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SHWETA GUPTA

Tragedy


3.9  

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Tragedy


अश्रुपूरित मुस्कान

अश्रुपूरित मुस्कान

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खिड़की पर से पर्दा हटते ही सुबह-सुबह की गुनगुनानी धूप के साथ 'पराग' के चेहरे पर किरणें अठखेलियाँ करने लगीं। उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर मोड़ लिया पर कमरे में छाई हुई रोशनी ने जैसे उसे उठाने का प्रण ही कर लिया था। उसने चादर से चेहरा ऐसे ढक लिया मानो नई नवेली दुल्हन ने लाज का घूँघट ओढ़ लिया हो। 'मधु' सही ही तो कहती थी, "पराग को डिगा पाने का साहस तो स्वयं सूर्यदेव में भी नहीं था।" 'मुसु' ने भी 'पराग' की ही तरह चादर से मुँह ढक लिया था।

आज जंग पर जा रही थी मधु। पता नहीं कब लौटेगी। उसकी दाईं आँख फड़क रही थी। रह- रहकर मन में डर समा रहा था कि घर वापसी होगी के या नहीं। शायद इसलिए जाने से पहले मधु दोनों को नज़र भर कर देखना चाहती थी। पर दोनों को तो नींद से असीम प्यार था। "मैं जा रहीं हूँ," मधु ने कहा पर पराग ने उठना जरूरी नहीं समझा। बैग उठाकर मधु ने बाहर रखा, फिर ताला लगाया। उसे पंद्रह मिनट में बाहर बस - स्टाप तक पहुँचना था। उसके कर्तव्य रूपी जंग के मैदान में ले जाने वाली बस वहीं आनी थी। बस में चढ़ कर मधु ने सबको अभिवादन किया और निर्धारित सीट पर बैठ गई। खिड़की खुली हुई थी, मंद मंद चलती हवा मधु के बंधे बालों को भी स्वछन्द करने को आतुर थी। खाली सड़कों पर बस भी मानो उड़ान भर रही थी। अशोक होटल के मुख्य द्वार पर यह उड़ान समाप्त हुई। यही उसका गंतव्य था पर यहाँ पहुँचना सभी यात्रियों का मंतव्य नहीं था। उन्हें तो अपना सामान कमरे में रख कर ठीक दस मिनट में वापस बस में बैठना था और जाना था लोकनायक अस्पताल में अनदेखे शत्रु से जंग लड़ने, वहाँ के कोविड 19 संक्रमित मरीज़ों की सेवा करने। 

'सेवा परमोधर्म:' इसी उक्ति की जीती जागती मिसाल थी मधु और उसके सभी सहकर्मी। सुबह से शाम कब हो गई पता ही नहीं चला था। दिन भर जिसे तीन साल की मुसु की याद भी नहीं आई, होटल जाकर उसे उसकी की याद सताने लगी थी। वह सोचने लगी अगर घर गई होती तो मुसु को गोद में उठाते ही उसकी सारी थकान काफूर हो गई होती। उसने तुरंत विडियो काल करने का विचार किया, परंतु पराग की कही हुई बात को याद कर उसने अपना हाथ पीछे कर लिया। सही ही तो कहा था पराग ने, "जब तक तुम इसे नहीं दिखतीं मुस्कान (पराग सदा मुसु को मुस्कान ही कहते थे। वे कहते उनके जीवन में मुस्कान इसी के कारण तो है।) मेरे साथ खेलती रहती है और तुम्हारे आते ही यह मुझे भूल जाती है।" कितनी बदल गई थी मधु और पराग की ज़िंदगी मुसु के जन्म के बाद। पराग क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत था इसलिए वह अधिकतर 'वर्क फ्राम होम' करता था। मधु सरकारी अस्पताल में नर्स थी इसलिए वह बाहर जाती थी। फोन में मुसु के फोटो और विडियो देख कर ही मधु अपनी ममता को समझा रही थी। खाना खाने का मन नहीं था पर किसी तरह अपने मन को समझा कर मधु ने खाना खाया। तेरह दिन इसी तरह सेवा करने के बाद मधु सोच रही थी कि बस अब दो दिन की ही तो बात है, फिर वह अपनी मुसु से मिल पाएगी। अगले दिन मधु से उठा नहीं गया, उसे हल्का बुखार था। वह जानती थी कि यह लक्षण ठीक नहीं हैं। उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती किया गया। उसकी कोविड जाँच की गई। पराग को फोन कर उसके बीमार होने की सूचना दी गई। रात को न जाने कैसे उसे बस एक दर्द सा महसूस हुआ और... ठीक पंद्रह दिन बाद वह अनजान शत्रु से इस जंग में वीरगति को प्राप्त हुई। मुसु, नहीं मुस्कान आज भी अश्रुपूरित आँखों से माँ का रास्ता देख रही है।


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