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Nisha Chauhaan

Abstract


3.3  

Nisha Chauhaan

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भाई

भाई

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भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है। एक अमूल्य बंधन

सबसे बड़ी बात आप को घर में ही एक दोस्त मिल जाए तो बाहर जाने की जरूरत ही नहीं महसूस होती। में और भानु 13 महीने का अंतर है। तो जुड़वा बच्चो की तरह ही बड़े हुए। मिलकर दिनभर बाड़े में खूब खेत बनाए ,बड़े बड़े घर बनाए ,मेले का पूरा दृश्य दोनों मिल बनाते थे। जब वो स्कूल जाने लगा। मैं एक साल बाद गई आदरणिय खोड़े ताई के बाल मंदिर तांगे में बैठ जब पहले दिन जब स्कूल पहुंची तो खूब हंगामा मचाया मैंंने कि बैठुंगी तो मेरे भाई के साथ ही नहीं तो मेरे घर जा रही हूं मैं तो

बचाओ बचाओ भी चिल्लाई थी !

आखिर थक हार कर मुझे भानु की क्लास में भेजा गया।

मैं एक विजय भाव वाली मुस्कुराहट के साथ जब उसकी क्लास में एक ताई के साथ भेजी गई तो वो बिचारा शरीफ बच्चा इस गुंडी बहन कि हरकते देख शर्म से पानी पानी हो रहा था

फिर तो हम ने एमएससी फाइनल ईयर तक मतलब पूरी पढ़ाई होने तक भाई का पीछा नहीं छोड़ा।

मेरिट लिस्ट में भी हमेशा उसके पीछे पीछे पहुंच ही गए।

मैं हर बार परीक्षा के दिन कुछ घंटो पहले घोषणा कर देती की मुझे तो कुछ याद नहीं मैं सब भूल गई हूं

बिचारा भाई लाड़ली बहन को समझता रहता तुम को सब आता है ये ये रिवाइज कर लो वो टॉपिक पड़ लो। बस। पापा मम्मी ग्लूकोज देते। लस्सी पिलाई जाती लो डरो मत। ऐसे तमाशे फिक्स थे।

भला मेरे भाई को कोई कुछ बोल कर तो देखे।

मैं मदर टाइप थी ना साथ में।

एक सख्त मां के समझदार बच्चो में मैं ऐसी ही थी सिर चड़ी।

मेरे जब कभी अति हो जाने पर tपिटाई होती तो वो रोता की मेरी बहन को माफ कर दो। कोई उसको मत रुलाओ 

पर बहन तो उफ्फ।

एक समझदार संस्कारी बच्चा।

एक्स्ट्रा आर्डिनरी इंटेलिजेंट।

वर्ल्ड हिस्ट्री से लगाकर जनरल नालेज से लगा बॉटनी हो या इंजीनियरिंग से जुड़ी कोई समस्या हमारे इंजीनियर पति भी उनका लोहा मानते है।

एक धिर गंभीर अल्पभाशी व्यक्तित्व।

हमारी बिटिया उनकी प्रतिमूर्ति है। शुक्र है मां जैसी नहीं। पापा के असमय जाने के बाद 17 साल के एक अंतर्मुखी मासूम को अचानक घर का बड़ा बुजुर्ग बना दिया। जब उसे लोगो की मय्यात से लगाकर आए दिन होने वाले शादी ब्याहो में पापा की जगह शामिल हो ड्यूटी बजाते देख मन जार जार रो उठता।

पर उस धीरज के धनी बच्चे ने सारी सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां उतनी ही शांति और समर्पण से निभाई। अपने कैरियर को तिलांजलि दे।

इस सरचड़ी बहन को आज भी अपने लाडले भाई पर बहुत अभिमान है।

भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है। एक अमूल्य बंधन जो शब्द्दी्द्द्दों की सीमााओं से परे हैसबसे बड़ी बात आप को घर में ही एक दोस्त मिल जाए तो बाहर जाने की जरूरत ही नहीं महसूस होती। में और भानु 13 महीने का अंतर है। तो जुड़वा बच्चो की तरह ही बड़े हुए। मिलकर दिनभर बाड़े में खूब खेत बनाए ,बड़े बड़े घर बनाए ,मेले का पूरा दृश्य दोनों मिल बनाते थे। जब वो स्कूल जाने लगा। मैं एक साल बाद गई आदरणिय खोड़े ताई के बाल मंदिर तांगे में बैठ जब पहले दिन जब स्कूल पहुंची तो खूब हंगामा मचाया मैंंने कि बैठुंगी तो मेरे भाई के साथ ही नहीं तो मेरे घर जा रही हूं मैं तोबचाओ बचाओ भी चिल्लाई थी!

आखिर थक हार कर मुझे भानु की क्लास में भेजा गया। मैं एक विजय भाव वाली मुस्कुराहट के साथ जब उसकी क्लास में एक ताई के साथ भेजी गई तो वो बिचारा शरीफ बच्चा इस गुंडी बहन कि हरकते देख शर्म से पानी पानी हो रहा थाफिर तो हम ने एमएससी फाइनल ईयर तक मतलब पूरी पढ़ाई होने तक भाई का पीछा नहीं छोड़ा। मेरिट लिस्ट में भी हमेशा उसके पीछे पीछे पहुंच ही गए। मैं हर बार परीक्षा के दिन कुछ घंटो पहले घोषणा कर देती की मुझे तो कुछ याद नहीं मैं सब भूल गई हूं। बिचारा भाई लाड़ली बहन को समझता रहता तुम को सब आता है ये ये रिवाइज कर लो वो टॉपिक पड़ लो। बस। पापा मम्मी ग्लूकोज देते। लस्सी पिलाई जाती लो डरो मत।

ऐसे तमाशे फिक्स थे। भला मेरे भाई को कोई कुछ बोल कर तो देखे। मैं मदर टाइप थी ना साथ में। एक सख्त मां के समझदार बच्चो में मैं ऐसी ही थी सिर चड़ी। मेरे जब कभी अति हो जाने पर tपिटाई होती तो वो रोता की मेरी बहन को माफ कर दो। कोई उसको मत रुलाओ पर बहन तो उफ्फ। एक समझदार संस्कारी बच्चा। एक्स्ट्रा आर्डिनरी इंटेलिजेंट। वर्ल्ड हिस्ट्री से लगाकर जनरल नालेज से लगा बॉटनी हो या इंजीनियरिंग से जुड़ी कोई समस्या हमारे इंजीनियर पति भी उनका लोहा मानते है। एक धिर गंभीर अल्पभाशी व्यक्तित्व। हमारी बिटिया उनकी प्रतिमूर्ति है। शुक्र है मां जैसी नहीं। [26/07, 9:24 PM] Nisha Chauhan: पापा के असमय जाने के बाद 17 साल के एक अंतर्मुखी मासूम को अचानक घर का बड़ा बुजुर्ग बना दिया। जब उसे लोगो की मय्यात से लगाकर आए दिन होने वाले शादी ब्याहो में पापा की जगह शामिल हो ड्यूटी बजाते देख मन जार जार रो उठता। पर उस धीरज के धनी बच्चे ने सारी सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां उतनी ही शांति और समर्पण से निभाई। अपने कैरियर को तिलांजलि दे। इस सरचढ़ी बहन को आज भी अपने लाडले भाई पर बहुत अभिमान है।


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