SHWETA GUPTA

Drama Others


5.0  

SHWETA GUPTA

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वह ..रिक्शावाला

वह ..रिक्शावाला

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1. अब अभाव नहीं

मेरा परिवार, लंबा-चौड़ा नहीं है। हम दो ही सदस्य हैं - मैं और मेरी माँ। पिताजी नहीं थे मेरे। पिताजी की मृत्यु के उपरांत माँ को उनकी जगह नौकरी मिल गई थी।

कुछ लोगों को उनकी सरकारी नौकरी से ईर्ष्या होती, तो कोई उन्हें खुश- नसीब कहता। दो साल पहले माँ सेवा- निवृत्त हुईं थीं। एक सरकारी दफ्तर में झाडू लगाने का काम करतीं थीं वे। मेरा बचपन एक कमरे के सरकारी क्वाटर में अभावों में बीता था। जैसे ही माँ को सेवा- निवृत्ति के उपरांत पैसा मिला, मैं नित नए सपने देखने लगा।


हमने दो कमरों का फ्लैट लिया। 'नया सोफ़ा, नया टी. वी., नया पलंग' इन सबसे हमने अपने नए घर को सजाया। मैंने ज़िद करके एक बाइक और एक नया मोबाइल फोन भी लिया। कुछ नए कपड़े भी खरीद लिए। माँ को समझाया कि नौकरी के साक्षात्कार के लिए जाऊँगा तो अच्छा प्रभाव पड़ेगा। माँ ने बहुत समझाने की कोशिश की पर इकलौते बेटे की ज़िद के आगे हार गईं।


मैं हर रोज़ बाइक पर नौकरी ढूँढने के बहाने निकल पड़ता। कुछ समय दोस्तों के साथ बिताता, शाम को थका सा मुँह बना वापस आ जाता। शाम को चाय के साथ कभी समोसे तो कभी पकौड़े की माँग करता। माँ कुछ कहती तो बस इतना कहता, "कुछ दिन और पेंशन से खर्चा चला ले माँ, नौकरी लगते ही तुझे रानी बना कर रखूँगा। माँ वैसे तो बहुत समझदार थी, पर हर बार मेरी बातों में आ ही जाती थी।


2. पहली मुलाकात

आज के दिन की शुरूआत ही अजीब ढंग से हुई थी। माँ ने सिर पर हाथ फेरकर उठाया नहीं था।

जब उठा तो देखा माँ सोई हुई थी। चेहरा दूर से ही लाल लग रहा था, पास गया तो देखा बुखार था। "परेशान मत होना माँ, मैं बाहर ही कुछ खा लूँगा", यह कह मैं तैयार होने चला गया।

तैयार होते हुए शीशे में खुद को देख में इतरा रहा था। दादी की बात याद आ गई, "बिलकुल राजकुमार लगता है मेरा पोता। किसी की नज़र न लगे।" यह कहकर मेरी बलाएँ लिया करतीं थीं।

माँ दफ्तर जातीं थीं इसलिए दादी के साथ ही मेरा बचपन बीता था। अनपढ़ थीं इसलिए यह नहीं देख पातीं थीं के मैं क्या पढ़ रहा हूँ, पर हर रोज़ पढ़ने ज़रूर बैठा देतीं थीं। उनके स्वर्गवास के बाद, मैं आज़ाद परिंदा बन गया था।

जल्दी- जल्दी तैयार हो मैंने माँ के पर्स से पाँच सौ का नोट निकाला, बाइक की चाबी उठाई और चल दिया।


'ओह!' बाइक को भी आज ही पंक्चर होना था! अभी तो कोई पंक्चर लगाने वाले की दुकान भी नहीं खुली होगी। चलो कोई बात नहीं शाम को लगवा लूँगा। आज कहीं पास का ही प्रोग्राम बनाता हूँ। यह सोच घर से निकल गया।

'बाबूजी, बाबूजी पीछे से आवाज़ आई।" मैंने मुड़ कर देखा तो एक रिक्शा चला आ रहा था। पास पहुँच कर उसने रिक्शा रोक दी। "बाबूजी आज पैदल ही जा रहें हैं। कहीं पास ही जाना है तो आइए मैं रिक्शा से छोड़ दूँ।" "पैसे कितने लोगे?" मैंने पूछा। "बाबूजी आप से थोड़े ही भाव करूँगा। जो ठीक लगे दे देना। नहीं भी दोगे तो कोई बात नहीं, आप माँजी के बेटे हो, आपके लिए इतना तो कर ही सकता हूँ। आपकी बाइक को क्या हुआ? पंक्चर हो गई क्या?" वह बोलता ही जा रहा था। मैंने जवाब देना जरूरी नहीं समझा।


बस स्टैंड पर रिक्शा से उतरकर मैंने पाँच सौ का नोट पकड़ाया तो वह बोला, "बाबूजी क्यों ग़रीब का मज़ाक उड़ा रहे हो?" यह कहकर वह अपनी रिक्शा की घंटी बजाता हुआ आगे बढ़ गया।


3. बातूनी

शाम को बस स्टैंड पर वही रिक्शावाला मिल गया। कहने लगा, "मुझे पता है आप रोज़ इसी समय आते हैं। आपका ही इंतजार कर रहा था।"

"बाबूजी आपको छोड़कर, मैं सीधा मिस्री को लेकर आपके घर गया था, कील घुस गयी थी टायर में। पंक्चर लगवा दिया। माफ़ करना बाबूजी मेरे पास पचास रुपये नहीं थे इसलिए माँजी से लेकर देने पड़े। कोई माँ से भला पैसे लेता है! गरीब हूँ बाबूजी, पर माँ क्या होती है यह मैं भी समझता हूँ!"

"अरे हाँ, एक बात तो बताना भूल ही गया कि माँजी को तेज़ बुखार था। केमिस्ट से दवाई लाकर दे दी थी। सोचा था दोपहर को जाकर फिर से हाल पूछ लूँगा पर दूर की सवारी मिल गई थी इसलिए जा न सका।"


"कितना बोलता है यह! चुप होने का नाम ही लेता।" मेरे इतना सोचते ही वह फिर शुरू हो गया।

"अरे! बाबूजी आपको एक और बात भी बताना भूल गया। आज आप बैठे तो मेरी रिक्शा के भाग्य ही खुल गए। आज ही मुझे बच्चों को रोज़ स्कूल छोड़ने का काम मिल गया। पूरे दो हज़ार मिले, वो भी एडवांस। मैंने डेढ़ हज़ार गाँव में माई को भेज दिए। यह महीना आराम से कट जाएगा। इसलिए ही तो माई को अकेला छोड़ दिल्ली आया था।"

"वह सोचती है के उसका बेटा नौकरी करता है। उनको नहीं पता के मैं रिक्शा चलाता हूँ। माई का यह भ्रम बना रहने दिया है मैंने। बेचारी इसी आस में तो सालों से जी रही थी।"


"ओह! इस सड़क पर आज फिर ट्रैफिक जाम! बाबूजी क्या करूँ? यहाँ रुकूँ या दूसरे रास्ते से ले चलूँ।"

जवाब के इंतजार के बिना ही उसने रिक्शा मोड़ लिया। जब अपने मन की ही करनी थी तो पूछा ही क्यों था!


4. क्या ठग है वह?

"कहाँ से हो?" यकायक मेरे मुँह से निकल गया।

"बाबूजी मधुबनी, बिहार से। नाम तो आपने सुना ही होगा! अरे क्यों नहीं सुना होगा! पूरे संसार में मशहूर है हमारे 'मधुबनी' का नाम। वहाँ की चित्रकारी सभी जानते हैं। सीता मैया भी यही चित्रकारी करतीं थीं। मेरी माई भी कर लेतीं हैं। हमारे झोपड़ी के बाहर की दीवार पर की हुई है। मेरे पास आपके जैसे फोटो लेने वाला फोन नहीं है, अगर होता तो फोटो दिखाता। माई की फोटो भी दिल में बसी हुई है। सोचता हूँ अगली बार गाँव जाऊँगा तो उनकी फोटो बनवा कर ले आऊँगा। याद आने पर कम से कम देख सकूँगा।"


इतने में घर आ गया। मैं पैसे देने लगा तो कहने लगा, "आप तो मेरे राम जी हैं, इस केवट की नैया पार लगाने आए थे। चलता हूँ बाबूजी एक- आध चक्कर और लगा लूँ, रिक्शा का किराया भी देना है। वरना मालिक कल रिक्शा नहीं देगा।"

"और हाँ बाबूजी माँजी को मेरी ओर से प्रणाम कहना।"


मैं उसे समझ ही नहीं पा रहा था। घर पहुँचकर देखा माँ की तबियत ठीक थी।

"मैं जानती हूँ तुझे साक्षात्कार के लिए देर हो रही थी इसलिए नंदू को बोल कर गया था। सच में ईश्वर की बहुत कृपा है मुझपर जो मुझ अभागन को तुझ सा समझदार बेटा दिया।"

"नंदू भी कुछ दिनों में अपना सा लगने लगा है। अगर पैदल चलते देखता है तो फटाफट अपनी रिक्शा में बैठा लेता है, पैसे भी नहीं लेता। हमेशा कहता है, माँ से भला कोई पैसे लेता है। बड़ा ही अपनापन है उसकी बातों में।"


"माँ संभल कर रहना मुझे तो यह कोई ठग लगता है," मैंने बस इतना ही कहा।


5. दाल- रोटी

अगले चक्कर में दूर की सवारी मिली। यह सोचकर कि आज का किराया निकल जाएगा नंदू ने हाँ कर दी। लौटते हुए ढाबे से दाल- रोटी भी खा ली। पेट भर गया था, पर माई के हाथ की चूल्हे पर सिकी बाजरे की रोटी की बात ही कुछ और थी। उस जैसा स्वाद उसे दिल्ली में एक ही बार नसीब हुआ था, जिस दिन माँजी ने उसे दोपहर की बची हुई दो बासी रोटी दीं थीं।


दस बज गए थे। आज फिर माई की बहुत याद आ रही थी।

नंदू ने अपनी चादर निकालकर दुकान के चबूतरे पर बिछाई। दुकान का मालिक भला आदमी था। रात बिताने का नंदू से किराया नहीं लेता था। मुफ्त में चौकीदारी जो हो रही थी उसकी दुकान की। भोला नंदू कहाँ समझ पा रहा था इन बातों को!


सोना जरूरी था, अगले दिन बच्चों को स्कूल छोड़ना था।

अगले दिन बच्चों को छोड़कर जब लौट रहा था, माँजी बाहर ही खड़ी सब्जी ले रहीं थीं। न जाने नंदू को देखा तो उससे पूछ लिया, "क्यों रे, कौन सी सब्जी पसंद है तुझे? दोपहर खाने पर घर आ जाना, इधर- उधर मत निकल जाना।"

माँजी के चरणों में शीश नवा वह आगे बढ़ गया। रोज़ी रोटी के लिए काम भी जरूरी था।


6. जन्म

नंदू आखिर कौन था? यह जानने के लिए लगभग पच्चीस साल पीछे चलते हैं।

मधुबनी, बिहार के बेनीपट्टी मंडल के एक गाँव में एक लड़के का जन्म हुआ। (कालिदास को विद्वान बनाने वाली माता उच्चैठ वासिनी का मंदिर वहाँ से पाँच किलोमीटर के दूरी पर है। कहा जाए तो महाकवि विद्यापति डीह और माता उच्चैठ भगवती आशीर्वाद प्राप्त कालिदास के डीह में मध्य में बेनीपट्टी है। सड़क मार्ग से बेनीपट्टी से पटना एवं नेपाल के सीमावर्ती शहरों में जाना संभव है। यहाँ रेलवे स्टेशन नहीं है। सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन मधुबनी है जो बेनीपट्टी से लगभग पच्चीस किलो- मीटर दूर है।)


"पोता हुआ है, पोता हुआ है", यह चिल्लाती हुई एक बुढ़िया गाँव भर में भाग रही थी।

"बड़ी भाग्यशाली है, मेरी पुतौह (बहु), उसके आते ही पहले गिरवी रखा हुआ खेत छूट गया और अब पोता। पूरे गाँव में गुड़ बाँटूगीं।

शाम को ढोलक की थाप पर 'सोहर' गाए गए। हर तरफ खुशी ही खुशी थी।

नामकरण के दिन पूरे गाँव के लिए भोज रखा गया। पंडित जी ने कहा, "बहुत ही भाग्यवान है यह लड़का। माता लक्ष्मी और माता सरस्वती दोनों की कृपा होगी इस पर। राज योग है। इसका नाम 'राज' होना चाहिए।


पर माई और दादी अपने नंदन को नंदू ही बुलाती थीं।

कहते हैं पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। उसकी मुस्कान जैसे मनमोहन की मोहिनी। आँखें ऐसी जो सम्मोहित कर लें।

हर समय हँसता रहता था। रोना तो जैसे सीखा ही नहीं था। किसान का बेटा था इसलिए मिट्टी में बैठ कर भी खुश रहता था और चारपाई पर बैठ कर भी खिलखिलाता रहता। दस महीने में ही नंदू चलने लगा था।


समय आने पर मुंडन भी हुआ और जनेऊ संस्कार भी। बस किसी ने जिस बात का नाम नहीं लिया वह थी.....


7. विद्यारम्भ संस्कार

अब नंदू चार साल का हो गया। अनपढ़ किसान का बेटा था इसलिए शिक्षा की ओर किसी का ध्यान ही नहीं दिया। किसी ने सोचा ही नहीं के उसे विद्यालय भेजा जाए।

जनमाष्टमी का दिन था। नंदू की माई ने उसे कृष्ण- कन्हैया के जैसे तैयार किया। पीतांबर उढ़ाया, मोर-पंख वाला मुकुट पहनाया, हाथ में बाँसुरी दी। बहुत ही कांतिवान लग रहा था नंदू।


पंडित जी ने देखा उसे देख उसके चरण- स्पर्श कर लिए और कहने लगे गौ- लोक से साक्षात श्री कृष्ण उतर आएँ हैं धरती पर। बड़े ही स्नेह से उन्होंने उसे माखन- मिश्री खिलाई। ऐसा लग रहा था जैसे एक भक्त, अपने प्रभु की आराधना कर रहा हो।


अगले ही दिन पंडित जी नंदू के घर जा पहुँचे। कहने लगे, आज विद्यारम्भ संस्कार का शुभ मुहूर्त है, इसलिए चला आया। पंडित जी की बात सुन नंदू के बाबा (पिता) बोले, "पंडित जी ग़रीब किसान का बेटा पढ़कर भी हल ही तो जोतेगा, क्या करना है इसे स्कूल भेजकर!"

"इतनी मुश्किल से तेरे गिरवी रखे खेत छूटे फिर भी तू नासमझ ही रहा। अगर तू पढ़ा- लिखा होता तो यूँ ही कागज़ पर अंगूठा नहीं लगाता। पढ़ना सिर्फ नौकरी के लिए नहीं अपने लिए भी जरूरी है। और मैं तो अपने- आप आया हूँ, पंडिताई भी नहीं लूँगा।"


नंदू की माई बोली 'विद्यारम्भ संस्कार' यह क्या और क्यों होता है? पंडित जी ने समझाया, "विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। मैं आज इसे 'ऊँ ' लिखना सिखाऊँगा। जाओ एक थाली में चावल लाओ और नंदू को मेरी गोद में बैठाओ।"


माई ने ऐसा ही किया। पंडित जी ने हाथ पकड़कर नंदू से चावलों में 'ऊँ' लिखवाया।

फिर ज़रा सख़्त आवाज़ में बोले, "कल इसका विद्यालय में दाखिला करा देना।"

क्या पंडित जी कुछ ऐसा देख पा रहे थे जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी!


8. नई भोर

उस छोटे से गाँव में एक ही स्कूल था। पंडित जी की बात की अवहेलना करना उचित नहीं था इसलिए उनकी बात को मान देते हुए अगले ही दिन नंदू के बाबा श्री लीलाधर हाई स्कूल गए और नंदू का दाखिला करा दिया। इसी के साथ नंदू के जीवन में नई भोर ने दस्तक दी।

अब रोज़ सुबह नहा-धोकर, माई- बाबा का आशीर्वाद ले नंदू स्कूल जाने लगा। किसी ने सोचा भी न होगा के इतना मन लगाकर पढ़ाई करेगा नंदू!


समय के साथ उसका ज्ञान बढ़ता गया। विवादपूर्ण विषयों पर प्रमाण तथा युक्तियाँ देना उसे अच्छा लगता था। अपनी मेहनत और लगन के कारण सभी शिक्षकों का वह प्रिय था।

नंदू जितना विद्वान था उतना ही गुणवान भी। स्कूल से आने के बाद बाबा की खेत पर मदद करता। शाम को गाय को चारा डालता, गोबर उठाता। यह सब करके पढ़ने बैठ जाता। रात को दादी के तलुओं पर सरसों का तेल लगाता और पैर दबाता।


अब हर साल फसल कटने के बाद अनाज मंडी में भी नंदू अपने बाबा के साथ जाने लगा। बिचौलिए अब उनका हक मार नहीं सकते थे। सरकार की नीतियाँ, न्यूनतम खुदरा मूल्य सब उसे समझ आते थे। इस तरह घर के हालात पहले से बेहतर होने लगे तो पाँच बीघा खेत भी खरीद लिया। पक्का घर भी बनवा लिया।

हर सुबह मंदिर जाकर नियमित पूजा करने के बाद माई पंडित जी से कहती, "आपने तो ग़रीब की झोली ख़ुशियों से भर दी। न आप आते, न नंदू स्कूल जाता, न ही हमारे दिन फिरते।" पंडित जी हँसकर कहते, "सब ईश्वर की माया है। जो हुआ अच्छा हुआ और आगे भी अच्छा ही होगा।"


साल दर साल अव्वल आने के बाद, नंदू ने हाई स्कूल की परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर ली। पर अब आगे क्या करेगा नंदू? उसके गाँव में तो आगे की शिक्षा के लिए विद्यालय ही नहीं था।


9. वे दो साल

क्या नंदू सच में एक अध्ययनशील बच्चा था, जिसे पढ़ते समय सबसे ज्यादा खुशी होती थी? क्योंकि इसका उत्तर 'हाँ' था इसलिए आगे की शिक्षा के लिए उसने मिथिला की ह्रदयस्थली बेनीपट्टी में अवस्थित डॉ० नीलाम्बर चौधरी महाविद्यालय में दाखिला ले लिया। उसने इस महाविद्यालय का बहुत नाम सुना था।


(यह महाविद्यालय बेनीपट्टी निवासी स्वनामधन्य बाबु डॉ० नीलाम्बर चौधरी जी द्रारा सन 1985 में स्थापित किया गया था। इसका उदक बिहार के सुदुर ग्रामीण, अविकसित मिथिलांचल एवं सीमावर्ती नेपाल के अति पिछड़े क्षेत्र के छात्र - छात्राओं के बीच शिक्षा के सम्यक प्रदान करना था। यहाँ से शिक्षा प्राप्त छात्र राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित होकर इसे गौरवान्वित कर रहे है। )


इस महाविद्यालय में जाकर तो नंदू की प्रतिभा में और अधिक निखार आ गया। इस महाविद्यालय ने हीरे को तराशने की भूमिका निभाई। गाँव का समझदार सीधा- सादा नंदू धीरे-धीरे अंग्रेजी बोलना भी सीखने लगा।


उसे आगे बढ़ता देख उसके माई- बाबा फूले नहीं समाते थे। पंडित जी उसे सफलता के लिए ढेरों आशीष देते। वे सदा कहते, "तू संस्कारी है, विद्वान है, माता का हाथ है तेरे सिर पर, तू बहुत आगे जाएगा।" वह बस मुस्करा देता और कहता पंडित जी पहली कक्षा में गुरू जी ने सिखाया था के कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, मैं बस उसी सीख का पालन कर रहा हूँ।


कब दो बरस बीत गए पता ही नहीं चला। अब नंदू बारहवीं की परीक्षा पास कर चुका था। अब समय ने नंदू की पहली परीक्षा ली। जिस दिन उसे काॅलेज में दाखिले का फार्म भरना था उसी दिन सुबह उसकी दादी का स्वर्गवास हो गया।

क्या नंदू आगे की पढ़ाई कर पाएगा?


10. शहरी रंग- ढंग

नंदू की माई पढ़ाई का मूल्य समझ चुकी थी। इसलिए दादी के दाह- संस्कार के तुरंत बाद ही उन्होंने नंदू को मधुबनी के राम-कृष्ण काॅलेज जाने को कहा। अंतिम क्षण में नंदू ने फार्म भर दिया। शीघ्र ही उसे अर्थ शास्त्र में बी. ए. में दाखिला मिल गया।


यहाँ से आरंभ हुआ नंदू का शहरी जीवन। रोज़ पच्चीस किलो- मीटर चलना आसान नहीं था इसलिए नंदू ने साइकिल ले ली। अब सुबह- सुबह अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ, नंदू निकल पड़ता अपने काॅलेज की ओर। लेक्चर के बाद नंदू लाइब्रेरी में चला जाता। वहीं बैठकर घंटों पढ़ा करता।


वैसे तो नंदू बुद्धिमान था पर शहरी हवा से न बच सका। एक बार जब दोस्त के ज़िद्द करने पर जब वह कॉलेज की कैंटीन में गया तो उसके तो रंग- ढंग ही बदलने लगे। अब कैंटीन में बैठना, दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना उसके लिए आम बात थी।

ऐसे ही एक दिन दोस्तों से बातों- बातों में सिगरेट पीने की शर्त लगा ली। हारना नंदू ने सीखा ही नहीं था, यह शर्त वह कैसे हार सकता था? आख़िरकार जीत ही गया। कब एक बार के खेल से, सिगरेट उसकी आदत और जरूरत बन गई, यह वह स्वयं भी नहीं जान पाया।


एक दिन नंदू गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के पीछे बैठकर कश लगा रहा था, अचानक पंडित जी वहाँ से गुज़रे, उन्होंने नंदू को देख लिया था। नंदू डर के मारे पानी- पानी हो गया। वे नंदू से बोले, "कलि को मस्तक पर धारण करना है या पैरों तले कुचलना है, कलियुग में मनुष्य के विवेक की यही पहचान है," और यह कहकर वे आगे बढ़ गए।


नंदू को अपनी भूल का अहसास हो गया। पुनः पुराने नंदू का पदार्पण हुआ।

उसकी बी. ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। तदुपरांत अर्थ शास्त्र में एम. ए. किया। इसके साथ जीवन की नई उधेड़न- बुन शुरू हो गई।


11. कुदरत का कहर

खेतीहर के बेटे ने पढ़- लिखकर भी खेत का ही रुख किया। वह खेतों में ही काम करना चाहता था, पर माई- बाबा की ज़िद के आगे हार गया।

उसने नौकरी के लिए आवेदन पत्र भरने शुरू किए। पर अभी साक्षात्कार के लिए कोई भी बुलावा नहीं आया था। फिर उस पर और उसके गाँव पर कुदरत का कहर टूटा।


मधुबनी जिले में बेनीपट्टी के पास महाराजी बांध दस से पंद्रह फुट की दूरी पर दो जगहों से टूट गया था, जिससे गाँव में बाढ़ की स्थिति काफी भयावह हो गयी थी। यहाँ तक कि उसके आस पास के गाँव और टोले टापू में बदल गये थे। बाढ़ के कारण हजारों परिवारों को भोजन और पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा था। बाढ़ से घिरे लोग त्राहिमाम कर रहे थे। बाढ़ के कारण कई परिवार बेघर हो चुके थे।इस बाढ़ में लगभग पैंसठ लोगों की मृत्यु हुई। मरने वालों में नंदू के बाबा भी थे।


बाढ़ के कहर से जब बांध ढह गया तो घर की क्या बिसात। वह भी नहीं रहा। खेत में पानी भर गया और खड़ी फसल बर्बाद हो गई।

दो दिन से माई ने कुछ खाया नहीं था, गर्म पानी से अपनी भूख मार रही थी। आज तो चूल्हा भी ठंडा था क्योंकि जलावन की लकड़ी भी नहीं थी।


अब न बाबा थे, न घर था, न खेत और न ही फसल! बैंक का कर्ज था वो अलग।

ऐसे में क्या करेगा नंदू?


12. दिल्ली की ओर

नंदू के गाँव के बहुत से लड़के दिल्ली में काम करते थे। यह सोच उसने भी दिल्ली आने का फैसला किया। माई को अकेला छोड़ वह आना तो नहीं चाहता था पर मजबूरी जो न करवा ले वह थोड़ा है।


पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद जब नंदू बाहर निकला तो उसे श्यामू दिख गया। वह नंदू के ही गाँव का था। नंदू ने उसे बताया कि वह यहाँ नौकरी की तलाश में आया है, श्यामू तो यह बात सुनकर ज़ोर- ज़ोर से हँसने लगा और बोला, "यहाँ भी कहाँ है नौकरी!"


अर्थ शास्त्र के ज्ञाता नंदू को 'माँग और आपूर्ति' का नियम समझने में देर न लगी। वह समझ गया के नौकरी मिलना आसान नहीं है। उसने श्यामू से कहा वह भी रिक्शा चलाएगा। श्यामू फिर हँसा! "अरे! रिक्शा ही चलाने था तो इतनी माथा- पच्ची क्यों की!" उसके हिसाब से पढ़ाई किसी परेशानी से कम न थी।


नंदू को बुरा नहीं लगा। अगले ही दिन उसने रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। माँजी उसकी पहली सवारी थीं। नंदू उनमें उसी दिन से माई की झलक देखने लगा था।


13. वापसी

माई से बात करने के बाद नंदू बहुत खुश था। उसने माई को कहा कि वह उसी रात की ट्रेन पकड़ कर लौट आएगा।


उसने आज मालिक से रिक्शा नहीं ली। वह बाज़ार गया माई के लिए एक साड़ी खरीदी, एक शाल और एक गर्म रजाई भी ले ली। फिर उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने माँजी के लिए भी सलवार- सूट लिया। यह सब खरीदने के बाद उसने अपने लिए एक सफेद कमीज़ और काली पैंट ली।


माँजी के पास जाकर उनसे विदा ली और दोबारा आने का वादा किया। जाने से पहले सलवार- सूट देते हुए बोला, " माँजी इस ग़रीब बेटे की यह भेंट स्वीकार करें।"

फिर दुकान के मालिक को भी जाने के बारे में बता दिया। बहुत जल्दी में था, रात नौ बजे की ट्रेन जो पकड़नी थी। सारा दिन भागा-दौड़ी करके जल्दी से दाल- रोटी खाई, ढाबे से बाहर निकलते ही उसने कुछ ऐसा देखा कि वह सन्न रह गया।


क्या देखा था उसने?


14. औकात

मैं दोस्तों के साथ पान की दुकान पर खड़ा था। वहाँ खड़े रहकर भद्दे मज़ाक और लड़कियों पर छींटाकशी हमारा रोज़ का काम था।

नंदू ने मुझे वहाँ सिगरेट पीते हुए देखा था। मैंने उसे देख कर भी अनदेखा कर दिया। आखिर एक रिक्शावाला ही तो था वह!


पर शायद माँ को माँजी कहते- कहते वह मुझपर भी हक समझने लगा था। उसने आव देखा न ताव मुझे एक थप्पड़ जड़ दिया और मेरे हाथ को कसकर पकड़ लिया। इससे पहले कि मेरा कोई दोस्त उसे रोक पाता वह मुझे खींचकर घर तक ले गया।


"समय बर्बाद मत करो बाबूजी, अब नौकरी ढूँढ लो," वह बोला। मैं बहुत गुस्से में था। उसको उसकी औकात बता मैं घर के अंदर चला गया।

मन में डर था कि अगर नंदू ने माँ को बता दिया तो.......


इस 'तो' का उत्तर किसी के पास नहीं था।


15. कौन आया था?

बहुत दिनों से नंदू दिखाई नहीं दिया तो मैंने माँ से उसके बारे में पूछा। माँ ने बताया कि वह अपने गाँव वापस चला गया है।


मैंने माँ से कहा, "जरूर कहीं तगड़ा हाथ मारा होगा। तभी चला गया। तुझसे तो कुछ नहीं ले गया। तू बहुत भोली है, जल्दी ही बातों में आ जाती है।"

धीरे-धीरे नंदू और उसकी बातें पुरानी हो गईं। एक साल बहुत लंबा समय था उसको भुलाने के लिए। मुझमें और मेरे व्यवहार कोई परिवर्तन नहीं हुआ।


एक दिन जब मैं शाम को घर लौटा तो घर के बाहर से एक सरकारी गाड़ी को जाते देखा। मन में लड्डू फूटने लगे, शायद माँ का जो बकाया (एरियर) था, वह मिल गया। अब तो मौज़ ही मौज़ थी। यह सोच सीटी बजाता हुआ घर के अंदर चला।


मेज़ पर तीन कप रखे थे, एक प्लेट में बिस्कुट थे, फटाफट दो बिस्कुट मुँह में डाले। इससे पहले कि माँ से पूछ पाता माँ बोल उठी, "मेरी एक सालों पुरानी सहेली अपने बेटे के साथ आई थी। सरकारी दफ्तर में बड़ा अफ़सर है। मैंने तेरी नौकरी की बात छेड़ी है। उन्होंने वादा तो नहीं किया, पर यह कहा कि कोशिश करूँगा।


16. पहला दिन

माँ आखिर माँ ही होती है, लगता है अपनी सहेली और उसके बेटे के पीछे ही पड़ गई होगी। तभी तो दस दिन बाद ही माँ ने मुझे ओमप्रकाश कांट्रेक्टर का नाम और फोन नंबर दिया और जाकर उसी दिन मिलने को कहा।

आज़ाद परिंदे के पंख कुचलने की कोशिश कर रही थी मेरी माँ। जाना नहीं चाहता था पर उसकी मुस्कान की ख़ातिर चला गया।


मुझे उसी दिन से अस्थायी रूप से काम पर रख लिया गया। पहनने को सरकारी नीली वर्दी और टोपी भी दी गई। कपड़ों को पहन जब मैंने खुद को देखा तो मुझे पिताजी की इकलौती फोटो याद आ गई। वे भी ऐसे ही कपड़ों में थी।


"अरे! अब सजता ही रहेगा या कुछ काम भी करेगा।" कांट्रेक्टर ने गुस्से में आवाज़ दी। जा पहले जाकर बड़े साहब को पानी देकर आ, फिर आगे का काम बताता हूँ।

'राज नंदन कुमार' यह नेम प्लेट पर लिखा था। पानी लेकर मैं अंदर दाखिल हुआ। पानी रखने के बाद जैसे ही साहब के चेहरे को देखा तो देखता ही रह गया। वह और कोई नहीं 'नंदू रिक्शावाला' था।




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