"अपनत्त्व की चाह"
"अपनत्त्व की चाह"
आदरणीय सासूमाँ,
सादर चरण स्पर्श,
वह दिन अच्छी तरह याद है,जब आपने हाथ पकड़ कर मेरे नए घर में मुझे प्रवेश कराया था। बहुत खुश थी आपसे वह अपनत्त्व पाकर।वह ममता, स्नेह, आपके भीतर माँ की ही छवि नज़र आई थी और मन ही मन निर्णय लिया था कि उतने ही प्यार व अपनत्त्व से इस घर को अपनाउँगी,और अपनी तरफ से पूरी कोशिश भी की थी।
किन्तु जल्द ही आपने मुझे ये एहसास दिलाना शुरू कर दिया कि ये घर मेरा है ही नहीं। मैं तो यहाँ पराए घर से आई एक लड़की हूँ, जो इस घर का हित सोच ही नहीं सकती।
मेरे हर काम में मीन मेख निकालना,मुझे नीचा दिखाना आपकी आदत में शुमार हो गया। बहुत कोशिश की चीजों को सम्हालने की,आपके दिल में जगह बनाने की,किन्तु नाकामयाब रही। आखिर आपने अपने मन में ये धारणा ही बना ली थी कि मैं तो पराई ही हूँ।मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए। जो अपने सपनों का महल खड़ा किया था,वह धराशायी होने लगा।
किन्तु मैं हार नहीं मानूँगी,आपकी धारणा मेरे प्रति बदल कर रहूँगी।मेरा समर्पण मेरे परिवार के प्रति बना रहेगा।मैंने ये पत्र लिखा तो है, किन्तु मुझे लगता है इसे आप तक पहुंचाने की जरूरत ही नहीं है। मैं अपने प्रयासों से,समर्पण से आपके दिल में अपनी जगह बनाउँगी।
आपकी प्यारी बहू।
