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sukhwinder Singh

Inspirational

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sukhwinder Singh

Inspirational

शीर्षक: डिग्री का कब्रिस्तान

शीर्षक: डिग्री का कब्रिस्तान

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कमरे की खामोशी में घड़ी की 'टिक-टिक' किसी हथौड़े की तरह आर्यन के कानों में बज रही थी। मेज पर धूल से सनी फाइलों का अंबार लगा था और उनके बीच में रखी थी आर्यन की इंजीनियरिंग की वो गोल्ड मेडलिस्ट डिग्री। सफेद कागज़ का वो टुकड़ा, जिसके लिए उसने अपनी उम्र की सबसे हसीन दों दहकती गर्मियों और कड़कड़ाती सर्दियाँ किताबों के बीच दफ़न कर दी थीं। आज उसी कागज़ को हाथ में लेते ही आर्यन के हाथ कांप रहे थे। उसे याद आया कि कैसे उसने a^2 + b^2 के फॉर्मूले रटते-रटते अपनी माँ के हाथ की बनी चूरी का स्वाद भुला दिया था। उसे यह तो याद था कि आसमान नीला क्यों होता है, पर उसे यह महसूस नहीं हो रहा था कि आख़िरी बार उसने उस नीले आसमान को सुकून से कब देखा था। ​तभी दरवाजे की चौखट पर रिया आकर खड़ी हुई। रिया, जिसके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, लेकिन जिसकी आँखों में पूरी कायनात का सुकून था। उसने आर्यन की आँखों में छपे उस खालीपन को देखा और धीरे से कहा, "आर्यन, इन कागज़ों की चमक में तुमने अपनी आँखों की रोशनी खो दी है। तुम इतने पढ़ गए कि अब तुम्हें ये भी नहीं पता कि बाहर बारिश की पहली बूँद गिरने पर मिट्टी कैसी महकती है।" आर्यन की रुआँसी आवाज़ निकली, "रिया, दुनिया कहती है मैं कामयाब हूँ, पर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं एक ऐसे कब्रिस्तान में खड़ा हूँ जहाँ मेरी मासूमियत, मेरा बचपन और मेरी खुशियाँ दफन हैं। ये डिग्रियां मुझे ऊँची कुर्सी तो दे सकती हैं, पर वो सुकून नहीं दे सकतीं जो बचपन में कागज़ की कश्ती चलाने में मिलता था।" ​आर्यन ने अपनी सारी मार्कशीट्स को एक तरफ झटक दिया। उसे अहसास हुआ कि उसने 'बड़ा आदमी' बनने की चाह में उस 'छोटे बच्चे' का गला घोंट दिया जो कभी तितलियों के पीछे भागता था। उसने महसूस किया कि असली शिक्षा वो नहीं जो दिमाग भर दे, बल्कि वो है जो दिल को जिंदा रखे। उस रात, गोल्ड मेडल की चमक के पीछे एक इंसान अपनी हार पर सिसक रहा था, क्योंकि वह पढ़ा-लिखा तो बहुत था, पर अब उसे 'इंसान' होना दोबारा सीखना था।


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