बेघर परिंदे
बेघर परिंदे
शीर्षक: विनाश की अदृश्य तरंगें रात का सन्नाटा गहरा था, लेकिन यह वह शांति नहीं थी जो सुकून देती है। यह एक ऐसी खामोशी थी जो आने वाले तूफान का संकेत दे रही थी। आर्यन अपने महल की बालकनी में खड़ा था। उसकी रूह आज बहुत बेचैन थी। उसके कानों में अब परिंदों की वह चहचहाहट नहीं गूँजती थी जो कभी उसके दिन की शुरुआत करती थी। रिया उसके करीब आई, उसकी आँखों में भी एक अनजाना डर था। उसने पूछा, "आर्यन, आजकल ये हवाएँ इतनी ज़हरीली और भारी क्यों महसूस होती हैं? न आसमान में वो कौवे दिखते हैं, न ही वो छोटी लाली (मैना) जो खिड़की पर आकर बैठती थी। सब कहाँ खो गए?" आर्यन ने हाथ बढ़ाकर दूर क्षितिज पर खड़े उन ऊँचे मोबाइल टावरों की ओर इशारा किया, जिनकी लाल बत्तियाँ अंधेरे में किसी शिकारी की आँखों की तरह चमक रही थीं। आर्यन की आवाज़ में एक भारीपन था, "रिया, वो टावर देख रही हो? इंसान ने अपनी 'सुविधा' के लिए इन परिंदों की 'सांसें' दांव पर लगा दी हैं। उनसे निकलने वाली ये अदृश्य तरंगें इन बेज़ुबान पक्षियों के नन्हे दिलों को छलनी कर रही हैं। उन्हें रास्ता नहीं मिलता, उन्हें दिशा नहीं मिलती। वे उड़ते-उड़ते गिर रहे हैं और हम समझ रहे हैं कि हम तरक्की कर रहे हैं।" अचानक, मौसम ने करवट ली। तेज़ धूल भरी आँधी चलने लगी और आसमान से आग के गोले की तरह बिजली कड़कने लगी। मौसम का मिज़ाज ऐसा था जैसे वह सब कुछ तबाह कर देगा। रिया सहम कर बोली, "आर्यन, ये अचानक कैसा पागलपन है कुदरत का? कभी इतनी गर्मी कि दम घुटे, और कभी ऐसी बाढ़ कि सब बह जाए!" आर्यन ने मलबे और ईंटों से भरे उस रास्ते की ओर देखा जहाँ पहले घने पेड़ हुआ करते थे। वह बोला, "रिया, इंसान जैसा बन गया है, कुदरत ने भी वैसा ही रूप धर लिया है। हमने पेड़ों को काटकर कमरे खड़े किए, तो अब कुदरत हमें छत नसीब नहीं होने दे रही। हमने नदियों का रास्ता रोका, तो अब पानी हमारे दरवाज़ों पर हिसाब माँगने आ रहा है। ये तूफान और ये बाढ़, कुदरत का बदला नहीं है, यह उसका 'आईना' है। वह हमें दिखा रही है कि तुमने मेरा संतुलन बिगाड़ा है, अब अपनी बर्बादी का मंज़र देखो।" आर्यन ने एक गहरी सांस ली और कहा, "रिया, याद रखना... कुदरत हमें सज़ा नहीं दे रही, वह तो बस अपना खोया हुआ हिस्सा वापस माँग रही है। अगर हमने आज इन बेज़ुबान पक्षियों और पेड़ों की चीख नहीं सुनी, तो कल हमारी चीख सुनने वाला भी कोई नहीं बचेगा। हमने कंक्रीट के जंगल तो बना लिए, पर असली जंगल को हम खोते जा रहे हैं।" शिक्षा (Moral): "सच्ची तरक्की ऊँची दीवारों में नहीं, बल्कि उन पेड़ों की छाँव में है जो हमें साँसें देते हैं। यदि हम प्रकृति का संतुलन बिगाड़ेंगे, तो प्रकृति हमारा अस्तित्व मिटा देगी। आज एक पेड़ लगाओ, ताकि कल कोई परिंदा बेघर न हो।" लेखक की कलम से: मेरे प्यारे पाठकों, यह कहानी सिर्फ़ एक कल्पना नहीं, बल्कि आज की कड़वी सच्चाई है। हम अपनी सुख-सुविधाओं के पीछे इतने अंधे हो गए हैं कि हमने अपने आस-पास के उन मासूम परिंदों और पेड़ों की अहमियत भुला दी है। उम्मीद है कि आर्यन और रिया की ये बातें आपके दिल तक पहुँचेंगी। अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर साझा करें और कुदरत को बचाने में अपना छोटा सा योगदान दें। आपका अपना—सुखविंदर।
