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Chandresh Kumar Chhatlani

Classics

4  

Chandresh Kumar Chhatlani

Classics

भेड़िया आया था

भेड़िया आया था

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“भेड़िया आया... भेड़िया आया...” पहाड़ी से स्वर गूंजने लगा। सुनते ही चौपाल पर ताश खेल रहे कुछ लोग हँसने लगे। उनमें से एक अपनी हँसी दबाते हुए बोला, “लो! सूरज सिर पर चढ़ा भी नहीं और आज फिर भेड़िया आ गया।“


दूसरा भी अपनी हँसी पर नियंत्रण कर गंभीर होते हुए बोला, “उस लड़के को शायद पहाड़ी पर डर लगता है, इसलिए हमें बुलाने के लिए अटकलें भिड़ाता है।“

                   

तीसरे ने विचारणीय मुद्रा में कहा, “हो सकता है... दिन ही कितने हुए हैं उसे आये हुए। आया था तब कितना डरा हुआ था। माता-पिता को रास्ते में डाकूओं ने मार दिया, हमने पनाह देकर अपनी बकरियां चराने का काम दे दिया... अनजानी जगह में तो आहट से भी डर लगे... है तो बच्चा ही...”


चौथा बात काट कर कुछ गुस्से में बोला, “बच्चा है, इसका मतलब यह नहीं कि रोज़-रोज़ हमें बुला ले... झुण्ड से बिछड़ा एक ही तो भेड़िया है पहाड़ी पर... उस औंधी खोपड़ी के डरने के कारण रोज़ दस-पांच लोगों को भागना पड़ता है, फायदा क्या उसे भेजने का?”

और वह चिल्लाते हुए बोला, “कोई भेड़िया नहीं आया... पहाड़ी पर कोई नहीं जाएगा...”


वहां से गुजरते हर स्त्री-पुरुष ने वह बात सुन ली और पहाड़ी की तरफ किसी ने मुंह नहीं किया।


“भेड़िया आया...” का स्वर उस वक्त तक गूँज रहा था। कुछ समय पश्चात् उस स्वर की तीव्रता कम होने लगी और बाद में बंद हो गयी।


शाम धुंधलाने लगी, वह लड़का लौट कर नहीं आया। आखिरकार गाँव वालों को चिंता हुई, उनमें से कुछ लोग पहाड़ी पर गये। वहां ना तो बकरियां थीं और ना ही वह लड़का। हाँ! किसी भूखे भेड़िये के रोने की धीमी आवाज़ ज़रूर आ रही थी।


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