी वो मुझे बता रहा था कि वो सिर कटे को देखकर डर गया और उसके हाथ से कप छूट गया । देखो हम उसे डरा सकते हैं क्योंकि वो पहले से ही डरा हुआ है । तुमने अपनी आइने वाली ट्रिक उसपर नहीं आजमाई? “ उस रात प्रेमा ने भूत से चहक कर पूछा जब वो उससे ट्रिक पूछने आया । 

“मैं जब उसके वॉशरूम के शीशे पर उसका डरावना प्रतिबिंब बना रहा था तब वो कुल्ला करने नीचे झुका उसी समय शीशे के सामने लगे हाईलोजन बल्ब की तेज रोशनी सीधी मेरी आँखों पर पड़ी और मेरी आँखें ही चौंधिया गईं । उफ मैं तो अंधा होते-होते बचा ।“ भूत ने स्नेहा की ओर देखा तो पाया कि वो उसे हिकारत से देख रही थी –“क्या ? कोई वॉशरूम में हाई लोजन बल्ब लगाता है क्या ?”

“मैं सोच रही हूँ तुम्हें भूत किसने बना दिया तुम्हें तो कॉमेडियन होना था । मेरा प्लान सुनो । साधू पहले ही डरा हुआ है पर मैं किसी तरह उसे हॉरर मूवी देखने के लिये मनाऊँगी । ‘द रिंग’ मूवी देखी है तुमने ? “

“हां बिल्कुल उस फिल्म की वो छोटी चुड़ैल भूतों के सालाना समारोह में अपने ऊपर बनी उस फिल्म का जिक्र करना कभी नहीं भूलती । हुंह….“

“तो मैं साधू को वही फिल्म देखने के लिए राजी कर लूँगी । सोचो जब टीवी पर वो भयानक कुँआ प्रकट होगा, तब उस कुएं से निकलकर एक चुडैल साधू की ओर बढ़ेगी और वो टीवी से निकलकर बाहर आ जाएगी तब तो साधू पक्का शॉक्ड रह जाएगा । “ भूत की आँखो मे चमक बता रही थी कि उसे ये आइडिया पसंद आया । 

“पर आज रात उसे परेशान मत करो और चैन से सोने दो कल मैं उसे ऐसे बहलाऊँगी कि वो मुझ पर विश्वास करे और मेरी सारी बात माने । “ भूत ने सिर हिलाया और गायब हो गया । 

अगली सुबह स्नेहा नीचे उतरी तो देखा साधू नाश्ते की टेबल लगा रहा था और बाकी सब लड़कियाँ अभी तैयार होकर नहीं आईँ थीं । आज से हवेली पर मरम्मत का काम शुरु होने वाला था । साधू से निकटता बढाने के लिए स्नेहा भी उसके साथ टेबल लगाने लगी । 

“तो साधू कल रात कैसी नींद आई ?”

“बहुत अच्छी स्नेहा मैम । आपने सही कहा था मेरी नींद पूरी नहीं हो रही थी । तेज प्रकाश के कारण मैं कई दिनों से ढंग से सो नही पा रहा था पर कल मैं लाइट बुझाकर आराम से सोया हूँ । बहुत बहुत धन्यवाद । “

“कोई नहीं । वैसे मैनें सुना है कि जिस चीज से जितना डरो वह उतना ही डराती है । इसलिए जब से मैं यहाँ आई मैनें सोच लिया कि मैं अब किसी से नही डरूँगी । भूत का डर भगाने के लिए मैं रोज रात को लाइट बंद करके हॉरर मूवीज देखती हूँ । ”

“अच्छा । ऐसा करने से भूत भाग जाता है क्या ?”

“कम ऑन भूत वूत कुछ नहीं होता ये हमारा डर है जो भूत के रूप में हमारे सामने आता है । हॉरर मूवी देखने से भूत के प्रति डर दूर हो जाता है । बस मूवी देखते समय मैं दोहराती रहती हूँ कि ये बस एक मूवी है और जो भूत टीवी पर दिख रहा है वो बस एक ऐक्टर है जो ऐक्टिंग कर रहा है । ये बात दिमाग में बैठ जाए तो डर गायब हो जाता है । “

“अच्छा यो तो अच्छा आइडिया है । तो मैं भी आज रात लाइट बंद करके हॉरर मूवी देखूँगा । पर कैसे यहाँ तो सीडी प्लेयर है ही नहीं ?” साधू ने सोचते हुए कहा । 

“अरे सीडी प्लेयर क्यों चाहिए आजकर स्मार्ट टीवी मोबाइल से कनेक्ट हो जाते हैं । कोई भी मूवी मोबाइल पर डाउनलोड करके टीवी पर चला कर देख लो सो सिम्पल ................. तुम चिंता मत करो मैं हूँ न मैं लगा दूँगी मूवी पर ध्यान से लाइट बंद करके देखना और दोहराते रहना कि ये तो बस एक मूवी है । “

“ये तो बस एक मूवी है और ये लोग ऐक्टर्स हैं जो ऐक्टिंग कर रहे हैं। मैं समझ गया मैम आपने बहुत अच्छा तरीका बताया है अपने डर पर काबू पाने का । धन्यवाद । अब यह भी बता दीजिए कि कौन सी मूवी देखूँ वीराना या बंद दरवाजा या.....................”

“छीः ये सब बकवास फिल्में हैं । हॉलीवुड देखो । ‘द रिंग ’ बहुत अच्छी फिल्म है । हिंदी में भी मिल जाएगी । तुम चिंता मत करो मैं आकर लगा दूंगी । अच्छा सुष्मिता आ रही है । इन लोगों को मत बताना जो कुछ भी हमने अभी बात की ।“

“बिल्कुल नहीं । “

रात को साधू के एल ई डी टीवी के बड़े से स्क्रीन पर एक डरावना कुआँ प्रकट हुआ । कुँए से निकलकर एक चुडैल टीवी स्क्रीन की ओर बढ़ने लगी उसने सफेद गाऊन पहना था । उसके लंबे बाल आगे की ओर लटके थे और वह घुटनों को बल रेंगकर चल रही थी । उसके बालों से व कपड़ो से पानी टपक रहा था । वह स्क्रीन से बाहर आने लगी और जिस टेबल पर टीवी रखा था उससे उतर कर साधू के बेड़ की ओर धीरे धीरे बढ़ने लगी । उसके कपड़ो व बालों से टपकने वाला पानी फर्श पर गिरते ही गायब हो जा रहा था । 

“ये बस एक मूवी है और ये चुडैल एक ऐक्टर है जो ऐक्टिंग कर रही है । “ साधू ये लाईन दोहरानी शुरू कर दी । भूतनी उसके बेड पर चढ़ने लगी तो साधू धीरे-धीरे पीछे खिसकने लगा और आखिर दीवार से जाकर सट गया । वह लगातार ये शब्द दोहराते हुए कांप रहा था और भूतनी पर से अपनी नजर नही हटा रहा था । भूतनी अब उसके चेहरे के बहुत करीब थी वह उसका चेहरा साफ देख पा रहा था । चेहरे पर मानों चूना पुता था और आँखों का सफेद हिस्सा लाल था । साधू पैर ताने दीवार से सटा हुआ था और भूतनी उसके दोनों ओर अपने हाथ पैर पसारे उसके एकदम नजदीक थी कि साधू उसकी सांसों की आवाज भी सुन पा रहा था जो घर्र घर्र करती हुई आ जा रहीं थीं । उसके दाँत ऐसे गंदे थे जैसे पान मसाला चबाने वालों के हुआ करते हैं। वह मुँह से भी पानी टपका रही थी और उसके कपड़ों और बालों से भी पानी टपक रहा था ।

“तुम बस एक ऐक्टर हो और ऐक्टिंग कर रही हो ।“ साधू ने बहादुर बनते हुए चेहरे के बहुत पास आ चुकी चुडैल से कहा । 

भूतनी ने सिर झटका –“अबे चूतिये...... कोई ऐक्टर टीवी से बाहर आकर ऐक्टिंग करता है क्या ? अगर ऐसा होता तो माधुरी टीवी से निकलकर सबके सामने न नाचने लगती । मैं सचमुच का भूत हूँ ।“

“ये एक 3D नहीं-नहीं 5D मूवी है, जो बिल्कुल असली लगती हैं । इसीलिए मुझे ये भूतनी अपने बेड पर दिख रही है । ये बस एक ऐक्टर है ।“ साधू ने खुद को समझाते हुए भूतनी से तर्क किया।

“मैं सचमुच का भूत हूँ ।“ भूत को अब गुस्सा आ गया और वह चीखा।

“न... तुम बस एक ऐक्टर हो और बहुत बढ़िया ऐक्टिंग कर रही हो । अगर ये मूवी न होती तो मैं तो पक्का हार्ट अटैक से मर ही गया होता हा-हा । आजकल विज्ञान ने कितनी तरक्की कर ली है साले ऐसी फिल्में बनाते हैं कि एकदम असली लगती हैं। कसम से कुछ देर के लिए तो मेरी फट ही गई थी। “ साधू ने बहादुर बनते हुए कहा। 

भूत बिस्तर से नीचे उतरा –“विज्ञान की माँ की ......................आँख ................ साला इस विज्ञान ने तो हमसे हमारी रोजी रोटी ही छीन ली है । हम भूतों के पास कुछ रहा ही नहीं करने को, जो करने जाओं सब पहले ही टीवी पर दिखा चुके होते हैं और वो भी एकदम रीयल जैसा। साला भूतों का कोई करियर ही नहीं रहा । “ भूत ने अपना लंबें काले बालों वाला विग जमीन पर पटका और फटाक की आवाज करता गायब हो गया । विग भी कुछ सेकेण्ड्स में गायब हो गया । 

“देखा वो बस ऐक्टर ही तो था अगर वाकई भूत होता तो मुझे जिंदा क्यों छोड़ देता ? वाह स्नेहा मैम की तरकीब काम कर गई अब मै भूतों से नहीं डरता ।“ (1300)




कुहनी से कटा हाथ

फटाक की आवाज के साथ भूत स्नेहा के कमरे में प्रकट हुआ तो वह सोते से चौंक पड़ी । 

“ये क्या कही टायर फट गया क्या ?”

“नहीं जब मैं गुस्से में होता हूँ तो प्रकट होते समय ऐसी आवाज करके गुस्सा जाहिर करता हूँ । “

“अब क्या हुआ ?”

“वो साधू भी मुझसे नहीं डरा । मैं टीवी से निकलकर उसकी ओर बढ़ा तो वह रटता रहा कि ये तो बस ऐक्टिंग है और ये भूतनी ऐक्टर है । तुमने उसे क्या उल्टा मंत्र पढ़ा दिया कि डरने की जगह वो मुझसे बहस लड़ाने लगा । कह रहा था कि ये एक रियल दिखने वाली 3D नहीं 5D मूवी है न कि रीयल भूत । “

“सत्यानाश......... अरे मैं तो फिल्म देखने के लिए राजी करना चाहती थी, इसलिए ऐसा बहाना किया पर क्या पता था कि वही बहाना उसका डर भगा देगा । “

“बू हू हू ... ऐसा ही चलता रहा तो भूतों के सालाना समारोह में किस मुँह से जाऊंगा । मैं कमजोर होकर भूत से आत्मा बन जाऊँगा। मुझे तो लगने लगा है कि तुम जानबूझकर ऐसे ट्रिक बताती हो जो फेल हो जाए । तुम अपनी सहेलियों से नहीं मुझसे बदला ले रही हो । मुझे नीचा दिखाकर खुद को मजबूत बना रही हो ।“

“अच्छा तो तुम्हें लगता है कि मैनें जो ट्रिक्स बताए वो तुम्हें नीचा दिखाने के लिए थे । तो क्यों नहीं तुम अपने आइने वाला और टैप वाला ट्रिक फिर से शुरू कर देते । एक तो मदद करो ऊपर से बातें सुनों । “ स्नेहा सुबकने लगी ।

“सॉरी .............. मैं दुख वो निराशा में कुछ ज्यादा ही बोल गया । मेरा मकसद तुम्हारा दिल दुखाना नहीं था । शायद मेरी किस्मत ही खराब है कि मैं इस युग में भूत बना हूँ जब मेरा कॉम्पिटीशन भूतों से नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी से है।“

“वैसे गलती तुम्हारी भी नहीं, लगता है हम दोनों की किस्मत ही खराब है । जीरो प्लस जीरो इक्वल टू जीरो ।“ स्नेहा ने ठंडी साँस छोड़कर कहा ।

“नहीं स्नेहा ऐसा मत कहो तुम जीरो नहीं हो । तुम तो मेरी कितनी सहायता कर रही हो मैं ही जीरो हूँ । कल मैं कोमल को डराने का प्रयास करूंगा । पिछली बार मैं उसे मैं डरा नहीं पाया क्योंकि उसने नल कसने के साथ-साथ मेरी गरदन ही कस दी थी । “

“एक आइडिया.................... खैर जाने दो ...........” स्नेहा ने चहक कर कहा पर फिर अपनी सारी ट्रिक्स के फेल होने की बात सोच कर चुप हो गई । 

“नही प्लीज मुझे बताओ तुम्हें क्या आइडिया आया है ?” स्नेहा ने भूत को अपना आइडिया बताया । तो वह बहुत खुश नजर आया । 

अगली सुबह हवेली का मरम्मत का काम चल रहा था जहाँ जहाँ प्लास्टर उखड़ा था वहाँ प्लास्टर लग रहा था और जहाँ नक्काशियाँ टूट रहीं थीं वहाँ कलाकार उन्हें फिर से नया रूप दे रहे थे । बागीचे की सफाई की जा रही थी और जंगली झाड़ काटी जा रही थी । उपयोगी पौधों को बोया जा रहा था । भूत यह सब देखकर दुखी हो रहा था । वह अटारी पर स्थित एक कोठरी की खिड़की पर खड़ा सब देख रहा था । दिन का समय वह यहीं काटा करता था । इस अंधेरी कोठरी में कोई नहीं आता । हवेली की मुख्य बिल्डिंग ऊपर से गुम्बदाकार है उसी गुम्बद के भीतर यह गुप्त कमरा मौजूद है, जहाँ तक पहुँचने के लिए एक दरवाजा छत पर ही बना है जिसमें थोड़ा झुककर प्रवेश करना पड़ता है। यह कोठरी स्टोर रूम की तरह है यहाँ ज्यादातर टूटे-फूटे फर्नीचर वगैरह पड़े हैं और एक छोटी सी खिड़की भी बनी है। इसी खिड़की पर खड़ा भूत बाहर मजदूरों को काम करते देख रहा था । एक समय था जब गाँव के लोग दिन में भी इस हवेली में आने से डरते थे, पर अब गाँव वालों ने देखा कि चार कमसिन नाजुक लड़कियाँ कई दिनों से हवेली में टिकी हैं तो उन्हें लगने लगा कि भूत अब जा चुका है । इसलिए गाँव के लोग हवेली पर मजदूरी करने को तैयार हो गये । इससे शहर से मजदूर बुलाने का खर्च भी बच गया । भूत यह चहल-पहल देखकर दुखी था।

रात के समय योजनानुसार खून टपकाते कुहनी से कटे हाथ के रूप में भूत कोमल के कमरे में प्रकट हुआ । कोमल हाथ में एक डायरी लिए मुँह में पेन चबाते हुए कुछ सोच रही थी और कमरे में इधर से उधर टहल रही थी । वह अपनी कहानी लिखने में इतनी व्यस्त थी की उसने जमीन पर रेंगते उस कटे हाथ की ओर देखा तक नहीं । 

“हेमा, रेखा, जया और सुषमा ने हवेली का दरवाजा खटखटाया पर अंदर से कोई आवाज नहीं आई कुछ देर इंतजार किया और फिर दोबारा खटखटाया कुछ और समय बीत गया फिर अचानक दरवाजा खुलने लगा । धीरे-धीरे चर्र-चर्र की आवाज करता दरवाजा खुल रहा था पर दरवाजा खोलने वाले हाथों का कोई अता पता न था । हेमा, रेखा, जया और सुषमा ने सोचा कि जरूर ऑटोमैटिक दरवाजा होगा । यह सोचते हुए वो हवेली के अंदर घुसीं । “ कोमल अपनी कहानी टहल-टहल कर लिख रही थी और बोलती जा रही थी।

कटा हाथ उसका ध्यान खींचने के लिये उसके सामने वाली दीवार पर चढ़ने लगा । 

“हवेली भीतर से बहुत ही वीरान और डरावनी थी । हर तरफ मकड़ी का जाल फैला था । वो उन जालों से उलझती और हाथों से उन्हें हटाती आगे बढ़ीं कि अचानक भड़ाक की आवाज के साथ उनके पीछे वो बड़ा काला दरवाजा बंद हो गया । अब हवेली में धुप्प अँधेरा था । उन्होंनें अपनी अपनी टार्च जला ली और चारों ओर रोशनी डाली । किसी का ध्यान नहीं गया कि हवेली के मालिक की बड़ी सी तस्वीर ने टार्च की रोशनी पड़ने पर आँखें मिचकाईं।“ कहते हुए कोमल ने भी अपनी आँखे मीच लीं और सामने दीवार पर चल रहे कटे हाथ को न देख सकी । वो फिर पलटी और पेन चबाते-चबाते सोचने लगी ।

इस बीच कटा हाथ दीवार चढ़ते-चढ़ते छत तक पहुँच गया व छत पार कर पुनः फर्श पर आ गया पर कोमल का ध्यान खींचने में असमर्थ रहा ।

“वो चारों टार्च लेकर हवेली की सीढियाँ चढ़ने लगीं । वो सीढियाँ लकड़ी की बनीं थीं और वैसी ही चर्र-चर्र की आवाज कर रहीं थीं जैसी पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ करती हैं। खामोश माहौल में ये चर्र-चर्र ही कम डरावनी नहीं लग रही थी ।“

तब तक वह कटा हाथ अपनी उँगलियों के बल चलते हुआ बिल्कुल उसके सामने आ गया । वह जमीन पर औंधा पड़ा अपनी उँगलियाँ हिला रहा था पर कोमल पेन चबाते हुए डायरी में खोई आगे बढ़ती रही । 


“तभी हेमा जोर से चीखी उसके पैर पर कुछ रेंग रहा था। उसने अपने पैर पर टार्च की रोशनी डाली तो देखा कि उसके पैर पर एक कॉकरोच् चढा था । हेमा ने उसे झटका और कसकर अपने पैरों तले कुचल दिया । “ कहते हुए कोमल ने अपने पैर जमीन पर पटक कर अपनी हाई हील सैंडिल से कुचलने की ऐक्टिंग की, वह कटा हाथ उसी स्थान पर पड़ा था जो, कोमल की हाई हील सैंडिल के वार से बिलबिला उठा पर कोमल ने उसपर तरस नहीं खाया । कोमल को भी अपने पैर के नीचे कुछ आने का आभास हुआ पर फिर भी वह अपनी डायरी में ही खोई रही ।

“उ...हूँ ..... डिस्टर्ब कर दिया । पता नहीं साधू कैसे सफाई करवाता है ? जहाँ तहाँ सामान बिखरा पड़ा रहता है। “ कहते हुए कोमल ने नीचे की तरफ देखे बिना ही उस कटे हाथ को लात मारकर बेड के नीचे फेंक दिया । और कहानी कन्टीन्यू की ।

“अचानक चारों ने देखा कि एक कटा हुआ हाथ हेमा के पैर की ओर अपनी उँगलियों के बल चलता हुआ बढ़ रहा है । चारों सहेलियों की चीख निकल गई और वो तेजी से नीचे की ओर भागीं ।“ कोमल ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई।(1200)



 भूत की कहानी

प्रेमा के बेड के नीचे भूत अपना सिर पटक रहा था और प्रेमा अपनी कहानी में मगन थी । उसने स्नेहा को जाकर पूरा हाल सुनाया और रोने लगा । स्नेहा को उससे हमदर्दी थी पर वो और कर भी क्या सकती थी । 

“कोमल ऐसी ही है जब वो अपनी कहानियाँ लिख रही होती है तो उसे न कुछ दिखाई देता है न सुनाई देता है । अगर उसने तुम्हें देखा भी होगा तो अपनी कल्पना मान लिया होगा, वो अक्सर ऐसी कल्पनाएं करती है और हमें भी कल्पना करने को कहती है कि 

‘देखो वो सामने एक आधे जले चेहरे वाला भूत खड़ा है, जिसकी गर्दन एक ओर इस तरह लुढ़की है मानों टूट ही गई हो और वो लंगड़ाता हुआ आँखों से आग उगलता इसी ओर चला आ रहा है । उसने एक पैर बढ़ाया और तुरंत उसका वो पैर घुटने से टूट गया , अब उसने दूसरा पैर बढ़ाया तो वह भी घुटने से टूट गया भूत को मानों परवाह ही नहीं कि उसके दोनों पैर टूट कर पीछे ही छूट गये हैं। वो घुटनों तक पैरों से इस ओर बढ़ रहा है , उसने फिर पहला पैर उठाया तभी उसका वह पैर जाँघों से टूट गया, फिर दूसरे पैर का भी यही हाल हुआ । इस प्रकार वह जब-जब आगे बढ़ रहा है उसके अंग टूट-टूट कर गिरते जा रहे हैं । वह हाथों के बल आगे बढ़ रहा है पर हाथ भी कुहनी से फिर कंधे से टूट कर पीछे छूट गये। उसे मानों परवाह ही नहीं कि वह अपने अंग पीछे छोड़ता जा रहा है और बस आगे बढ़ रहा है । अब सिर्फ उसका सिर बचा है, जो घिस घिस कर इसी ओर आ रहा है । वो देखो उसकी दोनों आँखे सॉकेट से बाहर गिर गईं हैं पर फिर भी उस सिर को परवाह नहीं वो घिसट-घसट कर इसी ओर आ रहा है।‘ “ स्नेहा ने गरदन हिलाकर कोमल की आवाज की नकल करते हुए कहा। “

“हुँह बकवास कहानियाँ लिखती है ।“ भूत ने मुँह बिचकाया, वह कुछ देर के लिए स्नेहा की कहानी में खो गया था, पर फिर उसे होश आ गया।

“खबरदार जो उसकी कहानियों को बकवास कहा तो । वो बहुत फेमस राइटर है । उसकी कई हॉरर किताबें छप चुकीं हैं । दूसरे लेखक टेबल पर बैठ कर लिखते हैं और वो टहल-टहल कर लिखती है वो भी पेन चबाते हुए । “ स्नेहा ने नाखून चबाकर कहा।

“तुम अपनी सहेली की तारीफ करना बंद करके मुझे बताओगी कि मैं क्या करूँ? ठीक है वो बहुत बड़ी राइटर है पर उससे मुझे क्या ?”

“ओके ठीक है-ठीक है। अच्छा एक बात तो बताओ मैने हॉरर फिल्मों में देखा है कि जीते जी किसी इच्छा के अधूरे रहने पर लोग भूत बन जाते हैं और यदि उस इच्छा को किसी प्रकार पूरा कर दिया जाए तो वो मुक्त हो जाते हैं । क्या तुम्हारा भूत बने रहना जरूरी है ? क्यों न तुम स्वतंत्र होकर पुनः चौरासी लाख योनियों का आनन्द लो ? ”

“मेरी आत्मा की मुक्ति इतनी आसान नहीं । मेरा मालिक मुझे कभी आजाद नहीं होने देगा । “

“कौन मालिक? कौन है जो तुम्हें इस भूतों की दुनिया में कैद करके रखे है ? आखिर तुम भूत बने कैसे ?”

“ये एक लंबी कहानी है ।“ कहकर भूत मुंगेरी लाल की तरह गरदन टेढ़ी कर आँख मिचकाते हुए फ्लैश बैक में चला गया । 

करीब बयालीस वर्ष (1980) पूर्व मैं अपनी सौतेली माँ से परेशान होकर घर छोड़कर भाग गया उस समय मैं पंद्रह वर्षीय किशोर था । मैंने दसवीं पास कर ली थी और ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारे गाँव में एक सरकारी स्कूल था जहाँ पेड़ों की छाँव में कक्षाएं लगा करती थीं । वो भी क्या दिन थे । मै जब दस वर्ष का था तभी मेरी माँ गुजर गई थी । मैं और मेरे पिता खुद ही कच्चा-पक्का पकाते खाते और सुख पूर्वक रहते । फिर एक दिन गाँव के किसी व्यक्ति ने मेंरे पिता को विवाह के लिए एक लड़की बताई । मेरे पिता ने मुझे कहा कि एक बार माँ घर आ गई तो हमारा घर स्वर्ग हो जाएगा । बिना औरत के घर नर्क समान होता है । मैं भी स्वर्ग के लालच में अपनी सौतेली माँ का इन्तजार करने लगा । पर जब से उसने घर में कदम रखा मेरे लिये वह घर नर्क बन गया । मेरे पिताजी हमेशा मुझे डांटते और अपनी मां की आज्ञा पालन करने की सलाह देते । मैं अपनी सौतेली माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने की कितनी भी कोशिश करूँ वह मेरी हर बात में नुस्ख निकालने की कला में माहिर थीं ।

जैसे एक दिन उन्हें खाँसी आ रही थी तो मैं उनके लिए पानी ले आया - “ जहर पिला दे मुझे…….. तू तो चाहता है कि मैं मर जाऊँ ।“ मैं गुस्से से पानी वापस ले गया ।

जब पिताजी आये तो माँ उनसे बोली –“आज मुझे बहुत खाँसी आ रही थी पर इस लड़के से ये न हुआ कि एक ग्लास पानी ला दे मुझे । चाहे मैं मर जाऊं पर ये मेरे मुँह में जल नहीं देगा।“ पिताजी बिना कुछ जाने समझे मुझे डांटने व मारने लगते । 

एक दिन पडोस से पुष्पा चाची आईं तो मेरी सौतेली मां उनसे बतियाने बैठ गई । उसने दिनभर कोई खाना नहीं पकाया तो मैंने खुद बनाकर खा लिया और उसके लिए ढककर रख दिया। इसपर भी वो शाम को पिताजी से बोली कि – “यह दुनिया को दिखाना चाहता है कि सौतेली मां इसको खाना तक नहीं बनाकर देती । पड़ोस की पुष्पा आई थी दो घड़ी उसके साथ बातें करने बैठ गयी तो खाना पकाने में जरा देर हो गई । उस पुष्पा को दिखाने के लिए ये दुष्ट खुद घुस गया रसोई में खाना पकाने । पुष्पा जाते-जाते मुझे ताना मार कर गई । अबतक तो सारे गाँव में मैं बुरी सौतेली माँ के रुप में मशहूर हो गई होंऊँगी, हुंह ... मेरी तो किस्मत ही खराब है । “

“पिताजी मैनें देखा माँ व्यस्त हैं, तो मैनें खाना पका लिया जब ये न थीं तो मैं ही तो खाना पकाता था और आप कितने चाव से खाते थे। माँ मरने से पूर्व मुझे सब घर के काम सिखा कर गई थी। मुझे किसी माँ की जरूरत नहीं थी पर फिर भी आप इसे ब्याह लाये अब ये दिन रात मुझमें खोट ढूँढा करती है । “

“गोपी अपनी माँ के बारे में ऐसा बोलते हैं । अरे औरत बिना घर-घर नहीं होता, मकान होता है, वो औरत ही है जो घर को घर बनाती है । गायत्री से मुझे भी प्रेम था पर अब वो इस दुनिया में नहीं है तो क्या मैं सारी उम्र आँसू बहाता फिरूँ? क्या तू यही चाहता है कि मैं चैन से जी भी न सकूँ ? चल अपनी माँ से माफी माँग ।“

“छः माह हुए मुझे घर आये और ये मुझसे इतनी नफरत करता है पता नहीं पूरा जीवन इसके साथ कैसे काट सकूँगी । कल को मेरे बच्चे हुए तो उनसे भी बदला निकालेगा ।“ वो रोने लगी । बापू को उसकी आँखों में आँसू बर्दास्त नहीं थे। 

“उससे पहले मैं इसे घर से न निकाल दूँगा । ये घर ये खेत सब मेरे हैं । मैं चाहूँ तो इसे दूँ चाहूँ तो न दूँ । तू चिंता न कर मेरा सबकुछ मैं तेरे और हमारे होने वाले बच्चे के नाम कर दूँगा। “ तो अब मुझे पता चला कि मेरी सौतेली मां एक बच्चे को जन्म देने वाली थी और बापू की संपत्ति व स्वयं बापू पर अब मेरा कोई अधिकार नहीं रह जाएगा। यह सोचकर ही मैं परेशान हो गया ।

आखिर मेरी सौतेली से परेशान होकर एक दिन मैनें तय कर लिया कि मैं किसी और गाँव चला जाऊंगा और वहीं कुछ कमा खा लूँगा । मेरा बापू अपनी पत्नी और आने वाली संतान के साथ सुखी रहे यही सोचकर मैंने घर छोड़ दिया । 



घोरगाँव में रोजगार

 मैं चलते चलते इस गाँव में पहुंचा और भोजन की तलाश में घूमने लगा ।

दिल कहे रुक जा रे रुक जा 

यहीं पर कहीं 

जो बात इस जगह है 

कहीं पर नहीं । 

तब मेरी नजर इस हवेली पर गई मैने सोचा इतनी बड़ी हवेली है यहाँ तो कुछ न कुछ बासी तिबासी बचा खुचा मिल ही जाएगा । उस समय गाँवों में किसानों के पास पक्के मकान भी नहीं होते थे । तब के गाँव आज के गाँवों की तरह आधुनिक सुविधाओं से युक्त नहीं थे । अब तो गाँव में भी लोग समारट फोन , और समारट टीवी रखते हैं ।

 खैर हवेली के साहूकार ने मुझे देखा तो कहा “ मैं किसी को मुफ्त में कुछ नहीं देता । मेरा बगीचा साफ कर दे तो तुझे खाना दूँगा । “ मुझे ये बात ठीक लगी मैंने बगीचा साफ कर दिया और राजा साहब ने मुझे बढ़िया-बढ़िया खाने को दिया ।

फिर राजा साहब ने पूछा-“ तू कोई रोजगार करता है ?” मेरे मना करने पर उन्होंने मुझे हवेली के काम के लिए रख लिया । मैंने भी सोचा चलो कुछ खाने पहनने का बंदोबस्त हो जाएगा । राजा साहब की एक आदत थी कि उनसे पैसे निकलवाना बड़ा कठिन काम था । उन्होंने हवेली की साफ सफाई से खाना बनाने तक का काम मुझे सौंप दिया पर नौकरी की एक शर्त रखी कि -“मैं जो भी कहूँगा, तू करेगा, बिना कोई सवाल जवाब किये और अगर तू वो काम न कर सका या सवाल किया तो मैं उस माह की तनख्वाह नहीं दूँगा । चिंता मत कर मैं कोई कठिन काम नहीं करवाऊँगा ये ही घरेलू काम होंगे । बस ।“  राजा साहब ने नियमों का एक लेखा बनवाया और मेरे उस पर हस्ताक्षर और अँगूठा दोनों ले लिये । 


मैं भोला बालक उसके जाल में फँस गया । जब माह समाप्त हुआ और तनख्वाह लेने मैं राजा साहब के पास गया तो राजा साहब ने दो बर्तन दिये और कहा –“ ये बड़ा बर्तन इस छोटे बर्तन के अन्दर डाल दे । “

“ये क्या बोल रहे हैं राजा साहब भला मैं बड़ा बर्तन छोटे बर्तन में कैसे डाल सकता हूं ? हाँ मैं छोटा बर्तन बड़े में डाल सकता हूँ । “

“देख काम की मैनें क्या शर्त रखी थी ? अगर तू कोई काम न कर सका तो मैं तुझे तनख्वाह नहीं दूँगा । अब जा जाकर अपना काम कर और तनख्वाह भूल जा। भला पैसों की जरूरत भी क्या है ? तुझे खाने पीने रहने को तो मिल रहा है न और क्या चाहिए ? “

“हाँ खाने में सड़ी गली सब्जियां और पहनने के लिए अपने से चार गुना बड़े फटे पुराने कपड़े तो मिल ही जाते हैं। पर कभी बीमार पड़ा तो ? इलाज कराने के पैसे तो होने चाहिए न मेरे पास।”

“अरे तो गाँव के सरकारी अस्पताल में मैं स्वयं तेरा इलाज करा दूँगा । अब जा जाकर अपना काम कर । तू चिंता मत किया कर मैं हूँ न ।“

अगले महीने जब पैसे माँगे –“ देख ये लकड़ी की छड़ी बिना काटे या तोड़े छोटी कर दे तो मैं तुझे तनख्वाह दूँ वरना ............”

मैं फिर अपना सा मुँह लेकर चला गया भला बिना तोड़े या बिना काटे मैं छड़ी को छोटा कैसे करता ? 

अगले माह – “चल ठीक है अगर तू मेरे जन्म की सही-सही तारीख दिवस सहित बता दे तो मैं तुझे तेरी पूरी तनख्वाह दे दूँगा । “

“मैं आपकी माँ तो नहीं जो आपकी जन्म की तारीख पता होगी मुझे । ये तो कोई काम न हुआ ?”

“चल आज मैं तुझे एक हिंट देता हूँ , मेरे जन्म की तारीख को तू रोज चमकाता है, फिर भी नहीं जानता । याद कर..... तू रोज मेरे जन्म की तारीख पर पोंछा मारा करता है ।“

“मैंने बहुत दिमाग लगाया पर मुझे याद नहीं आया कि मैं उनके जन्म की तारीख पर मैं कब पोंछा लगाता हूं । एक बार की बात है मैं गेट पर लगे नम्बर प्लेट को चमका रहा था 7/725 पढ़कर मुझे याद आया कि सेठ जी अपनी जन्म तिथि के विषय में प्रश्न पूछ रहे थे और मकान की नंबर प्लेट भी अगर गौर करें तो एक जन्म की तारीख बता रही थी । सात जुलाई 1925 । मैं भागा-भागा गया और सेठ जी से बताया-“राजा साहब आपका जन्म सात जुलाई 1925 को हुआ था।“

लक्ष्मीचरण-“शाबाश ये ले दस रुपये रख । मेरा जनम दिवस बता और पूरी तनख्वाह लेले।“

अब इतने वर्ष पहले सात जुलाई को कौन सा दिन था ? ये पता करने के लिए मैं पूरा महीना लगाता तो भी पता न लगा पाता । इस प्रकार हर महीने वो कोई न कोई ऐसा सवाल मेरे सामने रख देते और मेरी तनख्वाह काट लेते । 

एक दिन बोले –“जा मेरे लिए इतने सेब और केले ले आ कि अगर मैं एक केला खा लूँ तो सेबों की संख्या बचे हुए केले से दोगुनी हो जाए । और अगर मैं एक सेब खा लूं तो बचे हुए सेबों की संख्या केलों के बराबर हो जाए । अगर तू इतने सेब और केले न ला पाया तो तनख्वाह भूल जा ।“

मैनें बहुत दिमाग चलाया पर ये पहेली हल नहीं कर पाया जब-जब सेब केले लेकर गया मालिक एक-एक खाकर दिखाते कि देख इनकी संख्या वैसी नहीं जैसी मैनें कही थी। 

इस तरह तीन-चार माह बीत गये कभी सोचता कि काम छोड़कर चला जाऊं पर फिर लगता यहाँ कम से कम सिर पर छत है, खाने को खाना है और राजा साहब अपने सबसे फटे कपड़े भी दे देते हैं पहनने को । गाँव में अन्य कोई ऐसा परिवार न दिखाई देता था जो इतनी भी सहायता प्रदान कर पाता । फिर ये जगह मेरे बाप के घर से तो अच्छी ही थी , यहाँ कोई सौतेली माँ नहीं थी मुझमें नुस्ख निकालने के लिए । गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुईं तो पता चला कि राजा साहब के दो बेटे और उनकी पत्नी जो शहर में रहते थे वो आने वाले हैं । मैंने सोचा उनके आने पर काम भी बढ़ेगा और कुछ पैसे भी न मिलेंगे । खाने के लिए राजा साहब सस्ती से सस्ती बासी और सड़ी गली सब्जियाँ खरीद कर लाते थे । पता नहीं उनके बच्चे और उनकी पत्नी का स्वभाव कैसा होगा ? मुझे तो अपनी सौतेली माँ याद आ गयी कि कहीं वे भी उसकी तरह न हों । पर जब वो आईं तो...............

“अरे तू कौन है रे? पहले कभी हवेली में देखा नहीं ?” मालकिन के सामने मेज पर जब मैनें चाय नाश्ता लगाया तो उन्होंने पूछा । उनकी वाणी में बहुत स्नेह था । मैं जब दस वर्ष का था तभी मेरी माँ मर गई थी और मालकिन को देखकर उनकी याद आ गई और तो और मालकिन का नाम भी गायत्री था। मैं उन्हें जवाब देता इससे पहले ही राजा साहब ने कहा । 

“ये गोपी है । बेचारा अपनी सौतली माँ से परेशान होकर अपने गाँव से यहाँ भागकर आया था तो मैंने इसे सहारा दिया ।“ राजा साहब से सीना फुलाकर कहा ।

“चलो , कोई तो नेक काम किया तुमने अपनी जिन्दगी में। कितनी तनख्वाह देते हो ?” 

“पूरे पचास रुपये तनख्वाह है इसकी ।“ राजा साहब ने सीना फुला कर कहा । 

“ ये तो अच्छी बात है । इस माह की तनख्वाह मिली तुझे ?”

 मुझे कुछ कहते न बना तो न में सिर हिला दिया । मालकिन ने तुरंत पर्स से निकाल कर पचास रुपये मेरे हाथ में रख दिये । मैं खुशी से लगभग रो पड़ा । मालिक अपनी पत्नी का विरोध न कर सके बस कसमसाकर रह गये । 

“देख गोपी मैं बच्चों की पढ़ाई के कारण शहर में रहती हूँ, तेरे यहाँ रहने से मैं संतुष्ट हूँ कि राजा साहब की देखभाल करने वाला कोई तो यहाँ है । वरना इनके स्वभाव के कारण कोई नौकर एक माह से ज्यादा नहीं टिकता । तू इसे अपना ही घर समझ कोई परेशानी हो तो मुझे एस.टी.डी. कॉल कर लिया करना । “ मालकिन ने प्रेम से कहा । वो मुझे प्रेम से पीठ पर धौल देतीं, कान उमेठती और जब अपने बेटों के सिर में तेल लगाने बैठतीं तो मेरे सिर पर भी तेल ठोक देतीं ।

मालकिन के गांव आने का मैं पूरे बरस इन्तजार करता । उनके स्नेह ने मुझे हवेली छोड़ने न दिया । राजा साहब उन्हें भी बहुत गिनकर पैसे भेजा करते थे पर मालकिन उसमें से भी पैसे बचाकर मुझे कुछ न कुछ पैसे दे जातीं । उनके बेटे भी मुझसे मित्रवत् व्यवहार करते जब वो घर पर होते तो उनके मनपसंद व्यंजन पकाने में मुझे बहुत सुख मिलता । मालकिन ने मुझे कई पकवान बनाने सिखाये । जब वो हवेली पर रहतीं तो किचन वही संभालती थीं । अजय और विजय मुझसे दो -तीन साल छोटे रहे होंगे । मैं अपने और उनके बीच नौकर व मालिक की सीमा बनाये रखता था। हम साथ-साथ घूमते फिरते , लड़ते झगड़ते और वो दोनों मुझे अंग्रेजी सिखाया करते । 



अजय-”चल बोल Ramu is a Good boy रामू एक अच्छा लड़का है ।”


गोपी -“Ramu is a bad boy”


विजय- “Bad नहीं Good।”


गोपी - “ अच्छा …………. भूल गये पिछली बार जब तुम दोनों गांव आये थे तो रामू ने तुम्हें कैसे धोया था? वो तो मैं समय पर पहुंच गया वरना ……………….” अजय विजय ने तुरंत गोपी का मुंह दबाया ।


अजय-”मरवायेगा क्या । अगर पिताजी ने सुन लिया तो ?”


विजय-”गधा कहीं का । अच्छा ठीक है Ramu is a bad boy अब खुश।


 मालकिन का ममतामयी स्वभाव मुझे मेरी माँ की याद दिलाया करता । उनसे मिलने के इंतजार में मैं हवेली में राजा साहब की देखभाल करता रहता । जब वो लोग हवेली में रहते तो हवेली मुझे अपना घर लगने लगती । गरीब आदमी पैसों से नहीं प्रेम से बिक जाता है । इस प्रेम पूर्ण वातावरण की प्रतीक्षा करते हुए कब दस वर्ष बीत गये पता ही नहीं चला । मालकिन कभी-कभी मुझे एसिडिटी कॉल भी करती थीं ।”

भूत की इस बात पर स्नेहा हँसे बिना न रह सकी – “उसे एस. टी. डी. कहते हैं । पहले लंबी दूरी की कॉल सीधे नहीं की जाती थी, पहले एक ऑपरेटर को कॉल किया जाता था, जो लाईन कनेक्ट करती थी, तब कहीं जाकर कॉल पर बात हो पाती थी। बाद में लंबी दूरी की कॉल एस.टी.डी. कॉल कहलाती थी। सब्स्क्राइबर ट्रंक डायलिंग में बिना ऑपरेटर के ट्रंक कॉल कर सकते हैं। “ 

“हां हां वही । हम तो फून की घंटी बजते ही दौड़ पड़ते थे । इस तरह दस बरस बीत गए।“

“मैं समझ सकती हूँ तुम्हारी जगह कोई भी होता तो यही करता । फिर क्या हुआ ?“




भूत की लव स्टोरी

“फिर .....मैं जवान हो गया था और..............” भूत शरमाया “ गाँव में एक लड़की थी...... जिसका नाम भुलिया था.......... मैं सुबह-सुबह पानी भरने के बहाने घाट पर उसे देखने जाता । 

“ए भुलिया ला मैं तोरी मटकी घर पहुंचा दूँ ।“

“न रे । अगर किसी ने देख लिया तो फालतू बात बढ जाएगी । गाँव वाले बातें बनाएंगे।“

“तू क्यों चिंता करती है अगर कोई तुझे परेशान करेगा तो मैं उसका भुर्ता बना दूँगा। ए.... भुलिया ..... मुझे तुझसे कुछ कहना है ।“

“क्या ?”

“तू मुझे बहुत अच्छी लगती है । मैं तुझसे ब्याह करना चाहता हूँ। “

“हुंह.... ब्याह करना चाहता हूं। तू तो खुद नौकर है अपने साथ-साथ मुझे भी राजा साहब की नौकरानी बनाएगा । मेरे बापू ने दूर गाँव में एक किसान लड़का देखा है मेरे लिए । दस बिसवा खेत हैं उसके । नौकरानी बनकर क्यूँ जिऊँ जब मैं मालकिन बनकर जी सकती हूँ। “ 

“अरे मैं कोई नौकर नहीं हूँ राजा साहब तो कंजूस हैं ही पर रानी साहिबा मुझे अपनी औलाद की तरह मानती हैं । “

“चाहे जितना औलाद की तरह मानें पर औलाद की तरह सम्पत्ति में हिस्सा न देंगी । तू तो बुद्धू का बुद्धू रहा । झूठा प्रेम दिखाकर वो लोग तुझे मूर्ख बना रहे हैं । मालिक दुत्कारता है पैसे भी नहीं देता और मालकिन पुचकारती है और भीख की तरह थोड़े से पैसे तुझे दे जाती है, उसी पर इतराता रहता है । “

“देख मेरी मालकिन के बारे में ऐसी बात न कर वो मुझे अपनी औलाद की तरह चाहती हैं। उनका भी नाम गायत्री है और मेरी मां का भी नाम गायत्री था । मेरी सौतेली मां और सगे बाप ने तो मुझे घर से निकाल दिया पर चाहे जैसे भी हो मालिक ने मेरे सिर पर छत दी और मालकिन ने मां का स्नेह दिया । और अजय विजय मुझे सगे भाइयों के समान प्रिय हैं। जा मैं तुझसे बात नहीं करता। अब तो मैं तुझसे कभी नहीं मिलूंगा। तू खुस रह उस दस बिसवा वाले के साथ। “

भुलिया ने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया -“अरे गोपी बुरा मान गया क्या ? देख मैं भी तुझे बहुत चाहती हूं पर... अगर मैनें बापू से हमारी शादी की बात की तो बापू यही कहेगा कि दस बिसवा वाले को छोड़कर नौकर से क्यूँ ब्याह करा दूँ अपनी बेटी का ? देख अगर मालकिन वाकई तुझसे प्रेम करती है तो उससे कहकर छोटा सा खेत ले-ले दस बिसवा न सही दो बिसवा ही सही । मैं तेरे साथ इतने में भी खुस रहूँगी । और बापू भी आसानी से मान जायेगा । अगर जो फिर भी न माना तो मैं तेरे साथ शहर भाग चलूंगी । “

“तू सच कहती है । ठीक है, फिर मैं अपनी मालकिन से जरूर बात करूँगा ।“

"मेरा गोपी। " कहकर जब भुलिया मेरे कंधे पर अपना सिर रखकर दोनो हाथो से मेरी बाजू भींच लेती तो मैं गदगद हो जाता ।

मैं मूर्ख मालकिन से कुछ भी न छुपाता था । अपने प्रेम की कथा भी कह सुनाई । मालकिन बहुत खुश हुईं । पर जब मैंने भुलिया की शर्त बताई तो वो परेशान हो उठीं । 

“भोला दो बिसवा जमीन तो क्या मेरे हाथ में होता तो दस बिसवा दे देती पर तू तो जानता है कि मैं बस नाम की मालकिन हूँ । पर मैं तेरी तरफ से राजा साहब से बात जरूर करूँगी । तू भी तो मेरा बेटा है। दो बिसवा खेत कोई बड़ी बात तो नहीं है। जितनी सेवा तो उनकी करता है उन पर तेरा इतना हक तो बनता ही है । “

मालकिन ने बात की भी थी पर राजा साहब ने कहा-“ ऐसी लालची लड़की से विवाह करने की क्या आवश्यकता है । हुँह.... अभी से मेरी सम्पत्ति पर नीयत लगा रखी है । और तू कोई मेरा बेटा तो है नहीं, जो जायदाद में हिस्सा दे दूँगा । पैसे पेड़ पर नही फलते , बड़ी मेहनत से कमाये जाते हैं, तू भी मेहनत कर और पैसे कमा । “

“आप तनख्वाह तो देते नहीं, पैसे कैसे कमाऊँ? ”

“तूने लिखा पढ़ी में मेरी शर्तें मानी हैं । मैं तो अभी तेरे पिछले सारे पैसे दे दूँ पर तू ही मेरे दिये काम नही कर पाता । अगर तुझे समस्या है तो काम छोड़कर चला जा मैनें क्या रोक कर रखा है । बहुत मिलेंगे तेरे जैसे । “ मालिक ने मुझे फिर दुत्कार दिया और बही खाते में जोड़ घटाना लगाने लगे । कभी तनख्वाह न देनी पड़े इस डर से उस कंजूस ने मुनीम भी नहीं रखा। कभी-कभी मुझसे ही बही में हिसाब-किताब भी करवा लेता था। मैं दसवीं पास तो था ही । 

एक मन किया काम छोड़कर चला जाऊं पर अपनी किस्मत को कोसता पड़ा रहा । 

"मालकिन के बस में होता तो दस बिसवा दे देती पर वो मरजाना he is a moron."

" क्या?"

" moron नहीं समझी moron माने एक नंबर का कंजूस और गधा है। तुझे क्या जरा भी अंग्रेजी नही आती ? "

"ना मैं तो दूसरी कच्छा के आगे न गई । पर तू तो बड़ा पढ़ा लिखा लागे है ?" भुलिया ने चहक कर कहा तो गोपी की छाती चौड़ी हो गई। 

"I learn अंग्रेजी from Ajay and Vijay . मैं तुझे सीखा दूंगा । "

“अच्छा तो चल इस नाशपाति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं बता । “ भुलिया नेे अपने हाथ में पकड़ी नाशपाती की ओर इशारा किया । 

“देख नाश माने Demolish और पति माने Husband दोनों को मिलाकर Demolished Husband. “ 

“वाह……………. मैं तुझे इसीलिए तो पसंद करती हूँ क्योंकि तू बड़ा भोला है। और इस गांव में कोई भी तेरे बराबर पढ़ा लिखा नहीं हैं । गांव के सब लड़के उजड्ड और गंवार हैं पर तू उनकी तरह नहीं है । और ……………. तू सुंदर भी है।” भुलिया ने शरमा कर कहा।

“सच ।” मैं भुलिया के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर खुश हो जाता । 

“हाँ सच । मैं तो जानबूझ कर नदी पर तुझसे मिलने के लिए ही पानी लेने आती हूं और जानबूझकर यहां घंटों लगाती हूं। चाहे तो मेरी मां से पूछ ले, जो इसके अलावा मुझसे घर का कोई भी काम करा ले तो मेरा नाम भुलिया नहीं ।” हम दोनों साथ में हंसे । भुलिया बड़ी जिद्दी थी । उसके दो छोटे भाई थे और वो अपने पिता की बड़ी लाडली थी। उसकी मां थोड़ा सख्त थी पर पिता के सामने उनकी चलती न थी । इसलिये भुलिया का मन करता तो मां का हाथ बंटाती मन न करता तो दिनभर मेर साथ घाट पर बैठी रहती । भुलिया बहुत सुंदर थी गांव के कई लड़के उसे पसंद करते थे पर वो मु्झपर फिदा थी सब ऊपरवाले की महिमा है । 

इस तरह भुलिया से मेरी निकटता बनी रही । उसे मुझसे सहानुभूति थी । वह बोली कि वो अपने बापू से बात करेगी और अगर वो न राजी हुए तो मेरे साथ भाग भी चलेगी । पहले मालकिन के प्यार के कारण रुका रहा फिर भुलिया के प्यार ने रोक लिया । (1130)



पेंटिंग बनवाने का राजसी शौक

इसी समय एक दिन गाँव में एक चित्रकार आया वो बहुत सुंदर चित्र बनाता था । वो किसी की भी हूबहू चित्रकारी कर सकता था मानों कैमरे से फोटू खींची हो । हमारे राजा साहब के पास कैमरा था पर वो कंजूसी के कारण ज्यादा फोटो नहीं खींचते थे। उन्हें जब पेंटर के विषय में पता चला तो उनपर राजा महाराजाओं की तरह पेंटिंग बनवाने का शौक चढ़ गया । मुझसे उन्होंने कहा कि जाकर उस चित्रकार को बुला लाओ । मैं गया और चित्रकार से बताया कि मेरे मालिक तुमसे अपना चित्र बनवाना चाहते हैं। तो यह सुनकर चित्रकार बहुत खुश हुआ उसे उम्मीद थी कि गाँव का सबसे बड़ा और अमीर साहूकार उसे बहुत बड़ा ईनाम देगा। पर, उसे क्या पता कि वो साहूकार कितना कंजूस था । उसने कई दिनों की मेहनत से राजा साहब का चित्र तैयार किया । पर चित्र बनने के बाद राजा साहब ने उसे उसकी आशा से कहीं कम पैसे दिये । चित्रकार राजा साहब से नाराज था । वह प्रतिदिन पैसे मांगने आता पर राजा साहब के कहने पर मैं उसे धक्के मारकर भगा देता ।

“लक्ष्मीचरण तू लक्ष्मीदास है, लुटेरा है, चोर है, तुझे मेरा श्राप लगेगा, मेरे पैसे तुझे हजम न होंगे । तू संडास में मरेगा । “ सारे गाँव में वो पेंटर राजा साहब की बुराई करता घूमा करता। 

वह पेंटर एक तांत्रिक भी था गांव वाले कहते कि वह रात में श्यमशान में बैठ कर चिताओं की रोशनी में चित्र बनाया करता था और उसने शमशान में ही अपने लिए एक घास फूस की छोटी सी झोपड़ी बना रखी थी । वह लाशों के खून, राख व हड्डी के प्रयोग से चित्रकारी करता था । राजा साहब से बदला लेने के लिए उसने हूबहू वैसा ही चित्र बनाया जैसा राजा साहब के पास था और उसमें राजा साहब की जगह अपना चेहरा लगा दिया । वह तंत्र विद्या से स्वयं को राजा साहब से बदलना चाहता था इसके लिए उसे असली चित्र से यह नकली चित्र बदलना था और राजा साहब के खून की जरूरत थी। एक दिन वो मुझे बाजार के पास मिला और जबरन मुझे प्यार जताकर अपनी घास फूस से बनी झोपड़ी में ले गया , उसने मुझसे चिकनी चुपड़ी बातें की और मुझे एहसास दिलाने लगा कि राजा साहब मुझे कितना बेवकूफ बना रहे थे और मुझे उनसे बदला लेना चाहिए था।

उसने मुझे चाय नाश्ता परोसा और बड़ी आवभगत की । मैं अभीभूत हो उठा । मैंने उसे अपने और भुलिया के विषय में सब बता दिया । ये भी कि भुलिया से शादी के लिए मुझे कम से कम दो बिसवा जमीन चाहिए । 

“गोपी तू बहुत भोला है । हो भी क्यों न, तूने दुनिया देखी ही कहां है ? मुझे देख पूरे भारत की सैर कर चुका हूँ और देख चुका हूँ कि ये पैसे वाले सेठ साहूकार सब एक जैसे होते हैं। पहले दुत्कार कर और फिर पुचकार कर दोनों तरह से हमारी मारते हैं। कभी पालतू कुत्ता देखा है ? कैसे मालिक की लात खाने के बाद भी, जैसे ही मालिक ने पुचकारा फिर दुम हिलाता चला आता है मालिक के पास । तेरी हालत तो ऐसी ही बना रखी है राजा साहब और उसकी पत्नी ने । राजा साहब दुत्कारते हैं और मालकिन पुचकारती है । अरे इतनी मेहनत तू शहर में करता तो इसी गाँव में इसी साहूकार के बगल में इससे भी बड़ी तेरी कोठी होती । “

“क्या तुम सच कहते हो?”

“हाँ मेरे भाई । शहर में बहुत रोजगार है । पर भोले-भाले मनुष्यों को हर जगह बेवकूफ बनाया जाता है । तू वहाँ भी होता तो शायद तेरी यही गति होती । पर एक तरीका है जिससे तुझे दो बिसवा जमीन और भुलिया दोनों मिल सकते हैं। “

“वो कैसे ?”

“मैं तंत्र विद्या जानता हूँ । मैं अपने शरीर से राजा साहब का शरीर बदल लूँगा फिर मैं राजा साहब की जिन्दगी जिऊँगा और वो मेरी । तब मैं तुझे दो क्या दस बिसवा जमीन दे दूँगा और रुकी हुई दस सालों की पगार भी दे दूँगा । वो राजा साहब दर-दर की ठोकर खाएगा और हम मजे करेंगे । किसी को पता नहीं चलेगा । उसकी पत्नी और बच्चे तो शहर में रहते हैं उन्हें भी पता नहीं चलेगा । तुझे बस ये दोनों पेंटिंग आपस में बदलनी है और किसी प्रकार इस पेंटिंग पर लगाने के लिए राजा साहब के खून की एक-दो बूंद लानी है।“ चित्रकार बासठ तिरसठ साल का रहा होगा उसकी उम्र लगभग राजा साहब की उम्र के बराबर थी पर वो राजा साहब के विपरीत दुबला पतला और फुर्तीला था जबकि राजा साहब मटके जैसी तोंद वाले गोल मटोल व्यक्ति थे जिन्हे गठिया के कारण चलने फिरने में परेशानी होती थी ।

मुझे उसका ये पिलान बहुत अच्छा लगा , मैं राजा साहब का खून प्राप्त करने के लिए जुगत लगाने लगा । एक सुबह मैं राजा साहब की दाढ़ी बनाने पहुंचा ।

“राजा साहब आपकी दाढ़ी बहुत बढ़ गई है लाइये बना देता हूं। “

“चल ठीक है बना दे । “ मेरे हाथ दाढ़ी बनाते समय कांप रहे थे क्योंकि दिमाग में कुछ और ही चल रहा था । दाढ़ी बनाने के बाद आखिरी बार मैंने उस्तरा थोड़ा तिरछा करके जैसे ही गाल पर फेरा एक जगह से खून निकल आया । 

“ये क्या कर रहा है ?” कहकर राजाजी ने मुझे झटका और अपने गले में पहने गमछे से ही गाल पोंछने को हुए पर मैंने गमछा कसकर पकड़ लिया ।

“नहीं हुजूर माफ कर दीजिए पता नहीं मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी जो ऐसी गलती कर गया । “ मैं चाहता था कि कुछ खून की बूंदे बहकर जमीन पर न गिर जाएँ तब तक राजा साहब को मुँह न पोछंने दूँ । 

“अरे कोई बात नहीं अब गमछा तो छोड़ खून बह रहा है ।“ राजा साहब ने गमछा अपनी ओर खींचा।

“नहीं पहले आप कहिए कि आपने मुझे माफ कर दिया वरना मैं रो – रो कर आपके चरणों में अपनी जान दे दूँगा । “ मैनें देखा एक बुँदें लुढक कर ढोडी तक पहुँच चुकी थी । 

“अरे ...तो क्या जब तक तुझे माफ न करूँगा तबतक तू मुझे मुँह ही न पौंछने देगा ?” इतने में एक के बाद एक तीन बूँदे जमीन पर गिर गईँ तो मैंने गमछा छोड़ दिया । मेरे अचानक गमछा छोड़ने से राजा साहब कुर्सी पर पीछे लुढ़क गये। 

“हुजूर माफी दे दीजिए । “ मैंने लालच से खून की बूँदों को देखते हुए कहा ।

“अरे तू आज इतनी ओवर ऐक्टिंग क्यों कर रहा है ? ये कोई नई बात तो है नहीं जब तूने मेरा खून निकाला है । तुझे तो दाढ़ी बनाना भी मैनें ही सिखाया है । अब फर्श साफ करके नाश्ता लगा दे । “ कहकर राजा साहब ने मुँह पोंछा और नहाने के लिए गुसलखाने में घुस गये । मैंने सावधानी से खून की बूँदों को एक डिब्बी में धरा और रात में राज साहब के सोने के बाद पेंटर के घर पहुँचा । (1095)

[10:52 am, 27/06/2022] Arsha Infra Developers: आत्माओं की स्वैपिंग


रात में जब मैं पेंटर के घर पहुंचा तो पाया कि पेंटर ने तंत्र मंत्र की पूरी तैयारी कर रखी थी । जमीन पर संदूर से एक आकृति बना रखी थी जो गोल, त्रिकोन , चौकोर और सभी ज्यामितीय आकारों के मिश्रण से बनी थी । इसके बीच में एक मानव खोपड़ी रखी थी और खोपड़ी के पीछे वो पेंटिंग खड़ी थी । पेंटर ने पूजा प्रारंभ की और बीच-बीच में मंत्र पढ़ते-पढ़ते अपने बड़े-बड़े बालों वाले सिर को बुरी तरह झटक रहा था ऐसा करते हुए वो बहुत डरावने तरीके से मजाकिया दिख रहा था । एक मन तो कर रहा था कि भाग खड़ा होऊँ पर मजा भी बहुत आ रहा था ।



दुबला पतला पेंटर जब अपने बदन को झटके देता तो मेरे पेट में तो बल पड़ जाते थे, हँसी रोके न रुक रही थी। पहली दफा ऐसा तंतर मंतर देखा था, तो उत्सुक भी था कि क्या वाकई ऐसे तंत्र मंत्र असर करते भी हैं या नहीं ? कम से कम दस बारह पसलियां तो हंसी रोकने में चटख गयीं होंगी। आखिर पेंटर ने झटके कम किये और मुझसे राजा साहब का खून मांगा । मैंने वह डिब्बी उसे दे दी जो उसी ने मुझे खून भरने के लिए दी थी । पेंटर ने अपने ब्रश को शीशी में रखी खून की बूँदों पर मला और फिर पेंटिंग में राजा साहब की लाल पगड़ी पर वह खून लगा दिया ऐसा करते वक्त भी वो कोई मंत्र बुदबुदा रहा था । फिर उसने अपनी हथेली पर चाकू से घाव बनाया और अपना खून भी इसी प्रकार पेंटिंग पर रंग दिया । कुछ और मंत्र पढ़ने के बाद उसने पूजा समाप्त की । 


“बस एक और काम कर दो फिर तुम जाकर चैन से सो जाओ । कल मैं तुम्हें राजा साहब के रूप में हवेली पर मिलूंगा पर इस रूप में नहीं बल्कि लक्ष्मीचरण के रूप में । और हाँ यह पेंटिंग हवेली पर ले जाकर उस पेंटिंग की जगह टाँग देना और वो वाली मुझे दे देना । कल से तुम्हारे और मेरे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे और राजा साहब के दुख भरे दिन शुरु हो जाएँगे । “ वो मेरे साथ-साथ हवेली तक पेंटिंग लेने आया । 


मैनें पेंटिंगें बदल कर उसे असली राजा साहब की पेंटिंग दे दी जबकि नकली पेंटिंग उसी जगह पर टाँग दी । पेंटर ने बताया कि वो वह असली पेंटिंग जला देगा । 


अगली सुबह मैं चाय बनाकर राजा साहब के कमरे में ले गया । राजा साहब बिस्तर पर चाय पीते थे, न कुल्ला न मंजन । कहते थे अंग्रेज इसे “बैड टी” कहते हैं । उनका कहना था कि रात में ही दाँत ब्रुश करके सोने के कारण सुबह की पहली चाय पीने के लिए ब्रुश करने की जरूरत नहीं। 


“बेड टी ।“ स्नेहा ने उसकी प्रोननशियेशन दुरुस्त करते हुए कहा ।


“क्या कहा ?”


“कुछ नहीं तुम आगे की कहानी बताओ । “


“राजा साहब उठिये । हम आपके लिए बैड टी लाएँ हैं । “ मैंने राजा साहब को आवाज दी तो वो उठ कर बैठे और मेरी ओर मुस्कुराकर देखने लगे । फिर उन्होंने अपने हाथ पाँवों की ओर आश्चर्य से देखा जैसे पहली बार देख रहे हों । वो उठकर कमरे में लगे आदमकद आईने के सामने खड़े होकर स्वयं को निहारने लगे मानो शादी में जाने के लिए तैयार हुए हों। 


“ मेरा जादू चल गया । मैं जानता था कि मैं ये कर सकता हूँ। अगर जरा भी चूक हो जाती तो राजा साहब के पास मेरी सारी याददाश्त चली जाती और मेरा शरीर भी न बदल पाता। “राजा साहब ने मुझे पकड़कर कहा । 


“क्या कहा ? क्या मतलब सारी याददाश्त् चली जाती ? “


“मतलब यह कि जब हम अपनी आत्मा बदल रहे थे तो हमारे शरीर के साथ-साथ हमारी यादें भी साझा हो रहीं थीं । अगर यह प्रक्रिया अधूरी रह जाती तो राजा साहब के दिमाग में कुछ मेरी यादें और मेरे दिमाग में कुछ उनकी यादें बची रह जातीं। “


“हाय राम ।“ सिर पर हाथ मार कर मैं बोला – “मतलब अगर जादू न चलता तो राजा साहब को पता चल जाता कि मैं उनके साथ धोखा कर रहा हूँ।“


“हां ... पता चल सकता था । इस बारे में कुछ पक्का नहीं कह सकते कि कौन सी याद उनके दिमाग में ही छूट जाती ? “


“राजा साहब तो अपनी दूनाली से मेरा दिमाग ही उड़ा देते । खैर, अब बताओ मेरी तनख्वाह कब दोगे ? तुमने कहा था कि तुम मेरी दस साल की तनख्वाह दे दोगे और दस बिसवा खेत भी मेरे नाम कर दोगे।“


“अरे अभी लो ....... पर तिजोरी की चाबी ?” उसने कमरे में इधर उधर देखते हुए कहा ।


“तुम्हारी धोती में .............. मतलब राजा साहब धोती में बाँधकर रखते हैं । “


उसी दिन मुझे मेरी पिछली सारी तनख्वाह मिल गई । 


मैं भुलिया को यह खुशखबरी सुनाने के लिए मरा जा रहा था पर भूख भी लगी थी तो सोचा कुछ अपने और राजा साहब बने पेंटर के लिए पका लूँ । पेंटर बैठक में बैठा इधर उधर ताक रहा था । तभी फोन की घंटी बजी तो उसने उत्सुकता से फोन उठाया । वह पहली बार फोन से बात कर रहा था तो बहुत ही उत्सुक था फोन पर बात करने के लिए । 

“हालो कौन बोल रहा है ?” पेंटर ने चिल्लाकर पूछा । 

“मैं पूछती हूँ कि तुम्हें अपने बीबी बच्चों की कोई परवाह है भी या नहीं ? हम चाहे जीएं चाहे मरें तुम अपने पैसे अपनी छाती से चिपकाये रहना । अरे कब से इंतजार कर रही हूँ अभी तक मुझे मनी ऑर्डर क्यों नहीं किया ? बच्चों की इंजीनियर कॉलेज फीस भरनी है , दूध वाले , सब्जीवाले , किराने वाले का हिसाब करना है । हर बार जबतक मैं फोन करके चिल्लाती नहीं हूँ तबतक तुम तो पैसे दाबे बैठे ही रहते हो । अब क्या मेरे मरने पर पैसे भेजोगे ? देर से फीस जमा करने पर हर्जाना भरना पड़ता है । तुम्हारे प्राण न निकल जाएंगे हर्जाना भरने में ? और मेरे बच्चों के भविष्य के साथ तो मैं समझौता करूंगी ही नहीं । ये उनका अंतिम साल है फिर मेरी तपस्या सफल हो जायेगी । ” आधे घंटे तक उस तरफ से कोई औरत लक्ष्मीचरण के शरीर में रह रहे पेंटर को कोसती रही । आखिर उसने फोन रखा तो लक्ष्मीचरण बना पेंटर सोफे पर धम्म से गिर पड़ा और दिल पर हाथ रखकर हाँफने लगा ।


“रे गोपी ये मनी ऑर्डर कैसे करते हैं रे ? कोई औरत फोन पर बहुत कोस रही थी ।”


“मालकिन होंगी । जब तक वो फोन पर कोसती नहीं तब तक बुड्ढा पैसे भेजता ही कहाँ है ? तुम चिंता मत करो मुझे पैसे दे देना मैं मनी ऑर्डर कर आऊंगा ।”

“अरे जितने तिजोरी में हैं सब भेज दे । हे भगवान ये औरत तो साक्षात् चंडिका का अवतार है । मेरा तो दिल बैठा जा रहा है । और सुन मनी ऑर्डर करने जाना तो मेरे लिए मंहगा वाला कैनवास, रंग और ब्रुश लेते आना । अब मैं बनाऊँगा अपनी मास्टर पीस पेंटिंग। “ अपनी उखड़ी सांसों पर काबू पाते हुए पेंटर ने कहा । 


मैं ये खुशखबरी भुलिया को देने जा ही रहा था कि अब हमारे सब कष्ट दूर हो जाएंगे कि तभी गेट पर पेंटर बन चुके राजा साहब दिखाई दिये ।


  “अरे ओ गोपी गेट तो खोल मुझे अन्दर आने दे ।“


“तू फिर चला आया । राजा साहब कल ही शहर चले गये हैं, अपने बच्चों के पास, जब आएंगे तब अपना पैसों का हिसाब करना ।“ मैंने जानबूझकर अनजान बनते हुए कहा ।


“झूठ मत बोल । मैं ही लक्ष्मीचरण हूँ, राजा साहब । पता नहीं मैं पेंटर की झोपड़ी में कैसे पहुँच गया ? रे गोपी तू तो मुझे बचपन से जानता है । तू भी मुझे नहीं पहचान रहा ?” उसने बेचारगी से मुझे मनाया।


“अच्छा तू राजा साहब है... तो मैं अमिताभ बच्चन हूँ । चल भाग यहाँ से । “ मैंने नामझ बनकर पेंटर राजा साहब को वहाँ से दूर खदेड़ दिया जैसे मैं हमेशा असली पेंटर के साथ करता था । फिर अपनी भुलिया को खुशखबरी देने पहुंच गया । गाँव के बच्चों से पूछता पछता आखिर एक गन्ने के खेत में पहुँचा जहाँ भुलिया चोरी से गन्ने चूस रही थी । 


“रे भुलिया ........ एक खुसखबरी है ।“ मैं अचानक प्रकट हुआ तो वह डर गई।


“क्या ? राजा साहब ने तुझे गोद ले लिया क्या ? और किसी तरह तो वो दो बिसवा खेत तुझे देने से रहा । ” भुलिया ने चूसा हुआ गन्न थूकते हुए कहा ।


“नहीं रे ......... ये देख राजा साहब ने मेरे दस साल की तनख्वाह दे दी ।“ मैंने उसे नोट दिखाए तो उसकी आँखे चमक उठीं । “अब राजा साहब बदल गए हैं । देखना वो जल्दी ही दो क्या दस बिसवा जमीन मेरे नाम कर देंगे । अब वो मेरी सब बात मानते हैं। “

“चले गपेड़ू कहीं का । जरूर किसी से उधार लेकर आया होगा मुझे दिखाने के लिए ।“

“न गौरी सच में । जिसकी कहे उसकी कसम उठा लूं । “


“मैं नहीं मानती कि राजा साहब जैसा कंजूस मक्खी चूस बदल सकता है । अगर तू सच कह रहा है तो .............. कुछ सोचकर वो बोली – मेरे बापू का पांच हजार रुपये का कर्ज माफ करवा दे । बापू खुश होकर मेरा हाथ तेरे हाथ में दे देगा । “


“हाथ कंगन को आरसी क्या , और पढ़े लिखे को फारसी क्या ? आज ही शाम को हवेली पर भेज दे अपने बापू को ।“


कर्ज माफ

शाम को भुलिया उसके छोटे भाई उसकी माँ और उसका बापू हवेली पहुंचे तो मैंने उन्हें कहा –“देखो ससुर जी .......... अ… अ… मेरा मतलब विकटराम जी, जैसे ही राजा साहब नीचे आयें तुम उनके पैर पकड़ लेना और जबतक मैं न कहूँ छोड़ना मत , बाकी सब मैं देख लूंगा । “ विकटराम ने स्प्रिंग वाले गुड्डे की तरह सिर ऊपर नीचे हिलाया । 

“राजा साहब ........ नीचे आइये आपसे मिलने विकटराम जी आए हैं। “ योजनानुसार सिगार पीते हुए शाही अंदाज में राजा साहब रुपी पेंटर नीचे आया । तभी विकटराम उसके चरणों में गिर गया । वह इतनी जोर से उनके चरणों पर झपटा कि राजा साहब कुर्सी पर धम्म से गिर गये । 

“अरे विकटराम जी मेरे पैर तोड़ना चाहते हैं क्या आप?” राजा बने पेंटर ने परेशान होकर कहा ।

“हुजूर कैसी बात करते हैं हम तो आपकी प्रजा हैं और आप हमारे राजा । जिन चरणों में हमे आसरा पाना है भला उन्हें क्यों तोड़ेंगे प्रभु। “

“ठीक है, ठीक है पर आपको क्या काम है मुझसे ? “

“हुजूर बड़ी मुसीबत आन पड़ी है । इस साल खेत में एक दाना भी नहीं फला , बीबी को टीबी हो गया है , बेटी का ब्याह सिर पर है , बेटों को हैजा हो गया है और मैं खुद कई दिनों से निमोनिया का इलाज करवा रहा हूँ । इस मुश्किल घड़ी में अब आपका ही सहारा है ।“ 

“ओह... तुम्हारा तो पूरा परिवार ही समस्याग्रस्त है पर मैं क्या करूं भला ? न मैं डॉक्टर हूँ कि तुम्हारी पत्नी, बच्चे और तुम्हारा इलाज करूँ , न पंडित हूँ कि लड़की के लिए लड़का बताऊँ ? और अगर बात पैसों की है तो तुम्हारा पिछला उधार ही इतना बाकी है कि नया कैसे दे दूँ?”

“हुजूर मैं उधार मांगने नहीं आया ।“

“तो अपनी दुख भरी कहानी सुनाने आये हो ? अरे भाई दूर से सुनाओ , भला टाँग तोड़ कहानी सुनाने की क्या आवश्यकता है ?” पैर छुड़ाते हुए लक्ष्मीचरण बने पेंटर ने कहा ।

“अरे विकटराम जी आप राजा साहब का पैर छोड़िये, मैं बात करता हूँ आपकी ओर से । वो क्या है राजा साहब.... कि ये अपने पिछले कर्ज माफ करवाने आये हैं । हुजूर... विकटराम जी बहुत मुसीबत में हैं ऐसे में आपके जैसे धर्मात्मा से नहीं तो किससे आस लगाएँगे । आप ही तो हम सबके भगवान हैं। आप से ही हमें सहारा है । “ मैंने राजा साहब से निकटता जताते हुए बोला विकटराम ने हां में गरदन हिलाई ।

“ओह , तो ये बात है। ठीक है, गोपी तू तो स्वयं पढ़ा लिखा है, जरा देखकर बता कितना कर्ज बाकी है इनका । “

मैनें बही का वह पन्ना राजा साहब के सामने रखा जिसपर भुलिया के पिता का हिसाब किताब था –“ ये देखिये राजा साहब बस पाँच हजार रुपये का हिसाब है । “

“बस पाँच हजार रुपये.... अरे इतने पैसे में कौन सा मेरी हवेली बिकी जा रही है । जा अभी ये पन्ना फाड़कर यहीं जला दे । अब तो खुश हो भुलिया के बापू । अब तो रिश्ता मंजूर है ?” राजा साहब बने पेंटर ने ओवर ऐक्टिंग कर दी मैंने उसे घूरा तो वह सकपका गया।

“हां हां हुजूर खुश तो मैं बहुत हूँ पर ... कैसा रिश्ता ?”

“वो कह रहे हैं अब तो राजा साहब से मित्रता का रिश्ता हो गया तुम्हारा । “ मैनें बात संभाली । 

“हां हा हुजूर । आपने हम गरीबों को मित्र समझा यह तो बहुत बड़ी बात है हमारे लिए । “ विकटराम ने झूम कर कहा । 

मैने विकटराम के सामने ही बही का वह पन्ना जला दिया । फिर उन्हें छोड़ने बाहर तक आया । भुलिया ने मुझे देखकर आँख मारी । 

“विकटराम जी बाकी समस्याएं तो आपकी दूर हो गईं, अब रही बेटी की शादी की बात तो कैसा दामाद चाहिए आपको ?“ अपनी ओर इशारा करके मैने पूछा। 

“अरे बिल्कुल तुम्हारे जैसा दामाद चाहिए बेटा, जो मेरे बेटे की तरह मेरे दुख को अपना दुख समझे । काश तेरे नाम कहीं दो – तीन बिसवा जमीन भी होती तो मैं अपनी बेटी का हाथ तेरे हाथ में दे देता । पर क्या करूँ नौकर आदमी का क्या भरोसा? कब मालिक लात मार के नौकरी से निकाल दे ? और वो सड़क पर आ जाए । मैनें अपनी बेटी के लिए पड़ोस के धर्मा गांव के कर्मा किसान का बेटा नर्मा चुना है । बस वहीं अपनी बेटी का ब्याह तय कराने की इच्छा है । शादी के खर्च की चिंता सता रही थी सो तुमने वो भी दूर कर दी । धर्मा गाँव के कर्मा किसान के पास पाँच बिसवा जमीन है और उसके एक ही लड़का है। मेरी बेटी तो वहाँ राज करेगी । “ विकटराम की बात सुनकर मैं चौंका । 

“पांच बिसवा पर .............” मैनें भुलिया की ओर देखा तो उसने जीभ काटकर अपने कान पकड़े । मैं समझ गया कि वह बढ़ा चढ़ा कर बोल रही थी कि लड़के के पास दस बिसवा जमीन है । उनके जाने के बाद मैं सीधा पेंटर राजा के पास पहुँचा । 

“जल्दी से छः बिसवा जमीन मेरे नाम कर दो । धर्मा गाँव के कर्मा किसान का बेटा नर्मा पाँच बिसवा खेत का मालिक है तो मुझे बस छः बिसवा जमीन चाहिए उससे आगे रहने के लिए । “

“ठीक है मैं अभी अपने वकील को फून करता हूं । पर ........ उसका नंबर क्या है ?” फोन की ओर बढते हुए राजा साहब बना पेंटर रुक गया । 

“वो वहाँ फोन की डिक्सनरी रखी है, उसी में देखो भोलानाथ वकील का नंबर, राजा साहब ने उस पर पेन से गोला कर रखा है । जाने दो..... मैं ही मिलाकर देता हूँ । “ मैंने वकील को फून मिलाकर उसे रिसीवर पकड़ा दिया । 

फोन पर वकील साहब से बात करने के बाद जब पेंटर राजा ने फोन रखा तो उसका चेहरा उतरा हुआ था।

“क्या कहा वकील ने ?”

“कह रहा था कि कागजात बनवाकर लाता हूँ आप हस्ताक्षर कर दीजिएगा काम हो जाएगा ।“

“सच.... तो तुमने क्या कहा ?”

“मैंने कहा कुछ दिन रुक जाए फिर बताता हूँ कि क्या करना है ?”

“क्यों ? तुम मुझे धोखा दे रहे हो ?” 

“नहीं रे गोपी । इन सब चक्करों में मैं भूल ही गया कि मैं अनपढ़ हूँ, लिखना पढ़ना नहीं जानता । मैं अपना हस्ताक्षर नहीं कर सकता तो राजा साहब का हस्ताक्षर कैसे करूँगा? वकील से कागजात बनवाने से पहले मुझे कोई उपाय करना होगा कि मुझे कागजातों पर हस्ताक्षर न करना पड़े बस अँगूठा लगाना पड़े क्योंकि अँगूठा तो राजा साहब का ही होगा न । “ उसने मुझे अँगूठा दिखाकर कहा ।

“ओह तो ये बात है । “

मैने और राजा बने पेंटर ने कई दो दिन तक सोचा फिर हमने एक युक्ति लगाई । हमने वकील को फोन पर बताया कि राजा साहब के हाथ की आठों उंगलियों में चोट लग गई है, इसलिए क्या वो जायदाद के पेपर पर अँगूठा लगा सकते हैं । वकील ने कहा कि हाँ ऐसे में अँगूठे से भी काम चल सकता है । हमने कागजात तैयार करने को कह दिया । 

इस बीच पेंटर बने राजा साहब घर के बाहर आकर चिल्लाते, चीखते, रोते, बिलखते और हवेली में आने की जिद करते पर मैं हर बार उन्हें भगा देता। 

“गोपी ये मैं हूँ, राजा साहब, तेरा असली मालिक, वो बहरूपिया है जो हवेली में रह रहा है । “

“चल-चल बड़े देखे तेरे जैसे । राजा साहब ने कहा न कि वो तुझे अब एक कौड़ी भी नहीं देंगे तो क्यों रोज-रोज परेशान करने चला आता है । जाके मर कहीं .... पर यहाँ मत आइयो ।“ मैं राजा साहब से बदला लेने के उद्देश्य से पेंटर बने राजा साहब को दो चार तड़ी लगाना न भूलता । धीरे-धीरे उनका आना कम होता गया आखिर तंग आकर वह हार मान गया और हवेली पर आना ही बंद कर दिया । मैंने भी चैन की साँस ली । (1209)


जो दिखता है वो होता नहीं

अगले ही दिन वकील कागजात तैयार कर लाया, राजा बने पेंटर ने अँगूठा लगाकर छः बिसवा जमीन मेरे नाम करवा दी , भुलिया के बापू को हवेली पर बुलवा कर मेरा और भुलिया का विवाह भी तय करा दिया और मेरे और मेरी ही जमीन पर हमारे लिए एक सुंदर झोपड़ी भी बनवा दी । मैं खुशी से फूला न समा रहा था । मैं इतना अंधा हो चुका था कि राजा बने पेंटर के स्वभाव में बदलाव को नहीं देख पाया । 

कुछ ही सप्ताह के बाद ही पेंटर जो राजा साहब के शरीर में था वह परेशान रहने लगा था। उसने पेंटिंग बनाने के लिए मंहगा कैनवास खरीदा और सुंदर रंग खरीदे ताकि वह अपना मास्टर साहब पीस पेंटिंग बना सके । “

“यू मीन मास्टर पीस”

“हाँ वही............. पर वह इस शरीर में पेंटिंग नहीं बना पा रहा था । बुढापे के कारण राजा साहब का हाथ कांपा करता था जिससे पेंटर कभी मनचाहा चित्र नहीं बना पा रहा था । वह हमेशा कहता कि अब मेरा ब्रुश मेरी बात सुनता ही नहीं । हम सबको यह लगता है कि हमसे बेहतर जीवन दूसरे जी रहे हैं, पर जब हम उनका जीवन जीने लगते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हमारा जीवन कितना सुखमय था। ऐसा ही कुछ पेंटर के साथ हुआ । वह जब गरीब था तो उसे कोई रोग न था पर राजा साहब के शरीर में जोड़ों का दर्द रहता था । उन्हें उच्च रक्तचाप भी रहा करता था । वह पेंटर जब गरीब था तब कभी एक स्थान पर नहीं रुकता था और पूरे भारत की यात्रा पैदल ही किया करता था। पर राजा साहब के रोगी शरीर में ये संभव नहीं था। उसकी कोई पत्नी न थी जो पैसों के लिए आये दिन उसे फून करती और कम पैसे भेजने के लिए कोसा करती । उसके बच्चे भी नहीं थे जो पिता को फून करके पैसे माँगा करते । 


कितना स्वार्थी परिवार था वह, जहाँ राजा साहब को पैसों से प्रेम था और वो उसे खर्च नहीं करना चाहते थे, चाहे पत्नी और बच्चे उनसे दूर ही क्यों न हो जाएं । और उनके पत्नी और बच्चे कभी उन्हें फून करते भी तो पैसे माँगने के लिए ही करते अन्यथा उनकी कोई सुध न लेते। अब पेंटर पछताने लगा था । उसके पास महंगा कैनवास था, मंहगे रंग थे, पर पेंटिंग बनाने की प्रतिभा उससे छिन गई थी । वह अब हवाई जहाज से या ट्रेन से जहाँ चाहे जा सकता था पर खराब सेहत के कारण कहीं जाने की इच्छा ही न रही । वह उस रोगी शरीर में कैद होकर रह गया था । वह अपने दुबले पतले चपल फुर्तीले शरीर और आजाद जीवन शैली को याद किया करता था।

इसी तरह एक माह पूरे हुए, मैं सुबह-सुबह चाय लेकर राजा साहब के कमरे में गया और चाय टेबल पर रखकर उनसे अपनी तनख्वाह माँगी । 

“राजा साहब आपकी चाय । और आज आप मेरे पैसों का भी हिसाब कर दीजिए तो बड़ी मेहरबानी होगी । “

“कैसे पैसे ?” राजा साहब ने बेड से उठते हुए कहा।

“मेरी तनख्वाह ।“

“कैसी तनख्वाह ? तूने मेरे दिये वो चार काम कहां पूरे किये जो मैं तुझे पैसे दूँ। न तू बड़े बर्तन को छोटे में रख सका न मेरी दी छड़ी को बिना तोड़े बिना काटे छोटा कर पाया । और मेरा जन्म दिवस और वो सेब केले?“ उन्होंने नींद में झूमते हुए कहा ।

ये सुनकर मेरे पैरों तले जमीन निकल गई । क्या ये सच है ? क्या वाकई इस समय जो राजा साहब मेरे सामने बैठे हैं, वो ही असली राजा साहब हैं ? क्या वो पेंटर के साथ मिलकर कोई खेल-खेल रहे थे या वो पेंटर फिर कोई खेल, खेल गया ? मेरे चेहरे का उड़ा रंग देखकर राजा साहब भी चौंके और अपने घुटनों पर हाथ टेककर उठे और सीधे आइने के सामने पहुँच गये । 

“यह क्या उस पेंटर ने मेरा शरीर मुझे लौटा दिया । पर क्यों ? “

“राजा साहब ये क्या कह रहे हैं आप ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा?” मैंने अनजान बनने का अभिनय करते हुए कहा । 

“अच्छा तुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा ? झूठा कहीं का । मैं जानता हूँ, मेरी आत्मा पेंटर से बदलने जरूर तूने उसकी मदद की होगी ।“ राजा साहब कमर पर हाथ रखकर हमेशा की तरह मेरे सामन खड़े थे और मेरे होश फाख्ता हो गये थे । 

“आप ये क्या कह रहे हैं अन्नदाता? मैं क्यों उस भिखारी पेंटर का साथ दूँगा ? मैं तो रोज उसे दरवाजे से धक्के मार-मार के भगा देता था, आपने तो देखा है, हुजूर । और आत्मा बदलने से आपका क्या मतलब है ? किसकी आत्मा बदल गई ?“ मैंने भोलेपन से पूछा । 

“बड़ा भोला है तू । मैं जानता हूँ कि तूने ही पेंटर की मदद की थी पेंटिग बदलने में और मेरी आत्मा चुराने में । इतने दिन मैं झोपड़ी मे पेंटर के रूप में पड़ा रहा और तूने अपने नाम छः बिसवा जमीन लिखवा ली क्यूँ ? उसकी झोपड़ी में छुपाकर रखी गयी मेरी असली पेंटिंग भी मैनें देखी है । आखिर वो पेंटर किस हक से मेरे कर्जदारों का उधार माफ करता फिर रहा है ? ये सब तेरा किया धरा है। खेत अपने नाम कराने के लिए तूने ही पेंटर का साथ दिया होगा । “

 “हाय राजा साहब ऐसा मत कहिए, मैं तो खुद परेशान था कि आपको क्या हो गया? जो आप ऐसे अपने मेहनत की कमाई लुटा रहे हैं । आज ही मुझे इस बात का पता चला कि उस दुष्ट पेंटर ने ऐसा किया था । अगर मैं पहले जान जाता तो .......” 

“तो क्या ? साले जब मैं पेंटर के रूप में राजा से मिलने आता तो तू मुझे धक्कें मार-मार के भगा देता था, है न..... अब मैं भी तुझे धक्के मार कर भगाऊँ ?”

“मालिक दया कीजिए । मैं आपको नहीं पेंटर को भगाता था । मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था कि वो आप थे । जिसकी कहिए उसकी कसम उठा लूँ ।“

“हुँह.... बन मत.... मैं तेरा नाटक खूब समझता हूँ । पर फिर भी मैं तुम दोनो को माफ करता हूँ, क्योंकि मेरा दिल बहुत ब़ड़ा है । जा जाकर चाय गरमा कर लेकर आ। और कुछ खाने को भी ला । “ कहकर राजा साहब ने मुझे भगा दिया ।


 मैं इसी उधेड़बुन में चाय गरमाने लगा कि कहीं राजा साहब मेरी जमीन फिर से छीन तो न लेंगे । मैं तो रह-रह कर पेंटर पर गुस्सा कर रहा था कि उस पर बेकार ही भरोसा किया । फुरसत पाते ही सब्जी तोड़ने के लिए खेत जाने के बहाने पेंटर के घर पहुँचा । पेंटर अपनी झोपड़ी में बड़ी तन्मयता से कोई पेंटिंग बना रहा था । मैनें पीछे से उसे लात लगाई । जब वह राजा साहब के शरीर में था तब मैं उसका कितना आदर करता था, जबकि पेंटर बने राजा साहब को आसानी से धक्के मार देता था, यह जानते हुए कि वो ही असली राजा साहब हैं। मैं राजा साहब के शरीर में ही राजा साहब की इज्जत कर सकता था । शायद वो शरीर ही मेरे लिए राजा साहब थे न कि उसकी आत्मा । 



हृदय परिवर्तन


“क्यों बे तू ऐसा कुछ करने ही वाला था तो मुझे पहले नहीं बता सकता था । मैं तो मरते-मरते बचा । किसी तरह अपनी ऐक्टिंग के बल पर राजा साहब को यकीन दिलाया कि मैं उनकी आत्मा बदल जाने के बारे में कुछ भी नहीं जानता । वरना राजा साहब अपनी दुनाली से मेरा भेजा छेद देते ।“ मैंने रुँआसा होकर कहा । 

“ अरे ऐसे कैसे छेद देते? पुलिस कानून कुछ है कि नहीं इस देश में ? तू न.. नाहक राजा साहब की दंबूक से डरता है । पर हाँ... गलती तो मैंने की है , कि तुझे मन की बात नहीं बताई । मुझे लगा तू मुझे ऐसा करने न देगा । माफ कर दे भाई , मैं बहुत दिनों से परेशान था । मैं पेंटिंग नहीं बना पा रहा था और अनेक रोगों से लड़ रहा था, मुझे अपना पुराना शरीर व रहन-सहन याद आने लगा । मैं किसी स्थान पर अधिक दिनों तक टिक के नहीं रहा सदा ही घूमता फिरता रहता था पर राजा साहब के शरीर के साथ मैं वो सब नहीं कर पा रहा था और………… । (उसने बात अधूरी छोड़ दी ) बेख्याली में मैंनें रात के समय उठकर पुनः तंत्र मंत्र करके अपनी आत्मा उनसे बदल ली । असली पेंटिग लाकर हवेली में लगा दी । और नकली वाली जला दी जो कि मैंने अभी तक संभाल कर रखी थी । मैं अब उस शरीर में कभी वापस नहीं जाना चाहता । न उठे चैन , न बैठे चैन न लेटे चैन । इतनी दवाइयाँ खाते हैं राजा साहब कि जितने कि मैं निवाले भी नहीं चबाता। ऊपर से गठिया का दर्द उफ। इतने भारी शरीर के साथ लेटे लेटे भी हांफ जाता था। “

“अब राजा साहब अपनी जमीन मुझसे छीन लेंगे । क्या तुम मेरे और भुलिया का विवाह होने तक नहीं रुक सकते थे। उसके बाद करते जो करना था । “ मैं सिर पकड़कर बैठा रहा ।

“ना मेरे भाई तू चिंता मत कर मैनें वकील से पूछ लिया था । जो जमीन एक बार तेरे नाम हो गयी उसे जबतक तू कोरट में अँगूठा लगाकर किसी के नाम नही कर देता तब तक वो तेरी रहेगी । राजा साहब कुछ भी करके वो छः बिसवा जमीन तो तुझसे नहीं ले सकते । और हाँ मुझे तेरी और भुलिया की शादी होने तक रुकना चाहिए था पर ….... (उसने फिर बात अधूरी छोड़ दी ) तू नहीं समझ सकता कि इतने दिनों तक मैं कैसे अपने पेंट, ब्रुश और कैनवास से दूर रहा । “ उसने अपने ब्रुश को गले लगाकर और कैनवास को सहलाते हुए कहा मानों वे उसके पालतू हों । 

“सच कहता है तू? राजा साहब मेरी जमीन वापस नहीं ले पाएंगे न ।” मुझे कुछ राहत मिली । 

“मेरे पेंट और ब्रुश की कसम ।“ उसने प्यार से मेरे गाल हिलाकर कहा । 

“फिर ठीक है । कम से कम जमीन मेरे पास रहेगी तो भुलिया और मेरी शादी तो हो जाएगी । अब आगे कुछ भी बेवकूफी करने से पहले मुझे बता देना । “ मैंने धमकी वाले अंदाज में कहा तो पेंटर ने हां में सिर हिलाया । 

इस बार जो राजा साहब आये तो कुछ बदले-बदले से थे, वो मुझसे बहुत प्रेम से बात करते और मेरा बहुत ख्याल रखते, हालांकि मेरी तनख्वाह उन्होंने अभी भी नहीं दी थी। मैं नहीं जानता था कि वो क्या सोच रहे थे ? उन्होंने मुझे पेंटर की सहायता करने के लिए भी नहीं डाँटा । पेंटर ने उनका बहुत नुकसान किया था, पर फिर भी एक रोज उन्होंने पेंटर को बुलवाया और उसका पिछला हिसाब साफ कर दिया । 

“देखो पेंटर बाबू कल रात शिवजी ने मेरे सपने में आकर मुझे बहुत डाँटा और कहा कि किसी गरीब का पैसा मार लेना बहुत गलत बात है । क्रोध में शिव तांडव की मुद्रा में आ गये तो मैंने भी उनके चरण पकड़ लिये और कहा कि मैं कल ही पेंटर का हिसाब कर दूँगा । तब जाकर कहीं वो शांत हुए । मैं तुम्हें पूरे पैसे देने को तैयार हूँ और तुम्हारी सहायता के लिए तुमसे एक और पेंटिंग बनवाना चाहता हूँ । उसके पैसे मैं तुम्हें एडवांस में दूँगा । “ राजा साहब ने उदार बनते हुए कहा । मैं सोच रहा था कि शिवजी ने मेरी तनख्वाह की शिफारिश क्यों न की । आखिर मैं भी तो गरीब हूँ ।

“धन्यवाद राजा जी आपका भी और शिव जी का भी । तो आपकी पत्नी और बच्चे जैसे ही आएं बता दीजिएगा मैं आकर उनकी भी पेंटिंग बना दूँगा ।“ पेंटर ने पैसे लेते हुए कहा । 

“नहीं-नहीं मैं तो अपने प्यारे गोपी की पेंटिंग बनवाना चाहता हूँ । इसने मेरी दस वर्षों से बड़ी सेवा की है । इतना तो सगा बेटा भी नहीं करता । मैं चाहता हूँ इसकी एक पेंटिंग बनवाकर यहीं अपनी पेंटिंग के बगल में सजा लूँ । “ राजा साहब ने मुझे धौल जमाकर कहा तो मैं आश्चर्य से कभी उन्हें तो कभी पेंटर को देखने लगा। पेंटर मेरी पेंटिंग बनाने को तैयार हो गया ।

मुझे आश्चर्य हुआ पर मैं खुश भी था, मैं राजा साहब की चालाकी न समझ सका । मैं तो खुशी से फूला न समा रहा था, सबकुछ सपने जैसा लग रहा था । पेंटर ने यहीं इसी हवेली में आकर मेरी तस्वीर बनाई । तस्वीर बनने के बाद अचानक मुझे राजा साहब पर कुछ शक हुआ कि कहीं वो मुझसे किसी प्रकार का बदला तो नहीं लेना चाहते । मैं जानता था कि आत्मा बदलने के लिए तस्वीर पर मेरे खून की बूँद की जरूरत थी इसलिए मैं सावधान रहने लगा मुझे हर समय यही लगता कि राजा साहब मेरे खून के प्यासे हैं । मेरी शादी के एक दिन पहले राजा साहब ने एक नाई को घर बुलवाया ताकि वो मेरी दाढ़ी बना दे तब मुझे फिर शक हुआ कि कहीं राजा साहब नाई की सहायता से मेरा खून तो नहीं निकालना चाहते पर .... 

“गोपी कल तेरी शादी है और तू ऐसे शादी के मंडप में बैठेगा ? चल अपने बाल भी कटवा ले और दाढ़ी भी बनवा ले । “ राजा साहब ने चाशनी भरे शब्दों से कहा।

मैनें नाई से कहा –“देख अगर मुझे जरा भी चोट पहुँचाई तो समझ लेना ।“

“नहीं हुजूर निश्चिंत रहिए मैं आपको पता भी नहीं चलने दूँगा कि कब आपकी दाढ़ी बन गई और कब आपके बाल कट गये । “ नाई ने मेरे बाल काटे दाढ़ी बनाई पर मुझे कोई चोट नहीं पहुँचाई । मैंने सोचा कि मैं बेकार ही डर रहा था भला मेरे जैसे गरीब से कौन अपनी आत्मा बदलना चाहेगा ? मैंने राजा साहब के साथ धोखा किया था इसीलिए मेरे मन का चोर मुझे राजा साहब पर शक करने की सलाह दे रहा था पर भला राजा साहब को अपने नौकर के शरीर की क्या आवश्यकता ? (882)


सुखद सपने का अंत

शादी के एक रात पहले की बात है उस रात मालकिन और उनके दोनों बेटे भी आ गये । मालकिन ने मुझे आशीर्वाद दिया और सेठ जी की भूरी-भूरी प्रशंसा की –“आज आपको अपना पति बोलते हुए मुझे बहुत गर्व हो रहा है । आपने गोपी के लिए जो कुछ भी किया वह इसके योग्य था । गोपी तूने मेरे पति को कंजूस से दानी बना दिया तेरा बहुत-बहुत धन्यवाद । जो मैं न कर सकी वो तूने कर दिखाया । अब इस बार बच्चों के इम्तहान खत्म होने के बाद मैं हवेली पर ही रहने आ जाऊँगी । और तेरी बहू के हाथ की बनी रोटियाँ तोड़ूँगी । खिलाएगा न अपनी पत्नी के हाथ की बनी रोटियाँ । “ मेरे मालिक के दोनों बेटे इंजीनियरिंग पास कर चुके थे तो अब मेरी मालकिन गाँव आने की सोच रहीं थीं । दोनों भाई सरकारी विभाग में बड़े इंजीनियर बन गये थे और बंबई जा रहे थे ।

“हाँ मालकिन । माँ के जाने के बाद आप ही तो माँ के रूप में मेरे जीवन में आईं हैं । अब मैं और भुलिया मिलकर आपकी सेवा करेंगे ।“ मैंने उनके चरण दबाते हुए शर्माकर कहा ।

“अरे बस अपनी सेवा ही करवाती रहोगी, बड़ा प्रेम जताती हो, पर कभी एक ग्लास दूध तक तो पूछा न होगा उससे । “ राजा साहब ने मालकिन से कहा । 

“अच्छा मैने नहीं पूछा तो तुमने कौन सा उसको कभी तनख्वाह दे दी पूरी । “ मालकिन ने उलाहना दी।

“लो अभी देता हूँ । नई बहु आने की खुशी में गोपी को उसकी पूरी तनख्वाह देता हूँ और वादा करता हूँ कि अब कभी भी उसकी तनख्वाह नहीं रोकूँगा ।“ मालिक ने जनेऊ छूकर कहा ।

“तो मैं अपने गोपी बेटे के लिए अभी दूध गरमा कर लाती हूँ । रे गोपी…… भुलिया तो तेरी जिंदगी में साक्षात् लक्ष्मी बनकर आई है रे । अब मैं अपने बाकी दोनों बेटों की भी शादी के लिए लड़कियाँ खोजना अभी से शुरू कर देती हूं। तीन-तीन बहुएँ सेवा करेंगी मेरी ।“ मालकिन की खुशी देखकर मैं गदगद हो उठा ।

मैं तो वहीं बैठे-बैठे सपनों में खो गया । मालिक मालकिन के पीछे-पीछे रसोई में घुस गये। 

“वाह गोपी तू तो लव मैरिज कर रहा है । “ अजय ने कहा ।

“गोपी तो गाँव का होकर भी मॉर्डन है और एक हम हैं, आजतक शहर में किसी छोरी ने हमें घास ही नहीं डाली । इससे तो गांव ही भला है ।“ विजय ने मुझे छेड़ा और मैं भी उनके साथ हँसने लगा ।


“अरे अजय विजय की माँ, वो तिजोरी की चाबी कहां है जो मैनें तुम्हें दी थी । “ तभी राजा साहब की आवाज किचन से आई ।

“वो तो तुम्हारे बिस्तर के नीचे पड़ी है ।“ मालकिन का जवाब था।

“मुझे नहीं मिली तू ढूँढ के ला दे ।“ मालिक ने कहा । 

“ठीक है गोपी की तनख्वाह देने जा रहे हो इसलिए ले आती हूँ । तुम देखो कहीं दूध उबल न जाए । “ मालकिन रसोई से ऊपर कमरे की ओर चली गयीं । 


"अच्छा गोपी तूने भूलिया को कैसे इंप्रेस किया ?" अजय। 

"वो आप लोगों से अंग्रेजी सीखी थी ना वही सुना कर … " गोपी शरमाया।

"अच्छा तो तूने अंग्रेजी सुनाकर पटाया था उसे । चल अच्छा इस वाक्य की अंग्रेजी तो बता * संतोष एक आम खाता है।*" विजय ने पूछा । 

" Satisfaction is a general account."

"हैं ?? वो कैसे ??" अजय और विजय । 


" देखो संतोष की अंग्रेजी = satisfaction, 

उसके बाद is लगेगा , 

फिर एक = a , 

आम = general, 

और खाता बैंक में खुलता है न = account … 

मिलाकर बना ……. 

" Satisfaction is a general account." गोपी बोला ।


"धत्त तेरे की ।" अजय विजय ने एक दूसरे से सिर लड़ाए । 

“ It’s raining cats and dogs today. इसका हिन्दी अनुवाद बता ।” विजय ।

“आज कुत्ते बिल्लियों की बारिश हो रही है ।” 

“Are you kidding me ?” अजय।

“क्या तुम मुझे बच्चे दे रही हो ?”

जानें क्यों वो दोनों भाई मेरे इस उत्तर पर हँसते हँसते लोट पोट हो गए। 

मैं सुखद सपनों में खो गया । मालकिन ने स्वयं मुझे दूध का एक गिलास लाकर दिया । दूध पीने के बाद मैं सोने चला गया । 

उस दिन मेरी और भुलिया की शादी थी । सुबह जब मैं सोकर उठा तो बदन कुछ भारी सा था सिर चकरा रहा था । मैंने इधर-उधर देखा तो पाया मैं अपने कमरे में नहीं बल्कि मालिक के कमरे में सोया पड़ा था । मैं डर गया और जब झटके से पलंग से उतरने लगा तो मेरे घुटने में तेज दर्द उठा । मैंने खड़े होने की कोशिश की तो लड़खड़ा गया । 

मैंने अपने शरीर पर नजर डाली तो आश्चर्य! कि ये मेरा था ही नहीं यह तो राजा साहब का शरीर था । राजा साहब ने पेंटर से कहकर मेरे शरीर पर कब्जा कर लिया था । मैंने कमरे में रखे आईने में देखा, यह देखकर मेरे होश उड़ गये , मेरा शरीर बूढ़ा व कमजोर हो गया था ।

असल में राजा साहब जब पेंटर के शरीर में रह रहे थे, तो कुछ समय तो बहुत दुखी थे, पर फिर उन्हें अहसास हुआ कि जब वो साहूकार थे तब अनेक बीमारियाँ उन्हें घेरे थीं, न वो ढंग से खा पाते थे, न चल पाते थे, पर यह पेंटर जो लगभग उनकी ही आयु का था कितना चपल व फुर्तीला था । यह सोचकर वो स्वस्थ शरीर का आनंद लेने लगे । पर जब पेंटर ने उन्हें वापस उनके शरीर में भेजा तो वो परेशान हो उठे । अब उन्हें अपना रोगी शरीर खुद पर बोझ लगने लगा । तब उन्होंनें एक युक्ति लगाई और पेंटर को बहुत धन दिया ताकि वह उनकी आत्मा मुझसे बदल दे। कंजूस सेठ ने जान लिया था कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है । 

 “हुजूर ये क्या अन्याय है मुझे मेरा शरीर वापस चाहिए।“ मैं नौकर बने राजा साहब के सामने गिड़गिड़ाया जब वो चाय रखने मेरे कमरे में आए।

“कैसा अन्याय पगले ? तुझे गाँव के साहूकार का जीवन जीने मिल रहा है तुझे तो खुश होना चाहिए ।“

“मैं…… मैं…… मालकिन से बता दूँगा ।“

“क्या बताएगा? कि मैंने तेरी और मेरी आत्मा बदल ली ? कौन यकीन मानेगा तेरा ? कैसे साबित करेगा ? ज्यादा से ज्यादा गायत्री तुझे.... यानी कि मुझे फिर से कोसेगी , फटकारेगी , कहेगी बुड्ढा पागल हो गया है और सदा के लिए शहर चली जाएगी, पर तुझे तेरा शरीर नहीं दिला सकेगी । गोपी.... जब मैं पेंटर के शरीर में था तब मुझे ये अनमोल ज्ञान मिला कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है । पहले तो मैं यह सोचकर दुखी हो रहा था कि इतनी मेहनत से कमाई गयी मेरी सारी संपत्ति वो पेंटर बर्बाद कर देगा । पर फिर मैंने पाया कि जब से मैं पेंटर के शरीर में था तब से खुद को कितना स्फूर्तिवान और हल्का महसूस करता था । साहूकार के रूप में जाने कितने ही रोग मुझे समय से पहले ही घेर चुके थे । पर पेंटर के रूप में न मुझे वो कड़वी दवाइयाँ निगलनी पड़ रहीं थीं न घुटनों का दर्द झेलना पड़ रहा था। मैं उछल सकता था , कूद सकता था , दौड़ सकता था मानोंखुला आसमान मुझे पुकार रहा था कि उड़ो और मेरी थाह लेलो । और फिर एक दिन जब मैं सोकर उठा तो फिर वही रोगी शरीर मुझपर हँस रहा था। मैं फौरन उस पेंटर के पास गया और बोला कि मेरी सारी संपत्ति लेले पर मुझे अपने शरीर में रहने दे। पर वो पेंटर मुझे दोबारा अपना शरीर देने को तैयार न था इसीलिए मुझे तुझसे शरीर बदलना पड़ा । “

“पर शरीर बदलने के लिए दोनों लोगों का खून चाहिए ?” मैंने अचानक जीभ काटी ।

“अच्छा ..... कुछ दिन पहले तो तू बोल रहा था कि तुझे ये नहीं पता था कि पेंटर ने मेरी आत्मा बदल दी थी । अगर ऐसा है तो तुझे कैसे पता कि आत्मा बदलने के लिए खून की जरूरत पड़ती है ? खैर.... मैं पहले से ही ये जानता था कि इस काम में तू जरूर शामिल रहा होगा । 

कल जो दूध तूने पिया उसके कारण तू इतनी गहरी नींद सोया कि कब मैंने तेरे अँगूठे पर ब्लेड से काट कर तेरा थोड़ा सा खून निकाल लिया तुझे पता भी नहीं चला ।“ अपने अँगूठे पर बँधी पट्टी दिखाकर गोपी बने राजा साहब ने कहा । “ अपने शरीर से खून निकालना तो मेरे लिए आसान था ही । “ उन्होंने मेरे यानी राजा साहब के शरीर की ओर इशारा किया । मेरे यानी राजा साहब के अँगूठे पर भी पट्टी बंधी थी।

यह जानकर मैं गोपी बने राजा साहब के सामने बहुत रोया गिड़गिडाया पर कोई फायदा नहीं हुआ । (1287)



पेंटर की कहानी


 मैं पेंटर से मिलने गया तो पता चला कि राजा साहब ने पेंटर से सदा के लिए गाँव छोड़ने को कह दिया था । बू हू हू ।

उस दिन राजा साहब ने मेरी भुलिया से शादी कर ली । मैं किस मुँह से उसे बताता कि मैं उसका गोपी हूँ । जब वो मेरा आशीर्वाद लेने आए तो मैं फूट-फूट कर रोने लगा, दुख से मेरा कलेजा फट गया और उसी समय मेरी मृत्यु हो गई, तब से मैं यहीं भूत बनकर भटक रहा हूँ । मैनें बहुत जानना चाहा कि भला मेरी आत्मा यहाँ क्यों भटक रही है ? पर पता न चला ।

मेरी यानी राजा साहब की तेरही के बाद अजय विजय ने यह हवेली जिसे बेची मैंने उसे दो दिन यहाँ टिकने न दिया इस प्रकार उस व्यक्ति ने किसी और को हवेली बेची पर उसे भी मैंने भगा दिया । पहले मैं लोंगों को अपना दुख बताता था पर लोग मुझे देखकर डर जाते और चीखने चिल्लाने लगते वो मेरी बात समझ नहीं सकते थे। फिर मुझे अहसास हुआ कि लोगों के डरने से मुझे शक्ति मिलती है और मैं अजीब सी खुशी महसूस करता हूँ। बस फिर क्या मैं यहाँ आने वाले हर व्यक्ति को डराने लगा। आखिर यह हवेली भूतिया मशहूर हो गई । कोई भी इसे खरीदना नहीं चाहता था । पर एक दिन लगभग मेरी मौत के दो माह पश्चात् हॉल के बीच में एक पारदर्शी आकृति प्रकट हुई । मैं चौंक गया क्या अब भूत भी हवेलियाँ खरीदने लगे ? तभी उस भूत ने मेरा नाम पुकारा –“रे गोपी क्या हुआ मुझे नहीं पहचाना ?”

“साले पेंटर तू । मैं तुझे जान से मार दूँगा तेरे कारण मेरी भुलिया मुझसे बिछड़ गयी । “मैं उसकी ओर दौड़ा पर उसके आर पार चला गया ।

“देख भाई मरे हुए को क्या मारेगा ? मैं जानता हूँ कि तू मुझपर गुस्सा है पर ... आज मैं तुझे अपनी पूरी कहानी सुनाकर रहूँगा । शायद तुझे ये कहानी सुनाने के लिए ही मैं मरने के बाद सीधा यहाँ आया हूँ । यही मेरी अंतिम इच्छा थी कि तुझ तक अपना संदेश पहुँचा सकूँ। “ मुझे पेंटर पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर किया भी क्या जा सकता था अब तो वो भी मर चुका था तो बदला किससे लेना ? एक दिन सभी को मर जाना है और मौत से बढ़कर कोई बदला हो ही नहीं सकता संसार में । पेंटर भूत ने मुझे अपने बचपन की कहानी सुनाई । 

“मुझे जब से मेरी कहानी याद है तब मैं दस वर्ष का था अपनी मां और पिता के साथ मैं एक छोटे गाँव में रहता था। मेरा बाप एक नंबर का शराबी था और कई-कई दिन घर से गायब रहता था। जब कभी भी वह आता तो उसके डर से मैं घर में कम ही रहता था। जब कभी वह शराब के नशे में चीखता चिल्लाता और माँ से झगड़ा करता तो मां मुझे भगा देती। इस डर से कि कहीं नशे में बापू मुझे भी न मारने लगे। यही मेरी आदत बन गई कि जब कभी वह नशे में धुत आता तो मैं बाहर भाग जाता। वह माँ के जोड़े हुए पैसे छीनकर फिर कई दिनों के लिए बाहर चला जाता। 

मेरी माँ गाँव के एक साहूकार के घर पानी भरने व साफ सफाई का काम किया करती थी। 



मैं भी मां के साथ जाता था और काम में हाथ बंटाता था । मैं बचपन से किन्ही अदृश्य लोगों की आवाजें सुनता था।

 मैंने एक दिन अपनी मां से कहा "मां मुझे रात में जब सब सो जाते हैं तो कुछ लोगों की चीख पुकार सुनाई देती है । कुछ लोग मुझसे मदद मांगते हैं पर कोई दिखाई नहीं देता । वो लोग रोरो कर मदद मांगते हैं और जाने क्या क्या कहते हैं पर कुछ भी समझ में नहीं आता । 

माँ ने सोचा मुझपर भूत सवार है तो वह मुझे गांव के ओझा के पास ले गई । गाँव में वह ओझा भूत भगाने के लिए जाना जाता था । “ इतना कहकर पेंटर भूत ने गर्दन टेढ़ी की और फ्लैश बैक में चला गया । अब मैं उसकी कहानी स्वयं उसकी याद में जाकर देख रहा था ये ब्लैक एण्ड व्हाइट का जमाना था । 


पहले दृष्य में दो दस वर्षीय बालक नदी के तट पर बैठे दिखते हैं। एक बालक कोयले से नदी किनारे पड़े एक बड़े पत्थर पर दूसरे बालक का चेहरा बना रहा था। उसने हूबहू उस बच्चे की शक्ल बनाई फिर उसके बगल में अपना चेहरा बनाया। 

“हीरा ये तू और ये मैं।“

“वाह रे पेंटर तूने तो मेरी फोटू छाप दी, पत्थर पर। तू तो कमाल की चित्रकारी करता है तभी तो तेरा नाम ही सबने पेंटर रख दिया। “ वह हँसकर बोला।

“अब हम पक्के दोस्त सदा इस पत्थर पर  साथ-साथ रहेंगे।“ दोनों बालकों ने एख दूसरे के कंधे पर हाथ रखा और दूर दिख रहे गांव की दिशा में चल पड़े। 

दूसरे दृष्य में वही दस वर्षीय बालक जिसका नाम पेंटर था , खंभे से बँधा रस्सियों से जकड़ा खड़ा था और उसके चारों ओर सारा गाँव इकट्ठा था। पास ही एक औरत पल्लू दाँत से दबाए रोये जा रही थी इसकी उम्र पैतीस चालीस के आस पास होगी। और एक दुबला पतला लगभग नंगा बाबा जिसने शरीर पर अनेक पक्षियों के पंख व हिरन के चमड़े की बनी लुंगी पहन रखी थी वो उस बच्चे के चारों ओर घूम- घूम कर ऊट पटांग मंत्र पढ़ रहा था। उस गाँव में कोई भी इतना ज्ञानी नहीं था जो, उन ऊट पटांग मंत्रों को गलत बता सके। पर निश्चय ही वो संस्कृत में तो नहीं बोल रहा था।

“अगड़म बगड़म भुंचाला ,

तिकड़म बिगड़म त़िंकाला।“


“माँ मुझे बचा ले। “ बच्चे ने उस महिला को पुकारा।

“मेरे लाल ई सब तो ओझा जी तोहार भलाई के लिए करत हैं। ऊ चुडैल रोज रात में तुझे डराती है न ..”

“नहीं माँ मुझे कोई नहीं डराता। वो लोग तो रोते हैं और मेरी मदद माँगते हैं वो तो खुद दुखी हैं। पर वो दिखाई नहीं देते। और वो लोग बस रात में ही मेरें पास आते हैं अभी तो दिन का समय है।“

“हां वही तो.... रात में तो भूत प्रेत ही आवे हैं। जो दिखाई न देवे ऊका भूत ही कहत हैं। तोर मूढे पर एक भूतनी सवार है। पर तू चिंता न कर हम हूँ न...... ओझा भैरवनाथ। बड़े-बड़े भूतन की चुटिया पकर के नचाये चुके हैं।“ वह ओझा अब जोर जोर से मंत्र पढ़ते हुए खंभे के चारों ओऱ घूमने लगा और जोर जोर से झाड़ू उस बच्चे पर बरसाने लगा। कभी झाडू की सींक उसके नाक में घुसती, कभी मुंह में, आँख तो उसने कसकर भींच ली थी। 


“अगड़म बगड़म भुंचाला ,

तिकड़म बिगड़म त़िंकाला। बता…. बता कौन है तू और इस बच्चे का पीछा छोड़ने का क्या लेगी? वरना ………………..” ओझा ने फिर झाड़ू घुमाई । 

जब पेंटर ने  देखा ऐसे उसका पीछा न छूटेगा तो औरतों जैसी आवाज बनाकर बोला –“मुझे छोड़ दो ओझा बाबा मैं इस बच्चे को छोड़कर सदा के लिए चली जाऊँगी और फिर कभी नहीं आऊँगी। मुझे माफी देदो।“ उसने बहुत बार दूसरों को ऐसे ही बोलते देखा था। ये कोई पहली बार गाँव में भूत उतारने का आयोजन तो था नहीं। इससे पूर्व वो बहुतों के भूत उतरते देख चुका था। जबतक लोग आवाज बदलकर इस प्रकार माफी ने मांगते, मरा ओझा उन्हें पीटता ही रहता। इसलिए उसने दो चार झाडू खाते ही यह प्रक्रिया दोहरादी। 

“तू वादा करती है कि अब इस बालक को कभी तंग न करेगी।“

“नहीं बाबा मैं आपकी कसम खाकर कहती हूँ कि अब इसे तो क्या किसी को भी तंग नहीं करूँगी। अगर मैं झूठ बोलूँ तो तू अभी का अभी मर जाए। “ चिढ़कर पेंटर  ने कहा।

“हा हा हा तेरी जैसी जाने कितनी चुडैलन को मैने बस में किया है तू का चीज है। देखा कितनी जल्दी रस्ते पर आ गई। ई गाँव के भूत भी जान गये हैं कि ओझा से  पंगा लेना ठीक नहीं। “ कहते हुए बाबा ने एक और झाड़ू पेंटर को मारी। 

“माँ मुझे बचा लो।“ कहकर वो बच्चा जोर जोर से रोने लगा।

“लो पेंटर की माँ आ गया तुम्हारा बेटा। सही समय पर ले आईं इसे मेरे पास वरना ऊ चुडैल तो आज रात ही इसे मुर्दोंकी दुनिया में ले जाने वाली थी।“

“धन्यवाद बाबा आपने मेरे घर के चिराग को बुझने से बचा लिया। ये लीजिए आपकी दक्षिणा। “ कहते हुए उस स्त्रि ने बाबा को कुछ पैसे दिये। और पेंटर को खोलने लगी । (1224)



कर भला तो हो भला

वही औरत सिर पर पल्लू संभालती उसी दस वर्षीय बालक के साथ ठाकुर अमरसिंह की हवेली पर पहुँची। हवेली के चारों ओर एक उपवन था जिसमें अनेक फलों से लदे पेड़ खड़े थे और एक ओर रंग बिरंगे फूलों से सजी क्यारी थी। उपवन चारों ओर से चार दीवारी से घिरा था। इसके मेन गेट पर एक बूढा जिसकी कमर झुकी हुई थी खड़ा गुहार लगा रहा था और सामने एक सुंदर स्त्रि और एक आदमी खड़े थे। स्त्रि अमर सिंह की पत्नी है और वो आदमी उनका चौकीदार।

“ठकुराइन गाँव में भीषण आकाल पड़ा है पीने को पानी नहीं है। बहुत दूर नदी से गाँव औरतें पानी भरकर लाती हैं। थोड़ी तो दया कीजिए आपका कुँआ तो पूरे साल पानी से भरा रहता है। मैं बूढ़ा आदमी कैसे इतनी दूर नदी पर पानी भरने जाऊँगा। मुझे आप बस एक बल्टी पानी दे दिया कीजिए। मैं अपनी बाल्टी बाहर रख दिया करूँगा। आप इसी में उड़ेल दिया कीजिएगा।“

“अरे तू बूढ़ा है पर तेरे दोनों लौंडे तो मोटे, मुस्टंडे, जवान हैं। उनसे कह...... पानी भरकर ले आया करें।“ हरिया चौकीदार ने कहा।

“हरिया तू तो जानता ही है कि वो दोनों कामचोर दिनरात चारपाई तोड़ा करें हैं। उनसे रत्ती भर भी सहारा न है। “

“तो उन्हें घर से निकाल क्यों नहीं देता ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना भला।“ इसबार ठकुराइन ने कहा। उन्होंने रेशम की साड़ी पहनी थी जो खून जेसे लाल रंग की थी और जिसपर सोने के तारों से सुन्दर कढ़ाई की गयी थी। उमर कोई बीस बाइस रही होगी। तन पर सुंदर गहने थे और चेहरा चाँद के समान चमक रहा था।

“ठकुराइन क्या करुँ मोह माया में फंसा हूँ। अपनी औलाद के प्रेम के कारण उसे निकाल भी नहीं सकता।“

“तो तुम्हारा कहना है कि जो माता पिता अपने नालायक बच्चों को घर से निकाल देते हैं वो उन्हें प्रेम नहीं करते या उनके दिल में मोह माया नहीं है। तो दशरथ ने जो राम को वनवास दिया तो क्या उन्हे राम से प्रेम न था ? क्या तू उन्हें निवाला लाकर न देगा तो वो भूखों मर जाएंगे ? अरे तू मर गया तो क्या वो जी न सकेंगे ? इस संसार को चलाने वाला तो ईश्वर है यदि वह चाह लेगा तभी कोई भूखा मरेगा। तुझे लगता है कि तू उन दोनों को पाल रहा है और तू मर गया वो तेरे साथ वो भी मर जाएंगे । तू ईश्वर है या  तू ईश्वर से भी बढ़कर है।“

“मैं आपकी सब बात मानता हूँ ठकुराईन पर ......... फिर भी स्वयं को इस बंधन से मुक्त नहीं कर पाता।“

“देख तुझे पानी चाहिए तो एक लोटा लेकर पी ले पर तेरे बेटों को एक बूँद न मिलेगी। अगर ठाकुर साहब को पता चला कि मैंने तुझे एक लोटा पानी भी दिया है तो मेरी खैर नहीं। यह सवर्णों का कुँआ है इसने ठाकुर साहब के पूर्वजों को सींचा है। किसी नीच जाति वाले निकम्मे के लिए नही खोदा गया था इसे। देवी माता की कृपा है इसपर, कि सारे वर्ष इसमें जल की कोई कमी नहीं रहती। तेरे बेटों के जैसे निकम्मों के लिए इसकी एक बूँद भी नहीं मिल सकेगी। “

द्वार पर खड़ी औरत और वो बच्चा अबतक चारदीवारी के कोने पर बने उस देवी माता की कृपा वाले कुँए तक पहुँच गये थे और स्त्रि ने उसमें बाल्टी गिरा दी थी। 

“ठहर जा गायत्री अब तू कुँए से पानी नहीं भरेगी।“

“क्यों मालकिन मुझसे क्या भूल हुई ? मैं तो वर्षो से ठाकुर साहब के यहाँ पानी भरने और साफ सफाई का काम करने आती हूँ। जब मैं पंद्रह वर्ष की आयु में यहाँ ब्याह कर आई थी उसी के बाद से अपनी सास के साथ ये काम कर रही हूँ फिर आज क्या हुआ जो आप मुझसे ये अधिकार छीन रही हैं?” वो औरत रुँआसी हो गई।

“अरे तू तो रोने लगी। पूरी बात तो सुन। तू गर्भवती है न तो आज से भारी बाल्टियाँ उठाने काम नहीं करेगी। ये हरिया बाल्टियाँ भरेगा और तू बस हवेली की साफ सफाई कर दिया कर। “

“मालकिन ? मैं अपना काम करूँ कि इसका काम करूँ ?” हरिया को यह बेमतलब का बोझ खल गया।

“हाँ हाँ चौकीदार के रूप में तो बड़ा लड्ठ भाँजा करता है न। जब तक गायत्री का बच्चा नहीं हो जाता ये काम तू करेगा बस। “ उनकी ये बहस चल ही रही थी कि कुँए की घिर्री घूमी और पानी की भरी बाल्टी ऊपर आने लगी। गायत्री के दस वर्षीय बालक ने पानी की बाल्टी खींची थी। 

“ठाकुराईन चाची तुम चिंता मत करो मैं अब बड़ा हो गया हूँ। मैं ये बाल्टी उठा सकता हूँ। मैं हवेली का पानी भी भर दूँगा और साफ सफाई में माँ की मदद भी कर दूँगा।“

“और गाय के बछड़ों को और बकरी के मेमनों को नहलाना खाना खिलाना वो कौन करेगा?” हरिया ने पूछा।

“वो तो मैं करूँगा ही। “

“शाबाश पेंटर तू तो बहुत बड़ा और समझदार हो गया है।“ ठकुराईन ने उसकी तारीफ की।

“ठकुराईन मैंने गाँवभर की औरतों को बच्चे जनने में सहायता की है। मैं जानती हूँ कि गर्भावस्था में कैसे बच्चे को सुरक्षित रखना है। मैं ये काम कर सकती हूँ। “

“तभी तीन बच्चे गिर गये तेरे ...क्यों ?” ठकुराइन ने पूछा।

“वो तो ...........”

“पेंटर के बापू के कारण ......... है...... न ? मुझे सब पता चल गया है। मैं तुझे जो पैसे देती हूँ वो सब छीन कर ले जाता है पर अब मैं तुझे पैसे नहीं दूँगी बल्कि आज से एक काली वाली बकरी तेरी हुई। ये जितना दूध देगी सब तेरा। पैसे मैं नहीं दूँगी ताकि पेंटर का बाप उसे दारू में न उड़ा सके।“

“सच ..............” पेंटर ने होठों पर जीभ फेरते हुए कहा। काली बकरी का दूध एक बार उसने चखा था। जब कोई नहीं देख रहा था तब उसने चुपके से उसके थन में मुँह लगाकर एक लंबा घूँट भरा था। आज भी वो अद्भुत स्वाद याद आता है तो मुँह में पानी भर जाता है। 

“हाँ सच.... अब पानी भरने पर ध्यान दे। “

“ठकुराईन आपका कर्ज मैं कैसे चुका पाऊँगी ?”

“गायत्री कर्ज तो मैं कभी न चुका पाऊँगी तेरा। तूने मेरी जान बचाई है वरना मैं तो साल भर पहले ही भगवान को प्यारी हो चुकी होती। राघव को जन्म देते समय जब शहर की डॉक्टरनी ने बताया कि बच्चा गर्भ में टेढा हो गया है और ऑपरेशन करना पड़ेगा तो मेरा तो कलेजा ही बैठ गया। ऑपरेशन के समय डॉक्टर कागज पर हस्ताक्षर करवाते हैं कि अगर रोगी मर गया तो उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं। अरे मैं तो सपने में अपने फटे हुए पेट से अपने प्राण निकलते साफ देख रही थी। 

पर तूने जाने आधे घंटे मेरे पेट की क्या मालिश की कि बच्चा घर पर ही हो गया बिना ऑपेरेशन। जब मौत सामने खड़ी हो तो जिन्दगी का महत्व पता चल जाता है। न सिर्फ अपनी जिन्दगी का बल्कि हर जीवन जो हमारे आस पास मौजूद है। वरना पहले तो मैं नीच जाति वालों से बात करना भी अपना अपमान समझा करती थी। एक समृद्ध परिवार में जन्म लेने का दंभ मुझे बचपन से ही था। पर तूने मेरी बुद्धि ठिकाने लगा दी। जो किसी की जान बचा ले उससे बड़ा सवर्ण  कोई नहीं। “

“दाई का काम तो मैंने पहले अपनी माँ से फिर सास से ही सीखा था। ये सब उनका ही आशीर्वाद है और ईश्वर की दी हुई शिफा है। मैं तो सदा कहती हूँ कि गर्भिणी स्त्रि को,  जो पढ़ लिख सकतीं है,  उन्हें रामायण का पाठ प्रतिदिन करना चाहिए और जो नहीं पढ़ सकतीं उन्हें दिन में जब समय मिले ईश्वर को याद अवश्य करना चाहिए। द्रौपदी ने तो अपने गर्भ में ही अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ना सिखा दिया था। बालक में गर्भ से ही संस्कार डाल देने चाहिए । “

“अच्छा तो जब पेंटर पेट में था तो तू रामायण पढ़ा करती थी तभी तो रावण के घर राम ने जन्म लिया है। बहुत अच्छा बेटा है तेरा भगवान ऐसी औलाद सबको दे। देखना जब ये बड़ा होगा तो तेरे सारे दुख दूर हो जाएंगे। “ ठकुराईन की बात सुनकर पेंटर का सीना फूल कर गुब्बारा हो गया। खुशी संभाले न संभली तो वह सिर नीचे किये शर्माता हुआ पानी की बाल्टी लेकर कोठी की ओर चल पडा। (1314)


मैं अपने भाई को बचाऊँगा


“माँ ठकुराईन क्या सच कह रही थीं कि मेरा भाई या बहन आने वाले हैं ?” घर पहुँचते ही पेंटर ने सबसे पहले यही सवाल किया।

“हाँ बेटा।“

“तो अब तू आराम किया कर मैं सारा काम कर दूँगा।“ इससे पहले जब माँ गर्भवती थी तब बापू ने मां को बहुत मारा । फिर दाई माँ ने कहा कि बापू की मार के डर से मेरा भाई वापस भगवान के पास चला गया और अब नहीं आएगा। मैंने सोचा इस बार मैं बापू को माँ पर हाथ नहीं उठाने दूँगा ताकि मेरा भाई या बहन वापस भगवान के पास न चला जाये। मैं अपने आप को अचानक बड़ा और जिम्मेदार महसूस करने लगा था। 

“नहीं बेटा तू तो मेरा राजा बेटा है। तुझपर कितना बोझ डालूँगी ? पहले ही तू मेरे बहुत काम कर दिया करता है। भगवान हर जन्म में तुझे ही मेरा बेटा बनाये। “ मां जब ऐसा बोलती मैं खुशी से फूल जाता । 

तभी भड़ाक से कोठरी का दरवाजा खुला और नशे में धुत्त एक पचास के आस-पास की उम्र का व्यक्ति भीतर आया। वो पूरे अधिकार से कोठरी में इधर-उधर कुछ ढूँढने लगा। 

“क्या ढूँढ रहे हो ? ठकुराईन को पता चल गया है कि तुम सारे पैसे दारू में उड़ा देते हो इसलिए अब वो पैसे नहीं देंगी बस खाने पहनने भर के लिए सामान दे दिया करेंगी। “

“साली कुलटा झूठ बोलती है मुझसे। सीधे-सीधे बता दे कि तूने पैसे कहां छुपाए हैं वरना मैं वसूलना जानता हूँ। “

“कह दिया न पैसे नहीं हैं।“

“लातों के भूत बातों से न मानें हैं। साली रांड ये ले।“ उस आदमी ने गायत्री को लात मारी तो गायत्री उसकी ओर पीठ करके उलट गई। वह गर्भवती थी और अगर वो ऐसा न करती तो वो लात उसके गर्भ पर पड़ती। 

“बापू मां ठीक कहती है। ठकुराइन अब एक नया नहीं देंगी।“ पेंटर ने बाप के पैर पकड़ लिये ताकि वो माँ को मार न सके।

“चुप कर संपोले। देख गायत्री बता दे वरना मैं आज तुझे जीवित न छोड़ूंगा। मैं पहले ही बहुत परेशान हूँ। जुएं में सबकुछ जीतते–जीतते हार गया। “

“अरे जुएँ में तो युधिष्ठिर जैसे सम्राट ने अपना सारा राज पाठ और पत्नी की मान मर्यादा सब लुटा दी थी। तुम तो मामूली मजदूर हो तुम कहां से जुआँ खेलकर राजा बन जाओगे। “

रावन ने उसे लातें लगाना शुरू कर दिया –“बड़ी आई मुझे सिच्छा देने वाली। सारी रामायण और महाभारत रट ली पर जे न सीखा कि पति की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी सेवा करनी चाहिए।“

“बापू माँ गर्भिणी है ठकुराईन ने कहा है कि माँ को अपना ख्याल रखना चाहिए।“

“हुँह खयाल रखना चाहिए। बड़ा आया माँ का खयाल रखने वाला। बता तेरी मां ने पैसे कहाँ छुपाये हैं वरना तुझे भी लगाता हूं दो चार लात।“

“घर में पैसे नहीं हैं। माँ सच कहती है। “

गुस्से में रावन अपनी पत्नी पर फिर टूट पड़ा उसके बाल पकड़कर मुँह दबा दिया और जोर से जमीन पर पटका। फिर उसे लात घूसे लगाने लगा। गायत्री ने फिर उसकी ओर पीठ फेर ली और गठरी की तरह अपने गर्भ को छुपा लिया। यह देखकर पेंटर को गुस्सा आ गया इस बार फिर बापू के कारन उसका भाई वापस चला जाएगा। इससे पहले भी तीन बार उसका भाई डर के मारे दुनिया में नहीं आया और गर्भ से ही भगवान के पास वापस चला गया था। उसने आव देखा न ताव कोनें में रखा डंडा उठाकर पूरे जो से अपने पिता की पीठ पर दे मारा। पहले तो रावन बिलबिलाया फिर पलट कर उसकी ओर बढ़ा। पेंटर ने फिर डंडा ऊँचा उठाया और अपने पिता को मारने का प्रयास किया पर बीच में ही पिता ने डंडा रोककर उसके हाथ से छीन लिया। और उसी पर बरसाने लगा। दो चार डंडें पूरे जोर से पड़े तो पेंटर बिलबिला गया। वह अभी भी इतना बड़ा नहीं हुआ था कि अपने पिता से पंगा ले सके। ये देखकर गायत्री ने रावन के पाँव पकड़ लिये। 

“भगवान के लिए उसे छोड़ दो वो मेरी एकलौती संतान है बाकी तो तुम्हारी शराब की भेंट चढ़ गये। “

“साली कुतिया एक ही संतान  है और उसे भी तूने मेरे खिलाफ भर रखा है। अभी से अपने बाप पर हाथ उठा रहा है। अगर इसे छोड़ दिया तो कल को मेरी जान ही ले लेगा।।“ बेटे को छोड़कर वह पुनः बीवी पर झपटा।

पेंटर को कुछ न सूझा तो घर से बाहर भागा। 

“हरिया काका मेरी माँ को बचा लो।“

“लो भला.... मैं क्यों पती पत्नी के बीच बोलने लगा। ये तो उनका रोज का झगड़ा है। पति पत्नी को मारे चाहे पीटे ये तो उसका हक है। भला हम कौन होते हैं उनके बीच में बोलने वाले और तुझे भी बीच में नहीं बोलना था। अब तेरे कारण वो दोगुनी मार खाएगी , अपने हिस्से की भी और तेरे हिस्से की भी। हुँह बड़ा सयाना बनता फिरता है। अब मैं बड़ा हो गया हूँ कहने से तू बड़ा नहीं हो जाएगा। वो तेरा बाप है और बाप ही रहेगा। क्या जरूरत थी उसपर हाथ उठाने की। ठकुराइन कहती थी कि तेरे जैसा बेटा मिलना उसका सौभाग्य है अब देखती तो जानती। भला मेरा बेटा मुझपर हाथ तो उठा दे। “ उसने खा जाने वाली नजरों से अपने बेटे को देखा तो वह सहम गया।

“सही कहते हो भैया। अब मैं अपने बेटे को इसके साथ न खेलने दूँगा वरना तो मेरा बेटा भी कलको मुझपर डंडे भाँजेगा।“ संगम ने अपने बेटे हीरा को घूरते हुए कहा जो पेंटर का पक्का दोस्त है। 

भीतर से गायत्री की रोने चीखने की आवाजें आ रहीं थीं और पेंटर एक के बाद दूसरे गाँववाले के सामने गिड़गिडा रहा था कि उसकी माँ को बचा लें। फिर अचानक भीतर से गायत्री की आवाजें आनीं बंद हो गईं। पेंटर वापस घर के भीतर भागा तो भीतर का दृश्य कुछ इस प्रकार था कि माँ खून से लतपथ जमीन पर आँखे बंद किये पड़ी थी और उसका पिता उसपर लाठियाँ बरसा रहा था। पर अब वो न तो उसके वार से बचने का प्रयास कर रही थी न रो रही थी बल्कि शांत पड़ी लाठियाँ खा रही थी। रावन भी अब उसे मार-मार कर थक गया था। वो फिर पूरे घर को खंगालने लगा था। पेंटर आँसुओं से सराबोर अपनी माँ पर गिर पड़ा और पागलों की तरह उसे हिलाने लगा। 

“माँ उठ। माँ क्या हुआ ? कुछ बोलती क्यों नहीं ?” श्यामलाल काका जो अब अपने जीवन के अंतिम वसंत देख रहे थे वो हिम्मत करके भीतर आये और गायत्री की नाड़ी देखी फिर नाक पर उँगली रखी। 

“पेंटर तेरी माँ मर गई।“ 

ये सुनकर पेंटर के रुके हुए आँसू बह निकले। वो खड़ा हुआ और अपनी माँ को ऐसे देखा जैसे वो कोई अजनबी हो और बाहर की ओर भागा। काश उसने अपने भाई या बहन को मर जाने दिया होता तो हर बार की तरह कम से कम माँ तो जीवित होती। काश वो हमेशा की तरह बापू और मां को झगड़ते छोड़कर कायर की तरह भाग गया होता। हरिया काका ने सही कहा यदि वह उन दोनों के बीच में न पड़ता और अपने बापू पर हाथ न उठाता तो ................ सब कुछ ठीक होता। वह भागता रहा भागता रहा जबतक कि एक भगवाधारी साधू से टकरा न गया। (1129)




अघोरी की शरण में


“कौन है तू बालक कहाँ से आया है ?“ उस साधू ने गुस्सा करने के बजाए अत्यंत अपने पन से सिर पर हाथ फेरते हुए उससे पूछा। तो वह रोने लगा। साधू ने उसे पुचकारा और अपनी पोटली में से निकालकर सूखी रोटी और अचार खाने को दिया। पेंटर ने ठकुराइन के घर पर बकरी का गिलास भर दूध पिया था उसके बाद से न कुछ खाया न पिया। इस समय यह रोटी अचार उसे अमृत से कम न लगा। 

जब सांसों पर काबू पाया तो साधू महाराज को अपने घर का किस्सा बताया। “बालक चिंता मत कर तेरी माँ मरी नहीं है, बल्कि उसने तो बस इस नश्वर शरीर का त्याग किया है। अब वह ईश्वर के पास जाएगी, जहाँ से उसे स्वर्ग भेजा जाएगा और सौ वर्षों तक स्वर्ग के सुख उठाने के पश्चात्, पुनः धरती पर भेजा जाएगा और वह किसी की पुत्री के रूप में पुनः जन्म लेगी। “ यही वो शब्द है जिसका प्रयोग कर साधू संयासी दुखी लोगों के दुख दूर किया करते हैं। स्वर्ग ।

पेंटर की आँखों के सामने लातों से मार खाती माँ की तस्वीर घूम गई –“अगर उस घर में मेरे बापू समान कोई हुआ तो वो भी गर्भ से ही वापस भगवान के पास चली जाएगी ? “ उसने गर्भ के भीतर अपने पिता की लातों की चोट सहती अपनी माँ की कल्पना कर ली थी। 

“तेरी माँ को पिछले जन्म के पापों के फलस्वरूप जितना कष्ट मिलना था मिल चुका अब वो अगले जन्म में अपने इस जन्म के पुण्यों का फल पायेगी। वो किसी सेठ साहूकार के घर जन्म लेगी और राजकुमारियों की तरह पलेगी।“ साधू ने उसे फिर सांत्वना दी ।

साधू की ये बात सुनकर पेंटर के चेहरे पर मुस्कान आ गई। ये कल्पना करना कितना सुखद था कि उसकी माँ राजकुमारी की तरह पालना झूलेगी। -“ हरिया काका ने कहा कि अगर मैं बापू पर हाथ न उठाता तो माँ अभी भी जिंदा होती।“

“अगर जिंदा होती तो तेरा बापू फिर कुछ दिनों के बाद उसकी कुटाई करता पर अब वो उसकी पहुँच से बहुत दूर निकल गई है। “ संयासी भी हार नहीं मानने वाला था वो पेंटर के हर सवाल का सकारात्मक उत्तर देने को कटिबद्ध था। 

हाँ ये भी सच है कि बापू अब उसे कभी हानि नहीं पहुँचा सकेगा अगर उसे ढूँढ भी लेगा तो जिस साहूकार के यहाँ वो जन्म लेगी उस साहूकार के आदमी बापू को डंडों से भाँज देंगे। अब उसे अपनी माँ की मौत का दुख नहीं था बल्कि उसके राजकुमारी बनकर जन्म लेने की खुशी थी। “ मृत्यु से भय कैसा ? वो तो नये जीवन की शुरुआत है।”  बाबा जी के वचन उसके कानों में पड़े तो उसने संतोष की साँस ली। रास्ते में एक नदी पर वह नहाया तो बाबा ने उसे लुंगी और कुर्ता पहनने को दिया जो उसे काफी बड़ा हो रहा था। बाबा ने उसे कहा कि वह खून से सने कपड़े फेंक दे पर उन कपड़ों में उसकी माँ का खून लगा था जाने क्यों वह उसे फेंक न सका और पोटली बनाकर अपने साथ रख लिया।

रात में वह खुले आसमान के नीचे सोया तो उसे अपनी माँ की रोने की आवाजें सुनाईं दीं तो उठ बैठा। वो पेंटर पेंटर पुकार रही थी पर उसकी आवाज अस्पष्ट और बहुत दूर से आ रही थी। चारों और अंधकार था आकाश में चाँद और तारे रोशनी बिखरा रहे थे। उसने चारों ओर देखा सभी संयासी सो रहे थे। 

“मां मैं तुझे साफ-साफ सुन नहीं पा रहा पर मैं जानता हूँ कि ये तू ही है। मुझे आज भी रातों को आवाजें सुनाई देतीं है पर मैंने तुझे नहीं बताया कि कहीं तू मुझे फिर उस पागल ओझा के पास न ले चले। अब मैं तुझे भी सुन पा रहा हूँ पर समझ नहीं रहा कि क्या कहना चाह रही है।“

“मुझे विश्वास है कि वो तेरी कुशल क्षेम ही पूछ रही होंगी। “ संयासी ने कहा शायद वह जाग रहा था।  

“मुझे रातों को लोगों के चीखने रोने की बहुत धीमी आवाज सुनाई देती है। अब आप मुझे झाड़ू से मारेंगे ?”

“नहीं…….  दो दिन बाद हम काशी पहुँच जाएंगे वहाँ एक बहुत ही पहुँचे हुए अघोरी हैं, बिपत हरण महाराज,  मैं तुम्हें उनकी शरण में दे दूँगा। वो तुम्हारी शक्तियों को सही दिशा देने में सक्षम होंगे। अभी सोने की कोशिश करो। अपनी भँवों के बीच अपना ध्यान लगाओ, गहरी सांस लो  और अपनी सांसो की गिनती करो। नींद आ जाएगी। “

वाकई ये तरीका कारगर सिद्ध हुआ पेंटर कुछ ही पलों में सो गया। काशी पहुँचकर वह संयासी उसे एक अघोरी के पास ले गया जिसने सिर से पाँव तक काले कपड़े पहने थे और माथे पर लाल तिलक किया था। उसके बाल जटाओं में बंधे उसकी कमर तक आ रहे थे और सिर पर काला साफा बंधा था। उसने शरीर के हर अंग पर रूद्राक्ष धारण किया होगा। कानों में बाली से लेकर हाथों और पैरों में भी रुद्राक्ष लपेट रखा था। वह उसके बापू से कुछ बड़ा ही रहा होगा। पेंटर उसकी आयु का अंदाजा नहीं लगा सका। 


उसने पेंटर के सिर पर हाथ रखा और आँखे बंद करके मंत्र बुदबुदाया –“तेरी माँ  को मरे तेरह दिन नहीं हुए हैं। मृत्यु के तेरह दिनों तक आत्माएं इस लोक और उस लोक के बीच भटकती हैं और अपने परिजनों तक अपना दुख व कष्ट पहुंचाने के प्रयास करती हैं। परंतु प्रायः सांसारिक लोगों तक उन परालौकिक लोगों की पुकार नहीं पहुँचती। ऐसे में वे ऐसे लोगों के पास जाते हैं जिनकी आत्मा अभी मरी नहीं है और जो संसार में होकर भी उतने सांसारिक नहीं हैं। तुझे ईश्वर ने एक शक्ति दी है जिसकी सहायता से तू उन्हें मुक्त करा सकता है। उन्हें शांत कर सकता है व उनके दुख दूर कर उन्हें अपने लोक लौटने का मार्ग दिखा सकता है और उनकी यात्रा को सरल बना सकता है।“

“क्या मैं मेरी माँ को मुक्त करा सकता हूँ ?”

“हां पर तेरे और तेरी माँ के बीच संपर्क कराने के लिए उसके खून , हड्डी या उसकी चिता की राख की या किसी भौतिक माध्यम की जरूरत है । यह माध्यम कोई भी भौतिक वस्तु हो सकती है । जैसे कि कोई वस्त्र, या कोई चित्र या कोई भी वस्तु जिसे व्यक्ति जीते जी प्रयोग करता हो और उससे उसे लगाव रहा हो , जिसमे कुछ समय के लिए आत्मा को रखा जा सके। “

“ मैं स्वयं माँ की पेंटिंग बना सकता हूँ। और उसके खून से सने कपड़े हैं मेरे पास।“

“तू पेंटिंग भी करता है यह तो अच्छी बात है और तेरे पास खून भी है तो यह कार्य अपेक्षाकृत सरल हो जाएगा। तेरी पेंटिंग के जरिये तेरी माँ को एक मूर्त माध्यम मिलेगा ताकि वह इस दुनिया से जुड़ सके और उसपर खून लग गया तो चित्र को अपनाने में वह अधिक समय नहीं लेगी। हम आज रात ही यह प्रक्रिया करेंगे आज पूरे चाँद की रात है इस समय तांत्रिक क्रियाएं अधिक दक्षता से की जा सकतीं है।“ 

अघोरी ने पेंटर को पेंट और ब्रश दिया वह खाना पीना भूलकर पेंटिंग बनाने लगा। जब पेंटिंग बनकर तैयार हुई तो अघोरी ने बहुत प्रशंसा की। 

“शाबाश तू तो बहुत प्रतिभाशाली है रे। तेरी पेंटिग्स भटकी आत्माओं को मुक्त कराने का माध्यम बन सकती हैं। एक बार किसी को देखकर क्या तू उसकी पेंटिंग बना सकता है ? अगर मैं किसी का हुलिया बताऊँ तब क्या तू उसकी पेंटिंग बना लेगा? “

“हाँ बना लूंगा ।”

“जैसे तुझे परालौकिक आवाजें सुनाई देतीं हैं वैसे ही मुझे परालौकिक जीव दिखाई देते हैं । परंतु मैं उन्हें सुन नहीं सकता और तू उ़न्हें देख नहीं सकता । हम दोनों मिलकर उनकी समस्या को दूर कर सकेंगे। बोल मेरा साथ देगा ?”

उसने हां में सिर हिलाया। रात में अघोरी ने अनेक तांत्रिक क्रियाएं कीं उसने उसकी माँ का खून निचोड़कर उसके कुछ बूँदे पेंटिंग पर लगाईं और फिर झूम-झूम कर मंत्र पढ़ने लगा। जब वह रुका तो पेंटर को अपनी माँ की स्पष्ट आवाज सुनाई दी जो मानो उसी चित्र से आ रही थी जो उसने बनाया था। 

“पेंटर मेरे लाल तू कैसा है ?”

“माँ अब मैं तुझे साफ सुन सकता हूँ। मैं ठीक हूँ तू कैसी है?” पेंटर ने अपनी माँ के चित्र से पूछा यह चित्र तो अब भी सामान्य लग रहा था पर आवाज मानों उसी ओर से आ रही थी। 

“अब तुझसे बात हो गई अब मै खुश हूँ। तू अपना ख्याल रखना। तू कहता था न कि तू अब बड़ा हो गया है और अपना ख्याल रख सकता है। तो अब मैं भगवान के घर जाती हूँ अपने दूसरे बच्चों की देखभाल करने वो तो अभी छोटे हैं न। “

“हाँ मां तू सही कहती है। मेरी चिंता मत कर मैं अपना ख्याल रख लूँगा तू उनका ख्याल रखना।“

“एक वादा कर मेरे लाल कि तू कभी अपने बापू के समान नहीं बनेगा। तू कभी औरत पर हाथ नहीं उठाएगा न ही दारू को हाथ लगाएगा। “

“माँ मैं वादा करता हूँ कि मैं कभी दारू नहीं पियूँगा न किसी औरत न मर्द पर हाथ उठाऊँगा। अब तू अपने लोक जा माँ और मेरे भाई बहनों का ख्याल रख। मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ मां।“

“मैं भी तुझे बहुत चाहती हूँ रे।“

इसके बाद उसकी माँ की आवाज आनी बंद हो गई। वो चली गई थी। पेंटर को फिर रुलाई छूटी। (1350)



पिता से बदला

“तेरी माँ की तरह अनेक आत्माएं हैं जो अपना दुख सुनाना चाहती हैं पर कोई सुनने वाला नहीं जिसके कारण वो बड़ी दुखी व अतृप्त रहती हैं। यद्यपि उन्हें एक दिन तो अपने लोक जाना ही है। वो सदा यहाँ नहीं रह सकतीं पर अपनी इच्छा के पूरी होने तक वो दो लोकों के बीच फंसी रह जाती हैं। जैसे कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति से प्रेम करता है तो वह तबतक भटकता रहेगा जबतक की उसकी संतानें उस पूंजी को पूरी तरह लुटा न दें। इसके बाद ही वह मुक्त हो सकेगा। पर तेरी माँ बहुत ही नेक औरत थी। मरने के बाद भी उसने अपने पति का बुरा नहीं चाहा। वह तो बस तुझसे प्रेम भरी बातें करने की प्रतीक्षा में बीच में रुकी हुई थी। 

पर सभी आत्माएं ऐसी नहीं होतीं कुछ तो किसी का अहित देखने की इच्छा में ही दुनिया नहीं छोड़ना चाहतीं। यदि तू चाहे तो अपनी पेंटिंग के जरिये उन्हें मुक्त कर जबरन उस दुनिया में भेज सकता है जो उनके लिए बनी है। जहाँ अपने कर्मों का हिसाब करने के बाद उन्हें वापस जन्म लेने का और गलतियाँ सुधारने का अवसर दिया जाएगा। मैं तुझे उन आत्माओं का हुलिया बता सकता हूँ और तू उनकी पेंटिंग बना सकता है। “

इसके बाद पेंटर ने अघोरी के बताये हुलिए के चित्र बनाए और बहुत सी आत्माओं को मुक्त कराने लगा। अधिकतर आत्माएँ अपने प्रियजनों तक अपनी बात पहुँचाना चाहती थीं। एक स्त्रि की आत्मा अपनी बेटी को यह बताना चाहती थी कि उसकी शादी के लिए जोड़े गए गहने उसके कमरे की दीवार पर  चुनवा रखे हैं। अघोरी ने यह सूचना उसकी पुत्री तक पहुँचा दी। उस घर के सामने पहुंचकर अघोरी ने अलख निरंजन की आवाज लगाई तो घर से एक लड़की कुछ खाने का सामान लेकर आई। वो अत्यंत चिंतित लग रही थी। 

“बेटी तूने बाबा को भोजन दिया है बाबा तेरी एक चिंता हर लेंगे बता क्या चाहिए तुझे ?” 

“बाबा कुछ दिनों में मेरा ब्याह है। मेरे पिता ने कुछ गहने बनवाये थे और माँ से उन्हें छुपाकर रखने को कहा था। कुछ दिन पूर्व ही माँ की धोती ने आग पकड़ ली जिससे उनकी अकस्मात् मृत्यु हो गई। पूरा घर ढूँढ लिया गहने नहीं मिले।“

“तू अपने कमरे की पश्चिमी दीवार में देख कदाचित तेरे गहने मिल ही जाएँ। “ लड़की ने अपने पिता को यह बात बताई तो पिता ने पश्चिमी दीवार को गौर से देखा। उस समय बैंक व लॉकर व तिजोरी की सुविधा तो थी नहीं, आम आदमी ऐसे ही अपना धन छुपाया करता था, कभी चूल्हें के नीचे जमीन खोदकर, तो कभी झोपड़ी की दीवार में चुनवाकर। लड़की के कमरे की पश्चिमी कच्ची दीवार को एक जगह गोबर से नया-नया पोता गया था वहाँ खुदाई की तो गहने निकल आये। दोनों बेटी-बाप साधू का शुक्रिया अदा करने भागे पर अघोरी जा चुका था। इस घटना ने पेंटर को बहुत प्रेरित किया ताकि वह लोगों की सहायता कर सके। 

हर सुबह अघोरी पेंटर को  उसके आसपास मंडराने वाली आत्मा का हुलिया बताता और वह उसका चित्र बनाता।  रात होने पर वो उससे संपर्क करते। अघोरी को आत्माएं दिखती थीं, पर वह उन्हें सुन नहीं सकता था, वहीं पेंटर को वो बस सुनाई देती थीं वो भी अस्पष्ट, पर पेंटिंग के रूप में माध्यम मिलने पर उनकी आवाज साफ सुनाई दिया करती थी । आत्माएं अपनी तस्वीर को ही अपना शरीर मानकर आसानी से उसे ग्रहण कर लेतीं और उन्हें सांसारिक मनुष्यों से सम्पर्क करने का मार्ग मिल जाता । हाँ कभी-कभी लोग स्वयं अपने मरे हुए प्रियजनों से संपर्क करने के लिए उनके पास आया करते थे। तब वो दोनों उनकी सहायता कर दिया करते थे। पहले अघोरी को आत्मा से संपर्क साधने के लिए मरने वाले के प्रयोग में आई कोई वस्तु की आवश्यकता पड़ती थी जिससे उसे मोह रहा हो , पर अब पेंटर की सहायता से वह ऐसी आत्माओं से भी संपर्क कर सकता था जिनकी कोई वस्तु उसके पास नहीं है । सिर्फ हुलिया बताकर अघोरी, पेंटर से आत्मा की पेंटिंग बनवाता और आत्मा को उसकी पेंटिंग में ही बुला लेता। क्योंकि आत्मा के लिए यही हुलिया उसकी पहचान होती थी, इसलिए वे सरलता से उसे अपना माध्यम बना लेतीं थीं । तीन-चार वर्षों में ही पेंटर भी मंत्रो का सही-सही उच्चारण करने लगा और काफी कुछ सीख गया । एक रात उसे अपने पिता की आवाज सुनाई दी तो वह चौंक कर उठ बैठा । और अगले दिन उसने अपने पिता का चित्र बनाया ।

“ये किसका चित्र बना रहा है रे पेंटर ?” इन दिनों वो किसी शमशान में नहीं थे बल्कि हिमालय की वादियों में स्थित एक आश्रम में डेरा डाले थे जो घाटी में स्थित एक छोेटे से गांव तिकड़मपुर में था। 

“मेरा बापू रावन,  वो मुझे पुकार रहा था। बाबा आपने कहा था कि आपको एक ऐसा तरीका पता है जिससे आत्माओं को रोता बिलखता इसी संसार में अनन्त काल तक छोड़ा जा सके।“

“हां पता तो है पर क्यों ? क्या तू अपने पिता से अभी भी नाराज है ?”

पेंटर के हाथ रूक गये पर वह कुछ नहीं बोला। अघोरी बाबा ने सदा उसे यही सिखाया कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। आत्मा को उसके किये का दंड देने का अधिकार ईश्वर को है । अपने कर्मों के कारण जीवात्मा बार-बार शरीर धारण कर अपने कर्मों का फल भुगतती है। नश्वर शरीर से मोह नहीं करना चाहिए बल्कि आत्मा को उच्च शिखर पर ले जाने के लिए प्रयासरत् रहना चाहिए। अपने सफर में उसकी मुलाकात कई ऐसी आत्माओं से हुई थी , जो अपने कर्मों के हिसाब के डर से अपने लोक लौटना ही नहीं चाहती थीं और संसार में रहकर लोगों का बुरा कर रही थीं। पर पेंटर और बाबा ने उन्हें भी जबरन उनके लोक भेज दिया था। पर अब यह एक ऐसी आत्मा थी जिससे पेंटर बहुत नाराज था। उसकी माँ और उसके चार भाई बहनों का कातिल उसका पिता अब मुक्ति के लिए उससे गुहार लगा रहा है। पर पेंटर नहीं चाहता कि वो मुक्त हो। “हाँ ... मैं चाहता हूँ कि मेरा बाप सदा मंझधार में फंसा रहे।“

“देख तेरी माँ के साथ जिसने बुरा किया वह एक शरीर था और यह एक आत्मा है जो कि परमात्मा का ही अंश है। यदि उसकी कोई अंतिम इच्छा या अंतिम कार्य अधूरा नहीं है तो वह स्वतः ही तेरह दिन बाद अपने लोक को रवाना हो जाएगा। और जैसा जीवन तेरे पिता ने जिया है उससे तो यही लगता है कि वह अपने पापों का हिसाब देने शीघ्र ही प्रस्थान कर जाएगा। पर यदि तूने उसे यहाँ रोका तो वह स्वाभाव से ही दूसरों को कष्ट पहुँचाने वाला रहा है। यदि उसे इस दुनिया में रोक कर रखा तो वह इस रूप में भी  दूसरों को कष्ट ही देगा। “

“और यदि उसे कैद करके किसी गहरे अँधेरे कुँए में फेंक दिया जाए तो ? किसी ऐसी जगह जहाँ न कोई उस तक पहुँच सके न वो किसी तक। फिर वो अनन्त काल तक वहीं आँसू बहाता रहे। ”

“इस समय तू बस बदले की भावना से भरा हुआ है।  और...............”

“यदि आप मेरे सहायता नहीं करना चाहते तो साफ मना कर दीजिए। “ पेंटर ने रूखेपन से कहा। 

“ठीक है जैसी तेरी मर्जी। मै तुझे वो मंत्र बताऊँगा जिससे तू उस आत्मा को सदा के लिए इस पेंटिंग में कैद कर सकेगा। जितना ही वह इस लोक को छोड़ने में देर करेगा उतनी ही बुरा होता चला जाएगा। पर यदि यह पेंटिंग फट गई और इसमें उस आत्मा को वहन करने योग्य ताकत न बची तो उस समय इसे जो इन्सान छुएगा वह दुष्ट आत्मा उस पर सवार हो जाएगी। और तब वो बहुत ताकतवर होगा। अन्यथा वह इसी दुनिया में फँसा रहेगा तब तक जब तक कि उसे रोक के रखने वाला माध्यम पूरी तरह नष्ट नहीं हो जाता । जैसे की अगर वह जला दिया जाए । पर अगर वह किसी शरीर में स्थान पा गया तो उसे दूसरे लोक भेजना कठिन होगा। वह एक के बाद दूसरा शरीर आसानी से प्राप्त कर लेगा । “

“मैं इसे ऐसे स्थान पर फेंकूँगा कि जहाँ इसतक कोई न पहुँच सके।“

रात में तांत्रिक क्रियाएं प्रारंभ हुईं। रावन की आत्मा ने पेंटिंग के जरिये पेंटर से संपर्क किया। 

“पेंटर मेरे बेटे कैसा है तू ? पहले तेरी मां मुझे छोड़कर चली गई फिर तू चला गया। तुम्हारे जाने के बाद मेरी जो हालत हुई कि पूछ मत। मुझे कोढ़ हो गया और गाँव वाले मुझे छूने व पास आने से कतराने लगे। सब कहते ये मेरे पापों का फल है। इस प्रकार सड़गल कर भूख प्यास से तड़पते हुए मेरी मृत्यु हुई। आज तुझे देखकर बहुत संतोष हो रहा है। मैं अपने किये हर पाप की तुझसे क्षमा मांगता हूँ , मुझे माफ कर दे,  ताकि मैं भार मुक्त होकर नये जीवन में प्रवेश कर सकूँ। तेरी माँ से तो मैं ऊपर जाकर माफी मांग लूँगा पर मैं तेरा भी दोषी हूँ। मुझे माफ कर दे , एक बार कह दे कि तूने मुझे माफ किया तो मुझे शांति मिल जाएगी। “

“नहीं मैं तुम्हें माफ नहीं करूंगा न तुम्हें अपना हिसाब किताब करने दूसरी दुनिया में जाने दूँगा। मैं तुम्हें यहीं रोककर रखूंगा ताकि तुम अनन्त काल तक आँसू बहाते रहो। “

“ऐसा न कर पेंटर। यदि ऐसा किया तो मै शैतान बन जाऊँगा। अभी मैं मुक्ति के लिए तड़प रहा हूँ मुझे मुक्त कर दे मुझसे और पाप न करवा। “

“पेंटर यह ठीक कहता है। मृत्यु के तेरह दिनों तक आत्मा को अपने किये बुरे कामों पर पछतावा होता रहता है पर यदि तूने उसे जाने न दिया तो वह पछतावा समाप्त हो जाएगा और एक आत्मा के रूप में भी उसपर वही वहशी प्रवृत्ति हावी हो जावेगी। तब..............”

“मैने कहा न मैं इसे ऐसे स्थान पर फेंकूँगा कि यह कभी नहीं निकल पाएगा। “ दूर पहाड़ी पर बने एक जर्जर हो चुके किले में स्थित एक सूखा गहरा अंधा कुआँ उसकी आँखो के सामने घूम गया जिसे उसके पिता ने भी देखा। 

“नहीं मैं वहां नहीं जाना चाहता। मुझे क्षमा कर दे। “ पेंटर ने वो मंत्र दोहराए जो उसने सीखे थे। और कुछ ही समय में सब शांत हो गया। रावन की आत्मा पेंटिंग में कैद हो चुकी थी। रावन चीख चीख कर उससे क्षमा मांग रहा था पर वह नहीं पसीजा । क्या उसने सही किया ? (1457) 



इतिहास दोहराया जाता है । 


“पेंटर तुझे अभी गुस्सा चढ़ा है इसलिए तुझे समझ में नहीं आ रहा पर एक दिन तू पछताएगा। मैं जानता हूँ कि तू किसी दिन पछताएगा। इसलिए मैं तुझे वो विधि बताता हूँ जिससे तू भविष्य में इसे रोक सकेगा। भगवान करे वो समय कभी न आये और ये कुआँ सदा के लिए दफन कर दिया जाए और कोई इस पेंटिंग तक न पहुँच सके।  पर फिर भी यदि ऐसा कुछ हुआ तो उसे रोकने के लिए तुझे क्या करना है यह बताना मेरा फर्ज है। “ जब पेंटर पहाड़ी पर बने किले के अवशेष में स्थित सूखे कुएँ में पेंटर ने वह पेंटिंग फेंक कर आया तब अघोरी ने उसे भविष्य में कैसे इस आत्मा से निपटना है इसका उपाय बताया। 

पेंटर के दिल में आग लगी थी। वो पुराने दिन उसकी आँखों के सामने कई दिनों तक घूमते रहे। अभी वह चौदह पन्द्रह वर्ष का किशोर ही तो था। अघोरी बाबा जो देख रहे थे वह उस भविष्य को देख पाने में असमर्थ था।

कुछ और वर्ष बीते अब पेंटर एक पच्चीस छब्बीस साल का नौजवान है । और अघोरी बाबा पचासी वर्ष के हो चुके हैं और उनका स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता है । उनकी तबीयत बिगड़ने पर पेंटर ने उन्हें आगे जाने से रोक दिया और कुछ दिन उसी गाँव में ठहरने का मन बनाया जहाँ वे दो दिन पूर्व ही आये थे । अघोरी यहाँ रुकना नहीं चाह रहा था पर स्वास्थ्य के कारण वह कहीं और की यात्रा भी न कर सका। वे हमेशा की तरह शमशान में ठहरे थे ।

उस दिन एक स्त्रि अघोरी बाबा के पास आई -“बाबा मेरे बेटे को बचा लीजिए उस पर किसी बुरी आत्मा का साया है । वो शमशान के पास वाले पीपल के पेड़ पर कल रात के समय मूत्र विसर्जन कर आया। उसी पीपल के पेड़ से कोई दुष्ट आत्मा उस पर सवार हो गई। वही पेड़ जो कल आँधी में गिर गया।“ 

“इस श्यमशान के बाहर जो पेड़ लगा है कहीं वही तो नहीं ?” अघोरी ने चिंतित होकर पूछा । उसके चेहरे का रंग उड़ सा गया था ।

“हां बाबा वही वाला ।“

अघोरी बाबा पेंटर के साथ उस महिला के घर पहुँचे। उन्हें अब चलने-फिरने में परेशानी रहने लगी थी, पर लोगों की सहायता करने का जज्बा अभी भी बरकरार था। उन्होंने बालक की स्थिति जाँची और रात में उसे शमशान लाने को कहा जहाँ वो उसका इलाज करने वाले थे। 

“पेंटर मुझे लगता है अब विदा लेने का समय आ गया है।“

“क्या बात करते हो बाबा ? अभी तुम सौ वर्ष और जिओगे।“

“हाँ हां अमृत पीता हूँ न मैं। मरने से पहले तुझे एक विद्या सिखाना चाहता हूँ यद्यपि मैंने डर के मारे वो विद्या कभी प्रयोग नहीं की पर एक ऐसा काला जादू है जिससे तू किन्हीं दो लोगों की आत्माएं आपस में अदल बदल सकता है। अपनी पेंटिंग में इसके शरीर पर उसका और उसके शरीर पर इसका चेहरा बनाकर। पर इसमें एक खतरा भी है कि एक ही शरीर में दो यादें रह जाएं और व्यक्ति कभी पहले व्यक्ति की तरह तो कभी दूसरे व्यक्ति की तरह बर्ताव करने लगेगा। “ यह विधि बताने के बाद बाबा ने लंबी सांस खींची और कहा। 

“सुन पेंटर वो जो आत्मा उस बालक को परेशान कर रही है वो इतनी आसानी से तेरी पेंटिंग में नहीं जाएगी। वह वर्षों से किसी शरीर की प्रतीक्षा कर रही थी। उसे किसी ने जानबूझकर दूसरे लोक जाने से रोक दिया था जिसका बदला वह ले रही है। ऐसी आत्माएं पहले ही दुष्ट थीं अब वो और भी नकारात्मक ऊर्जा एकत्र कर चुकी हैं। ऐसे में उन्हें दूसरी दुनिया में भेजने के लिए किसी दूसरी उतनी ही शक्तिशाली आत्मा की आवश्यकता होगी। सुन मैं अपना जीवन पूरा जी चुका हूँ और वह बालक अभी छोटा है उसके सामने पूरा जीवन पड़ा है। आज रात मैं अकेला ही तंत्र मंत्र करूँगा और उस आत्मा को शरीर छोड़ने पर विवश करूँगा फिर इस दौरान मैं योगविद्या से अपना शरीर त्यागकर स्वयं आत्माओं की दुनिया में उसे लेकर जाऊँगा। इतने वर्षों की तपस्या के कारण मेरी आत्मा भी अनेक शक्तियाँ अर्जित कर चुकी है और वही उसे उस लोक में धकेल सकती है। जब मैं उसे लेकर पेंटिंग में कैद हो जाऊँ तब भोर होने तक  इंतजार करना सुबह की पहली किरण तक यदि मैं न आऊँ तो नियमानुसार मंत्रोच्चारण करके पेंटिंग की आहूति दे देना। और मुझे सदा के लिए विदा दे देना। इस कमजोर शरीर में वापस आने की बहुत कम उम्मीद है। “ 

“बाबा ये आप क्या कह रहे हैं आपके बिना मैं क्या कर सकूंगा ? कोई और उपाय बताईये मैं यह खतरा नहीं मोल ले सकता। “

“मेरे लाल कोई और उपाय होता तो मैं ये उपाय क्यों अपनाता। उस पेड़ पर एक आत्मा को कैद किया गया था वैसे , जैसे तूने अपने पिता को कैद किया था ।  पेड़ के मरते ही वह आत्मा स्वतंत्र होकर अपने लोक चली जाती पर उस बालक के मूत्र ने उसे रहने के लिए एक नये घर का पता दे दिया । रक्त या मूत्र किसी आत्मा के लिए आमंत्रण के समान होते हैं। इसलिये कहीं भी मूत्र विसर्जन करना बुरी बात है । इसके लिए सरकार द्वारा जगह-जगह सार्वजनिक शौचालय बनाये गये हैं, उनका ही प्रयोग करना चाहिए । कहते हैं  इतिहास स्वयं को दोहराता रहता है । सुन...... वो बालक जिस आत्मा से ग्रसित है..... वो .... कभी.............. मेरा बाप हुआ करता था । मैंने ही उसे उस पेड़ में कैद किया था । तब तू नहीं था न मेरे बाप की पेंटिंग बनाने के लिए इसलिए मैंने उस पेड़ को चुना जिसके नीचे बैठकर वो अपने शराबी दोस्तों के साथ शराब पीता व जुआँ खेलता था। “ आगे न अघोरी ने कुछ कहा न पेंटर ने पूछा वह समझ गया कि अघोरी क्या कहना चाहता है ? अघोरी ने अपने पिता की आत्मा को पीपल के उस पुराने वृक्ष में वर्षों पूर्व कैद किया था शायद उसके दिल में भी वही आग लगी थी जो पेंटर के दिल में जल रही है । तभी तो वह जानता था कि इस कृत्य का क्या अंजाम होना है। अत्यंत बूढा होने के कारण वह पीपल का पेड़ उसी रात आँधी से गिर गया था और उसकी आत्मा ने उस बालक के शरीर पर कब्जा कर लिया जिसने कुछ देर पूर्व ही उस पेड़ पर अपनी निशानी छोड़ी थी। पेंटर को अपने पिता की आत्मा की याद आई पर वो आस्वस्थ था कि उस पेंटिंग को उसने इतने गहरे कुंए में फेंका है कि वहाँ कोई क्यों जाएगा ? जब पेंटिग गलकर नष्ट हो जाएगी तब उसके पिता की आत्मा अपने लोक लौट जाएगी ।

रात में अघोरी बाबा ने अकेले ही सारी प्रक्रिया पूरी की एक गोल घेरे के भीतर पेंटर की बनाई अपने पिता की पेंटिंग रखी और मंत्रोच्चारण शुरु किया। कुछ देर में वह बालक होश में आ गया। और चिल्लाने लगा –“तू क्या चाहता है मुझसे ? तू जो चाहता था वो मैं बन गया अब मैं हरगिज इस बालक को नहीं छोड़ूँगा पहले तू मुझे आजाद नहीं कर रहा था अब मैं आजाद नहीं होऊँगा। “ वह बालक चीख रहा था पर अघोरी बाबा मंत्र पढ़ते रहे वो पलथी मारे मंत्र पढ़ते पढ़ते अचानक एक ओर लुढ़क गये। बालक का शरीर कांपने लगा और फिर शिथिल पड़ गया कुछ देर जब सबकुछ शांत दिखा तो आगे की प्रक्रिया स्वरूप मंत्रोच्चारण करते हुए पेंटर ने पूजा जारी रखी । भोर हो गई पर अघोरी को होश नहीं आया । बालक ठीक हो चुका था पर अघोरी बाबा के प्राण पखेरू उड़ चुके थे । पेंटर बाबा की लाश पर बैठकर बहुत रोया इतना तो वह अपनी माँ की मौत पर भी न रोया होगा । इसके बाद वह एक शहर से दूसरे शहर बहुत सी आत्माओं को शांत करते हुए बढ़ता रहा। (1015)



घोरगाँव में आगमन

अब पेंटर साठ-बासठ वर्ष का हो चुका है पर दिखने में चालीस पैतालीस से ज्यादा नहीं लगता। वह एक गांव आया है जो बहुत ही सुन्दर है , गांव का नाम है घोरगांव। गाँव में सभी लोग गरीब हैं कोई भी पक्का मकान देखने को नहीं मिलता सिवाय एक बड़ी हवेली के। पेंटर हमेशा सोचता था कि इतनी बड़ी-बड़ी हवेली में रहने वालों का जीवन कैसा होता होगा ? वह यहाँ भी शमशान में बैठता और मरने वाली आत्माओं को शांति प्रदान करता। 

“अलख निरंजन भिक्षा दे माता तेरे दर पर संयासी आया है।“

“ये लो बाबा।“एक विधवा स्त्रि ने बाहर आकर गुड़ के साथ दो सूखी रोटी परोसी जो वह स्वयं खाने जा रही थी। 

“तेरे पति को मरे अभी तेरह दिन नहीं हुए क्यों ?”

“हाँ महाराज। ये तो सब जानते हैं। मुझे तो ये बताईये कि किस प्रकार मैं अपना जीवन यापन करूँ और अपने तीन बच्चे पालूँ ? साहूकार का बड़ा कर्ज है हमपर,  कैसे उतारें ? घर में मैं मेरी सास और तीन बच्चे हैं कोई कमाने वाला न रहा।“

“हुंम्म सुन तेरे पति ने मृत्यु से पूर्व कुछ कागजात तुझे दिये थे?”

“हाँ बाबा दिये थे पर कुछ बताया नहीं उनके विषय में। “

“तेरा पति अपने चाचा से जमीन का केस जीत चुका है। वे कागजात उसी जमीन के हैं, वो चाहता है कि तू कुछ जमीन बेचकर बाकी जमीन पर खेती किया कर। और एक बात और……… ल उस पुस्तैनी जमीन में पूर्व दिशा की ओर एक बक्से में कुछ पुस्तैनी जेवर भी गड़े हैं उन्हें भी निकाल लेना तेरे काम आएँगे। बेटी तेरा पति तुझे कुछ बताता इससे पूर्व ही हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गई और मृत्यु के बाद आत्मा वो देख सकती है जो आँखवाले नहीं देख सकते। तेरे पति ने वह पुस्तैनी जेवरों का बक्सा खेत में देख लिया है। यही सूचना देने यहाँ आया था। जा खुस रह।“ कहकर पेंटर अलख जगाता आगे बढ़ा । 

तभी पेंटर को किसी ने पीछे से आवाज दी –“ए पेंटर।“ ये एक नौजवान था जो देखने में बहुत ही खूबसूरत था गठा भरा बदन लंबा कद उसे देखकर पेंटर को अपनी जवानी याद आ गई।

“राजा साहब ने तुझे बुलाया है।“ राजा साहब वही अमीर साहूकार है जिसकी इस गाँव में बड़ी सी हवेली है। 

“अच्छा वो राजा साहब जिनकी बड़ी सी हवेली है ? क्यों बुलाया मुझे?”

“हाँ वही। वो तुमसे अपना पोस्टर बनवाना चाहते हैं। जैसे राजा महाराजा बनवाया करते थे न वैसे ही। “

“अच्छा तब तो राजा साहब बहुत अच्छा इनाम देंगे। चलो अभी चलो।“ पेंटर कभी कभी लोगों की पेंटिंग बनाकर कुछ पैसे भी कमा लेता था और अपना जेबखर्च निकाल लेता था। 

उसने बड़ी मेहनत से राजा साहब की पेंटिंग बनाई पर पेंटिंग बनने के बाद राजा साहब ने सौ रुपये की नोट उसके हाथ में रख दी जबकि वह पाँच सौ रुपये की उम्मीद कर रहा था।

“पाँच सौ रुपये के लायक तो तेरी पेंटिंग है न। देख तूने मेरा चेहरा ही बिगाड़ दिया है पेंटिंग में। सौ रुपये रखना है तो रख वरना ये भी वापस कर दे।“

“लक्ष्मीचरण तू चोर है , लुटेरा है , तेरा नाम लक्ष्मीचरण नही लक्ष्मीदास होना चाहिए। धन के लोभी तुझे मेरा श्राप लगेगा। “ जब गोपी उसे हवेली के बाहर की ओर धक्का दे रहा था तब वह चीख-चीख कर राजा साहब को कोस रहा था। रात होते – होते उसका क्रोध बढ़ता गया और उसने एक और पेंटिंग बनानी शुरू की। हूबहू वैसी जैसी उसने राजा साहब के लिए बनाई थी पर इस पेंटिंग में उसने राजा साहब की जगह अपना चेहरा उभार दिया। आजतक उसने आत्माओं की अदला बदली का खेल नहीं खेला था पर अब वो इस विद्या का भी प्रयोग करके देखना चाहता है। इसके लिए उसे राजा साहब के खून की आवश्यकता थी। इस काम में गोपी की सहायता ली जा सकती है। वह बेचारा दस वर्षों से राजा साहब की सेवा कर रहा है पर कभी उसे पूरी तनख्वाह नहीं मिली। अगले कुछ दिनों तक वह गोपी के विषय में जानकारी इकट्ठा करता रहा। वो भुलिया नामक एक लड़की से विवाह करना चाहता है पर उसका पिता किसी किसान के हाथ में ही अपनी बेटी का हाथ देगा इसलिये गोपी का कोई चांस ही नहीं। मौका देखकर एक दिन वो गोपी अपने घर पर ले आया और उसकी बड़ी आवभगत की और बहलाफुसला कर उसे अपनी योजना में शामिल कर लिया। 

उस सुबह गोपी ने पेंटर को जगाया वह चाय लेकर आया था उसे देखकर पेंटर बहुत  खुश हुआ। उसने कर दिखाया वह आत्माओं की अदला बदली करने में सफल रहा। गोपी को उसने उसकी रुकी हुई सारी तनख्वाह एक दिन में ही दे दी। हवेली के बाहर से पेंटर बन चुके राजा साहब गोपी को आवाज लगा रहे थे। गोपी ने पेंटर बने राजा साहब को हवेली से दूर खदेड़ दिया। 

गोपी खुश था और गुनगुनाते हुए उसके लिए खाना बना रहा था तभी फोन की घंटी बजी। राजा साहब को गठिया होने कारण उठने बैठने में दिक्कत होती थी, अब पेंटर को उनके रोगी शरीर की समस्याएं खलने लगी। 



वह किसी प्रकार फोन तक पहुँचा और जैसे ही रिसीवर कान में लगाया –“हलो कौन बोल रहा है। " पेंटर फोन पर चीखा । 


रिसीवर से कान फोड़ू आवाज आई –“तुम्हें अपने बीबी बच्चों की तो कोई परवाह है भी या नहीं । क्यों अभी तक हमारे खर्च के पैसे नहीं भेजे ? मैं पूछती हूँ ऐसा कौन सा जरूरी काम था कि तुम्हें पैसे भेजना याद न रहा ? एक तो गिन-गिन कर पैसे देते हो ऊपर से वो भी समय पर नहीं भेजते । तुम चाहते क्या हो ? मेरे बच्चो की सरकारी नौकरी लगने वाली है उसके बाद हम तुमसे पैसे नहीं मांगेगे । सारे पैसे अपनी छाती पे लेकर वैकुंठ चले जाना । पर तब तक के लिए मेरा खून जलाना बंद करो । ...... “ उस औरत ने पूरे आधे घंटे तक उन्हें फटकारा और जल्दी पैसे भेजने की बात करके फोन काट दिया ।

“ उस औरत ने पूरे आधे घंटे तक उन्हें फटकारा और जल्दी पैसे भेजने की बात करके फोन काट दिया। लक्ष्मीचरण बने पेंटर का दिल ऊपर नीचे हो रहा था उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे वह किसी प्रकार सोफे पर बैठा।

-“गोपी ए गोपी।“

“खाना अभी तैयार नहीं है थोड़ा सब्र करो। हुंह... अपने आपको राजा साहब ही समझने लगा है।“

“अरे मनी ऑर्डर कैसे करते हैं? कोई औरत फोन पर चीख रही थी कि मुझे मनी ऑर्डर कर दो वरना तुम्हारी खैर नहीं। बाबा रे इतना तो मैं भयंकर आत्माओं से नहीं डरा जितना उस स्त्रि ने मुझे डरा दिया। ” 

“मालकिन होंगी। मुझे पैसे दे देना मैं मनी ऑर्डर कर दूँगा।“

“जितना तिजोरी में है सब भेज दे ताकि वो दोबारा फोन न करे। साक्षात माँ काली का अवतार है कसम से। “ पेंटर ने हाथ जोड़े। 

पेंटर ने गोपी को पैसे दिये ताकि वो उसके लिए मँहगे रंग ब्रश और पेंटिंग के दूसरे सामान भी ले आये। डाकखाना गाँव से कुछ दूर स्थित एक छोटे कस्बे में था गोपी जब वहाँ मनीऑर्डर करने गया तो वहीं से पेंटिंग का सामान भी ले आया। 

“देखना इन रंगों का प्रयोग करके मैं मास्टर पेंटिंग बनाऊँगा। अपनी अबतक की सबसे सुन्दर व ऐतिहासिक पेंटिंग। “

“आप को जो करना है कीजिए मैं तो चला भुलिया को खुशखबरी देने। “

पेंटर ने जैसा सोचा वैसा हुआ नहीं उसने मंहगें रंग तो खरीद लिए पर राजा साहब के शरीर मे रहकर वह पेंटिंग न कर पाया । राजा साहब के हाथ कांपते थे जिसके कारण पेंटर चित्र बना ही नहीं पा रहा था।



आखिर इतिहास फिर दोहराया गया ।


“इस प्रकार मैंने तेरी और भुलिया की शादी भी तय करा दी। उस दिन तू भुलिया से मिलने गया था तभी गाँव का एक किसान रुपा मेरे पास आया। -“हुजूर, माई बाप सुना है कि आपने विकटराम का कर्जा माफ कर दिया है , प्रभु मुझ गरीब पर भी संकटों का पहाड़ टूट पड़ा है ऐसे में अपने भगवान के पास मैं भी सहायता माँगन आया हूँ। “

“तुम्हें क्या समस्या है ?”

“हुजूर मैं तो इस बार अपना पूरा करज उतार देता पर का करूँ मेरी बेटी अपने छोटे मामा की शादी में दूसरे गाँव गई रही, जब से वहाँ से आई है बदन तेज बुखार में तप रहा है। न कुछ खाती है न पीती है। बहुतेरे डॉक्टर और ओझा को दिखाया पर ठीक नहीं हुई। उस मुए पेंटर ने तो देखने से ही मना कर दिया। ऐसे तो बड़ा शमशान में बैठा तंतर मंतर किया करता है पर किसी गरीब की सहायता नहीं कर सकता।“

“तंतर मंतर आता होगा तब तो सहायता करेगा न। खैर आगे कहो।“

“हुजूर हमका कुछ और उधार चाही रहा। हमार बिटिया रात मां अच्छी भली सोवत है और सवेरे ऊके शरीर पर चोट का नया निशान मिलत है। कहीं न कहीं से ऊकी चमड़ी कट फट जावत है। रोज नये घाव उभर आवत हैं। उसका मलहम खरीद सकने भर के भी पैसे नाहीं बचे। डाक्टर साहब कहत रहिन ऊका ब्रेड स्टोल (Bedsores) हुई गवा है। और ऊके मूढ़ी माँ भी बुखार चढ़ गवा है ।“

“क्या कहा ? उसे नये जख्म अपने आप उभरते हैं ? और बदन भी हमेशा गर्म रहता है।” मेरा तांत्रिक दिमाग चलने लगा। 

“हां हुजूर।“ मुझे वर्षों पूर्व उस बालक की याद आई जिसे बचाने के लिए अघोरी बाबा ने अपने प्राणों का त्याग किया था। उसके शरीर पर भी अनेक घाव थे। निश्चय ही ये किसी प्रेतात्मा का साया है। 

“चल मुझे अपने घर ले चल मैं देखूँ कहीं तू झूठ तो नहीं बोल रहा। “

रूपा के घर में उसकी पत्नी , उसकी तेरह वर्षीय बेटी छमिया और सात वर्षीय बेटी चमकी रहती थीं। छमिया बिस्तर पर पड़ी थी और उसके शरीर पर कई घाव दिख रहे थे। राजा साहब बने पेंटर ने छमिया का माथा छुआ तो अचानक उसके सामने उसके पिता का चेहरा घूम गया। “यही चाहता था न तू ........... ले अब मैं इस लड़की को,  फिर इसकी छोटी बहन को और फिर जो भी उसके संपर्क में आएगी उस महिला या बच्ची को,  सबको सजा दूँगा। मुझे इस दुनिया में जबरन कैद करके रखने की सजा। तेरे कारण ........” राजा साहब बना पेंटर हिल गया और उसने हाथ खींच लिया। 

“तुम्हारी बेटी कहाँ गई थी ?”

“बतावा तो रहा , अपने ननिहाल, मामा की शादी में। “ रूपा ने कहा। 

“अरे ननिहाल कहाँ है इसका? किस शहर में ?“

“शहर नाहीं ऊ तो गांव है।“

“मेरे बाप ......... उस गांव का नाम क्या है ?”

“तिकड्मपुर में।“

“वहाँ कोई हादसा हुआ था क्या ?”

“हां करीब पचास बरस पहले ........ ऊहन बड़ी जोर बाढ़ आई राहिल।”

“अरे ….शादी में कोई हादसा हुआ था ?”

“हाँ….. शादी के पंडाल में आग लग गई रही। कहो ज्यादा नुकसान नाहीं हुआ। पन आपको कैसे पता चला ?“

“अरे ........ भोले राम…… मेरा मतलब बच्ची छमिया के साथ शादी समारोह के दौरान कोई हादसा हुआ था क्या ?” ’ दीवार पे सर फोड़ लूं अपना ।‘ पेंटर ने सोचा पर फोड़ा नहीं। 

“हाँ… उई तिकड़मपुर के किले पर बच्चन के संग खेलत रहील। वहाँ एक सूखा कुँआ है जिसमें छांकते बखत एक पत्थर खिसक गवा तो ऊ नीचे गिरि परि। पर देवी माता की किरपा से इसे कुछ खरोंचे ही आईँ और थोड़ा बहुत हाथ पैर में चोटें लगीं, न कौनो हृड्डी टूटी न चटखी। डॉक्टर साहब कहिन ई ता चमत्कार हुई गवा। कुँआ जितन दिखत रहा ऊतन गहिर न रहा। पर ऊ दिन के बाद से ईके शरीर का ताप जो बढ़ा तो अभी तक नाही उतरा। डॉक्टर साहब बोले मूढ़ीं में बुखार चढ़ गवा है। कौनो तरह चम्मच से दूध-पानी जबरदस्ती हलक के नीचे उतार देइत हैं। आँखी तो खोलतै न है ऐसे ही पड़ी रहत है। “ रूपा ने चिंतित होकर कहा।

राजा बने पेंटर को सारा माजरा समझ में आ गया। उसे अघोरी बाबा की बात याद आ गई इतिहास स्वयं को दोहराता है। आज उसका इतिहास खुद को दोहरा रहा था। पेंटिंग फट गई थी उसे छमिया का खून भी मिल गया था। एक नया पता जहाँ वो आकर बस गई है। अब वह छमिया की जान लेकर ही जाएगा या जैसा की उसने कहा उसके बाद वह दूसरा शरीर अपना लेगा जो उसके लिए आसान है । छमिया की छोटी बहन का खून तो उसे आसानी से मिल जाएगा ।

“मालिक कुछ पैसे मिल जाते तो।“ राजा साहब के चेहरे का उड़ा रंग देखकर रुपा ने फिर याद दिलाया।

“चल हवेली देता हूँ। “ राजा बने पेंटर ने तिजोरी पर नजर डाली जो लगभग खाली थी। राजा साहब अपना पैसा बैंक में ही रखते थे। और बैंक से वह पैसे नहीं निकाल सकता क्योंकि उसे राजा साहब का हस्ताक्षर करना नहीं आता। जो थोड़े बहुत पैसे थे उसने रुपा को दे दिये। 

वह राजा साहब के रूप में उस बच्ची को नहीं बचा सकता पर पेंटर के रूप में उसकी जान बचा सकता है। उस रात उसने पुनः पेंटिंग को लेकर अपनी पूजा प्रारंभ की और अगले दिन वापस पेंटर के शरीर में उठा। वह राजासाहब से मिलकर पैसे माँगेगा। शायद डर के मारे वह बुड्ढा कुछ पैसे दे दे। पेंटर के पास भारत की तीन पवित्र नदियों का जल है पर इस पूजा में उसे सात पवित्र नदियों के जल की आवश्यकता है। गंगा , यमुना , महानदी , ब्रह्मपुत्र , नर्मदा , गोदावरी और गोमती।


 भारत की नदियाँ असल में देवियाँ हैं जो मानव जाति की भलाई के लिये नदी रूप में सदा के लिए स्वर्ग का सुख छोड़ कर यहीं बस गईं। और भारत के नासमझ मनुष्य ऐसी परोपकारी देवियों के जल में गंदगी डालकर उन्हें दूषित किया करते हैं। पेंटर के पास गंगा , यमुना व गोमती नदी का जल समाप्त हो गया था बाकी चारों नदियों का जल उसने बोतलों में भरकर रखा था। प्रायः गंगा नदी का जल अधिक प्रयोग होता हैं क्योंकि वह सबसे पवित्र नदी है इसलिए वही जल्दी समाप्त भी हो जाता है। गंगा और यमुना दोनों का जल प्रयाग से मिल जाएगा फिर वहाँ से गोमती भी दूर नहीं। अगर वह ट्रेन से जाएगा तो जल्दी ही जल लेकर वापस आ सकता है और समय रहते उस बच्ची की जान बचा सकता है। (1037)


मुक्ति का उपाय 


मुक्ति का उपाय 


अभी वो इसी उधेड़बुन में लगा हुआ घर के बाहर निकलता है तो क्या देखता है कि राजा साहब खुद अपनी लाठी टेकते चले आ रहे हैं। 

“पेंटर ये तूने क्या किया ?”



“राजा साहब ................ वो मैं ।“ मुझे लगा राजा साहब मुझे अपनी सम्पत्ति लुटाने के लिए डाँट रहे हैं पर ..



“मुझे क्यों इस रोगी शरीर में वापस भेज दिया । मुझे तेरा शरीर देदे चाहे तो मेरी सारी सम्पत्ति ले ले । मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ । मुझे धन नहीं चाहिए मुझे इन रोगों से छुटकारा चाहिए । मुझे फिर वही शरीर दे दे, भला इस शरीर के साथ तुझे मेरी अथाह सम्पत्ति भी तो मिली है फिर क्या कारण है कि तू इसमें नहीं रहना चाहता ? तू धन के लिए ही तो मेरे घर के चक्कर काट रहा था न। अरे हाँ........... शायद तिजोरी साफ होने के बाद तू मेरा बैंक अकाउँट नहीं प्रयोग कर पा रहा होगा । चल मैं बैंक चलकर कह देता हूँ कि आज के बाद मेरे अँगूठे के निशान देखकर पैसे निकालने दिये जाएँ । “




“पर मैं आपके शरीर में रहकर..................... माफ कीजिए मैं ऐसा नहीं कर सकता । मैं अपना शरीर आपको नहीं दे सकता । ” पेंटर बोलते – बोलते रुक गया कि वह उस शरीर में जटिल तान्त्रिक क्रियाएँ नहीं कर सकता था। 


“ठीक है यदि तू अपना शरीर नहीं देना चाहता तो मेरे पास एक और उपाय है । मुझे गोपी का शरीर देदे । मैं उसका मालिक हूँ और मेरी सेवा उसका धर्म है । मैं तुझे जितना कहे उतना पैसा देने को तैयार हूँ । “ राजा साहब ने एक चेक पर दस्तखत करके चेक मुझे दे दिया । “ ले इसपर जितनी चाहे उतनी रकम भर ले। मेरे शरीर बदलने के फौरन बाद तू मेरा दिया चेक कैश करा सकेगा । मैं उसपर अगले दिन की दिनांक डालकर तुझे दे दूँगा । पर यदि तू मेरे साथ धोखा करेगा तो मैं चेक कैंसिल करा दूँगा।“ 


मैं सोच में पड़ गया । ऐसा करके मैं उस बच्ची को भी बचा सकता था । वरना मेरा बाप जाने कितनी औरतों और बच्चियों के प्राण लेता । पर इसमें मुझे अपनी कुर्बानी भी देनी पड़ सकती थी जिसके कारण मैं स्वयं दूसरी दुनिया में फँस सकता था और मृत्यु को प्राप्त हो सकता था । या मैं अपने पिता को उस लोक में धक्का देकर लौट भी सकता था । यदि मैं लौट आता तो तुझे तेरा शरीर दे देता ।


आखिर मैंने अपनी यात्रा जल्दी खतम करने के उद्देश्य से इलाहाबाद की ट्रेन पकड़ी । ट्रेन पर चलने का ये मेरा पहला अनुभव था । 

“अरे भैया ये देखो तो जरा टिकट पर क्या लिखा है ? मैं कहां बैठूं ?” मैंने एक सज्जन से पूछा । 


“अरे बाबाजी आप गलत डिब्बे पर चढ़ गये हैं इसके बाद दो डिब्बे छोड़कर तीसरा डिब्बा है आपका । ये तो रिजर्वेशन वाला डिब्बा है । आपके पास जनरल का टिकट है । “ उस आदमी ने टिकट वापस करते हुए बताया । 


मैं ट्रेन के उतरा और उसके बताये डिब्बे में चढ़ गया । वहां बड़ी भीड़ थी । मैं किसी तरह वहीं जमीन पर ही बैठ गया । गाड़ी चल पड़ी धड़क धड़क हिचखोले खाती ट्रेन में पहली दफा बैठ कर बहुत मजा आ रहा था । मैं तो ख्यालों में खो गया । कितनी तेज गति से ट्रेन आगे बढ़ रही थी मुझे आशा थी कि मैं उस बच्ची को बचाने के साथ साथ तुझे भी बचा लूँगा ।


“बाबाजी कहां जा रहे हैं आप ?” एक सज्जन ने पूछा जिनका चेहरा दाढ़ी मूँछों के पीछे छुपा हुआ था । 


“इलाहाबाद जा रहे हैं पहली दफा ट्रेन में बैठे हैं । ये देखो हमने टिकट भी लिया है । हम तो गलत डिब्बे में बैठे थे तभी एक भाई साहब ने बताया कि इस डिब्बे में बैठना है वरना टीटी पकड़ लेगा । तो जल्दी से यहां आ गये । “तभी ट्रेन स्टेशन पर रूकी कई लोग उतर गये और एक टीटी ट्रेन पर चढ़ा वो सबका टिकट देख रहा था ।


“लाइये मैं देखूं कहीं आप फिर गलत डिब्बे में तो नहीं बैठ गये ?”


“लो भाई तुम भी देख लो भाई कहीं फिर गलत डिब्बे में तो नहीं बैठ गये ?”


उसने टिकट लिया और देखने लगा , तभी टीटी हमारे डिब्बे में सबका टिकट चेक करने लगा । उसने उस आदमी का भी टिकट चेक किया जिसे मैंने अपना टिकट थमाया था । फिर टीटी मेरी तरफ मुड़ा । 


“आपका टिकट दिखाइये । “ 

“मेरा टिकट तो अभी अभी इन भाई साहब ने लिया था । लाईये भाई साहब मेरा टिकट दे दीजिए ।”

“कैसा टिकट ये तो मेरा टिकट है टीटी साहब ये बाबा झूठ बोल रहा है । ”


अब मुझे पता चला कि वो आदमी बिना टिकट यात्रा कर रहा था और टीटी को आते देखकर जान बूझ कर मुझसे बात करने लगा । मैं मूरख भी उसकी बातों में आ गया । बस फिर क्या पुलिस वालों ने बिना टिकट यात्रा के जुर्म में जेल के भी दर्शन करा दिये । सोचा इससे तो अच्छा होता अगर ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट लेते हुए और पैदल ही यात्रा करते हुए इलाहाबाद पहुँच जाता ।


"साहब मैं कसम खाकर कहता हूं मैंने टिकट खरीदा था । उस आदमी ने मेरे टिकट को अपना बताया था। मुझे छोड़ दीजिए दरोगा जी मैं बहुत जल्दी में हूं। " मैंने हवलदार से कहा । 


" देखो बाबा अघोरियों की मैं बहुत इज्जत करता हूं पर कानून सबके लिए समान है । टिकट उसके हाथ में था और तुम्हारा हाथ खाली था । खुद को जज साहब के सामने तुम्हें कैसे निर्दोष साबित करोगे । "


"वो बात तो है पर क्या कुछ हो नहीं सकता ? मेरी दुआएँ लगेंगी तुझे । "


"वैसे तो एक रास्ता है । मेरे हाथ की खुजली मिटा दो तो मैं तुम्हे छुड़ा सकता हूं । वरना छः महीने की बामशक्कत सजा और जुर्माना अलग से देना पड़ेगा । " उसने खुसफुसाकर कहा । 


" लो इत्ती सी बात। सुन नीम की पत्तियां पानी में दस मिनट तक उबाल कर उसमे आधा घंटे हाथ डुबोकर बैठा रह। और ज्यादा खुजली है तो पट्टी का लेप लगाकर पट्टी बांध ले । तीन दिन में खुजली ठीक होने की गारंटी मेरी । "


"बाबा बहुत पहुंची हुई चीज हो । चलो चलो थाने चलो । "


मुझे लगा की शायद वो एक अघोरी से किसी तंत्र मंत्र की आशा करता होगा इसलिए मैंने उसे कई टोटके और मंत्र बताए जिनसे उसके हाथ की खुजली मिट जाती । पर जाने क्यों उसने मुझे लॉकअप में बंद कर दिया । मुझे लगा शायद वो मेरे बताए नुस्खे अजमायेगा और सही होने पर ही मुझे जाने देगा । वरना छः महीने की सजा और जुर्माना अलग से । 


मैं चार पांच दिन लॉकअप में बंद रहा और रोज हवलदार से खुजली के विषय में पूछता रहा पर हर बार वो मुझे झिड़क देता । फिर मुझे लगा की शायद उसे गुप्त रोग है, बताने में झिझक रहा होगा, इसलिए सिर्फ खुजली का नाम लिया होगा, शायद मैं ही उसे गलत समझा । मैंने उसे पास बुलाकर फुसफुसाकर गुप्त रोगों का इलाज बताने की भी कोशिश की पर इसबार भी वह मुझे झिड़क कर चला गया। तभी एक दिन एक सज्जन को पकड़कर पुलिस वालों ने मेरे ही लॉकअप में डाल दिया । 


“ए हवलदार क्या करता है अभी होगया न तेरा । छोड़ मेरे को। चल पचास रुपये रख ले और जाने दे । “ पचास की नोट दिखाते हुए उन सज्जन ने उसी हवलदार से कहा।


“तुझे मिली सोने की चेन और मुझे सिर्फ पचास रुपये । साहब को भी देना पड़ता है । इतने में मेरी खुजली नही मिटने वाली , चालीस टका दे तो कुछ बात बने । “ हवलदार फुसफुसाया।


“चल तू भी क्या याद करेगा चेन बेचते ही तुझे तेरे पैसे दे दूँगा । अभी ये पैसे रख और जाने दे मुझे । ताकि मैं जल्दी से जल्दी चैन बेचकर तेरी बाकी की खुजली का इलाज कर सकूं। “ चैन स्नैचर ने भी फुसफुसा कर कहा और जबरदस्ती पचास का नोट उसकी जेब में ठूस दिया । 


"ठीक है । तू रुक मैं साहब से बात करता हूं । "

हवलदार पैसे लेकर चला गया । मैं फौरन उस व्यक्ति के पास पहुंचा । 


“भाई साहब मेरे गुरू श्री विपत हरण महाराज जी कहा करते थे कि पेंटर ...ज्ञान प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती जीवन के हर पल हर क्षण तुझे कोई न कोई तुझसे भी ज्ञानी व्यक्ति मिलेगा जो तुझे कुछ न कुछ नयी बात सिखाएगा । “ मैने उस चैन स्नैचर से कहा।


“तो मैं क्या करूं ? तेरे गुरू से अपुन को क्या ? अपुन का गुरु तो अपुन को चैन स्नैचिंग सिखाया तेरे को भी सीखने का है क्या ?” उसने कंधे उचकाकर कहा। 


“गुरुदेव मैं तो कह रहा था कि आप मुझे कुछ दिन पहले मिल जाते तो मेरा बहुत पहले ही उद्धार हो गया होता । मै तो आपको अपना गुरू मानता हूँ । “ मैंने उसे प्रणाम किया । तो उसने अपना सिर खुजाया । उफ्फ कितने खुजले हैं इस संसार में । 


कुछ समय में हवलदार ने उस चोर को छोड़ दिया । पुलिस से दो दो हाथ का ये मेरा पहला मौका था । अब मुझे समझ में आया की पुलिस से कैसे निपटना है?

फिर मैंने भी हवलदार को बुलाकर पैसों का लालच दिया। और वह पाँच सौ रुपये में मान गया। तब पता चला की उन्होंने मेरे खिलाफ केस बनाया ही नहीं था। मैं मुफ्त में अपना और उनका समय बर्बाद कर रहा था । 


“मैं तो कितनी दफा तुझसे बोला की मेरे हाथ की खुजली मिटा दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा पन तू ही पता नहीं कौन कौन से मन्तर और जड़ी बूटियों की बातें करने लगता था। आज तू काम की बात बोला तो देख तेरा काम करा दिया । फालतू अपना और हमारा टाइम वेस्ट किया । इस बार तो साहब ने तेरे खिलाफ कोई एफ आई आर नहीं लिखी । पन अब कभी बिना टिकट नहीं चलने का । सब पुलिस वाले हमारी तरह सज्जन नहीं होते । समझा ।” मैंने समझदारी से सिर हिलाया । 


मैंने सोच लिया की अब जिंदगी में मैं ट्रेन पर ही नहीं चढ़ूंगा । 


मैं लिफ्ट मांगने के लिए इलाहाबाद जाने वाली सड़क पर खड़ा हो गया । एक भले ट्रक ड्राइवर ने ट्रक रोक कर मुझे बिठा लिया । 

“इलाहाबाद तो नहीं मैं आपको इंदौर तक छोड़ दूँगा आगे आप फिर लिफ्ट ले लेना ।” उसने कहा।


“बहुत शुक्रिया बच्चा भगवान तुम्हारा भला करे । मैं तो पैदल ही चला जाता पर जरा जल्दी में हूं। ” 


“पैदल ? अरे बाबा इलाहाबाद बहुत दूर है । "

"जनता हूं , मैं तो हमेशा से फक्कड़ प्रवृत्ति का इंसान रहा हूं । यात्रा ही मेरा जीवन है। "

" बाबा जी , मैं तो आज पूरे दो साल बाद अपने घर जा रहा हूं। अभी कुछ दिन पहले ही मेरी पत्नी का पत्र आया था कि उसने जुड़वा लड़कों को जन्म दिया है । शादी के पन्द्रह वर्ष के बाद जाकर मुझे संतान की प्राप्ति हुई है । “ खुशी से झूमते हुए वो बोला तो मैं चौंक गया। दो साल बाद ? तो फिर ??????


“ ईश्वर तुम्हारी संतान को लंबी आयु दे ।” मैंने मुस्कुराकर कहा। 


“आज तो मैं बहुत खुश हूं । मैंने तो अपनी बीबी से कह दिया था कि जब तक तू खुशखबरी नहीं देगी वापस ही नहीं आऊँगा । एक तो ट्रक ड्राइवर की नौकरी में ऐसे ही छुट्टी नहीं मिलती ऊपर से घर किसके लिए जाऊँ ? अपनी मनहूस बीबी का मुँह देखने जो मुझे संतान का सुख भी न दे सकी । बस इसी गुस्से में दो साल घर नहीं गया न घर खर्च भेजा तो देखो जोरू लाइन पर आ गई । ” वह क्रोध दिखाते हुए बोला। मुझे समझ में नहीं आया मैं क्या कहूं ?


" बेटा मेरी मानो तो साल में दो बार दस पन्द्रह दिन के लिए घर हो आया करो । परिवार और बच्चों को भी तो तुम्हारी जरूरत है । “ मैंने सोचा इतनी सलाह देना ही काफी है। 


“जी बाबा जी अब मैं अपने बच्चों से मिलने जरूर जाऊँगा । आशीर्वाद दीजिए । “ उसने कुछ पल के लिए स्टेयरिंग से हाथ हटा कर मुझे प्रणाम किया तो मैंने तुरंत उसे आशीर्वाद दे दिया । इसी तरह कभी किसी साइकिल , बैलगाड़ी, ट्रक वगैरह से लिफ्ट लेते हुए तो कभी पैदल यात्रा करते हुए मैंने विभिन्न नदियों के जल एकत्र किए । और अन्य पूजन सामग्री खरीदी । 


लगभग एक माह पश्चात घोरगांव वापस आया तो तेरी मृत्यु के बारे में पता चला। काश कि तू राजा साहब के शरीर में जिन्दा होता तो मैं तुझे वापस ले ही आता । पर तेरी मौत ने मुझे निराश कर दिया । मेरे जीवन का मानो एक उद्देश्य कम हो गया । यह नकारात्मक विचार पूजा के समय मेरे दिमाग पर छाये रहे ।


मैंने माँ दुर्गा की तस्वीर बनाई जिसपर अपनी माँ के चेहरे की छवि बनाई । यही मेरे जीवन की मेरी मास्टर पीस पेंटिंग थी जिसने एक बच्ची की जान बचा ली । मैंने रुपा को बता दिया कि मैं भोर होने तक होश में न आया तो पेंटिंग जला दे और मुझे मरा मानकर मेरा अंतिम संस्कार करा दे । मैं अपने पिता की आत्मा के साथ दूसरे लोक गया और उसे वहां कैद करके तेरे पास आया हूँ । मुझे वहां से लौटने में भी बहुत समय लगा। मैं फिर भी तुझे मिलने के लिए ही आया हूं । मेरा शरीर तो कब का नष्ट कर दिया गया ।


अब मैं सिर्फ तुझे तेरी मुक्ति का उपाय बताने आया हूँ फिर सदा के लिए चला जाऊँगा ।


“मेरी मुक्ति का उपाय ? मैं क्यों भूत बना ?”


“जब किसी की कोई इच्छा अधूरी रह जाए तो वह भूत बनता है या कोई काम अधूरा रह जाए तो वह भूत बनता है ।“


“मैं भुलिया से शादी करना चाहता था । मैं रोज रात सपने मे उसके साथ सात फेरे लिया करता था । यही इच्छा अधूरी रह गई ।“



“तूने जिसे सपने में भुलिया के साथ फेरे लेते देखा होगा वो शरीर तो भुलिया के साथ फेले ले चुका । यह इच्छा नहीं है जो तुझे रोक कर रखे है, कुछ और सोच कोई काम जो अधूरा छोड़ा हो ?”


“हां राजा साहब के वो चार काम....... मैं आज तक उन पहेलियों का अर्थ नहीं निकाल पाया । “


“वो मारा .............. अब तूने सही पकड़ा । सुन दिन-रात तेरे दिमाग में भुलिया से ज्यादा तो वो चार काम घूमा करते थे । तो तू जैसे ही वो काम कर सका तो मुक्त हो जाएगा । वरना.... “


“अरे क्या वरना ................... मैं दस सालों से नहीं कर सका तो अब क्या चमत्कार हो जाएगा । कोई और उपाय बता ।” तब पेंटर भूत ने आँख बंद करके कुछ मंत्र बुदबुदाये ।


“सुन ... मैंने सुनी है ..... एक भविष्यवाणी ..........आत्माओं की भविष्याणी.... एक दिन इसी हवेली के हूबहू हवेली से निकलकर कोई हवेली में आएगा और तुझे मुक्ति दिलाएगा ।“


“अच्छा.. और मैं उन्हें कैसे पहचानूँगा ?”


“पता नहीं पर वो तेरा साथ छोड़ कर तबतक नहीं जाएंगे जब तक कि तुझे मुक्ति न मिल जाए। अच्छा मेरा काम तो पूरा हुआ मैं तो चला । “


“तू कहाँ जा रहा है ?”


“मैंने इस जन्म में बहुत मुर्गे खाये हैं अब किसी मुर्गी के गर्भ से जन्म लूँगा और वो मुर्गे मानुष बनेंगे जिन्हें मैंने खाया था , फिर वो लोग मुझे खाएंगे और इस प्रकार यह चक्र चलता रहेगा । जब वो सभी मुर्गे अपना हिसाब चुका लेंगे तो बकरों का नंबर आयेगा । मैंने दो बार बकरीद के बकरे भी खाये हैं तो कम से कम दो बार बकरा बनूँगा । उसके बाद जैसी ईश्वर की मर्जी और भी चौरासी लाख योनियां हैं जिसमे भी भेज दें, चला जाऊंगा । अच्छा चलता हूँ मेरी माँ मेरे जन्म के इंतजार में अपने अंडे सेंक रही होगी । टाटा। “ कहकर वो अदृष्य हो गया ।



“अच्छा हुआ मैं शाकाहारी हूँ । “ गोपी उसके जाने के बाद बड़बड़ाया ।

(2000)

राजा साहब का भूत 


“ आखिर अपना पूरा जीवन जीने के बाद पाँच वर्ष पूर्व नौकर बने राजा साहब भी मर गये। उनकी आत्मा भी इस हवेली में आई और मैंने उन्हें बताया कि वो यहाँ तबतक फँसे रहेंगे जबतक कि मैं उनके सवालों के जवाब न दे दूँ । अब वो भी इसी हवेली में रहते हैं और प्रतिदिन मुझसे वही काम करने के लिए दोहराते हैं और मुझे रोज डाँटते रहते हैं कि मेरे कारण वो मुक्त नहीं हो पा रहे । इसे कहते हैं उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे । 

जब तक मैं वो कार्य पूरे न कर सकूँगा तब तक हम दोनों ही न जीवित न मृत रहेंगे । जहाँ राजा साहब आत्माओँ की दुनिया में फँसे हैं वहीं मैं भूतों की दुनिया में । राजा साहब को सिर्फ मैं ही देख सकता हूँ वो अभी भी ऊपर वाले गुम्बद के भीतर बनी कोठरी में रो रहे होंगे । दिन के समय मैं वहीं उनके साथ ही रहता हूँ । वैसे इन्सान हो या भूत.... अपनी खुशी से उतना खुश नहीं होता जितना दूसरे के दुख से खुश होता है । मैं राजा साहब का ये अंजाम देखकर बहुत खुश हुआ पर अब मुझे उनपर तरस आने लगा है । “

“ओह कितने दुख की बात है । तुम्हारा पूरा जीवन ही संघर्ष में बीता । “ स्नेहा ने सहानुभूति जताई । 

“और अब मृत्यु भी संघर्ष से कम नहीं है ।“

“देखो ये जो कोमल है न । उसे कहानियाँ सुनने और पहेलियाँ सुलझाने का बड़ा शौक है । उसे जरूर राजा साहब के इन प्रश्नों के जवाब पता होंगें । क्यों न हम उसे तुम्हारे विषय में सबकुछ बता दें और ............. मतलब अगर तुम मुक्त होना चाहो तो .............. वरना ।“ स्नेहा ने दोनों हाथ ऊपर कर दिये ।

“तुमने मुझे एक आशा दी है। एक समय था जब मैं किसी को डरा लेता था इसी में खुश हो जाता था पर मुक्ति तो हम भूतों और आत्माओं के लिए सबसे बहुमूल्य उपहार है । अगर मैं राजा साहब की पहेलियाँ सुलझा सका तो मैं और राजा साहब दोनो आजाद होंगे । “ भूत की आँखों में खुशी के आँसू छलक आये ।

अगले दिन ................... 

“कोमल ......... तुझसे एक पहेली पूछूँ ? “

“पूछ ?”

स्नेहा ने उसके सामने दो बर्तन रखते हुए कहा -“ये देख ये बड़ा बर्तन है और ये छोटा इस बड़े बर्तन को छोटे में डालकर बता । “ कोमल ने कुछ देर सोचा फिर अपने टूल्स में से निकाल कर एक हथौड़ा ले आई और बड़े बर्तन को तोड मरोड़कर छोटे में डाल दिया । 

“ये क्या ?”

“तूने कहा था बड़े बर्तन को छोटे में डालना है ये तो नहीं कहा कि साबुत डालना है या तोड़कर ।“ इतराकर प्रेमा ने कहा । 

“शाबाश । अच्छा अब बता कि ये जो मेरे पास छड़ी है इसे बिना काटे या बिना तोड़े तू छोटा कर सकती है ?” उसने छड़ी दिखाकर पूछा । 

“हाँ कर सकती हूँ ।“ उसने कंधे उचकाये । 

“कैसे ?” स्नेहा ने ठोड़ी पर उंगली रखकर गरदन टेढ़ी करके पूछा।

“देख इससे बड़ी छड़ी लाकर इसके बगल में रख दे, ये खुद छोटी हो जाएगी क्योंकि बड़ी छड़ी तो वो दूसरी वाली होगी और तब ये उसके आगे छोटी लगेगी । कोई भी कहेगा कि ये छोटी है और वो बड़ी । सिंपल । “ प्रेमा ने फिर कंधे उचकाये । 

“वाह..... अच्छा अब अगर मैं कहूँ कि जा मेरे लिए इतने सेब और केले ले आ कि अगर मैं एक केला खा लूँ तो सेबों की संख्या बचे हुए केले से दोगुनी हो जाए । और अगर मैं एक सेब खा लूं तो बचे हुए सेबों की संख्या केलों के बराबर हो जाए ।“ स्नेहा ने अँतिम सवाल किया । 

कोमल ने कुछ जोड़ घटाना किया और बोली –“तीन केले और चार सेब । एक केला खाते ही केले दो बचेंगे सेब उसके दूने यानी चार । और एक सेब खाते ही केले भी तीन और सेब भी तीन । “ पूरे आत्मविश्वास से प्रेमा ने अंतिम सवाल का भी सही जवाब दिया।

“वाह मेरी शेरनी तूने तो कमाल कर दिया । अब वो आजाद हो जाएगा ।“ प्रेमा की जबान फिसल गयी। 

“कौन आजाद हो जाएगा ?”

“कोई नहीं अच्छा चलती हूँ तू अपनी किताब लिख ।” प्रेमा उठकर भागी । 


………………………………………..


स्नेहा ने कोमल के बताये सारे जवाब गोपी को बताए । 

“मैं मूढ़ मगज ये सब कैसे समझ पाता । “ माथा पीटकर गोपी का भूत बोला । 

“अगर तुम कोमल की तरह अकबर बीरबल या तेनालीरमन के किस्से पढ़ते हुए बड़े होते तो जरूर कर पाते । इसीलिए बच्चों को मोबाईल के साथ कम और किताबों के साथ अधिक समय बिताना चाहिए । “ स्नेहा ने कहा । 

“पर मैं जब छोटा था तब मोबाईल तो था ही नहीं और किताबें खरीदने के पैसे भी नहीं थे । खैर राजा साहब का जन्म दिवस वो कैसे जाना ?”

“आजकल मोबाईल पर किसी भी वर्ष का कैलेंडर निकालना हुआ, बहुत आसान ।“ स्नेहा ने उसे 1925 का कैलेंडर निकाल कर दिखाया उस दिन मंगलवार था। 

“चलो अब इंतजार किसका कर रहे हो जाकर अपने सेठ के सारे काम पूरे करो । “ स्नेहा ने भावुक होकर कहा जैसे उसे जंग के लिए भेज रही हो । 

“स्नेहा सारे काम पूरे होने के बाद मैं चला जाऊँगा पर मैं उस दुनिया में भी तुम्हें हमेशा याद रखूँगा । तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त व शुभचिंतक हो । धन्यवाद । पर एक बात समझ में नहीं आयी कि उस पेंटर ने कहा था कि जो लोग इस हवेली के हूबहू हवेली से निकलकर यहाँ आएँगे वे ही मुझे मुक्त करा सकेंगे । तो तुम लोग क्या शहर में ऐसी ही बड़ी हवेली में रहते हो ।“

“जिस कार से उतर कर हमने इस हवेली में प्रवेश किया उसका नंबर PB 32 GG 7725 है जो कि हवेली का एड्रेस भी है GG का फुल फार्म घोर गांव और मकान नम्बर 7/725 जो राजा साहब का जन्मदिवस भी है। शायद हूबहू से यही मतलब निकल रहा था । “ स्नेहा ने सोचकर बताया । 

“स्नेहा तुमने मेरी बहुत सहायता की पर फिर भी एक बार सबको सदा के लिए विदा लेने से पहले मैं सबको डराना चाहता हूँ । तो आज रात ग्यारह बजे तुम किसी तरह सबको ड्राइंग रूम में एकत्रित करना और लाइट डिम रखना ताकि मैं उन सबको अच्छी तरह डरा सकूँ । आज मुझे भी एक धाँसू आईडिया आया है । “

“ठीक है । जैसी तुम्हारी इच्छा आज रात ग्यारह बजे हम सब बड़े हॉल में एकट्ठे रहेंगे चाहे इसके लिए मुझे उनके सामने एकबार फिर डरपोक ही क्यों न साबित होना पड़े ।” स्नेहा की आँखों में भी आँसू उतर आये । भूत उससे विदा लेकर चला गया । (1100)


राजा साहब का पश्चाताप्


"तू फिर आ गया ? पहले तो बस दिन भर मेरी छाती पर मूंग तलता था, रात में हवेली भर में मंडराया करता था। अब क्या हुआ? हे भगवान……… कहीं तू भी भूत से डिमोट करके आत्मा तो नही बना दिया गया? हे भगवान अब चौबीसों घंटे इस मूर्ख को झेलना पड़ेगा । मनहूस कहीं का, सरल से काम नही कर सकता, पता नही कब तक तेरी वजह से में इस बंद कोठरी में आंसू बहाता रहूंगा। करमजले ।"

"अच्छा मेरी वजह से ? वरना तो तुम स्वर्ग में अप्सराओं के साथ मजे कर रहे होते क्यूं? ये सब तुम्हारे कर्मो का नतीजा है की खुद भी फंसे हो और मुझे भी फंसा रखा है । एक तो मेरी जवानी खा गए ऊपर से मेरी प्रेमिका छीन ली । और तो और मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा । मेरा बस चले तो तुम्हें कभी यहां से न निकलने दूं। 

एक बात और सुनो मुझे उन पहेलियों का उत्तर मिल गया है । पर सोचता हूं की उनके जवाब न दूं ताकि अनंत काल तक तुम यही पड़े आंसू बहाते रहो। " गोपी ने नखरे दिखाए । 


"रे गोपी क्या कहता है ? मरे हुए से क्या बैर निभाना ? मेरे लाल मुझे माफ करदे । मैने तेरे साथ बहुत बुरा किया और उसका फल भी भुगता मैंने । भूलिया को पता चल गया की मैं ……" अचानक राजा साहब चुप हो गए । 

"क्या ? क्या पता चल गया ? बोलो ? क्या-क्या छुपाते आए हो आजतक मुझसे ? जल्दी बताओ वरना मैं चला जाऊंगा और तुम सदा के लिए यहीं फसे रहना । " गोपी को आजतक राजा साहब ने भुलिया के विषय में कुछ भी नहीं बताया था । 

"नहीं-नहीं गोपी मुझे माफ कर दे । ले आज मैं तेरे पैर पकड़ता हूं । मैं कभी भूलिया से प्रेम न जता सका। मैं तो सदा गायत्री से प्रेम करता था। और मैं पूरी तरह उस शरीर का न हो सका । मेरे पास दोनों यादें थीं । तेरी भी और मेरी भी । मैं कभी तेरे जैसा बन जाता और भुलिया से वो बातें करता जो तू उससे करता था पर कभी मैं उससे दूरी बना लेता और लक्ष्मीचरण की तरह उसपर हुकुम चलाता और अकड़ दिखाता। गांव वालो के साथ भी में दोहरा बरताव करने लगा था । कुछ-कुछ देर के लिए मैं अपना आपा खो देता था मैंने सोचा मरने के बाद से तू भूत बनकर मुझपर सवार है । मैं डरने लगा । मुझे भुलिया नही तेरा शरीर चाहिए था , भुलिया तो इस शरीर के साथ फ्री में मिली थी और फ्री में मिली चीज की कद्र कौन करता है ? धीरे-धीरे मैं गांव वालों की नजर में पागल हो गया था, कभी मैं गोपी तो कभी राजासाहब बनता । लोग कहते हवेली के राजासाहब की आत्मा आती है इसपर । पर भुलिया ने आखिर मुझे पहचान लिया। वह जान गई की मैं गोपी नहीं जिसपर राजासाहब की आत्मा आती है , बल्कि मैं ही राजा साहब हूं। जब उसने मुझे चंडिका का रूप धरकर डांटा तो मेरी सिट्टी पिट्टी गुम गई और मैंने सब बक दिया । 

पूरी कहानी सुनने के बाद भुलिया रोने लगी और उसने कहा की वो मरने के बाद अगले जन्म में तुझे मिलेगी । फिर वो घर से भाग गई । कुछ देर बाद हल्ला मचा कि भुलिया नदी में कूद गई है यह सुनकर मैं चुपचाप बिना किसी से कुछ कहे गांव छोड़कर भाग गया । मैंने राजा साहब के रूप में पहले ही कुछ पैसे छुपा कर रख लिये थे, जो गोपी बनने के बाद मेरे काम आते पर विधाता ने ऐसा खेल खेला कि वो पैसे भी मैनें गुमा दिये । मैंने सोचा गाँव में रुका तो भुलिया की मौत का जिम्मेदार माना जाऊँगा , पुलिस गिरफ्तार करेगी, जेल जाना पड़ेगा । अरे मैं तो जवान शरीर के साथ पूरे भारत भ्रमण का स्वप्न देख रहा था । मैं पेंटर के समान फक्कड़ बनकर एक शहर से दूसरे शहर घूमते हुए जीवन बिताना चाहता था। चारों धामों की पैदल यात्रा करना चाहता था । और कहाँ मेेरे नसीब में जेल की कोठरी रह गई । 

मैंने संयासी का भेष धर लिया ताकि कोई मुझे पहचान न ले । इसी प्रकार घूमते-घूमते मैं हिमालय पहुँचा वाह…….. बता नहीं सकता वहाँ कितनी खुशी मिली । जब मैं अमीर था और कहीं भी जा सकता था तब मैं इतना कंजूस था कि एक रुपया खर्च करने से डरता था । पर इस नये जीवन ने मुझे नयी शिक्षा दी । धन होकर भी मैं चार धाम की यात्रा न कर सका पर बिना धन के मैंने सब तीरथ कर डाले । इच्छा हो तभी कुछ करना संभव है । मैं कभी बैलगाड़ी, कभी मोटर गाड़ी, कभी बिना टिकट ट्रेन, से सफर करता । जो भिक्षा में मिलता खाता और प्रसन्न रहता । आखिर में मैं हिमालय पहुँचा । वहाँ बद्री नाथ के दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया । इतना लंबा जीवन जिया मैंने अपना भी और तेरा भी । पर फिर भी खुस नहीं रह सका । 

तेरे और भुलिया के प्राण लेने का दुख मुझे अंदर ही अंदर खाये जा रहा था । जिसके कारण मुझे टीबी की बिमारी लग गई । दिन रात खांसा करता और कभी-कभी खून की उल्टियाँ करता। मेेरे संगी साथी भी मुझसे कतराने लगे । वैसे ही मेरे साथी मेरे डबल पर्सनैलिटी डिस्ऑर्डर से परेशान थे । मैं कभी गोपी बनकर भुलिया-भुलिया चिल्लाता तो कभी सबपर रौब गाँठता । लोग मुझे पागल भुलिया बाबा पुकारते ।

एक दिन एक पर्वत से गिरकर मेरी मृत्यु हो गई । इतनी लंबी जिन्दगी जीकर भी मुझे संतोष न मिला । गोपी सच कहता हूँ , एक अच्छी जिन्दगी वही है जो अपने समय पर समाप्त हो जाए। अपना जीवन व अपना शरीर ही सबसे अच्छा है । मैंनें तेरे शरीर में रहकर गायत्री को और अपने बेटों को सदा के लिए खो दिया । काश मैं अपने पोते पोतियाँ खिताते हुए राजा साहब की मौत मरता । मरने के बाद उनसे मिलने गया था पर किसी ने मुझे नहीं पहचाना । मेरे बेटों के बेटे बेटियाँ हो चुके हैं । यदि मैं जीवित रहता तो ……“


“कमीने तूने मेरी भुलिया की जान ले ली । और ये तू मुझे अब बता रहा है । कम से कम मैं सोचता था कि उसके पास मेरे शरीर के रूप में सहारा तो है पर तूने उससे वो भी छीन लिया । अब तू अनन्त काल तक यहीँ रह । तुझे आजादी कभी नहीं मिलेगी । “ कहकर गोपी वहाँ से चला गया पीछे राजा साहब चिल्लाते रहे पर वह नहीं रुका । (1038)




आखिर बालाएं  बलाएं डर ही गईँ

रात के साढ़े दस के करीब मकान के रिनोवेशन पर चर्चा होने के बाद कोमल ने अँगड़ाई ली –“बस अब मैं बहुत थक गई हूँ कल सुबह दस बजे उठना भी तो है । मैं तो चली सोने । “

“नहीं रुको हमें अभी ग्यारह बजे तक यही रुकना है ।“ स्नेहा ने कहा ।

“क्यों ?” एकसाथ सबके मुँह से निकला यहाँ तक कि साधू ने भी सुर में सुर मिलाया ।

“वो आज रात मैं साबित करना चाहती हूँ कि पहले दिन मैंने जो भूत वाली बात कही थी वह सच थी । वह भूत आज रात किसी न किसी को अपने साथ ले जाएगा क्योंकि ............ आज पूर्णिमा की रात है । “ डरने की ऐक्टिंग करते हुए स्नेहा ने कहा । 

“आज न अमावस्या है न पूर्णिमा। तो हम अगली पूर्णिमा या अमावश्या आने तक के लिए सुरक्षित हैं । “ सुष्मिता ने उसे कैलेंटर याद दिलाया ।

“नहीं……… सॉरी-सॉरी आज ही के दिन उसकी मौत हुई थी शायद…………… इसीलिए वह आज ही आएगा । “

“पहले तो तू डिसाइड कर ले कि आज क्या हुआ था ?” कोमल ने कहा ।

“आज फर्श्ट अप्रैल नहीं है जो सबको विश्वजीत की फिल्म अप्रैल फूल बना रही है । “ प्रेमा ने कहा ।

“तुम लोगों को मेरी बात पर यकीन नहीं है न, तो ग्यारह बजे तक लाईट बुझाकर या जीरो पॉवर बल्ब जला कर यहीं मेरे साथ रुको और मुझे गलत साबित करो । “ स्नेहा ने टेबल पर हाथ मार कर कहा ।

“ठीक है हम तैयार हैं । “ सुष्मिता ने कहा और वोलोग कुछ बल्ब बुझाकर कम रोशनी कर वहीं बैठे ग्यारह बजने का इंतजार करने लगे । वॉल क्लॉक पर ग्यारह बजे पर कुछ भी नहीं हुआ ।

“शायद उसे कुछ देर हो गई हो । कुछ देर और बैठो ।“ स्नेह ने कहा तो सुष्मिता जो उठने को थी वापस बैठ गई । ग्यारह बजकर पाँच मिनट पर अचानक कमरे में एक धीमी हँसी गूँजी । यह एक स्त्रि की आवाज थी । एक हल्की हँसी जो धीरे-धीरे तेज होती गई । आवाज मानों चारों ओर से आ रही थी । एक धीमा गीत सुनाई दिया ।

कब से थी तेरे इंतजार में बेजार मेरे यार

तू न आया तो मैं ही चली आई तेरे द्वार।

जीवन ये मेरा था दीवार मेरे यार

इसे मौत के हवाले कर आई तेरे पास। 

“ऐसा लग रहा है यहाँ डॉल्बी साउंड सिस्टम है । ‘1942 A Love Story' भारत की पहली फिल्म थी जिसमें डॉल्बी साउंड सिस्टम का प्रयोग किया गया। “ प्रेमा ने फिल्मों पर अपना ज्ञान बघारा ।

तभी हॉल की ऊँची सीलिंग को सहारा देने वाले खंभे पर हल्की रोशनी दिखी जिसने आकार लिया और एक स्त्रि दिखाई दी , जिसकी आँखे खून की तरह लाल थीं , बाल बिना हवा के उड़ रहे थे मानों जीवित हों और सभी दाँत पैने थे और गंदे थे । 


“इसके पास सिर्फ कैनाइन दाँत ही है मोलर्स व प्रिमोलर्स तो हैं ही नहीं । ये तो पक्का है कि ये मांसाहारी जीव है । और लगता है सालों से ब्रश भी नहीं किया । इसे देखकर लॉर्ड ऑफ द रिंग्स के गोल्लुम की याद आ गयी । “ प्रेमा ने नांक सिकोड़ कर कहा ।

इधर चुडैल हल्की हंसी हँसते हुए धीरे-धीरे अपने हाथ पैर पीछे करके किसी मकड़ी की तरह खंभे पर चढ़ने लगी ।

“ये देखकर तो 1920 फिल्म की अदा शर्मा की याद आ गई ।” प्रेमा फुसफुसाई ।

“हे भगवान प्रेमा मैडम आपको इस मुसीबत में भी फिल्मों के नाम सूझ रहे हैं। ये तो सचमुच की चुडैल है । जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जै कपीस तिहुँ लोक उजागर …….“ साधू तो डर से सफेद पड़ चुका था ।

“हाँ 1920 में चुडैल भगाने के लिए रजनीश दुग्गल ने भी हनुमान चालीसा ही पढ़ी थी ।” प्रेमा भी साधू के साथ-साथ दोहराने लगी । 

चुडैल जब छत छूने लगी तो वापस उतरने लगी । और जमीन छूते ही अचानक वहाँ से गायब होकर पहले सुष्मिता के सामने प्रकट हुई और जोर से चीखी । फिर बारी बारी सबके साथ उसने ऐसा ही किया । सबकी सब पीछे खिसक कर किसी न किसी फर्नीचर के पीछे छुप गईं । चुडैल हॉल के बीच में खडी होकर जोर से चीखी तो सारे काँच छन्न से टूट कर बिखरने लगे । खिड़की के काँच, आईने व टेबल पर लगे काँच, इधर-उधर फैल कर बिखर गये । जिस जगह वह भूतनी खड़ी थी वहाँ मौजूद हर चीज हवा में उड़ने लगी और उसके चारों ओर ऐसे घूमने लगी जैसे ग्रह उपग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। स्टूल टेबल से लेकर छोटे काँच के टुकड़े तक उसका चक्कर लगा रहे थे । और वो किसी ल्यूमिनस ऑबजेक्ट की तरह स्वयं का प्रकाश उत्पन्न कर रही थी ।

“हे भगवान आज तो गोपी वाकई मूड में है । पूरी तैयारी से आया है । “ स्नेहा बुदबुदाई । तभी सुष्मिता पीछे हटते-हटते अचानक किसी चीज से टकराकर गिर पड़ी । चुडैल को ध्यान आया कि यहाँ कोई और भी है । जैसे ही उसका ध्यान सुष्मिता पर गया उसके चारों ओर घूमने वाले ऑबजेक्ट्स गिर पड़े । 

चुड़ैल वहाँ से गायब होकर सुष्मिता के सामने प्रकट हुई जो अबतक अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी थी और कांप रही थी -“बता कहाँ है मेरा गोपी वरना मैं तेरा खून पी जाऊंगी ।“ चुडैल ने कहा और अपनी जीभ बाहर निकाली जो साँप की जीभ की तरह लंबी और काली थी पर कई भागों में बँटी थी । वो जीभ सुष्मिता के चेहरे की ओर बढ़ी तो चीखकर उसने आँख बंद कर ली । चुडैल ने सुष्मिता को गरदन से पकड़कर हवा में टाँग लिया । 

“अरे इसका खून कोई सोडा है? जो पी जाएगी । छोड़ उसे । “ स्नेहा ने आगे बढ़कर बहादुरी दिखाई, उसे लगा यही मौका है खुद को बहादुर दिखाने का । ये जो सामने भूतनी खड़ी है वो उसका दोस्त गोपी ही तो है । ये देखकर उसकी बाकी सहेलियां वाह स्नेहा कहती हुईं उसी ओर आईँ पर कुछ दूर ही रुक गईं क्योंकि चुडैल ने दूसरे हाथ से स्नेहा को उठा लिया था ।

“आ ……. आ …….. गोपी ये गलत बात है तू क्या वाकई जान ले लेगा हमारी । छोड़ मुझे हमारी डील भूल गया ।“ स्नेहा ने हवा में हाथ-पैर मारते हुए फुसफुसाकर कहा ।

तभी अचानक फटाक की आवाज हुई और गोपी अपने रोज वाले रुप में प्रकट हुआ और चुडैल को नेगलेक्ट कर अपनी ही धुन में हवा में लटकी स्नेहा से बोलने लगा “ मैंने सोच लिया है कि न मैं मुक्त होऊँगा न उसे मुक्त होने दूँगा। तुम नहीं जानती उसने मेरी भुलिया के साथ कितना बुरा किया । मैं उसे अनन्त काल तक आत्माओं की दुनिया में रहने दूँगा । वो कभी आजाद न हो सके इसलिए मैं भी यहीं कैद रहूँगा । “ गोपी खुद बहुत गुस्से में था और बहुत ही भयानक लगा रहा था ।

“तू …. यहाँ है तो ये कौन है ?” स्नेहा ने हवा में हाथ पैर मारते हुए उँगली से इशारा किया तो गोपी का ध्यान चुड़ैल पर गया जो दोनों हाथों में एक-एक लड़की लटकाये उसे आश्चर्य से घूर रही थी । वह कुछ पल उसे गौर से देखता रहा ।

“दो – दो भूत ।“ बाकियों ने एक साथ कहा ।

“भुलिया उसे छोड़ दे ये मैं हूँ तेरा गोपी । “ गोपी के भूत ने दूसरी भूतनी से कहा ।

चुडैल ने सुष्मिता और स्नेहा को हवा में छोड़ दिया और गोपी की ओर पलटी ।

“मेरे गोपी ।“ वह भयानक तरह से मुस्कुराई ।

“मेरी भुलिया । “ गोपी ने उसे गले लगा लिया । 

“ओह तो ये भुलिया है ।“ स्नेहा ने कहा जो धम्म से जमीन पर गिर गयी थी और अपने आपको व्यवस्थित करने में लगी थी ।

“तू जानती है इन्हें ?” कोमल ने प्रश्न किया तो बाकी भी उसकी ओर मुड़े । सुष्मिता खंखारते हुए गला सहला रही थी । साधू जो अभी तक कोने में खड़ा था पर अब हिम्मत करके बाहर आया । 

फिर स्नेहा ने शॉर्ट में उसकी और गोपी की दोस्ती के विषय में बताया । (1200)



भुलिया की कहानी 

“गोपी जब मुझे पता चला कि तू मर चुका है तो मेरे जीवन का उद्देश्य ही खत्म हो गया । “ यह कहकर भुलिया अतीत में चली गयी । पहले दृष्य में शादी की तैयारी हो रही थी । भुलिया दुल्हन के रूप में बहुत सुन्दर लग रही थी । शादी सादगी से होना तय हुआ ।

“वाह गोपी तेरी दुल्हन तो बड़ी सुन्दर है ।“ अजय ने गोपी को कुहनी मारी तो गोपी ने उसे घूरकर देखा ।

“क्या ? मेरे खड़ूस बाप की तरह क्या लुक दे रहा है ? इतना बुरा लग गया, मैंने भाभी की तारीफ की तो ?” अजय ने कहा तो गोपी बने राजा साहब को याद आया कि उन्हें फिलहाल अपने कैरेक्टर में रहना चाहिए । 

ये सब ताम झाम उन्हें रास नहीं आ रहा था पर क्या करें गलत समय पर शरीर बदलने का निर्णय ले लिया । अब यदि शादी से इनकार करते तो भुलिया की बड़ी बदनामी होती । गले में हड्डी फँसी थी न उगलते बनती न निगलते । साले पेंटर से कहा था कि कुछ समय रुककर उनकी आत्मा बदले जब उन दोनों की शादी हो चुकी हो ताकि उसे फिर से शादी न करनी पड़े । पर उसके खेत में जाने कौन सी भैंस घुस गई थी कि वह बड़ी जल्दी में था ।

अरे एक ही शादी कम है इन्सान के जीवन को बर्बाद करने के लिए कि जो दूसरी भी कर ले । गनीमत थी कि दोनों मेहरारु राजा साहब के सिर पर नहीं चीखेंगीं एक तो गोपी का गला पकड़ेगी । अब पता चलेगा बच्चू को जो मालकिन को मक्खन लगाते फिरते थे।

अब शादी हुई थी तो सुहागरात भी होनी थी । जब सारी मोहल्ले टोले की सालियों ने राजा साहब को भुलिया की झोपड़ी में धकेलकर बाहर से कुंडी चढाई तो राजा साहब की जान सूख गई। खटिया पर भुलिया मुँह छुपाये बैठी थी । राजा साहब जाकर धीरे से खटिया के कोने पर बैठ गये और पसीना पोंछने लगे । अचानक भुलिया खटिया से उतरने को हुई तो उचककर राजा साहब भी खड़े हो गये ।

“मेरे गोपी ... तू क्यों इतना परेशान है ? देख मैं तेरे लिए बादाम वाला दूध लाई हूँ माँ कहती है इससे ताकत मिलती है । “ टेबल पर रखे गिलास को उठाकर भुलिया कोने में दुबके खड़े गोपी बने राजा साहब के पास लाई ।

“मुझे नहीं पीना तू पी ले ।“ गोपी ने कहा ।

“न माँ ने कहा था कि ये तू ही पियेगा । ला मैं अपने हाथ से पिला देती हूँ । “कहकर भुलिया गोपी के समीप गई तो वह दीवार से लगे-लगे एक ओर खिसक गया ।

“अच्छा वहाँ रख दे मैं पी लूँगा । “ भुलिया ने टेबल पर दूध रख दिया गोपी ने झट पी डाला । भुलिया उसे मुस्काकर देख रही थी ।

“वहाँ क्या कर रहा है यहाँ आ न ।“ भुलिया ने उँगली से इशारा किया ।

“देख लड़की तू चुपचाप नीचे दरी बिछाकर सो जा मैं खटिया पर सो जाता हूँ । एक तो ये चर्र मर्र खटिया ऊपर से तू, मैं दोनो को एकसाथ नहीं झेल सकता । कहाँ तो हवेली का सुंदर पलंग कहाँ ये खटिया । “

“हाँ हाँ अब तो तू मेरा पति हो गया है न अब तो तुझे मेरे घर से मिली हर चीज में कमी नजर आएगी ही । “

“अच्छा………… तो ये खटिया तेरे बाप ने दी है । भिखारी कहीं का .... कम से कम फोल्डिंग पलंग दे देता ।“

“देखो मेरे बापू को कुछ न कहना वरना .....”

“वरना क्या ?”

“वरना .......” भुलिया ने उसे तकिया खींच कर मारी और पलट कर गुस्सा होकर सो गई। गोपी ने चैन की सांस ली । गोपी खटिया पर लेटने लगा तो पाया कि जैसे ही खटिया पर बोझ पड़ा भुलिया लुढककर बीच में आ गई और उसे आँख मारी । खटिया पर सोने का मतलब था भुलिया से चिपककर सोना । इसलिये मन मारकर वो चटाई बिछाकर सो गये । 


अब वो सोचने लगे कि उन्हें करना क्या है ? उनके नाम छः बिसवा जमीन है कुछ नकद भी निकाल कर रखे थे वो सब लेकर वो गाँव छोड़कर चले जाएँगे और पूरे भारत के भ्रमण का अपना सपना पूरा करेंगे । चारों धामों की पैदल यात्रा का अपना सपना पूरा करेंगे । पिछला जन्म तो धन जोड़ते-जोड़ते ही बिता दिया । पर यह नया जन्म वो ईश्वर भक्ति को समर्पित करेंगे । काश गायत्री भी उनके साथ होती ।


………………………………………..


 “ए गोपी सुन………….. तू तो बड़ा भागवान है तेरा तो राजा साहब से बड़ा प्रगाढ़ रिश्ता है । सुन जैसे तूने विकटराम का कर्जा माफ करा दिया वैसे ही मेरा भी करा दे । चल बीस टका तू ले लियो । “ लालू कुम्हार ने पान से भरे अपने मुँह को आकाश की ओर ऊँचा उठाकर कहा ।

“भिखारी पहले पान तो चबा ले फिर बात कर मुझसे । तीन हजार असल और सूद को मिलाकर कुल चार हजार तीन सौ तेरह रुपये अठहत्तर पैसे होते हैं । चल भाग यहाँ से……………… तुम सबके घरों का ठेका लिया है क्या मैंने ? अगर सही समय पर सूद न दिया तो घर जमीन सब जब्त कर लूँगा । “ गोपी बने राजा साहब ने उसे दुत्कारा । 

“अरे तू क्यों जब्त करेगा ? अपने आपको बड़ा राजा साहब समझता है । हुँह । “ लालू कुम्हार उसे कोसता हुआ चला गया । 

“हाँ हूं………………………. मैं राजा साहब ही हूँ । “ और गोपी राजा साहब की तरह एक हाथ में धोती का कोना पकड़े घर की ओर चल पड़ा , वो घर जो कभी उसका था ।

वह सीधे हवेली पहुँचा जबकि अब उसका घर खेत में बनी उसकी झोपड़ी था । हवेली पर विकटराम और भुलिया पहले ही मौजूद थे ।

“गोपी तू आ गया । चल राजा साहब का आशीर्वाद लेने जाना है वो हमारी शादी में तो आये न थे तो बापू बोला आज पहले राजा साहब से आशीर्वाद ले ले फिर जीवन की नई शुरुआत कर । “ गोपी ने चहकते हुए कहा । 

“दामाद जी मैं तो अपने दोनों बच्चों को आपको लाने भेजने वाला था पर देखा तो आप चले आ रहे हैं । देखा बेटी कितना समझदार है गोपी और राजा साहब को कितना मानता है तभी तो सबसे पहले उनका आशीर्वाद लेने आया है ।“ विकटराम ने उसकी पीठ ठोंकी तो वो अकड़ने को हुआ पर फिर उसे याद आया कि विकटराम उसका ससुर है । 

“ठेंगा मानता है ।“ गोपी बुदबुदाया । अचानक उसे याद आया कि वह गोपी के किरदार में है और यह हवेली अब उसकी नहीं है ।

राजा साहब बना असली गोपी सारी रात सुबकता रहा । उसकी भुलिया किसी और से ब्याह दी गई ये बात उसकी छाती चीरे दे रही थी । तभी भुलिया मांग में सिंदुर भरे सुन्दर साड़ी पहने कमरे में घुसी, तो राजा साहब बना गोपी उसे देखता ही रह गया । नयी दुल्हन का निखार उसके चेहरे को सूरज सा चमका रहा था । तभी उसके बगल में गोपी बने राजा साहब भी प्रकट हुए जिनके चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी । कल उन दोनों की सुहागरात थी यह सोचकर ही लक्ष्मीचरण बना गोपी फिर फूट-फूट के रोने लगा । भुलिया चौंक पड़ी ।

“लगता है राजा साहब शादी ब्याह देखकर बड़े भावुक हो जाते हैं। इसीलिये रो रहे हैं ।“ विकटराम ने उनके रोने का अर्थ स्पष्ट किया । 

“हाँ …. हाँ….. ऊपर से ये बहुत कड़क बनते हैं पर दिल से एकदम बच्चे जैसे हैं । “मालकिन ने भाव विभोर होकर कहा ।

जब भुलिया और गोपी बने राजा साहब ने राजा साहब बने गोपी के पैर छुए तो अचानक उनके सीने में भीषण दर्द उठा और वह गिरकर तड़पने लगा । पूरे घर में कोहराम मच गया । गोपी बने राजा साहब ने अजय विजय को फटकारा –“अरे गधों मुँह क्या देख रहे हो देखते नहीं मुझे ... मतलब इन्हे हार्ट अटैक आया है जल्दी गाड़ी निकालो और नजदीकी कस्बे में जो बड़ा अस्पताल है वहाँ लेकर चलो ।“

अजय विजय ने गोपी के मुँह से गधों शब्द सुना तो उसे घूरकर देखा पर अभी उनकी प्राथमिकता अपने पिता को बचाना थी अतः इस बात को निगलेक्ट कर गये ।

कार तैयार की गई और उन्हें हॉस्पिटल ले जाने की तैयारी होने लगी पर भुलिया पर नजर गड़ाए राजा साहब इस दुनिया से ही जा चुके थे ।

हवेली में मातम छा गया । अपने शरीर को तड़पते और फिर मृत्यु को प्राप्त करते देख गोपी बने राजा साहब के होश उड़ गये । ऐसा तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था । कई दिन इसी उधेड़बुन में निकल गये । गायत्री को पछाड़े खाकर रोते देख गोपी का रुप धरे लक्ष्मीचरण का जी करता उसे सब सच बता दे । पर ऐसा कर न सका । आखिर गायत्री जो अब गाँव में राजा साहब के पास रुकने वाली थी वो फिर से अपने बेटों के साथ शहर चली गयी । गाँव में धीरे-धीरे चर्चा होने लगी कि हवेली में राजा साहब का भूत है पर गोपी बने राजा साहब जानते थे कि हवेली में गोपी का भूत है । अब वो हवेली में कदम रखने से डरने लगे । (1400)



आखिर भेद खुल ही गया । 


सुबह पानी की बूँदे चेहरे पर पड़ी तो गोपी की नींद खुली सामने भुलिया थी जो उसके चेहरे पर झुकी थी और उसके भीगे बालों से ही पानी गिर रहा था ।



“भुलिया मेरी प्यारी भुलिया ।“ गोपी ने उसे अपनी ओर खींचा ।



“आ गई अकल ठिकाने । रात में तो बड़ा अकड़ रहे थे । “ भुलिया ने चिपकते हुए कहा।



“मैं कब अकड़ा तुझसे ? तू तो मेरी रानी है और मैं तेरा गुलाम ।“ भुलिया हँसी और उसके गले लग गई । अचानक गोपी के हाथ पाँव ढीले पड़ गये । भुलिया ने उसे हिलाया तो जैसे वह नींद से जागा ।




“गोपी क्या हुआ तुझे ।“




“कौन गोपी ? ओह .......... ये क्या छोकरी तुझे शरम नहीं आती उठ मेरे ऊपर से ।“ भुलिया को एक ओर धक्का देकर गोपी ने कहा –“जा जल्दी मेरे लिए चाय बना कर ले आ , मैं बेड टी पीता हूँ तुझे नहीं पता ?”



“जाती हूँ राजा साहब आपके लिए चाय बनाकर लाती हूं ।“ भुलिया ने उसके गाल खींचकर कहा । इसी प्रकार कुछ दिन बीत गये । लक्ष्मीचरण कभी गोपी तो कभी स्वयं की तरह व्यवहार करता । जब उसे ये रियलाइज हुआ तो उसे लगा की कभी कभी गोपी का भूत उनके शरीर में घुस जाता है इसीलिए वो अपना आपा खो देता है । 

वहीं भुलिया के माता पिता और गांव वालों को लगने लगा था की गोपी के सिर पर लक्ष्मीचरण का भूत सवार रहता है । क्योंकि बाकी सबकी नजर में तो लक्ष्मीचरण की मौत हुई थी । और गोपी जिंदा था । बेचारा गोपी तो किसी को अपना दुख सुना ही नहीं सका। 



………………………………………………


उस दिन सुबह उठते ही गोपी बने लक्ष्मीचरण ने भूलिया को देखा तो बेड टी मांगी।



"ए लड़की जा मेरे लिए बेड टी ले आ। और जल्दी लाना वरना अपनी तनख्वाह भूल जा । " उसने नींद में झूमते हुए कहा।


"जरूर राजा साहब । हुंह।" भुलिया पल्लू झटक कर जाने को हुई । 


"ए भुलिया तू मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझसे ब्याह करेगी? " अचानक वो गोपी बन गया।


"मेरे प्यारे गोपी तू…भी न .। " भुलिया ने रुककर प्रेम से कहा और उसके समीप आ गई । 


"मेरी भुलिया। आज मैं बहुत खुश हूं। शादी के बाद मैं तुझे खूब पढ़ाऊँगा। ताकि हमारे बच्चे भी पढ़ लिखकर कलेक्टर बन सके । मां पढ़ी लिखी होगी तो बच्चे भी तो होशियार होंगे न । देखना तू एकदिन अजय विजय से भी ज्यादा अच्छी अंग्रेजी बोलेगी । " गोपी बने राजा साहब के कंधे पर भुलिया ने सिर टिका दिया। 


"अच्छा तो तू मुझे पढ़ाएगा । फिर तो लोग कहेंगे कि गोपी से ज्यादा पढ़ी लिखी उसकी बीबी है। तब तुझे शर्म नहीं आएगी। " भुलिया ने अपने वाक्य दोहराए जो उसने कुछ दिन पहले कहे थे । 


"शर्म कैसी ? शादी के बाद हम शिव पार्वती समान एक हो जायेंगे तब तेरी तरक्की में ही मेरी तरक्की है । मुझे तो तेरे जैसी प्यारी बेटी चाहिए जिसे मैं खूब पढ़ा लिखा कर कलेक्टर बनाउगा। बोल मेरी बेटी को कलेक्टर बनाने के लिए तू पढ़ेगी न । " गोपी बने लक्ष्मीचरण ने इमोशनल होकर पूछा । 


"हां गोपी शादी के बाद तू जैसा बोलेगा मैं वैसा ही करूंगी। " भुलिया ने आंख में आंसू भरकर कहा । 



जब लक्ष्मीचरण पर गोपी की याद हावी होती तब उसे उनकी शादी से पहले तक की ही बात याद रहती । इसलिए उनके टेपरिकॉर्डर पर वही पुराने डायलॉग बजने लगते जो भुलिया पहले सुन चुकी थी। गोपी ने शादी के बाद कभी कुछ भी नई बात नहीं कही । बल्कि हमेशा राजा साहब की तरह बरताव किया । ये सोचकर भुलिया की आंख भर आई । 


तभी गोपी को झटका लगा । 



"बदतमीज छोरी ये क्या कर रही है । तू अभी तक गई नहीं । जल्दी मेरे लिए चाय लेकर आ। कामचोर कहीं की। " लक्ष्मीचरण अपने, आपे में आया तो देखा भुलिया उसके कंधे पर सिर टिकाए बैठी है। उसने उसे झिड़क दिया ।


............………


"ए लड़की मैने तुझसे चाय मांगी थी, तू ये क्या ले आई?" टेबल पर रखे गिलास की ओर देखकर वह बोला । 



"राजा साहब ये खौलता सरसों का तेल है।"

"हैं? 



"तो .....मैं इसका क्या करूं?"




"ए बुढ़ऊ साफ-साफ बता मेरा गोपी कहां है और तूने उसका क्या किया ? वरना गरम चाय नहीं खौलता तेल तेरे हलक के नीचे उतार देगी ये भुलिया। तू लक्ष्मी चरण से अभी के अभी मरण बन जायेगा । " भुलिया एक हाथ से उनका गिरेबान पकड़कर और दूसरे हाथ में गर्म तेल का गिलास पकड़कर कहा । गिलास पकड़ने के लिए उसने उसके चारो तरफ कपड़ा लपेटा था । तेल से उठता धुआं गवाही दे रहा था की तेल गोपी के गले को कितना नुकसान पहुंचा सकता था । 


"अरे बेटी क्या करती हो ? तुम्हारे जैसी संस्कारी स्त्री के मुख से ऐसी वाणी शोभा नहीं देती। "


"संस्कारों की मां की …..क्या समझा ? अब बता मेरा गोपी कहां है? बता वरना मैं तेरी जान ले लूंगी । तू मेरा गोपी नहीं है । " उसके राजा साहब की गर्दन पकड़ कर कहा।


"मैं … मैने गोपी से अपनी आत्मा बदल ली और वो मेरी मौत मर गया । गोपी मरकर मुझसे बदला ले रहा है वह कभी-कभी मेरे सिर पर सवार हो जाता है । देख भुलिया तू तो मेरी बेटी समान है मैं …. मैं तो आज भी गायत्री से प्यार करता हूँ ।


मुझे माफ करदे मैं बुढापें की बीमारियों से तंग आ गया था और एक जवान शरीर में रहने का आनन्द उठाना चाहता था । मैं तो पेंटर की तरह दुनिया की खाक छानना चाहता था पर वह मुझसे दोबारा आत्मा बदलने को तैयार न था तो मैंने..............." 


"मतलब कुछ दिन पहले पेंटर जो आत्मा बदलने का हल्ला मचाते घूमता था वो सच में हुआ था ?"


"अरे वो भी मैं ही था । पेंटर ने मुझसे अपना शरीर बदला था । पहले तो मैं दुखी था की पेंटर मेरी जगह लेकर मेरे मेहनत से जोड़े पैसे बर्बाद कर रहा है पर फिर मैं उसके स्वस्थ शरीर से बहुत प्रभावित हुआ । न मेरे हाथ कांपते थे , न बीपी, न डायबिटीज और न बुढ़ापे की अन्य परेशानियां । तब मुझे पता चला की स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ा धन है । उसके स्वस्थ शरीर में रहने के बाद जब पेंटर ने वापस मुझे मेरे शरीर में भेजा तो मैं पछताने लगा । जब वो मुझे अपना शरीर देने को राजी न हुआ तो मैंने गोपी से शरीर बदल लिया । एक जवान और स्वस्थ शरीर के अलावा मैने और कुछ नही चाहा । पर तुझसे शादी करनी ही पड़ी । वरना तेरी बड़ी बदनामी होती । ये शरीर तेरा पति है पर ये आत्मा.... ये गायत्री के पति की है । मैं तो उसे ही चाहता हूं । मुझे माफ कर दे । "



ये सुनकर भुलिया धम्म से गिर पड़ी और सिर पकड़कर भूमि पर बैठ गई । वह तो शादीशुदा होकर भी विधवा है । उसे यह सोच कर ही रोना आ रहा था कि _


" जब मैं नकली गोपी के साथ फेरे ले रही थी तब असली गोपी का क्या हाल हो रहा होगा ? वह इस दुख को सह न सका और अपनी जान दे दी । अब मैं भी क्या करूँ जीकर , मैं भी मर जाती हूँ ।अब मैं अगले जन्म में उससे मिलूंगी ।"


यह कहकर भुलिया उठी और नदी की ओर दौड़ लगा दी । वह रोती जाती थी और दौड़ती जाती थी । गाँव की औरतों ने यह देखा तो आपस में खुसुर पुसुर करने लगीं आखिर नये ब्याहे जोड़े के बीच ऐसा क्या हुआ जो ............... 


भुलिया ने नदी में छलांग लगा दी । वह पानी में बहती जाती थी कि अचानक किसी ने उसे पकड़ लिया और खींचकर बाहर निकाला । जब भुलिया को होश आया तो सामने वही पेंटर खड़ा था जिसने राजा साहब की पेंटिंग बनाई थी ।


“मुझे क्यों बचाया पेंटर बाबू मैं मर जाना चाहती हूँ ।“


“भुलिया जिन्दगी बड़ी कीमती है । और मौत बहुत सस्ती। तू क्यों ये घाटे का सौदा कर रही है ? “


“तो क्या करूँ? मेरा गोपी तो मर गया अब मैं इस महंगी जिन्दगी जीकर क्या करुगी ?”


“क्या ? गोपी मर गया ? पर कुछ दिन पूर्व तो मैं उसे अच्छा भला छोड़कर गया था ।”


“तुमने ही राजा साहब और गोपी की आत्माएं बदल दी और गोपी जो राजा साहब के शरीर में था उसकी हृदयाघात से मौत हो गई । कोई मेरी बात पर विश्वास नहीं करेगा, पर मैं जानती हूँ कि जो मेरे घर में मेरा पति बनकर आया है, वो गोपी नहीं है और मैं उसके साथ पत्नी के रूप में जीवन नहीं गुजार सकती । इसलिये मुझे मर जाने दो । “ भुलिया ने रोते हुए कहा । 


“हे भगवान ............ मैंने ये तो सोचा ही नहीं । राजा साहब का शरीर बहुत बूढ़ा और रोगी था निश्चय ही वो दूसरी बार आत्माओं की अदला बदली न सह सका ।"


"नहीं ....गोपी मुझे लक्ष्मीचरण की पत्नी के रूप में नही सह सका इसलिए मर गया। हमने अपने भविष्य के जो सपने बुने थे सब बिखर गए । इंसान से उसके सपने छीन जाएं तो फिर उसके जीने का मकसद ही छिन जाता है। मैं भी अब जीकर क्या करूंगी? मुझे भी गोपी के पास जाना है । सुना है वो राजासाहब की हवेली में भूत बनकर रहता है । जरूर वो मेरा इंतजार कर रहा है । गांव वालो को लगता है की हवेली में लक्ष्मीचरण की आत्मा है पर वो गोपी ही है जो मुक्ति के लिए तरस रहा है। "


“भुलिया मैं तेरा दोषी हूँ मैंने ही उन दोनों की आत्माएं बदली थीं । मैंने सोचा था शहर से लौट कर गोपी को उसका शरीर वापस दे दूंगा पर ... “ फिर उसने अबतक की पूरी कहानी उसे बता दी और हाथ जोड़कर उससे माफी माँगी ।


“तुम्हारा दोष नहीं पेंटर बाबू मेरे नसीब में ही काँटे बोये हैं । पर अब मेरे जीवन में क्या बचा है कि मैं इसे जीऊँ ?”



“बहन ............. तेरा दुख तो मैं दूर नहीं कर सकता पर इतना आशीर्वाद दे सकता हूँ, कि अगले जन्म में तुझे गोपी ही पति के रूप में मिले । मैं तेरा दोषी हूँ मुझे जो चाहे सजा दे मैं हंस के सह लूंगा, पर तेरी मौत की खबर .... वो न सह सकूँगा । यूँ समझ की तू गोपी के साथ मर गई, ये भुलिया का नया जनम है, इस जनम को दूसरों की भलाई में लगा, गोपी को इससे बड़ी श्रद्धान्जली और क्या होगी ? गोपी मेरे भाई जैसा, बेटे जैसा था । यदि वह जीवित होता तो मैं उसे वापस ले आता पर अब ............ मेरी वजह से ही वो प्रेत योनि में फँस गया है । कम से कम मैं उसे वहाँ से आजाद होने का उपाय तो बता ही सकता हूँ । “


"वो मुझसे शादी नहीं कर सका शायद इसलिए प्रेत योनि में फसा है ?"



"नहीं । सपनों में उसने जिस शरीर को तेरे साथ फेरे लेते देखा वो तो तेरे साथ फेरे ले चुका है। मामला इतना सीधा नहीं है । कोई और इच्छा है जो गोपी को इस संसार में रोक के रखे हुए है । इसीलिए वो मरकर भी नही मरा। मैं रूपा की बेटी के शरीर से अपने बाप की आत्मा निकाल दूं फिर गोपी की समस्या सुलझाता हूं । "



पेंटर ने भूलिया को बता दिया की क्यूं वो राजासाहब और गोपी की आत्मा बदलने को तैयार हो गया । रूपा की बेटी छमिया का हाल तो भुलिया जानती ही थी । 



“ठीक है फिर आज से मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य है कि मैं स्वयं पढ़ूँगी और गाँव की बच्चियों को भी पढ़ाऊँगी । आज से भुलिया मर गई और भागमती जी उठी । मैं भी गोपी की इच्छानुसार अंग्रेजी सीखूँगी और दूसरों को भी सिखाऊँगी । हमारी बेटी भले ही न हो पर आज से गांव की हर बेटी को मैं अपनी बेटी मानकर उसकी उच्च शिक्षा के लिए प्रयासरत रहूंगी । गोपी को मेरी ओर से यही श्रद्धांजलि होगी । "


"तू धन्य है भुलिया तूने मुझे एक और पाप का भागी बनने से बचा लिया । वरना तेरी मृत्यु का पाप भी मेरे सर आता । ईश्वर तुझे सफलता के शिखर पर पहुंचाए। चल घर चल सब राह देख रहे होंगे । और उस राजा साहब को तो मैं देखता हूं । आज के बाद वो तेरे रास्ते में कभी बाधा नहीं बनेगा । "



जब भुलिया को लेकर पेंटर उसके घर पहुँचा तो सारा गाँव वहाँ एकट्ठा था । सबने भुलिया को भागते देखा तो इकट्ठे होकर गाँव के बड़े बुजुर्ग झगड़ा सुलझाने की सलाह देने गोपी के पास पहुँचे । पर गोपी तो पिछले दरवाजे से भाग निकला और गाँव के बुजुर्ग अब आपस में ही सलाह मशविरा कर रहे थे । 



“का हुआ बिटिया ?” एक बूढ़ी काकी ने पूछा । 


“कुछ नहीं काकी सब ठीक है आप अपना काम कीजिए ।“ पेंटर ने बात टाली । 


“क्या ठीक है ? ये पूरी तरह गीली है इसका मतलब ? कहीं ये नदी में तो नहीं कूद गई थी?” लालू कुम्हार ने पूछा ।


“हाँ हाँ ऐसन ही लागत है । भला पति पत्नी के झगड़े में ऐसा भी क्या गुस्सा ? खुदही तो लब मैरिज की थी तब नाहीं पता रहा कि का का होता है बियाह के बाद । “ बूढ़ी काकी की इस बात पर बाकी लोग हँसने लगे । 


पेंटर सबकी बातों के अनसुना कर भुलिया को भीतर ले गया ।

भुलिया के माता पिता व भाई भी तभी वहाँ आये । घर खाली था गोपी बने राजा साहब वहाँ नहीं थे ।


“का हुआ रे भुलिया ? गाँव वाले कहत हैं तू नदी में डूबने गई थी । अरे ऐसा क्या हो गया ? पति पत्नी में झगड़े तो होवें ही है ईमें कौन सी बड़ी बात है । कहीं मैं भी तेरे बापू से नाराज होकर डूब मरती तो तू पैदा ही न होती । देखो भला शादी को एक माह भी नहीं बीता और .........”भुलिया की माँ की बात को काटते हुए विकटराम ने कहा ।


“चुप रहो भाग्यवान । बेटी मुझे बता क्या बात है ? मैं जानता हूँ गोपी पर कभी-कभी राजा साहब का भूत सवार हो जाता है इसीलिये तू चिंतित रहती है , पर अब तू चिंता न कर मैं अभी-अभी दूसरे गाँव के ओझा बाबा से एक ताबीज बनवा कर ला रहा हूँ ले यह उसके बाजू पर बाँध दे वह ठीक हो जाएगा । “ भुलिया के बापू ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा तो वो सुबकने लगी।

भुलिया से भागमती तक का सफर 

भुलिया बुत बनी बैठी रही और तब पेंटर ने उसके पिता से अकेले में बात करने की इच्छा जताई । वो दोनों घर से बाहर कोने में जाकर बात कर रहे थे और गाँव वाले दूर से दोनों के भावों को समझने की कोशिर कर रहे थे । पेंटर ने पूरी बात उसके पिता को बताकर हाथ जोड़कर उनसे माफी भी मांगी । विकटराम ने पेंटर का हाथ रोक लिया और फूट-फूट कर रो पड़े । यह बात अन्य घर वालों से छुपा ली गई । गोपी घर छोड़कर भाग गया था, पर जाने से पहले बिस्तर पर एक पोटली छोड़ गया था उसे खोलने पर उसमें ढेर सारे रुपये निकले । विकटराम ने वो रुपये संभाल कर रख दिये अब ये रुपये, गोपी की जमीन व यह कच्चा मकान ही उनकी बेटी के जीवन गुजारने का सहारा था ।

.........................

“हाय मेरी बेटी के तो भाग ही फूट गये । वो राजा साहब क्या मरे, पहले तो उनके भूत ने मेरे दामाद को पकड़ लिया और अब तो वो पागल घर छोड़कर ही चला गया । हाय-हाय इससे तो धर्मा गांव के किसान कर्मा के बेटे नर्मा से अपनी बेटी ब्याह देते , तो भले ही पाँच बिसवा खेत की मालकिन होती, पर कम से कम सुहागन तो रहती । वो इस तरह पगला कर मेरी बेटी को छोड़कर तो न भाग जाता । अब क्या होगा? कैसे इसकी इतनी लंबी जिन्दगी बिना पति के कटेगी ?” भुलिया की मां ने रो-रोकर पूरा गाँव सिर पर उठा रखा था ।

“क्यों? क्या मैं पैदा ही शादीशुदा हुई थी? पहले भी पति के बिना रहती थी न? आगे भी रह लूँगी ।“ भुलिया ने चिढ़कर कहा ।

“कैसन बात करत है रि भुलिया ? अरे मरद के बिना कौनों औरत इज्जत से नाहिं जी सकत । भुलिया की अम्मा हम तो कहित है कि पानी डालो ऊ दू दिन की शादी पर । मेरे चचेरे भइया हैं जिनकी चार लड़कियाँ और दो लड़के छोड़कर उनकी जोरू स्वर्ग सिधार गई । अगर तुम कहो तो मैं उनसे बात करूँ ।“ सामने की झोपड़ी में रहने वाली मंथरा चाची ने कहा ।

“हाँ हाँ बहन अब तो तोहार ही सहारा है । कौनो तरह हमार बिटिया का दूसर ब्याह करै दो, बड़ा अहसान रहीगा तोहार, हमार ऊपर ।“

“तुम चिंता न करो भुलिया की अम्मा, हमार भइया के लिए वैसे तो बहुतै रिश्ते आवत हैं, पर हमार बात ऊ नाहीं टाल सकत हैं , हमका बहुतै मानत हैं , हम बात करब भइया से ।“ मंथरा ने खुश होकर कहा ।

“माँ तुम्हारा दिमाग तो ठिकाने है? सारा गाँव जानता है कि इसके भाई ने दारू के नशे में पीट-पीट के अपनी गर्भवती पत्नी की जान ले ली । और तुम उससे मेरी शादी कराना चाहती हो । और तो और वो उमर मे बापू से कुछ बरस ही कम होगा । मुझे पति नहीं चाहिए । गोपी मेरे जीवन यापन के लिए पर्याप्त जमीन व धन देकर गया है, मैं उसकी याद में अपना जीवन काटूँगी और अपनी पढ़ाई पूरी करुँगी । “

“क्या कहती है रे लड़की पढाई करेगी? पर कैसे? गाँव में आठवीं के आगे तो स्कूल न है। “ मंथरा ने नाक सिकोड़कर कहा ।

“मैं खुद से पढ़ूंगी और प्राइवेट हाई स्कूल का फार्म शहर से भर दूँगी । जरूरत पड़ी तो कुछ माह शहर में रहकर कोचिंग करूँगी पर शादी तो बिल्कुल नहीं करूँगी । मालकिन (राजा साहब की पत्नी) ने मुझे अपना शहर का नंबर दिया है मैं उनसे और अजय - विजय भैया से पूछ कर आगे की पढ़ाई करूँगी । मैं अंग्रेजी पढूँगी और गाँव की सभी लड़कियों को पढ़ाऊँगी भी । “ भुलिया ने निश्चय पूर्वक अपना निर्णय सुना दिया । 

“इस लड़की का तो दिमाग खराब हो गया है । अरे भुलिया के बापू इसे समझाओ इतना अच्छा रिश्ता आया है, उसे न ठुकराए ।“ भुलिया को पिता को झोपड़ी में घुसते देख उसकी माँ ने उन्हें पुकारा ।

“तुम चुप करो जी । लड़की सही कहती है । मेरी लड़की जो चाहेगी वो करेगी । चल बेटी मैं तेरे साथ शहर चलता हूँ तेरा फार्म भरवाने, देखूं मेरे जीते जी कोई मेरी बेटी पर उँगली भी कैसे उठाता है ? पति नहीं तो क्या हुआ ? क्या बाप बेटी का सहारा नहीं बन सकता ? जब तक मैं जिऊँगा अपनी बेटी के हर फैसले में उसका साथ दूँगा । किस्मत में जो लिखा था सो हुआ पर अब आगे की किस्मत हम खुद लिखेंगे ।“

“सच बापू । “ भुलिया बापू के गले लग गई।

“हाँ बेटी । तू तो मेरी प्यारी बेटी है, तूने अपने पिता का कितना ध्यान रखा, मैं भूखा था तो मुझे खाना पकाकर खिलाया, मैं थका था तो मेरा मूढ़ और गोड़ दबाया , मैं हताश था तो मेरा हौसला बढ़ाया , जब मैं कर्ज में डूबा था और परेशान था तो गोपी से कहकर मेरा कर्ज माफ करवा दिया। अब जब तू मुसीबत में है तो क्या मैं मुंह मोड़ लूँ ? जो दुख सुख होगा साथ सहेंगे ।“

“हाँ हम भी दीदी को कहीं नहीं जाने देंगे ।“ दोनों भाई एक स्वर में बोले ।

“राम भला करें । मैं तो भले के लिए कह रही थी पर तुम लोग बड़े मार्डन बने हो तो बने रहो। पर याद रखना रिश्ता हाथ से निकल गया तो बहुत पछताओगे ।“ मंथरा चाची बड़बड़ाते हुए चली गईं ।

भुलिया ने अपने पिता के साथ शहर जाकर स्वयं हाई स्कूल का फार्म भरा । विकट राम स्वयं कभी शहर नहीं गया था, पर बेटी के लिए वह पहली बार शहर गया । बड़ी-बड़ी शोर मचारी कारों व गाड़ियों के बीच सड़क पार करते हुए वह बहुत डरता था, पर फिर सोचता अगर वह डर गया तो उसकी बेटी हिम्मत हार जाएगी । जब वह अकेला होता तो कई बार आधे-आधे घंटे तक सड़क पार करने की हिम्मत न जुटा पाता पर जब भुलिया साथ होती तो वह उसका हाथ पकड़कर शान से सड़क पार कराता और यह जताता कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं । भुलिया अंग्रेजी पढ़ने के लिए गांव के ही मास्टर साहब से एक्ट्रा क्लास लेने लगी । मास्टर साहब जितनी कर पाते उसकी सहायता करते । भुलिया ने अच्छे नंबरों से हाई स्कूल पास हुई वह सेकेंड डिविजन से पास हुई थी । उसके पिता ने इस खुशी मे गाँव में मिठाई भी बाँटी । भुलिया को देखकर कई लड़कियाँ जो पढ़ना चाहती थीं उन्होंने भी हाई स्कूल का फार्म भर दिया और भुलिया से पढ़ने आने लगीं । विकटराम के पास गाँव के अन्य माता पिता शहर से फार्म भरने की सलाह लेने आने लगे और वह शान से उन्हें बताता कि कहाँ जाना है? क्या करना है ? कैसे परीक्षा दिलानी है ? कभी-कभी वह स्वयं उनके साथ जाया करता था । जो गाँव वाले विकटराम का मजाक बनाते थे वे अब उसकी प्रशंसा करते न थकते ।

 भुलिया ने इंटर ज्वाइन किया और अंग्रेजी पढ़ने के लिए कुछ माह शहर में ही रही। शहर में राजा साहब की पत्नी गायत्री ने उसे एक कमरा रहने को दे दिया और एक अच्छी कोचिंग में उसे एडमिशन दिला दिया । अजय विजय की शादी हो चुकी थी और उनकी पत्नियाँ भी भुलिया से हमदर्दी रखतीं थीं । भुलिया इस अहसान के बदले उनके घर के काम कर दिया करती थी। इस तरह भुलिया स्वयं भी पढ़ती और गांव की अन्य लड़कियों को भी पढ़ाती । 


जब वह शहर के एक डिग्री कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रही थी, तो वहाँ क़ॉलेज के सालाना समारोह में शहर के कलेक्टर साहब से उसकी मुलाकात हुई, तभी उसने अपने गाँव में इंटर कॉलेज की माँग उनके सामने रखी । कलेक्टर साहब उससे बहुत प्रभावित हुए और गांव में इंटर कॉलेज की व्यव्स्था का आश्वासन दिया पर भुलिया इतने पर शांत न बैठी वह जब भी शहर जाती इंटर कॉलेज का कार्य कहां तक पहुँचा इस बात की जानकारी लेने कलेक्टर साहब के पास एक चक्कर जरूर लगा लेती । आखिर गांव में आठवीं तक के स्कूल को ही और बढ़वाकर इंटर तक करा दिया गया ।


पहेलियों का हल और मुक्ति

 

भुलिया तब बीएड में एडमिशन ले चुकी थी जब उसके पिता की मृत्यु हो गई, पर अब वह स्वयं अपना ध्यान रखने में सक्षम हो चुकी थी । उसके भाई भी अपनी बहन का पूरा साथ देते और पिता के जाने के बाद वे उसके साथ शहर जाते ताकि उसे अकेलापन न लगे । भुलिया की अपने ही गाँव के इंटर कॉलेज में सरकारी नौकरी लग गई । पढ़ाने के साथ-साथ वह मेधावी छात्राओं का मार्गदर्शन करती। अगर उनके घरवाले उनकी फीस न भरते तो भुलिया अपनी तनख्वाह से फीस भर देती । उसके खेत उसके भाई जोतते व जो कुछ कमाई होती उसका निश्चित हिस्सा अपनी बहन को देते । इस प्रकार भुलिया के पास आय का अच्छा साधन था । उसे कभी किसी के सामने हाथ न फैलाने पड़े, तो गाँव वाले उसके पीठ पीछे उसे जो भी कोसा करते पर उसके मुँह पर किसी की हिम्मत न थी कि उसे कुछ कह सकें ।

चाहे औरत हो या मर्द सहारे की सबको जरूरत है पर जरूरी नहीं कि वह सहारा जीवनसाथी ही हो सकता है । हमारा परिवार भी हमारा सहारा हो सकता है । भुलिया का परिवार उसका सहारा बना और भुलिया अपने परिवार का सहारा बनी । पिता के जाने के बाद भुलिया ने अपने भाईयों की शादी गाँव की योग्य कन्याओं के साथ करवायी वो भी बिना दहेज के । उसकी माँ जो कभी उसके निर्णय से नाराज थीं वो धीरे-धीरे समझ गईं कि उनके पति का निर्णय कितना सही था । अब तो वो भी गांव भर से अपनी बेटी के लिए लड़ने को तैयार थीं । जब वो मरीं तो उनके दिल में संतोष था कि उनकी बेटी के इससे अच्छे भविष्य की तो कल्पना ही वो नहीं कर सकती थीं। जिस दिन भुलिया ने पहली बार इंटर कॉलेज की प्रिंसिपल का पद संभाया उसी दिन गाँव में पहला बालिका विश्वविद्यालय का उद्घाटन उसी के हाथों कराया गया । कलेक्टर साहब ने कहा कि इस सम्मान की हसली हकदार तो भागमती है । आज भागमति गाँव के लोंगों की नजर में देवी से कम नहीं है । गांव की लड़कियाँ उसे अपना आदर्श मानती हैं।

“तो आज रात जब मैं सोई तो सीधे इस हवेली में जागी। आज ही मरकर सीधे तेरे पास आई हूँ My Lord, NOW I CAN ALSO SPEAK IN ENGLISH . मैं दिन रात भगवान से यही मनाती कि मुझे गोपी के पास भेजना जहाँ वो वहाँ मैं । शायद इसीलिए भगवान ने मुझे यहाँ भेजा है । अब जबतक तू मुक्त नहीं होता हम दोनों मिलकर लोगों को डराएंगे । “ भुलिया ने चहककर कहा । वो अभी भी भयानक दिख रही थी ।

“वाह भुलिया तू तो बड़ी प्रतिभाशाली निकली । अंग्रेजी भी सीख ली और डराना भी एक दिन में सीख लिया । अरे मैं खुद तुझे देखकर डर गया तो इन सबका क्या हाल हुआ होगा । “ गोपी ने इमोशनल होकर कहा । 

“हाँ….. हाँ……. मैं तो सोच रही थी कि गोपी ने इसबार कमाल कर दिया पर नहीं ये तो भुलिया ने कमाल किया । “ स्नेहा ने कहा ।

“ओह तो आप भागमति देवी जी हैं। भूत न भी बनतीं तो भी आप कम डरावनी नहीं थीं । चलो अब तो सब ठीक है , अब किस बात का इन्तजार है ? अब अपनी पहेली सुलझाओ और हवेली खाली करो मेरी ।“ सुष्मिता ने दाँत दिखाकर कहा ।

“इसके कहने का मतलब है कि अब तुम लोग नया जन्म लेकर ‘बीस साल बाद’ फिल्म के डिम्पल और मिथुन की तरह नये जीवन की शुरुआत करो ।“ प्रेमा ने कहा ।

 

भुलिया और गोपी के साथ चारों सहेलियाँ ऊपर कोठरी में गईं उन्हें सिर्फ गोपी और भुलिया ही दिख रहे थे और सुनाई दे रहे थे पर वो लोग हवा में किसी से बातें कर रहे थे ।

“गोपी ? भुलिया ? भुलिया तू हवेली इतनी देर से क्यों आई? जबकि तू तो उसी दिन नदी में कूदकर मर गई थी जब तुझे गोपी की मौत का पता चला ?” राजा साहब की आत्मा ने पूछा । 

“उस दिन तो पेंटर ने मुझे बचा लिया था । मैं तो आज ही मरकर यहाँ पहुँची हूँ ।” भुलिया ने अपनी कहानी शॉ़र्ट में बताई । 

“ओह भगवान का शुक्र है कि आखिर तुम दोनो साथ-साथ हो । मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है । देख बेटा गोपी अब तो भुलिया तुझे मिल गई । अब और कितना इंतजार करवायेगा तू इसे ? कब तक ये भी तेरे साथ प्रेत योनी में भटकेगी ? भगवान की यही इच्छा है कि अब हम तीनों मुक्त हो जाएं । “ राजा साहब गिड़गिड़ाये ।

"ठीक है मैं तेरे पहले सवाल के जवाब में इस बड़े बर्तन को छोटे में डालता हूं । तुमने इससे साबुत डालने को नही कहा था इसलिए मैं इसे तोड़कर छोटे बर्तन में डाल सकता हूं।" गोपी ने वैसा ही किया । 

"साबाश गोपी। "

"आपका दुसरा सवाल हल करने के लिए मैं ये छड़ी लाया हूं । इसे देखिए और कहिए की ये छड़ी छोटी है या वो जो आपके पास है ?"

"जो मेरे पास है वो छोटी है । "

"तो बिना काटे या तोड़े मैंने उसे छोटा कर दिया । आप ये मानते हैं?"

"हां मानता हूं । "

"आप मंगलवार को पैदा हुए थे । "

"वाह ये भी सही।"

"अब अंतिम…. मैं आपके लिए तीन केले और चार सेब लाया हूं । हिसाब कर लीजिए सही हैं या नहीं?"

"बिल्कुल सही गोपी । तू मेरा प्यारा गोपी है । सच कहता हूं जितना तुझसे मुझे लगाव था उतना तो अपने बच्चो से न था। आज मैं अपने जीवन का सार तुझे बताता हूँ, अपना जीवन और अपना शरीर सबसे अच्छा है, इसकी कद्र करो और इसे प्रेम करो । एक समय के बाद मर जाना ही सबसे उपयुक्त तरीका है जीने का। जीवन लंबा है या छोटा इससे फर्क नहीं पड़ता , जीवन को उपयोगी होना चाहिए । पेंटर इसलिये खुश नहीं रहता था, कि वह शारीरिक रूप से स्वस्थ था, बल्कि क्योंकि वह सदा दूसरों की सहायता करने के लिए तत्पर रहता था । वह फकीर होकर भी मुझसे कहीं अमीर था। जब वो मेरे शरीर में था तब भी वह लोगों की सहायता ही कर रहा था । इसी प्रकार भुलिया ने भी अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध कर दी, पर मैं .................. दो दो जीवन जी गया पर दोनों ही व्यर्थ गये, मुझे कभी चैन न मिला । वह जीवन जो किसी के काम न आया, वह आपके भी किसी काम न आया जानों । अच्छा अब चलता हूं.......... गोपी ।" राजा साहब ने गोपी को गले लगाया और गायब होगे।


 गोपी ने सभी सहेलियों से सजल नेत्रों से विदा ली । राजा साहब, भुलिया और गोपी की आत्मा मुक्त होकर अगली योनी के लिए निकल पड़ीं । हवेली को पूर्णतः भूत मुक्त घोषित कर दिया गया और इसे बेच कर सुष्मिता के पिता ने बहुत लाभ कमाया । सभी सहेलियों को इसमें हिस्सा मिला । गोपी कोमल की कहानियों में अमर हो गया । 

तभी गाँव की एक मुर्गी के सेंके एक अंडे से बड़ा भोला सा चूजा बाहर आया और अपनी माँ के पंखों में छिप गया।

अब जरूरी नहीं को वो पेंटर ही हो । 


जय श्री हरी।



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