बेटे की सफलता
बेटे की सफलता
"अरे, वो निठल्ले, नाकारा कुछ तो काम कर लिया करो कि सारी उम्र भर दूसरों पर आश्रित रहेगा तू.... अपने भाई को देख तुझसे छोटा है फिर भी सारे काम कर लेता है.... जबान है कि नहीं कुछ तो बोल....... " पिताजी आज अजय पर बरस पड़े।
अजय कुछ न बोला और मायुस- सा होकर वहीं बैठा रहा।
पिताजी उसकी ओर देखकर ज्यादा चिढ़ गए और वहाँ से निकलकर जोर से चिल्लाते हुए अपनी बिवी से बोलने लगे, क्या होगा इस नालायक बेटे का किसी काम का नहीं.... इससे अच्छा तो एक बेटी को गोद ले लेते और इसे छोड़ आते किसी मंदिर में या फेंक देते समंदर में.... शायद धरती पर से बोझ कम हो जाता।
अपने बेटे के बारे में अनिष्ट कहते समय आपकी जुबान लड़खड़ाई कैसे नहीं.... आपको उससे प्रेम नहीं तो अपशब्द तो कहिए मत जैसा भी है आखिर आप ही का खून.... अजय की माँ उसका पक्ष लेकर बोली।
हा, हा ,है तो हमारा लाडला, मैं कहे देता हूँ अगर ये खुद को बदल न पाया तो मुझसे बूरा कोई नहीं....
तुम देखना एक दिन यही नाकारा बेटा तुम्हारा नाम रोशन करेगा....
देखो जरा उसकी तरफ कैसे उल्लू की तरह खिड़की के बाहर झाॅंक रहा है.... उल्लू का पठ्ठा....
बस मैं अब उसके खिलाफ कुछ सुन नहीं सकती.... बोलते वक्त गुस्से से लाल - पिली हो गयी।
वह काम के लिए अपने ऑफिस चला गया। अजय अभी भी खिड़की के बाहर एकटक निहार रहा था।
वह हमेशा अपने में ही खोया रहता था, ना कोई दोस्त और ना ही किसी से बातचीत करना.... एकदम अकेला- सा हो गया था वो.... यही वजह थी कि उसके पापा बात- बात पर उसपर चिल्लाने लगते.... इसी बात से हमेशा उसकी माँ चिंतित रहती.... वह तो चाहती है कि उसके सारे दुःख मिटा दे किंतु हो नहीं पाता।
करीब सुबह के दस बजे अजय के चाचाजी उनके घर आए। अचानक आए देवर जी को देख अजय की माँ उन्हें देख आश्चर्यचकित हो गई।
अजय की माँ ने उनको पानी देते हुए पूछा, क्यों देवर जी आज अचानक कैसे आ गए?
क्यों?नहीं आ सकता बिना बुलाए.... मज़ाकिया अंदाज में कहने लगे....
आइये ना आप ही का घर है....
अजय कहीं दिख नही रहा है और छोटे साहबजादे तो कभी घर में मिलते ही नहीं, ठीक कहाँ न भाभीजी....
वह अपने दोस्त के पास गया है, अजय तो यही है अपने कमरे में....
अजय के कमरे का दरवाजा खुला था तो आवाज देते हुए अंदर गए, उस समय अजय कुछ कागज पर लिख रहा था....
क्या अजय कुछ काम में हो क्या? मैं बाद में आता हूँ....
नहीं चाचाजी, बस खाली बैठा था तो पन्नों पर लिख रहा था....
देखूँ तो जरा क्या लिखा है तुमने....
बोलते हुए कागज़ पर नज़रें फेरी और उसे पढ़ने लगे, पढ़ते ही वे आश्चर्यचकित हो गए....
बेटे, तुम तो बड़े छुपे रुस्तम निकले कितना अच्छा लिख लेते हो तुम कभी बताया नहीं तुमने....
इस तरह कागज भरकर तो रोटी नहीं कमा सकते न हम, कुछ काम तो आता नहीं सिवाय इसके....
कौन कहता है कि तू कुछ काम का नहीं, तु तो एक बहुत बड़ा आदमी बनेगा देख लेना....
झूठी आशाऍं दिखाकर मुझे बहलाने की कोशिश ना करो चाचा....
बेटा तू खुद के बारे में ऐसा क्यों सोचता है आगे और लड़ना है तुझे.... तुझे किताबें पढने में दिलचस्पी है तो किताबें पढ़ उससे तुम्हें सुकून भी मिलेगा और शायद तुम अच्छा लिख सकते हो....
क्या ऐसा हो सकता है, मुझे तो नहीं लगता....
तुम ज्यादा मत सोचा करो, तुम्हारे साथ हम है ना....
शायद पिताजी मुझे समझ सकते, वे तो मुझे निठल्ले और कम अकल समझते है....
अपने पिता के बारे में ऐसा मत सोच, तेरे पिता को में अच्छी तरह जानता हूँ....
अच्छा भाभीजी, अब मैं चलता हूँ..... घर से निकलते हुए अपनी भाभी से कहने लगा।
देवर जी, खाना खा कर जाते अब समय भी हो चला है....
नहीं भाभीजी मुझे अब देर हो रही है फिर कभी.... कहते हुए वह निकल पड़ा अपने काम के लिए।
चाचाजी की बात सुनकर वह बहुत उत्तेजित हो गया, अब उसे किताबों और कल्पना के सिवा कुछ नजर नहीं आता.... किताबों को उसने अपनी दुनिया बना दी थी....
चाचाजी की बातें उसके लिए प्रेरणास्रोत थी, उन्हीं कारणों से वह खुश हो गया।
अजय बेटे कैसे हो.... चाचाजी की आवाज सुन वह दौड़ा- दौड़ा उनके पास चला आया।
ये देखो ना चाचा, अब तक कितना संग्रह हो चुका है, मैंने पापा को भी दिखाया लेकिन वह कुछ बोले नहीं....
कोई बात नहीं, अब आगे क्या करने का इरादा है....
मैं तो सोचता हूँ मैं इसे अपने दोस्त को दे दूॅं, वह फिल्म निर्माताओं के साथ कार्य करता है....
तो देर किस बात की घूमा उसका नम्बर....
मुझे डर लगता है कहीं कुछ गलत ना हो जाए....
तुम क्यों चिंता करते हो इस बात की, तूने अपना कार्य पूरा किया बाकी भगवान है ना वे सबकुछ देख लेंगे....
कुछ दिनों बाद अजय ने अपने दोस्त को अपनी एक कहानी दिखाई उसे बहुत अच्छी लगी।
दो - तीन महीने गुजर चुके तभी भी कोई खबर मिली नहीं, कारणवश अजय और नाराज हो गया।
अजय, ये क्या चल रहा है तुम्हारा ,धैर्य खोकर जीवन जीना आसान नहीं है आजकल की दुनिया में.... पिताजी प्यार से समझाने लगे।
मैं करूँ तो क्या पिताजी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है.... अजय रोते हुए कहने लगा।
मेरी बात मानेगा, तु शहर जाकर कोई अच्छा काम ढूँढ ले....
मगर पापा मैं तो....
अगर- मगर कुछ नहीं तू अब शहर जाएगा ये मेरा फैसला है....
अजय कुछ न बोला और निकल पड़ा पिताजी के आदेश पर शहर की ओर....
शाम को खबर मिली की अजय की रेल दुर्घटना में मौत हो गई, खबर सुनते ही परिवारवालों के पैरों तले जमीन खिसक गयी....
अजय की माँ अपने पति को दोष देते हुए कहने लगी, आप ही के कारण हमारे लाल की मौत हुई, आप ही चाहते थे ना उससे छुटकारा हो गई आप की मन की इच्छा पूरी.... क्रोध के कारण अपने हाथों से स्वयं के सिर पर हाथ मार रही थी....
पागल मत बनो नियति थी उसकी, उसका साथ यही तक था, वही हुआ जो होने वाला था.... अजय के पिता अपनी पत्नी को धीरज देते हुए समझाने लगे।
नहीं आप ही मेरे बेटे के हत्यारे हो.... क्या होता अगर वो शहर न जाता कम से कम वह जीवित तो रहता.... क्रोध के आवेश वह बड़बड़ाने लगी....
भाभी, किसी को दोष देकर जो हुआ वह तो बदला नहीं जा सकता न.... आखिर भैया भी तो उसका भला ही तो चाहते थे.... आप शांत हो जाइए.... देवर जी अपने भाभी को समझाने लगे।
कुछ समय पश्चात दरवाजे की घंटी बजी।
हा, कौन आप? किससे मिलना चाहते हो?.... अनजान व्यक्ति को सवाल किया।
क्या ये अजय माकन का घर है.... अनजान व्यक्ति ने सवाल पूछा।
जी हाँ, मैं उसका पिता.... कहिए आपको उससे क्या काम....
आप उन्हें ही बुलाए उनसे मानधन की बात करनी थी....
किस बात का.... मैं कुछ समझा नहीं....
आप उन्हें तो बुलाए सर....
मि.माकन( अजय के पिताजी)ने दीवार की तरफ इशारा किया.... उस ओर देखकर वह चौंक गया....
मुझे माफ कर दिजीए सर.... मैं इस बात से अनभिज्ञ हूँ.... किंतु ये सब कैसे हुआ....
अजय की मौत एक रेल हादसे में हो गई, कुछ आठ- दस हफ्ते पहले की बात है.... कहते- कहते उनकी नेत्रों से ऑंसू छलकने लगे।
संभल जाओ सर आप.... धीरज देते हुए कहने लगा|
मि.माकन अपने आपको संभालते हुए कहने लगे, आप क्या बात कर रहे थे सर....
मैं तो आपके बेटे से उसकी लिखी गई कहानी के मानधन के सिलसिले में बात करने आया था, खैर अब आपसे ही बातचीत कर लेता हूँ....
क्या सच में उसकी कहानी आपको पसंद आयी है....
पसंद मुझे ही नहीं बल्कि पूरे देश में सराही जा रही है.... इसी उपलब्धि के कारण अब उस कहानी पर एक फिल्म बनाने का फैसला लिया गया है और उसी सिलसिले में मैं यहाँ आया हूँ....
क्या सच में मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा है....
हाँ सर ,आपकी खुशी एकदम जायज है....
ओ.. सुनती हो भागवान, हमारे लल्ला ने कितनी बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है.... अपनी पत्नी के तरफ देखकर कहने लगा....
मैं नहीं कहती थी हमारा बेटा एक दिन अपना नाम जरूर रोशन करेगा....आप ही उसे पैदल और नाकारा समझते थे.... काश! मेरा पुत्र अभी मेरे साथ होता....
वह दोनों अपने बेटे की उपलब्धि के आनंद में तल्लीन हो गए.... वह झूमने लगे।
