असली न्याय
असली न्याय
बहुत समय पहले की बात है सुंदरगढ़ का राजा अपने न्याय प्रियता और धर्म-कर्म के लिए बहुत प्रसिद्ध था। एक दिन वह शिकार खेलते खेलते रात्रि के समय जंगल में राह भटक गया। भूख प्यास से बेचैन राजा जंगल में इधर-उधर घूम रहा था, तभी उसे एक आदिवासी दिखाई दिया। राजा ने उससे राह दिखाने का आग्रह किया। आदिवासी बोला "भाई ....थके हारे लग रहे हो पहले कुछ जलपान और आराम कर लो, सुबह चले जाना।"
राजा सचमुच थका हुआ और भूखा था । इसलिए उसने आदिवासी का निवेदन स्वीकार कर लिया । आदिवासी उसे अपनी कुटिया में लेकर पहुंचा और उसके लिए अपने भोजन से दो रोटियां और गुड खाने को दिया। राजा को भला यह सब खाने की कहां आदत थी , लेकिन मरता क्या न करता। वह खाना खा ही रहा था कि उसने देखा एक कुत्ता उधर बैठा उसकी ओर देख रहा है। राजा ने अपने भोजन से आधी रोटी और गुड़ उसको भी खिला दिया और स्वयं आराम करने लगा । सुबह सूरज निकलने से पहले ही वह आदिवासी राजा को उसके राज्य की सीमा पर छोड़ आया। राजा ने कहा लगता है "तुम्हारे कष्ट दूर करने के लिए मुझे ईश्वर ने ही राह भटकाई थी । मित्र तुम चिंता ना करो... तुम्हारे एहसान का बदला तो न चुका सकूंगा किंतु तुम्हारी मदद जरूर करूंगा । " यह कहकर राजा वहां से अपने राज्य को लौट आया।
अगले ही दिन उसने बहुत सा धन उस आदिवासी को भिजवा कर अपना वचन निभाया ।
कुछ समय बाद राजा का अचानक देहांत हो गया। सारी प्रजा फूट-फूट कर रोने लगी। जब देवदूत राजा की आत्मा को लेकर स्वर्ग पहुंचे तो वहां राजा के लिए सारी सुविधाएं प्रदान की गई । कुछ समय बीतने पर जब राजा को भूख लगी तो उन्होंने भोजन के लिए आग्रह किया । राजा को आधी रोटी और थोड़ा गुड़ खाने को दिया गया ।राजा बोला प्रभु ......"मेरे भोगों का तो पूरा ख्याल है और भोजन केवल आधी रोटी और गुड़ ?"
प्रभु ने कहा वत्स...... तुम तो न्यायप्रिय और दानवीर रहे हो । जरा सोचो....... तुमने लोगों को दान देने में कभी कमी नहीं रखी। सोना , चांदी धन , दौलत सभी दान किया किंतु भोजन ? भोजन तो तुमने अपने हिस्से से आधी रोटी केवल उस कुत्ते को ही दी ना । तो तुम्हें और अधिक कैसे मिल सकता है। जो तुम पृथ्वी लोक पर कर्म करते हो वही तो परलोक में भोग के रूप में प्राप्त होते हैं। राजा समझ गया कि धन दौलत का दान ही सब कुछ नहीं है बल्कि भूखे को भोजन कराना ही सबसे बड़ा दान है।।
