भूख
भूख
रामू की माँ को यह मालूम होता कि आगे ज़िन्दगी उसे इस मोड़ पर ला खड़ा करेगी तो वह रामू के बाप से हरगिज़ शादी नहीं करती. गरीब घर की वह ज़रूर थी लेकिन इतना उसके माँ-बाप के पास था जिससे तन ढक जाते और भूख मिट जाती थी. लेकिन रामू के बापू से शादी करके उसे क्या मिला...! खुद तो निठल्ला बैठा रहता और पत्नी के खून-पसीने की कमाई को शराब में डूबो देता.
एक बार शराब के नशे में झगड़ा करने के जुर्म में रामू के बापू को पुलिस पकड़कर ले गयी. रामू की माँ ने बचाकर रखे पैसों से उसकी जमानत कराई और किसी तरह छुड़ाकर उसे घर ले आयी. अब तो वह ज्यादा चिंतित थी क्योंकि बचे-खुचे पैसे भी अपने शराबी पति पर खर्च कर चुकी थी, रामू को खिलाती कहाँ से...! पूरा दिन रामू की माँ रामू को पानी पिलाकर ही बहलाती रही लेकिन अगले दिन वह रोटी के लिए रोने लगा. किसी तरह उसकी माँ ने उसे समझाया और जब वह खेलने को चला गया तो रामू की माँ घरों में चौका-बर्तन करने निकल गयी.
शाम को जब वह काम से लौटी तो उसे एक महिला ने टोका, "अरे तू जिंदा है ! तेरा बेटा तो कह रहा था कि मेरे माँ-बाप मर गए हैं, घर में खाने को कुछ भी नहीं है, रोटी दे दीजिए.." यह सुन रामू की माँ क्रोधित हो रामू को खोजने लगी. उसने देखा वह गली के एक कोने में बैठा रोटी खा रहा है. वह तेजी से उसकी तरफ गयी और उसे पीटना शुरू कर दिया. "बोल तूने झूठ क्यों बोला, क्या तू रोटी के लिए माँ-बाप को मार देगा." यह कहते हुए उसने जीभरकर रामू को पीटा. रामू बहुत देर तक रोता रहा फिर सुबकते हुए कहता है, "माँ मैंने ये जानबूझकर नहीं किया. जब मैंने सच बोला तो किसी ने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया और जब झूठ बोला तो लोग रोटी देने को तैयार हो गए. मुझे भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी इसलिए झूठ बोल दिया." इतना सुनकर उसकी माँ उसे गले से लगाकर कहने लगी ,"ठीक किया तूने बेटा, एकदम ठीक किया. जो माँ-बाप अपने बच्चे को एक रोटी तक नहीं दे सकते, उनके लिए तो मर जाना ही अच्छा है."
